कुंवारी लड़कियां कर रही हैं अपना बेबी प्लान, बदल रहा है समाज

नई दिल्ली।।  30 साल की निकिता (बदला हुआ नाम) छह महीने पहले तक अपने भविष्य को लेकर कन्फ्यूजन में थीं। भाई की मौत के बाद मां-बाप का इकलौता सहारा निकिता पर शादी करने का दबाव था। लेकिन वह पैरंट्स की देखरेख के लिए शादी नहीं करना चाहती थीं।

रिश्तेदारों के दबाव में उन्होंने शादी का मन बनाया भी, मगर मनमाफिक विकल्प नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने जीवन भर सिंगल रहने का फैसला किया। अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने एक बोल्ड डिसीजन लिया। स्पर्म डोनेशन और सरोगेसी तकनीक की मदद से अब निकिता के घर में पांच महीने बाद किलकारी गूंजने वाली है। लेकिन यह कदम उठाने के लिए निकिता को अपने पैरंट्स, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

वसंत विहार में रहने वाली और एक प्राइवेट कंपनी की मालिक निकिता को डॉक्टर की मदद से एक स्पर्म डोनर मिल गए और उनकी मामी उनके लिए सरोगेट बनीं। उनकी सरोगेसी करवा रहीं डॉक्टर कहती हैं कि निकिता को एक ही बच्चा चाहिए था। आईवीएफ के ज्यादातर मामलों में जुड़वां बच्चे होने की संभावना रहती है, ऐसे में थोड़ा ज्यादा अलर्ट रहना पड़ा।

उम्मीद के हिसाब से निकिता का सिंगल बेबी आने वाला है। उनका कहना है कि सरोगेसी का सहारा लेने वाले शादीशुदा कपल का आना तो अब आम है। मगर किसी अनमैरिड लड़की के इसके लिए एप्रोच करने के मामलों की अभी शुरुआत हुई है।

निकिता  कहती हैं…
मैंने एक बच्चा गोद लेने का फैसला किया। पुराने खयालों वाली मां का कहना था कि इससे हमारा खानदान आगे नहीं बढ़ेगा। ऐसे में मैंने खुद के बच्चे को जन्म देने का फैसला किया। डॉक्टरों की मदद से मुझे स्पर्म डोनर भी मिल गया मगर रिश्तेदारों का कहना था कि अगर मैं कंसीव करूंगी तो लोग बातें बनाएंगे। यही वजह है कि मैंने सरोगेसी का सहारा लिया। मुझे अपने फैसले पर गर्व है।

बदल रहा है समाज
यह समाज के बदलते नजरिये का एक नमूना है। पढ़ाई, करियर और परिवार से जुड़े हर मामले में अपनी जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा रहीं लड़कियां अब शादी और बच्चे को लेकर भी बोल्ड फैसले ले रही हैं।
डॉ. आशा शर्मा, रॉकलैंड अस्पताल की सीनियर गायनेकॉलजिस्ट

सरोगेसी फायदे का सौदा
आजकल वेडिंग प्लानिंग, इवेंट मैनेजमेंट की तरह सरोगेसी भी फायदे का बिजनेस बन गया है। डिमांड के हिसाब से कस्टमर को पैकेज दिए जा रहे हैं। पैकेज में स्पर्म डोनर, सरोगेट, डॉक्टर, हॉस्पिटल और लॉयर सब शामिल होते हैं। कम खर्च, लचीले नियम, डोनर व सरोगेट की आसान उपलब्धता ने इंडिया को सरोगेसी का हब बना दिया है। दिल्ली में इस पर 12 से 14 लाख रुपये का खर्च आता है।
डॉ. सुनीता मित्तल, एम्स के आईवीएफ डिपार्टमेंट की हेड  by नीतू सिंह from नवभारत टाइम्स

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