कूटनीति और कविता

कूटनीति और कविता में गहरा सम्बन्ध दिखलाई देता है । अनेक कूटनीतिज्ञ लम्बे समय से उत्कृष्ट कविता लिखते आ रहे हैं । इनमें सात कवियों ने अपनी रचनाओं के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार तक प्राप्त किया है । इससे यह स्पष्ट है कि कविता और कूटनीति में गहरा सम्बन्ध है । यह साहित्य का र्सवाधिक कम ज्ञात तथ्यों में एक है । गैबरिएला मिस्ट्रेल, सेण्ट जाँन पर्स, जार्ँज सेफरिज, इवो एण्ड्रिक, मिगुएल एंजल एस्टुरियस, पाब्लो नेरुदा और आँक्टोवियो पाँज नाँबेल पुरस्कार पाने वाले कूटनीतिज्ञ-कवि-मण्डली में हैं ।
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है जो एक कूटनीतिज्ञ को कविता लेखन में उत्कृष्ट बनाता है – समान्यतया कूटनीति को खाने-पीने की कला समझने की परम्परा रही है और कूटनीतिज्ञ को स्वप्न-विलासी । लेकिन सच यह है कि कूटनीति राजनैतिक तीक्ष्णता, सांस्कृतिक कुशाग्रता, भाषागत क्षमता, वाचाल कला मिश्रति विद्या है जिसका प्रयोग दूसरों को मनाकर अपने पक्ष में लेने के लिए किया जाता है । कूटनीति सामान्यतया छोटे-छोटे वाक्यों में व्यवहृत होता है जो जितना प्रकट करता है, उतना ही अप्रकट भी रहता है । कविता भी इससे भिन्न नहीं है ।
गैबरिएला मिस्ट्रल -सन् १८९७-१९५७) चीली की एक कवयित्री थीं । वे कूटनीतिज्ञ थीं और साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाली पहली लैटिन-अमेरिकी महिला थीं । इन्हें सन् १९४५ में नोबेल पुरस्कार मिला था । उनका वास्तविक नाम लुसिला गोनोय अल्कायमा था । प्रेम, धोखा, दुःख स्वास्थ्य-लाभ, प्रकृति और अमेरिकी तथा यूरोपीय देशों के प्रभाव के कारण लैटिन-अमेरिकी देशों के समाज और जीवन पर पडÞे मिश्रति प्रभाव और उसकी पहचान उनकी कविता के केन्द्रीय भाव रहे हैं । चीली के राजदूत के रूप में सन् १९३२ से मृत्यर्ुपर्यन्त उन्होंने नेपल्स, मैडि्रट, लिब्सन, निस, पेट्रोपोलिस, लाँस एञ्जल्स, साण्टा बारबारा, वेराक्रूज, रापालो और न्यूआर्क में सेवा दी ।
सेंट जाँन पर्स -सन्-१८८७-१९७५) पेसोडामिया के प|mेंच कवि-कूटनीतिज्ञ एलेक्स लेगर के छद्म नाम से लिखते थे जिन्हें सन् १९६० में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था । सन् १९०४ से १९१४ तक वे प|mान्स के उम्दा कूटनीतिज्ञ माने जाते थे । इसके बाद वे १९६७ तक अमेरिका में रहे । उनकी संग्रहित कविताएँ प्रिंसटन यूनिवर्सर्ीी प्रेस के बोलिंगन सिरीज के अर्न्तर्गत सन् १९७१ में प्रकाशित हैं ।
इवो एण्ड्रिक -सन् १८९२-१९७५) एक युगस्लावी कवि-उपन्यासकार और कूटनीतिज्ञ तथा सन् १९६१ के साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता थे । एण्ड्रिक ने अपनी साहित्यिक यात्रा एक कवि के रूप में प्रारम्भ की थी । पहले विश्वयुद्ध के वर्ष१९१४ में ‘यंग क्रोएशियन लिरिक’ के एक र्सजक वे भी थे । युद्ध के अन्त में उनकी गद्य कविता की दो पुस्तकें प्रकाशित हर्ुइ जिनमें एक का नाम था ‘निमेरी’ अर्थात् उद्वेग । द्वितीय विश्वयुद्ध के समय परिस्थितियों के कारण मिली फुर्सत में एण्ड्रिक ने अपनी तीन महत्वपर्ूण्ा पुस्तकों की रचना की जो सन् १९४५ में प्रकाशित हर्ुइं- ‘द ब्रिज आँन द डि्रना, बाँस्नियन स्टोरी और द ओमन प|mाम सेराजेवो ।’
ज्ाार्ँज सेफरिज -सन् १९००-१९७१) का जन्म उर्ला, समयरना के नजदीक र्-वर्त्तमान इजमिर, र्टर्की) में हुआ था । उनका वास्तविक नाम जीओजीअस सेफेरिउड्स था । वे सन् १९६३ में नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत हुए । उनकी कविताओं में यायावर और निर्वासित जीवन की बातें हैं । ‘स्ट्रोफ र्टर्निंग प्वाइंट -१९३१), द सिर्स्र्टन -१९३२), मिथिस्ट्रोमिया -१९३५) और लाँगबुक पहला, दूसरा तथा तीसरा -१९४०, १९४५, १९५५) उनकी कविताओं के संग्रह हैं । सफरिज ने कूटनैतिक सेवा में १९२५ में प्रवेश किया था । उन्होनर्ेर् इंग्लैंड, अल्वानिया, मिश्र, दक्षिण अप्रिmका, इटली, अंकारा, लेबनान और सीरिया में अपनी सेवा दी । सेफरिज शाही राजदूत के रूप में संयुक्त अधिराज्य में सन् १९५७ से १९६१ तक कार्यरत थे । इसके बाद सेवानिवृत्त होकर वे एथेन्स गए ।
मिगुएल एंजेल एस्टुरियस -सन् १८९९-१९७४) ग्वाटेमाली कवि, उपन्यासकार, कूटनीतिज्ञ और सन् १९६७ के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता थे । उनकी रचनाओं में सामाजिक अन्तर्विरोध माया का रहस्यवाद महाकाव्यमय आवेग के साथ समाविष्ट हैं । इन्होंने अपना अधिकांश जीवन निर्वासन में व्यतीत किया । सन् १९४० में उन्होंने कूटनीतिक वृत्त में प्रवेश कर मैक्सिको बुएनस, ऐरिस, पेरिस और सन सल्वाडोर में वर्षों गुजारा । ‘जादूमयक्विटजल’ -एक सुन्दर चिडिÞया) का पंख और जुगनू की चमचमाहट जैसी उज्ज्वल वैभव झलकानेवाली भाषा में कला और काव्यिक सृजना की बात स्वीकार करते हुए नोबेल पुरस्कार समिति ने उनके अल्पज्ञात काव्यिक चक्र ‘क्लारिभिजिलिया प्रमिवेरल’ -वसंत में स्व्ाच्छ समय) के प्रति गम्भीर होकर इस कृति को प्रभावशाली माना ।
पाब्लो नेरुदा -सन् १९०४-७३) चीली कवि-कूटनीतिज्ञ थे । इनका वास्तविक नाम नेप\mटाली रिकार्र्डो रेज बासल्टो था जो बाद में इनका वैध नाम भी बना । बाद में इन्होंने अपना साहित्यिक नाम जेज पोएट जाँन नेरुदा चयन किया । सन् १९७१ में उन्होंने साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया । नेरुदा तरुणावस्था में ही एक कवि के रूप में ख्यात हो चुके थे । इन्होंने अति यथार्थवादी कविता, ऐतिहासिक महाकाव्य और रतिरंग से भरी प्रेम कविताएँ अनेक शैलियों में लिखी है ।
अपनी कृति ‘लिबिरन्थ आफ सोलिच्यूड, सन स्टोन और अन्य प्रेम कविता के लिए पहचाने गए आक्टोवियो पाज -सन् १९१४-१९९८) मेक्सिको के कवि और कूटनीतिज्ञ थे । साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले मेक्सिको के पहले कवि पाज सन् १९९० में नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत हुए । अपनी पहली काव्य कृति ‘फारेस्ट मुन’ के प्रकाशन के साथ ही उन्नीस वर्षकी अवस्था में उन्होंने अपनी काव्य यात्रा प्रारम्भ की । मेक्सिको की कूटनैतिक सेवा में वे प्रतिष्ठित कूटनीतिज्ञ के रूप में जाने जाते थे । अपने सेवाकाल में उन्होंने न्यूयार्क, पेरिस, जेनेवा, टोकियो और नई दिल्ली में अपनी सेवाएँ दी ।
कूटनीति और कविता के बीच संबंध
कवि और कूटनीतिज्ञ की भूमिका में निश्चित समानता है । कवि संसार की दार्शनिक पृष्ठभूमि या दृष्टिकोण तैयार करता है और भविष्य कैसा हो सकता है, इस सर्न्दर्भ में एक दार्शनिक विचार भी प्रस्तुत करता है । र्’नई शताब्दी की कविता ः ‘एशिया’ के संपादक त्रय टीना चांग, रविशंकर और नथाली हैंडल ने कहा है कि कविता ‘आत्मा का राजदूत है ।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘कविता कूटनीति का उत्कृष्ट प्रकार लगती है जो भविष्य में आनेवाली परिस्थितियों और विश्व को समझने की शक्ति प्रदान करती है ।
अपनी यायावर जीवनशैली और अपना घर पाने से अधिक दूसरे के घर की तलाश की वृत्ति के कारण कूटनीतिज्ञ स्वयं को अतुलनीय अवस्था में पाता है । विदेशों में रहने के कारण कूटनीतिज्ञ अपनी मातृभूमि से निर्वासित और स्वयं का कुछ गुमाया हुआ सा महसूस करता है । घर की यादों से वह स्वयं को प्रताडिÞत भी महसूस करता है ।
कवि डब्लू. एच. औडेन ने कूटनीतिज्ञ के जीवन को ‘र्सार्वजनिक एकान्त का दुःस्वप्न’ कहा है । र्सार्वजनिक एकान्त के इस दुःस्वप्न से उबरने के लिए सृजनशील कूटनीतिज्ञ कविता, कहानी या संस्मरण लिखता है और सामान्य लोग मदिरा-सेवन करते हैं । जीवन भर सीखते रहना कूटनीतिज्ञों की पहचान है । उसे मिलने वाले अवसर अद्वितीय भी हो सकते हैं । हलका वीतरागी स्वभाव से चीजों को दूर से ही दखने की सुविधा उसे प्राप्त होती है । पाब्लो नेरुदा का कथन है कि ‘कविता शान्ति का कर्म है । जिस तरह आटा रोटी का निर्माण करता है उसी तरह शान्ति कवि का निर्माण करता है ।’
कूटनीतिज्ञ को सुख-सुविधापूण अपने नियुक्त स्थान पर रहकर स्वयं और संसार को देखने का पर्याप्त अवसर और समय होता है । अपने रूप और संरचना के कारण कविता कूटनीतिज्ञों की पहली पसन्द होती है । कविता सामान्यतया लघु आकार की होती है और यह एक सघन साहित्यिक उपकरण है । अन्तःप्रेरणा केे सघन प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ इसे कम समय में लिख सकता है और अवकाश के समय में इसका परिमार्जन कर पर्ूण्ा कविता की र्सजन कर सकता है ।
अन्तर्रर्ाा्रीय सम्बन्धों के व्यावसायिक व्यवस्थापक होने के कारण कूटनीतिज्ञों को नियमित रूप से कूटनैतिक संदेश अपने देश में भेजने पडÞते हैं । अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करने के लिए वह सम्भ्रान्त और आम दोनों तरह के लोगों से घुलता-मिलता है । समय क्रम में वह अनेक अन्तर्रर्ाा्रीय भाषाओं को फर्रर्ाा से बोल सकता है । तीव्र संवेदनशीलता, तीक्ष्ण अवलोकन शक्ति और सटीक संचार का भी वह विकास करता है । संवेदनशीलता, सूक्ष्म विचार और मानवीय संवेदना की पहचान में कवि कूटनीतिज्ञों से एक कदम आगे होते हैं ।
ऐसा कहा जाता है कि जब संस्कृति, सभ्यता और वैश्विक दृष्टिकोण एक धरातल पर एकत्रित होते हैं तो महान साहित्य का जन्म होता है । कवि-कूटनीतिज्ञों के सर्न्दर्भ में यह बात अक्सर तब घटित होती है जब वह स्वयं को विदेशी परिवेश, सम्भ्रान्त परिस्थिति और विविध दृष्टिकोण के लोगों के साथ पाता है । इन्हीं विशिष्टताओं के कारण अनेक कूटनीतिज्ञों ने कविता के क्षेत्र में महत्वपर्ूण्ा योगदान दिया है ।
अनुवादक: कुमार सच्चिदानन्द      

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: