कुसंगति संक्रामक:
रवीन्द्र झा शंकर’

कुम्हार नदी-तलाब किनारे  अशुद्ध मिट्टी, जिसे कोई हाथ नहीं लगाना चाहता, उसे घर लाता है, घर लाकर पानी से गीला करता है, पैरो से रौंवता है, चाक पर कई चक्कर लगाकर उस मिट्टी को मर्ूतरुप देता है। उसे धूप में सुखता है, आग में पकाता है। तब वह मिट्टी वर्त्तन के रुप में आकार पाता है। सभी बर्त्तन एक ही क्रिया से गुजरते हैं। ग्राहक आता है, उसे ठोक बजा कर देखकर अपने घर ले आता है, पर बर्त्तन पर असर पडÞता है ले जाने वाले के व्यवहार का। एक घड गंदे वातावरण में रह जाने वाला ले जाता है, एक घडा साफ सुथरे परिवार में जाता है तो काई घÞा शिव मंदिर में, भगवान शिव के अभिषेक के लिए। तीनों का अलग-अलग तरह से सम्मान मिलता है। साफ-सधरे न रहने वाले परिवार के घडÞे का पानी कोई सफा व्यक्ति नहीं पीना चाहता। साफ-सुधरे परिवार का व्यक्ति सभी को हिदायत देता है कि कोई भी बिना हाथ धोए घडेÞ से पानी न निकाले और भगवान शिव वाले घट के सम्मान के लिए सभी ध्यान रखते है कि उसे छूकर उसकी पवित्रता नष्ट नही की जाए। हर व्यक्ति या वस्तु का इसी तरह का मापदण्ड होता है- संगति से। एक और दृष्टान्तः तोता बेचने वाला तोता बेचता है। उसे एक तोता एक डाकू खरीद कर ले गया। उसने उसे पाठ पढाना शुरु किया- “लूटो-मारो।” एक तोता एक साधु खरीद कर ले गया। उसने उसे सिखाया- “राम-राम-सीताराम।” तोता बेचने वाला घुमते-घुमते रास्ता भटककर कुछ महीनों बाद डाकु के डेरे पर पहुँचा तो तोते से सुना- “लुटो-मारो।’ कुछ दिनों के पश्चात साधु के आश्रम में पहुँचा तो उसने तोते के मुख से सुना- “राम राम, सीताराम।” तोते की संगति का असर समझ गया वह। जीवन में सही राह दिखाने वाले की संगति के कराण अनेक उन्नति के शिखर पर पहुँच जाते हैं। और गलत राह दिखाने वाले किसी जीवन को नरक बना देता है। धूम्रपान, मद्यपान, जुआ, वासना, चोरी डकैती बलात्कार सभी संगति के ही असर हैं। हवा यदि फूलो का र्स्पर्श करके आती है तो उस में सुगंध होगी एवं यदि सडे-गले कुडÞो के ढेÞर के पास से आये तो उसमें दर्ुगंध होगी। इसमें हवा का क्या दोष है – व्यक्ति विशेष की परख के लिए यह जानना जरुरी है कि उसकी उठ-बैठ किस के साथ है। वह कैसे व्यक्तियों के साथ घूमता-फिरता है। आलोचक, निंदक व्यक्तियों के साथ रहने वाला उसी तरह का आचरण करेगा। जो सिर्फदूसरो की ओर अंगुली दिखाते हैं, उसकी संगत को असर भी उसी तरह का होगा। संगत संक्रामक है। जीवन में अपने अच्छे संस्कारों एवं विचारों से औरों को प्रेरित करें एवं अपनी बुराइयों में दूसरों को भागीदार न बनाये। कुसंगति जहाँ गड्ढेÞ में धकेल देती है, वही अच्छी संगति जीवन में नई ज्याति पैदा कर देती है। ऐसी ही एक घटना है। एक कुविचार वाला एक प्रौढÞ व्यक्ति अपनी साथी-संगियों के साथ बैठा गप-सप गर रहा था। उसके साथियों के जीवन की विचार धारा यही थी कि वे औरों का कैसे बेवकूफ बनाकर ठगे। संयोग से उस व्यक्ति के कानों में नीचे से एक आवाज सुनाई दी- ‘अच्छेसँग तरे।’ उसने अपने साथियों से पुछा कि नीचे से क्या आवाज आ रही है, इसकी सिज्ञासा की। साथियों ने कहा नीचे कोई संतरा बेचने वालो आवाज लगा रहा है। अपने सतरे बेचने के लिए। उस व्यक्ति का ध्यान फिर उस आवाज पर गया। उस के मन में अच्छे विचार चक्कर लगाने लगे थे। वह उछल पडÞा और उसने साथियों से कहा- ‘वह कह रहा है कि अच्छे संग तरे।’ यानी मनुष्य अच्छे व्यक्तियों की संगत से ही तर सकता है। उसने उन साथियों का साथ छोडÞ दिया और सर्त्कर्म में लग गया। परिवार के बुजर्ुग सदस्यों के आचरण का प्रभाव परिवार के छोटे-बडÞे सभी पर पडÞता है। देर से उठना, बात-बात पर झूठ बोलना, धूम्रपान करना, मद्यपान करना, जुआ खेलना, लाँटरी लगाना, अश्लील सिनेमा देखना, पान-मसाला खाना आदि ऐसे कुव्यसन है, जिन का प्रभाव भावी पीढÞी पर परना स्वाभाविक ही है। इसीलिए कहा गया है कि- सर्ंर्सगजा दोष गुणा भवन्ति। ±±±

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