कुछ अलग भण्डारी:-

कुमार सच्चिदानन्द

राजनीति और वक्तृत्व का अर्न्तर्संम्बन्ध काफी गहरा होता है। यही वह बला है जिसके द्वारा राजनीतिज्ञ सत्य को मिथ्या और मिथ्या को सत्य में बदलकर अपनी पहचान और सम्मान सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। नेपाल के सर्दर्भ में यह बात बखूबी कही जा सकती है कि यहाँ के राजनीतिज्ञों ने इस कला में अपेक्षाकृत अधिक महारथ हासिल किया है। यही कारण है कि यहाँ की राजनीति में शब्दों की बाजीगरी अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है। ‘शब्द ही शब्द भयौ उजियारौ’ का पाठ यहाँ ज्यादा पढ लिया गया है, इसलिए शब्दों में ही उजाले की तलाश की प्रवृति अधिक देखी जा रही है। शब्दों के द्वारा ही मुद्दों को मण्डित किया जाता है और शब्दों के द्वारा ही उसके गले भी उतारे जाते हैं। शब्दों की चासनी में पगी हमारी राजनीति यह नहीं समझ पा रही कि कभी-कभी मर्र्दे भी जीवित होकर खडे हो जाते हैं और जब ये खडे होते हैं तो आसपास का वातावरण सहज नहीं रहता। तर्राई मधेश के सम्बन्ध में राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रायः ऐसा ही है और विगत के मधेश आन्दोलनों को इसी सर्न्दर्भ में देखा और समझा जा सकता है।
यह सच है कि न्पाल की राजनीति आज भी संक्रमण काल से गुजर रही है। इसके बावजूद यह तो कहा ही जा सकता है कि यहाँ प्रजातंत्र की स्थापना हो चुकी है। मगर यह मानने में कोई आपत्ति नहीं कि राजनीतिज्ञों में प्रजातांत्रिक संस्कार अभी भी विकसित नहीं हो पाए हैं। यही कारण है कि देश की आधी आबादी जिस तर्राई-मधेश में बसती है, उसकी मँगों के र्समर्थन में अगर कोई आवाज उठती है तो उसे राष्ट्रघात से जोडÞ दिया जाता है। चाहे वह मधेश-प्रदेश का मुद्दा हो या मधेशियों के सैन्य-प्रवेश का मुद्दा या कुछ अन्य ही। सारे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर विवादास्पद बना दिया जाता है। इस प्रक्रिया में राज्य और उसके विभिन्न निकायों के साथ-साथ सूचना -तंत्र की भी महत्वपर्ूण्ा भूमिका होती है। यही कारण है कि पिछले दिनों तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री शरद सिंह भण्डारी ने भावनात्मक स्तर पर जब यह बात कही कि अगर मधेश के बाईस जिलों को समेट कर नहीं चला गया और अगर कल इन बाईस जिलों के लोग इस देश के साथ न रहने का फैसला किया तो देश का कोई नियम कानून उन्हें बाँध रखने में सक्षम नहीं। निश्चित ही भाषाशास्त्रीय और संवेदनात्मक दृष्टिकोण से श्री भण्डारी का यह कथन न तो राष्ट्रीय अखण्डता पर प्रश्न-चिहृन खडÞा करता है और न ही इससे राष्ट्रद्रोह की बदबू आती है। मगर राष्ट्रीय राजनीति में इसने जो भूचाल पैदा किया उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आज भी हमारी राष्ट्रीय राजनीति भेदभाव के मनोविज्ञान से ऊपर नहींे उठ पायी है। वास्तव में इस सम्पर्ूण्ा प्रकरण में अदूरदर्शी उन्हें कहा जा सकता है जो इस कथन के पीछे छुपी संवेदना को नहीं समझ पा रहे और विरोध के गीत बदस्तूर गा रहे हैं।
निश्चित ही श्री भण्डारी जन्मना मधेश से नहीं जुडÞे हैं लेकिन कर्मणा वे मधेश-पुत्र हैं और उनकी राजनैतिक पहचान का आधार भी मधेश ही है। इसलिए हमें यह कबूल करना ही चाहिए कि मधेश की रूझान और उसकी संवेदना का ज्ञान उन्हें भली-भाँति है। इसलिए उनका यह विचार भावुकता या शब्दों का फिसलन नहीं वरन एक ऐसा यथार्थ है जो सहजता से निगला नहीं जा सका। वास्तव में राष्ट्र का विभाजन न तो मधेश का मुद्दा है और न ही आकांक्षा। लेकिन जब कभी मधेश को सामाजिक न्याय के धरातल पर खडÞा करने की बात होती है तो तथाकथित राष्ट्रवादी इसमें राष्ट्रद्रोह की छाया देखते हैं और राष्ट्र की अखण्डता पर खतरा के रूप में इसकी व्याख्या करते हैं। सवाल यह है कि सही चिकित्सक कौन( लक्षणों के आधार पर रोग का इलाज करनेवाला या रोग के कारणों को समझकर उसका निदान करनेवाला – किसी न किसी रूप में भण्डारी यहाँ उस तथाकथित राष्ट्रवादियों के षडयंत्र का शिकार हुए हैं जिनका दृष्टिकोण कम से कम मधेश और उसके मुद्दों के प्रति अतिवादी है। वैसे भी प्रतिरक्षा जैसा महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय किसी मधेश र्समर्थक दल के प्रतिनिधि को मिलना सहज रूप में नहीं लिया जा रहा था और विभिन्न रूपों में इसका विरोध जारी था। उनका यह बयान प्रबल विरोध का बहाना मात्र बना।
श्री भण्डारी की यह बर्खास्तगी कुछ अर्थों में अलग महत्व रखती है। यह सच है कि मधेश आन्दोलन में दर्जनों लोगों ने अपनी शहादत दी जिसके परिणामस्वरूप देश में अनेकानेक राजनैतिक परिवर्तन हुए और आज भी यह प्रक्रिया धीरे-धीरे ही सही मगर जारी है। लेकिन इसका सवर्ाीधक लाभ मधेशवादी दलों को मिला क्योंकि आज इनसे जुडÞे लोग अनेक राजनैतिक पदों को सुशोभित कर रहे हैं और अनेक महत्वपर्ूण्ा मंत्रालयों का नेतृत्व भी उनके हाथ में है। यह अलग बात है कि परम्परागत सोच के कारण यह परिवर्तन सुपाच्य नहीं है लेकिन इस सच्चाई से मुँह भी नहीं मोडÞा जा सकता है कि आज सत्ता के प्रमुख घटक के रूप में मधेशवादी दल राष्ट्र के नीतिगत और प्रशासनिक मुद्दों को अंजाम दे रहे हैं और साधिकार सरकार को सहयाग दे रहे हैं। लेकिन मुद्दों पर पदीय शहादत के उदाहरण बहुत अधिक नहीं हैं। पहली बार यह अवसर मौजूदा उपराष्ट्रपति को मिला लेकिन किसी न किसी रूप में उन्हें संजीवनी मिली और उन्होंने पदीय रूप में पुनः जीवन ग्रहण किया। शिकायत उनकी भी थी कि मधेशवादी दलों से उन्हें अपेक्षित र्समर्थन नहीं मिला। भण्डारी भी फिलहाल उसी जमीन पर खडÞे हैं। अन्तर यह है कि ये जमीन से जुडÞे नेता हैं इसलिए अपने दृष्टिकोण पर अडिग हैं और इसका मूल्यांकन आम लोग कर रहे हैं।
भण्डारी के बयान का विरोध प्रमुख विपक्षी नेपाली काँग्रेस, नेकपा एमाले और सत्तारूढÞ नेकपा माओवादी का एक घटक ने भी किया। संसद अवरुद्ध कर सरकार पर दबाब बढÞाया गया कि वह श्री भण्डारी को मंत्री पद से कार्यमुक्त करे। लेकिन विपक्षियों के इस कदम ने एक तरह से भण्डारी को मधेश का नायक बनने का अवसर भी दिया है। यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में सरकार और सत्ता परिवर्तन का जो खेल हुआ और उसमें मधेशी दलों की जो भूमिका रही, इससे कम से कम आम मधेशी अपने नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन श्री भण्डारी ने मधेश के मुद्दे पर पदीय शहादत देकर आम लोगों के मन में आशा और विश्वास का दीप जलाया है। एक तरह से स्वयं को उन्होंने ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है जो जाति, वर्ग और समुदायगत संकर्ीण्ाताओं से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में सीमांतीकृत वर्ग की आवाज बुलंद करने की कोशिश करे। इसके लिए पदीय स्वार्थ को भी उन्होंने त्यागा और कुशल नेतृत्व का आदर्श आम लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। यह अलग बात है कि भविष्य में वे इस संवेदना का वहन किस हद तक कर पाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भण्डारी के विरोध का एक मात्र आधार था ( उनकी परम्परागत राजनैतिक सोच। क्योंकि ‘हमारी बिल्ली हमसे म्याउFm’ की स्थति वे झेलने को तैयार नहीं और मधेश की हर माँग उन्हें ऐसी ही लगती है। यद्यपि जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे गाँठ तो ढीली हो ही रही है। लेकिन कुछ मधेशी नेताओं ने भी मुखर होकर उनका विरोध किया। ऐसा तो माना जा सकता है कि राजनीति में र्समर्थन और विरोध का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। सामान्य तौर पर विचारगत, व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थ ही र्समर्थन और विरोध का आधार बनता है। लेकिन मधेशी नेताओं द्वारा भण्डारी के विरोध का कारण है कि प्रथम तो वे जो अब तक स्वयं को मधेश का मसीहा मान रहे थे, उनके सिंहासन पर काबिज होने के लिए किसी दूसरे की आहट उन्हें सुनाई पडÞती है और द्वितीय गैरमधेशी द्वारा मधेश के मुद्दे पर प्रमुखता प्राप्त करना किसी न किसी रूप में उनके राजनैतिक स्वाभिमान पर चोट है। आदर्श स्थिति तो यह है कि मुद्दों के र्समर्थन में अगर दुश्मन भी सामने आए तो उसे गले लगाना चाहिए और बदली हर्ुइ परिस्थिति में भण्डारी का राजनैतिक व्यक्तित्व कम से कम मधेश विरोधी नहीं है।
आज मधेश के मुद्दे पर राष्ट्रीय राजनीति और मधेश में जो पार्थक्य या विरोधाभास देखा जा रहा है उसका मूल कारण भेदभावपर्ूण्ा मनोविज्ञान और पर्ूवाग्रहयुक्त पारम्परिक राजनैतिक चिन्तन है जिसके कारण वर्ग विशेष की मुक्ति, उसकी पहचान और स्वाभिमान की लगाम को हम ढीला नहीं करना चाहते। लेकिन यह भी सच है कि माँगें अगर न्यायोचित और वैज्ञानिक हैं तो आज न कल उसे देना राज्य की मजबूरी होती है। इसकी व्याख्या-अपव्याख्या कर इसे बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता। यह मधेश और इसके मुद्दे के लिए शुभ-संकेत है कि आज इसकेे प्रति गैर मधेशी आवाजें भी बुलंद होने लगी हैं और मधेश के आम लोग इसे गम्भीरता से ले रहे हैं। निश्चित ही इसका लाभ समय पर सम्बद्ध व्यक्ति को मिलेगा मगर प्रकारान्तर से यह मधेशवादी दलों के नेतृत्व के लिए चुनौती भी है कि अवसर साधना के लिए बदनाम मधेशी राजनीति इस घटनाक्रम से मुद्दों के आधार पर अवसरों और पदों की शहादत देने की शिक्षा ले पाती है या नहीं।
एक ओर मधेश आन्दोलन पर यह आरोप लगाया जाता है कि इससे यहाँ साम्प्रदायिक विद्वेष बढÞा है, एक विशेष वर्ग के प्रति मधेशी समुदाय की आक्रामकता बढÞी है। तस्वीर का दूसरा रूख यह है कि शरद सिंह भण्डारी मधेशियों के मतों से जीतते हैं और मधेश के जनप्रतिधि हैं। आज उनके पक्ष में मधेश में सहानुभूति की एक लहर सी है जो वैचारिक भी है और अनेक स्थानों पर प्रकट भी हर्ुइ है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि किसी समुदाय के प्रति मधेश की कोई कटुता नहीं, कटुता उनके प्रति है जो मधेश के मुद्दों का अवमूल्यन करते हैं और परम्परागत सोच के शिकंजे में मधेश को कसना चाहते हैं। लेकिन इस जकडÞ के प्रति मधेश में कशमकश तो है जो कभी भी अवसर पाकर अपनी देह फैलाने का प्रयास कर सकती है। यह सच है कि कभी आवेश में अप्रिय घटनाएँ हर्ुइं जो अब अतीत की बात बन गई। इसके आधार पर मधेश की सहिष्णुता की भावना पर प्रश्न-चिहृन नहीं उठाया जाना चाहिए। भण्डारी का यह प्रकरण यह प्रमाणित करता है कि यहाँ की धरती किसी विशेष वर्ग के लिए स्नेह-प्रेम की दृष्टि से बंजर नहीं हर्ुइ है और यहाँ एक समरस समाज की स्थापना की पर्याप्त संभावना है।
आज राष्ट्र उस चौराहे पर खडÞा है जहाँ से व्यवस्था और अराजकता दोनों का मार्ग अलग होता है। अगर हमारी राजनीति संकर्ीण्ाता और परम्परावादी चिन्तन से ऊपर उठकर आगे बढÞती है, सभी वर्गों की समीचीन माँगों को समेटकर नवीन व्यवस्था का सूत्रपात करती है तो हर दिशा से स्वागत की तालियाँ गूँजेगी और मधेश के भी हाथ इसमें पीछे नहीं रहेंगे। संकर्ीण्ाता और क्षुद्र स्वार्थ को वरण कर हम किसी लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकते। राष्ट्र का विभाजन मधेश का मुद्दा नहीं। बार-बार इसे अनापेक्षित ढंग से उठाकर आम लोगों की प्रतिबद्धता पर आघात नहीं किया जाना चाहिए।

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