कुदरत का अनोखा कारीगरी है माँ कामाख्या मंदिर

माँ कामाख्या का मंदिर वाममार्ग की साधना के लिए दुनिया का सबसे सर्वोच्च स्थल माना गया है

पूजा गुप्ता , दुहवी, नेपाल | बेहद हसीन एवं सुन्दरता से सर से लेकर पाँव तक ढँका हुआ है विभिन्न जाति ..संस्कृतियो की भीड़ ..भाड़ में अपनी अलग पहचान बनाये हुए पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार गुवाहाटी सीटी जो की असम का सबसे बड़ा शहर माना जाता है ।जो कि न केवल अपने संस्कृति ,व्यापारिक और धार्मिक गतिविधियो का मुख्यालय माना जाता है बल्कि ये शहर अपनी मनमोहक आकर्षण से सारी दुनिया को सम्मोहित कर देने वाली सुंदरता के कारण भी सारे संसार के सामने इसका एक अलग ही मनमोहक अंदाज़ है । पर यहाँ आकर अगर आपने अनोखा ,अद्भुत ,अकल्पनीय , अविश्वासनिय रहस्यों से ओत ..प्रोत रहस्यमयी कामाख्या माँ की मंदिर के दर्शन ना किए तो समझिए आपकी यात्रा अधूरा एवं अपूर्ण ही रह गई ।तो चलिए आज़ हम उन सारे रहस्यों का पिटारा खोलते है और आपको सारी जानकारी देते है इस अतुल्य ,अद्भुत मंदिर के बारे में । कुदरत का अनोखा कारीगरी है माँ कामाख्या का मंदिर । जो ना केवल गुवाहाटी बल्कि आसाम का अगर मैं दिल कहुं तो गलत ना होगा । ये मंदिर गुवाहाटी का सबसे लोकप्रिय , प्रमुख ,विशेष अटैक्शन है । ये पौराणिक एवं बेहद प्राचीन मंदिर गुवाहाटी में स्वर्ग से भी ज्यादा खुबसूरत नीलांचल पहाडियो में स्थित है । इस मंदिर में मुख्यतः देवी कामाख्या के अलावा देवी काली के अन्य 10 रूपों जैसे धूमावती ,मतंगी ,बगोला ,तारा , कमला ,भैरवी ,चिनमासा , भुनेस्वरी और त्रिपुरा ,सुंदरी माताओ के भी दर्शन करने कॊ मिलते है ।कहा ये भी जाता है कि माँ कामाख्या शक्तिपीठ सबसे प्राचिनतम शक्तिपीठ है ।जब सती के पिता दक्ष ने अपनी पुत्री सती कॊ और उसके पति शंकर कॊ यज्ञ में बिना निमंत्रण के आमंत्रित होने पर भरी सभा में अपमानित कर अनाब ..शनाब कहा तो माता सती आहत हो उठी और उसी यज्ञ ..कुंड में खुद कि आहुती देकर आत्म ..दहन कर ली ।भोले शिव माता सती के पार्थिक शरीर कॊ अपने कन्धे पर रख कर तांडव ..संहारक निर्त्य करने लगे ।तब विष्णु जी ने अपने चक्र से माता सती के पार्थिक शरीर को काँट ..काँट कर धरती के भिन्न ..भिन्न हिस्सों में गिराया ।माँ सती का योनिभाग एवं गर्भाशय कामाख्या में गिरा और यही स्थल आगे चल कर माँ कामाख्या के नाम से सुप्रसिद्ध हो गया । इसके अलावा एक और दंतकथा प्रचलित है कि एक बार कि बात है कि देवता कामदेव किसी कारणवश अपना पुरूषत्व खो बैठे तो वो इस स्थान पर रखे सती के गर्भ और योनि कि सहायता से उन्हे अपना पुरूषत्व पुन: हासिल की ।इस मंदिर के बारे में ये भी कहा जाता है की इसी स्थान पर ही शंकर जी और पार्वती जी बीच प्रेम रूपी बीज अस्फुटित हुई थी ।
अगर हम अध्यन करेंगे तो पाएँगे की संस्कृत भाषा में प्रेम कॊ काम कहा जाता है शायद ये भी एक महत्वपूर्ण वजह है की इस स्थल का नाम कामाख्या पड़ा । मंदिर के पास अधूरी सीढियों कॊ देखकर हर कोई आश्चर्य से सराबोर हो जाता है पर इसके पीछे भी एक रहस्यमय वृतांत है । बहुत पुरानी एक समय की बात है की माँ कामाख्या की अद्वितीय कमनीय सुन्दरता कॊ देखकर नरका नाम राक्षस कामतुर हो गया अथवा उनसे परिणयसूत्र में बँधने का प्रस्ताव रखा परंतु देवी कामाख्या ने उसके प्रस्ताव कॊ यह कह कर स्वीकारा की उसकी एक शर्त अगर नरका पूरी कर देगा तो वो उसकी अनुचरी सदा के लिए बन जायेंगी ।वह अजीबोगरीब शर्त यह था की एक ही रात में नरका कॊ नीलांचल पर्वत से लेकर मंदिर तक सीढिया बनाना है ।नरका ने देवी के शर्त कॊ स्वीकार कर लिया और धराधर सीढियों कॊ बनाने लगा ।देवी कॊ संदेह होने लगा की नरकासुर इस काम कॊ कही पूर्ण कर ले इसलिए उसके कार्य में विघ्न डालने के लिए उनको एक उपाय सूझा ।एक कौवे कॊ उन्होने मुर्गा बना दिया और सूर्योदय से पहले ही बांग देने का आदेश दिया ।नरका कॊ एहसास हुआ की उसके हजारों जतोजहत करने के बावजूद भी उसकी शर्त अधूरी ही रह गई अथवा वो शर्त हार गया लेकिन जब उसे बाद में पता चला की देवी ने छल से उसको हराया है तो वो क्रोध से लाल हो गया अथवा मुर्गे कॊ मारने के लिए दौड़ा और उसकी बलि दे दी ।जिस जगह पर मुर्गे की बलि दी वो स्थल कुकुराकता के नाम से विख्यात हुआ और इस मंदिर की सिढिया आज़ भी ज्यों का त्यों अधुरी है । सारी पृथ्वी पर कामाख्या देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है जो हर वर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है ।जी हाँ भले ही रोचक जानकारी है पर ये सुन कर बड़ा ही अटपटा सा लगता है की देवी और महीनावारी यानि ” रजस्वला “पर ये सत्य है ।देवी पर अगाध विश्वास रखने वाले भक्तों का मानना है की प्रतिवर्ष देवी जून के महीने में माँ रजस्वला होती है और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र की नदी का रंग तीन दिनो तक लाल रहता है ।देवी पर अगाध विश्वास रखने वाले भक्तों का मानना है की प्रतिवर्ष देवी जून के महीने में माँ रजस्वला होती है और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र की नदी का रंग तीन दिनो तक लाल रहता है ।देवी पर अगाध विश्वास रखने वाले भक्तों का मानना है की प्रतिवर्ष देवी जून के महीने में माँ रजस्वला होती है और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र की नदी का रंग तीन दिनो तक लाल रहता है ।
उस समय तीन दिनो तक मंदिर का पट बँद रहता है साथ ही साथ पूरे आसाम में कोई शुभ कार्य नही होता और इस विशेष समय कॊ ‘अम्बूवाची पर्व “कहा जाता है ।बड़ी ही संख्या में माँ के भक्त , साधु ..संत ,अघोरियों एवं श्रधालुओं इस मेले में शामिल होने पर खुद कॊ भाग्यशाली मानते है । शक्ति के उपासक तांत्रिक नीलांचल पर्वत की गुफाओ में बैठकर अपनी साधना के तप से मनवांछित सिद्धियां की प्राप्ति करते है ।माँ कामाख्या का मंदिर वाममार्ग की साधना के लिए दुनिया का सबसे सर्वोच्च स्थल माना गया है । कहा जाता है कि मछन्द्रनाथ ,गोरखनाथ , लोनाचमारी ,इस्माईलजोगी आदि जितने भी जाने ..माने तांत्रिक थे वे ये से अपनी तंत्र ..मंत्र की साधना की थी ।वाममार्गी साधकों के लिए रजस्वला स्त्री और उसके रक्त का विशेष महत्व होता है इसलिए कामाख्या देवी के राजस्वला होने का समय तांत्रिक बाबाओ ,अघोरियों के लिए चाँदी ही चाँदी होता है । अम्बूवाची पर्व के शुरू होने से पहले माँ के गर्भगृह में स्थित योनि जिसे महामुद्रा के नाम से सम्बोधित किया जाता है उस जगह में सफेद वस्त्र पहनाये जाते है जो पूरी तरह से रक्त से भीग कर लाल हो जाता है ।तीन दिनो तक मंदिर का पट बँद रहता है ।पर्व समाप्ति के बाद यह वस्त्र माता के भक्तों में प्रसाद के तौर यही रक्त से लाल कपड़ो के टूकडो कॊ प्रसाद के तौर पर बाँट दिया जाता है । आस्था और विज्ञान के बीच एक महीन सी रेखा का अंतर होता है ।किसी ने ठीक ही कहा है की “मानो तो मैं गँगा माँ हूँ ना मानो तो बहता पानी !”देवी की मासिक धर्म (राजस्वला )होना ये सब आस्था और विश्वास की बाते है । वैज्ञानिक तर्क एक ये भी है और बहुत सारे लोगो का ये भी कहना है की इस पर्व के वक्त ब्रह्मपुत्र नदी में भारी मात्रा में सिंदूर डाला जाता है इसलिए नदी का रंग उस समय लाल हो जाता है ।बात चाहे जो भी हो यह सब एक गुह्य रहस्य और बहुत बड़ी विडम्बना है जिसको सुलझाना इसमे और उलझते जाने के समान है । कामाख्या माँ के मंदिर की शक्ति में आस्था ,श्रध्दा एवं विश्वास रखनेवाले यहाँ आकर खुद कॊ सौभाग्यशाली मानते है और अपनी ..अपनी मनोकामना भी पूर्ण कर लेते है । जिन्हे ये सारी बाते ढोंग,झुठ या मनघड़ंत लगती है या जो लोग नास्तिक होते है वो भी यहाँ आने के बाद माँ के चरणों में शीश झुकाने से खुद कॊ रोक नही पाते और साथ ही साथ स्वीकारते भी है की इस धरती पर भगवान है । खैर बात चाहे जो भी हो मासिक धर्म ,माहवारी ,रजस्वला के दौरान हम कही ना कही माँ कामाख्या के रुप में स्त्रीत्व कॊ पूजते है ।उनके रक्त से लाल कपड़े कॊ प्रसाद के रुप में पाना परमभाग्य मानते है पर, लेकिन ,परंतु हमारे समाज में किसी लड़की या महिला का मासिक धर्म में आने के पश्चात हम उसे अपवित्र मानते है और धार्मिक पूजा ..पाठ एवं पूजा स्थ्लो पर उसे जाने से सख्त मनाही होती है ।राजस्वला गुण के कारण ही हर स्त्री मातृ सुख एवं जननी होने का सौभाग्य पाती है। मासिक धर्म ही हर नारी कॊ उसे औरत होने का सम्पूर्णता प्रदान करता है पर ये कैसी विडम्बना है जो कि हम राजस्वला में हम किसी भी स्त्री कॊ अछूत मानते है और वही दुसरी तरफ़ कामाख्या माँ के राजस्वला के समय उनको सबसे पवित्र मानते है!
पूजा गुप्ता “नेपाल “

 

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: