किस किस के सीने को छलनी करोगे ? सावधान ! खूनी संविधान का खेल जारी है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति ,काठमांडू,२२ भाद्र |

सावधान ! खूनी संविधान का खेल जारी है । चाहें तो दिल थाम कर देखें या थोड़ी भी मानवता या इंसानियत बची है तो आँखों में नमी भर कर देखें, या फिर कुछ को छोड़, नेपाल की बाकी जनता की तरह चटखारे और मजे लेकर देखें । पर देखना तो है, क्योंकि इसके सिवा और कोई रास्ता भी नहीं है । देश की जनता अपने आकाओं से अधिकार के लिए bloodलड़ रही है, रोज मर–मर कर आन्दोलन कर रही है, किन्तु राज्य उसे दंगा का नाम देकर देश की हिफाजत के लिए हथियारों का संकलन कर रही है, अपने प्रहरियों को खुलेआम गोली चलाने की छूट दे रही है । एक ओर हमारे सक्षम (असक्षम) प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मधेशियों के अधिकारों में कटौती नहीं होगी दूसरी ओर उनके लिए ही हथियारों के जखीरे की तैयारी कर रहे हैं । वीरगंज की जमीन खून से रंग गई किन्तु सत्तासीन नेतागण (खास कर ओली जी) ५६ के अाँकड़े को पार करने का इंतजार कर रहे हैं, उनकी निगाहों में मनुष्य की जिन्दगी की कीमत संख्या और गिनतियों में सिमट गई है । और अभी तो सिर्फ २९ की गिनती पूरी हुई है । संख्या बढे इसकी तैयारी जोर शोर से हो रही है । किन्तु, क्या इसके दूसरे पक्ष से राज्य खुद को अलग रख सकती है ? जब एक बार फिर मधेश की जनता हिंसा की राह पर खुद को बढ़ाने के लिए मजबूर हो जाएगी, एक बार फिर कई ऐसे भूमिगत समूह पैदा हो जाएँगे जिनकी मार सिर्फ मधेश की जनता ही नहीं देश को भी भुगतनी पड़ेगी ? ये किस नए नेपाल की नींव रखने जा रहे हैं हमारे कर्णधार ? क्या मधेश को बन्दूक की नोंक पर रखकर संविधान लागु कर के सम्पूर्ण देश का विकास सम्भव है ? देश का एक हिस्सा सुलगता रहे, शोषित होता रहे, तो क्या इसकी तपिश राष्ट्र को महसूस नहीं होगी ? आज अगर मधेशी और थारुओं को सरकार ने सम्बोधन नहीं किया तो कोई आश्चर्य नहीं होगा कि देश के अलग अलग हिस्सों में टिकापुर जैसी घटनाएँ दुहराई जाएँगी, क्योंकि थारुओं और मधेशियों की उपस्थिति हर जगह है । किस किस के सीने को छलनी करेंगे और कब तक करेंगे ?

आन्दोलन के क्रम में बारा और पर्सा में प्रहरियों ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया है यह मानवअधिकार कर्मियों ने भी माना है अपनी जाँच के पश्चात । किन्तु एक जो दुखद वक्तव्य आया कि तालीम के अभाव में सुरक्षा कर्मियों ने यह गलती की उन्हें भीड़ नियंत्रण करना नहीं आया इसलिए गोली माथे में लगी और वह भी आन्दोलनकारियों को नहीं सर्वसाधारण को । क्या मजाक है, फिर ऐसे हाथों में देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी का औचित्य क्या है ? जाहिर सी बात है कि इस पर भी लीपापोती की जा रही है । और फिर उन्हीं हाथों में और भी हथियार और अधिकार देने की साजिश की जा रही है जो तालीम के अभाव के पीछे सरकार की मंशा पूरी करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं । किन्तु क्या यह नीति दूरगामी सिद्ध हो पाएगी ? यह नीति विस्फोटन की स्थिति को पैदा कर रही है जो निःसन्देह देश के हित में नहीं है । समाधान खोजना है तो संविधान की प्रक्रिया को रोकना होगा, देश की आधी आबादी को सम्बोधित करना होगा, नहीं तो बन्दूक की नोक पर जारी संविधान देश, जनता और नेता के लिए कभी भी फलदायी सिद्ध नहीं होगा । आज ९० प्रतिशत का गणित बनाकर जो कदम परिचालन सरकार कर रही है उसका भविष्य अन्धकारमय है । जिस जनता के खून को बहाने की तैयारी हो रही है, या अब तक की गई है, नेता, उनसे ही बनते हैं और उनकी वजह से ही सत्तासुख का मजा चखते हैं । नेता यह ना भूलें की ताकत हमेशा एक की होकर नहीं रही है, आज आपकी है तो कल किसी और की होगी । अपने नाम के साथ एक काला इतिहास ना जोड़ें । पड़ोसी के इतिहास से सीख लें । एक ऐसा राष्ट्र जिसने आजादी की लड़ाई मिलकर लड़ी थी किन्तु अँग्रेजों ने ऐसे विषवृक्ष की जड़ को रोपा, जिसने बँटवारे के दर्द के साथ अपनी शाखें फैलाईं और जो आज भी दुश्मनी के साए में ही फल फूल रहा है । देश को घृणा और विध्वंश की राह पर ना धकेलें । मत भूलें कि अगर सचमुच हम लोकतंत्र में साँसें ले रहे हैं तो एक दिन चुनावी प्रक्रिया से भी गुजरेंगे और तभी यही निरीह जनता आपको आइना दिखाएगी । सोचें कि जिनका खून आप बहा रहे हैं उनकी संतति को किस नागरिक के रूप में आप तैयार कर रहे हैं ? और फिर उनसे आप कैसी राष्ट्रीयता की उम्मीद करेंगे ?

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