कुलीनतंत्र का “कू”

रणधीर चौधरी

रणधीर चौधरी

कुछ तर्क ऐसे होते हंै, जो सिर्फ तर्क ना हो कर सच्चाई होती है और हम उस सच्चाई को भी नकारने का प्रयास करते है । सन्दर्भ है खुद मेरा अपना । चन्द ही साल हुए हैं जब से राजनीति को समझने का प्रयास करना शुरु किया है मैंने । पत्र पत्रिकाओं और किताबों को माध्यम बनाया है राजनीति को समझने के लिये । इस क्षेत्र मे रुचि रखने वाले जब कोई मिल जाते हैं तो राजनीति की राग खुद ब खुद शुरु हो जाती है । बहुतों ने कहा है  “पोलिटिक्स इज पावर” । कोई भी परिवर्तन राजनीति  से ही संभव होता है । और ये सच्चाई भी है । परंतु कैसा परिवर्तन ? किसके लिये परिवर्तन ? आम जनता के लिये परिवर्तन या किसी खास समुदाय÷जाति के लिये परिवर्तन ?
दो महीने पहले गाँव गया था । घर पर अपने पिता जी से नेपाल की राजनीति के बारे में कुछ चर्चा परिचर्चा हुई । मुझे निराश देख कर उन्होंने कहा–  शायद तुम राजनीति के बारे मे ज्यादा ही सोचते हो । सोचना अच्छी बात है, लेकिन हरएक दृष्टिकोण से जब तक राजनीति को नहीं समझोगे तो डिप्रेसड हो सकते हो । यह कह कर उन्होंने अपनी आलमीरे  से ओसो द्वारा लिखित एक पुस्तक दे कर मुझसे कहा इसको पढ़ो
वर्तमान राजनीति में महेन्द्रमाला की रटान लगाने वाली पार्टी का दबदबा बढ़ रहा है । परंतु इसका जिम्मेदार कौन है ? आज सारे किये गये समझौते को अस्वीकारा जा रहा है महेन्द्रवादी गैर मधेशी दलों के द्वारा । मधेशवादी दल भी कम नहीं हंै । इन में भी कुलीनतंत्र हावी दिखाई दे रही है
और राजनीति को एक दूसरे दृष्टिकोण से सोचो । पुस्तक का नाम था “प्रिस्ट एण्ड पोलिटिसयन ः माफिया अफ द सोल” ।
आज नेपाल इस मोड़ पर आ चुका है जहाँ पालीटिसयन और प्रिस्ट दोनों को नजदीक से देखने का मौका मिल रहा है । छ दशक से ज्यादा से उठी मांग संविधान आज संविधान सभा द्वारा जनता के सामने आने के कगार पर है । इस कगार पर मुझे नेताओं द्वारा लाये गये संविधान का मसौदा और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग उठाने वाले पंडितो को करीब से देखने को मिल रहा है, अच्छी बात है । परंतु इस लेख मे हिंदू राष्ट्र या सेकुलारिजम दोनों में से किसी पर  कुछ नहीं कहा जा रहा है । क्योंकि धर्म के बारे मे बरट्रान्ड रसेल की बात को मानता हुँ । उन्होंने कहा है कि – “अगर यह संसार खुश हो जाय, तो मैं ग्यारेन्टी ले सकता हूँ कि इस दुनिया में कोई धर्म नही टिक पायगा” । खैर ..
संविधान और आम जनता
संविधान के मसौदे को संशोधन की आवश्यकता है कह कर मधेशी, दलित, आदिवासी जनजाति आदि  सीमांतकृत वर्ग द्वारा आवाज उठाया जा रहा है, जो कि सरासर आत्मसमर्पणवादी सोच है । क्योंकि इस संविधान के मसौदे को संशोधन की नही पुनर्लेखन की आवश्यकता है । इस मसौदे में मुझे काठमाण्डो में स्थापित कुलीन वर्ग (व्यत्ति की कुछ खास समूह जो की शक्तिमान होते है) की “कू” दिखाई देती है । संविधान के भाग १ प्रस्तावना में मधेश आन्दोलन शब्द को जगह ना देना, राज्य की परिभाषा मे संघीयता शब्द को स्पेस ना देना शासकाें की नीयत को बयाँ करता है । अगर आप धारा २३ (३) में समानता का हक देखें तो पता चलेगा कि  उसमें लगाए गये प्रोभिजरी नोट यानी प्रतिबन्धात्मक वाक्यांश को रख कर समानता के हक से खेला गया है । सीमांतकृत वर्ग मे खस आर्याें को भी रखा गया है ।
इस सारे कपट से सिद्ध यह होता है कि गणतान्त्रिक नेपाल में कुलीनतन्त्र पूर्ण रूप से हावी है । गणतन्त्र में जब कुलीनतन्त्र का सम्मिश्रण हो तो मसौदा संशोधन की मांग करना कितना उचित और अनुचित है, यह समझने की बात है । संविधान के प्रस्तावना में नीचे समाजवाद के आधार निर्माण की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है । किस आधार पर ये लोग समाजवाद का आधार निर्माण करेंगे किसी को पता चले तो हमें भी बताइएगा । समाजवाद किसे कहते हैं ? समाजवाद वह सामाजिक और आर्थिक सिद्धान्त है जिसमें सम्पति और प्राकृतिक स्रोताें के ऊपर निजी से ज्यादा सार्वजनिक स्वामित्व की अपेक्षा की जाती है । जनता जो उत्पादन करती है वह एक अर्थ में सामाजिक उत्पादन होता है और वह उत्पादन करने में जिस जिसका योगदान रहता है उन सभी को साझेदारी का हक होता है । मतलव, सारा समाज उस उत्पादन पर  स्वामित्व या कम से कम उस पर नियन्त्रण रखता है । समाजवाद की इस सिद्धान्त को आत्मसात करने के लिये पहले नेपाली राजनीतिक दलों को व्यापारी÷पूँजीपतियों से साँठ गाँठ हटाना होगा । जो कि असंभव सा है । चुनाव के वक्त जो पैसों की नदी बहायी जाती है उसको रोकना होगा  और यह संस्कार कुलीनतन्त्र में होता नही । गणतन्त्र का चोला लगा कर यथास्थिति में देश को आगे बढ़ाने का कपटी प्रयास जारी है ।
कहा जाता है कि अगर आप में सच्चाई छुपाने की  सामथ्र्य नहीं है तो आप राजनीति नहीं कर सकते । राजनीति वे करते हैं जिसमें समाज को बाँट देने की क्षमता होती है । उपर जिस पुस्तक का नाम लिखा गया है, उस में ओसो ने हिटलर को कोट कर के कहा है कि, “जब तक आप का कोई दुश्मन नहीं है, आप बड़े नेता नहीं बन सकते । अगर आपका कोई दुश्मन नहीं है तो झूठा ही सही परंतु यह फैला दें की हमारी राष्ट्रीयता खतरे में है, और लोगो को जब यह महसूस हो जायगा तो लोग आप के गुलाम तक बनने के लिये तैयार हो सकते हंै, आप को नेता मानने के लिये तैयार हो सकते है ं।” नेपाल मे मुझे इसी नापाक विचारों को आत्मसात करके राजनीति कर रहे व्यक्तित्व ज्यादा दिखाई दे रहे हंै । और इस चीज को पुष्टि करता है असंबैधानिक १६ बुँदे समझौता को आधार बना कर संघीयता की हत्या करना । आप अवश्य नहीं भूले होंगे नेपाल के डिफेक्टो (तथ्यगत) प्रधानमंत्री का बयान, जिन्होंने मधेशियो को यू.पी और बिहारी की संज्ञा दी  थी । काठमाण्डो में लूटतंत्र मचाने में कामयाब कुछ वर्ग, संविधान की जातीय हिसाब से व्याख्या करने वाले स्वघोषित संविधानविद ये सब एक स्वर मे कहते हैं कि संघीयता से देश की अखंडता पर आँच आ सकती है । संघीयता की आवश्यकता को देश की अखण्डता से जोड़ना मेरी नजर में हिटलर की सिद्धान्त को अपना सिद्धान्त बनाना है ।
मुझे लगता है यही सब कारण है जिसके आधार पर ओसो ने कहा होगा कि, “ राजनीति करने वाले असल क्रिमनल होते हैं ।” एक तो १६ बुँदे के आधार पर लाया गया मसौदा ही असंवैधानिक है । और उस मसौदे पर जुलाई २० और २१ तारीख को जनता का सुझाव संकलन करने का कर्मकाण्डी अभियान चलाया गया । ६३ करोड़ बजट विनियोजन किया गया था । भूकंप के धक्के अभी भी आ रहे हैं । भूकंप से विशेष प्रभावित जिलों में जनता को अभी इस मौनसून में छत का अभाव है । जनता खेती पाती में लगी है । न जाने क्या सोच कर सुझाव संकलन की योजना बनाई गई । नेपाली मीडिया भले ही स्वीकारने से डरती हो । परंतु सच्चाई यही है कि मधेश ने इस मसौदे को स्वीकारने से इनकार कर दिया । मधेशी युवा धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने राज्य के दमन को दमदार रूप से बरदास्त किया था । मसौदा पे सुझाव संकलन के वक्त मधेश में सुरक्षा निकाय के तरफ से व्यापक दमन किया गया था । जिसको प्रमाणित करता है कुछ मानव अधिकारवादी संस्थाआें का प्रतिवेदन । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के प्रतिवेदन में तराई मे हुई दमन की घटनाओं की छानबीन करने का मांग किया गया है । एसियन हूमन राइटस कमीशन ने भी विज्ञप्ति निकाल कर कहा था कि तराइ में हो रहे अत्याधिक बल के प्रयोग को रोका जाय । उसी तरह, तराई मानव अधिकार रक्षक संजाल (थर्ड एलायन्स) के प्रतिवेदन अनुसार मसौदा पर सुझाव संकलन के अनुसार मधेश के सिर्फ पाँच जिले मे १२९ लोग गंभीर घायल हुए हंै । अधिकतम को सर में चोट लगी है ।
राज्य के तरफ से ऐसा दमन होना राज्य की नीयत को बयाँ करता है । राज्य में कुलीनतंत्र हावी है इसको प्रमाणित करता है  और यह तंत्र अदृश्य रूप में राजतंत्र ही है, नाजीवाद ही है ।
हम भी कम नही
यह सत्य है कि वर्तमान राजनीति में महेन्द्रमाला की रटान लगाने वाली पार्टी का दबदबा बढ़ रहा है । परंतु इसका जिम्मेदार कौन है ? आज सारे किये गये समझौते को अस्वीकारा जा रहा है महेन्द्रवादी गैर मधेशी दलों के द्वारा ।  मधेशवादी दल भी कम नहीं हंै । इन में भी कुलीनतंत्र हावी दिखाई दे रही है । हरेक मधेशवादी दल में उँगली पर गिने जाने वाले लोग हैं जो अपना अधिकार की सुनिश्चितता के लिये कुरवानी के लिये तैयार है । परंतु जो सत्ता की चासनी को चाट चुके हैं उनका कहना है कि अधिकार की लड़ाइ इतनी जल्दी समाप्त नहीं होती । उनका तर्क रहता है की हमें सड़क (सिर्फ काठमाण्डौ के) और सदन दोनों मे लड़ना होगा । बहुत खेद के साथ मुझे कहना पड रहा है कि अधिकार प्राप्ति के लिये जन्मी पार्टी में भी कुलीनतंत्र की कू नजर आ रही है । न जाने क्यों ये लोग भूल जाते हंै कि लोकतन्त्र में जब त्रूmरता बढ़ती है तो सिर्फ और सिर्फ सड़क पर अपनी पकड़ बनानी चाहिये । मसौदे में संसोधन और संविधान सभा छोड़ने वाली खोखली धमकी महज एक कुलीनतंत्र का लक्षण नहीं है, तो और क्या है ? हरेक मधेशी दलों मे इक्का दुक्का लोग हैं जिनके अन्दर में पार्टी सीमित है । आम मधेशी जनता जो आक्रोश में आकर अपने मत का सही प्रयोग नहीं कर पाते हैं और संविधानसभा में मधेशी एजेन्डा उठाने वाली पार्टी को अल्पसंख्यक बना देते हंै, खामियाँ उन मधेशी जनता में  नहीं है, इसको नहीं माना जा सकता है । हम जहाँ हैं वहीं से अपने एजेन्डे को मजवूत बनाना चाहिये । माहात्मा गांधी ने कहा है— अन्याय सहना भी अन्याय करने के बराबर है ।
अन्त में
हमारी बिगड़ी राजनीति को सुधारना होगा । सीमांतकृत वर्ग के नेताओं को सदन से अपना सद्भाव अब हटा लेना चाहिये । आज तक जितनी राजनीतिक उपलब्धियाँ  हुई हैं वह सड़क की देन है । कुलीनवर्ग भले ही गणित के आाधार पर अपनी स्वार्थ पूरी कर लें । परंतु मुझे यकीन है कि—
तेरी दीवार तेरी छत को भी हिला सकती है, अगर जिद पर आ जाए तो परवत भी हिला सकती है । ऐ सियासत तूने कभी सोचा भी नहीं होगा की एक इन्सान हुूकूमत भी हिला सकता है ।
आसार बताते हैं कि कुलीनतंत्र का कारवाँ बहुत दूर तक नहीं जाएगा ।

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