Sun. Sep 23rd, 2018

कुछ हाइकु

कुछ हाइकु-मुकुन्द आचार्य
तेज हवा है पेडÞ गिर जाएंगे दूब बचेगी ! धूप है खिली सूरज से है मिली प्रेम पगली ! आदमी नहीं आदमी की भीडÞ में आदमी कैसा ! शीत लहरी जन्ता भेंड ठहरी सत्ता बहरी ! ‘वाऊ !’ सुन्दरी सत्ता गलियारे में चमचागिरी ! जिन्दगी-मौत दोनों सदा से सौत मेल बहुत ! अंधेरा घना नेता है थोथा-चना देश न बना ! आकाश खुला पर दिल न खुला विकास लूल्हा ! कौवे मोर हैं पहचान मुश्किल सब चोर हैं ! पानी की बूँदें जुल्फों में बनी रहें मोती चुनिन्दे तकलीफ है यहां सांस लेना भी साथ देना भी रास्ता लम्बा है न फूल हैं न छांव ये कैसा गांव प्रतीक्षा करो रावण भी मरा था वनवासी से
कन्यादान
गणेश लाठ
उडÞ चली मेरी परी गुडिÞया
छूटा बचपन का गलियारा
हर्ुइ आँखें माँ पापा की नम
देखो बसाने निकल पडÞी
लाडÞली एक आशियाना न्यारा
मिले असीम खुशियां अनन्त प्यार
ध्यान रहे दादा दादी के उद्गार
आस्था, आदर, प्रेम, सेवा, सत्कार
सदा सुखी रहे तेरा नयाँ परिवार
छूटा बाबुल का घर आँगन द्वार
मिले कुछ नये राहगीर बिछडÞे पुराने
ना घबराना कभी बिटिया रानी
पति अब तेरा हमकदम हमराज
सदा खुशहाल रहे तेरा घरसंसार।
शुभकामना
नव वर्षहर खुशी दे संसार को
घर-घर भर दे अमन और प्यार को
आतंक मिटे, भय-त्रास छुटे
सृजनशील सब निर्माण में जुटे
नव वर्षहो सुखदायक कहकर
र्सर्ूय को नमन करता हूँ
खुशियों से भरा नव वर्षमें
लो आज मैं गमन करता हूँ।
जन-जन में सेवा भाव हो
कहीं न कुछ भी अभाव हो
स्वच्छ चरित्र निर्माण हेतु
सब में सुदृढÞ भाव हो
जाति-पाति के हीन भाव से
मुक्त चमन करता हूँ
खुशियों से भरा नव वर्षमें
लो आज मैं गमन करता हूँ।
सुरेश पाण्डेय -समाज सेवी महोत्तरी जलेश्वर
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of