कुर्सि सर्करि काम घूसखोरी

विनय दीक्षित
नेपालगंज। जिले के विभिन्न सेवाप्रदायक सरकारी कार्यालयांे में भ्रष्टाचार और घूसका मामला अब सामान्य बनता जा रहा है। मालपोत कार्यालय, नापी कार्यालय, भूमि सुधार कार्यालय, तथा जिला प्रशासन कार्यालय बाँके में भी यह असर दिखने लगा है। कुछ समय पहले लेने और देने की प्रक्रिया गोप्य रुपसे चलती थी, लेकिन अब फाईल के साथ उपयुक्त रकम-घूस) भी खुलेआम देना पडता है। ऐसा नहीँ है कि इस भ्रष्टाचार और घूसखोरी के खिलाफ किसी ने आवाज नहीँ उठायी, बल्कि आवाज उठाने वालेको सरकारी काम में हस्तक्षेपका आरोप लगाकर कारवाही को अलग मोड दे दिया जाता है।
जिला प्रशासन कार्यालय में नागरिकता से लेकर जातीय पहिचान की सिफारिस के लिए भी कीमत चुकानी पडÞती है, कई कार्यालयों में तो यह नौबत भी आ चुकी है कि लोग कर्मचारियों की भी चयन करने के बाद काम कैसा है उसकी जानकारी देते है। आर्श्चर्यकी बात है कि कर्मचारियों की चयन घूस ज्यादा लेनेवाला या कम लेनेवाले के मापदण्ड पर की जाती है। जनता अपना काम लेकर जब इन कार्यालयों में घुसती है, तो उससे पहले वे रुपयेको छुट्टा जरुर करालेते हैं। क्योंकि किसी भी विभाग में विना पैसे फाईलको नहीं देखा जाता है।
पिछले ४ दिनों से मालपोत कार्यालय बाँके में जमीन खरीद बिक्री के कामको लेकर परेसान हिरमिनिया गा.बि.स.वार्ड नं.५ निवासी उमेश यादव से जब हिमालिनी ने परेसानीकी वजह पूछी तो उनका कहना था- यह मालपोत कार्यालय नहीं घूसका अड्डा है, पता नहीं क्यो प्रशासन और अख्तियार दुरुपयोगका नजर यहाँ नहीं पडता, मेरा जमीन कृषि विकास बैंक से निषेधित है बताकर कामको रोक दिया, मैं यहाँ के बारे में उतना जानता भी नहीँ, तभी मेरे दोस्त ने बताया कि सौ रुपये दे दो काम हो जायेगा, मैने दिया और जमीन मुक्त हो गई।
इस तरह की वारदात आज आम बात हो गई है। जिले में सरकारी निकायके कार्यालयों में फैले इस तरह के घूस के ताँडव में कई बार तो मालपोत कर्मचारी आम जनता के हाथों पिट चुके हैं लेकिन मालपोत के सुब्बा बकरीदी मनिहारका कहना है- मैं बिना पैसे फाईल में हाथ नहीं लगाता जिसे जो करना है वह कर ले।
जिले का पिछडÞा क्षेत्र माना जानेवाला राप्तीपार क्षेत्र इन सरकारी अड्डों से और अधिक पीडिÞत है। नेपालगंज से ६५ कि.मी.दूरसे लोग विभिन्न समस्या लेकर जब ऐसे कार्यालय में पहुँचते हैं तो वहाँ की बात कुछ और ही होती है। समस्या पूछना तो दूरकी बात है, बिना पैसा लोगों की तरफ देखा भी नहीं जाता है। कालाफाँटा गा.बि.स.वार्ड नं.७ निवासी हरिवंश मौर्य ने बताया- आम जनता तो पिसती जा रही है, घूस, चन्दा, सहयोग, चायपानी आदि के नामपर जनता से अवैध असूली किया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक मालपोत कार्यालय में कुल मिलाकर मुद्दा, तामेेली, रजिष्ट्रेशन, मोठ, नामसारी विभाग है जहाँ हर चरण में ५० रुपये से लेकर ५०० रुपये तक घूस देना पडÞता है। इस न्यूनतम आँकडेको मानकर चलें तो हर ब्यक्ति कमसे कम एक हजार रुपये घूस देता है। और एक आँकडे के अनुसार प्रतिदिन २५० से लेकर ४०० तक सेवाग्राही कार्यालय में कुछ न कुछ काम लेकर पहुँचते हैं। इस हिसाब से हर सेवाग्राही अगर ५०० ही घूस दे तो मालपोत की प्रतिदिन घूस रकम २ लाख रुपये है अर्थात ७ करोड बीस लाख रुपये सालाना। यह एक बडी रकम है जिसका कोई हिसाब नहीं होता। इस तरह जिलें में दर्जनो सरकारी निकाय हैं जहाँ इसी तरह प्रतिदिन बेहिसाब कारोबार होता है। जहाँ के कर्मचारियों में राष्ट्रियता और नैतिकता के नामपर कुछ भी बाँकी नहीं बचा है।
इस तरह जनता से असूली क्यों की जाती है – यही सवाल जब हिमालिनी ने जिले के प्रमुख मालपोत अधिकृत मदन भुजेल से किया तो उनका कहना था- मैं अभी नया आया हूँ इसलिए मुझे उतनी जानकारी तो नहीं है लेकिन अगर हमारे कार्यालय में घूस लेने और देने का कार्य होता है तो वह अपराध है, और लेने देने वाले दोनों पक्ष दोषी हैं, मै जनता से सिर्फइतना कहना चाहता हूँ कि अगर कोई शिकायत हो तो वह मुझेसे मिलें, मैं सख्ती के साथ कारवाही करुँगा। भुजेल ने आगे बताया कि लोग काम जल्दी करवाने के चक्कर में कर्मचारियोंको पैसे देते रहते हैं और हमने कई बार लोगों से पूछ-ताछ भी किया लेकिन लोग मुह नहीँ खोलना चाहते।
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मालपोत कार्यालय में शिकायत पेटिका भी है लेकिन वर्षों से उस में किसी प्रकार की शिकायत पत्र नहीं डाली गई जिस कारण उसमें भी जंग लगचुका है। अधिकृत भुजेलकी बात से आम जनता सहमत नहीं हैं। होलिया गा.बि.स.वा.नं.८ निवासी सेवाग्राही बिनोद तमोली ने बताया कि सब आपसी मिलीभगत है, मैने कई बार प्रमुख से शिकायत की, अख्तियार दुरुपयोग में आवेदन दिया, लेकिन कारवाही के नाम पर रिजल्ट जीरो है।
आम जनता सहमत हो या न हो लेकिन कर्मचारी इस बात को नहीं मानते कि वे घूस लेते हैं। नाम सम्प्रेषण न करने की शर्त पर एक मालपोत कर्मचारी ने हिमालिनी से बताया- लोग अपना काम जल्दी चाहते हैं, जल्दी के चक्कर में कुछ गैर कानूनी काम भी हो जाता है लेकिन दोष सिर्फकर्मचारियों को दिया जाता है। खैर बात कुछ भी हो अनियमित तरीके से दिया जानेवाला १ रुपया भी घूस ही है और न्यूनीकरण तब मात्र सम्भव है, जब जनता खुद ऐसे लोगोंको बेनकाब करे।

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