“कू” की साजिश रचते राष्ट्रपति

राष्ट्रपति की कू करने की खतरनाक योजना से एक बात तो साबित हो गई है कि नेपाल में अभी अभी आए लोकतंत्र से खतरे का बादल छंटा नहीं है और इसे बाल्य अवस्था में ही समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।

‘मैं सिर्फआलंकारिक राष्ट्रपति नहीं हूं। संविधान की रक्षा मेरा पहला कर्तव्य है। दलों के द्वारा सहमति नहीं करने पर मैं आवश्यक कदम उठाऊंगा। मैं चूपचाप बैठकर तमाशा देखने वाला नहीं हूं। संविधान में मेरी भूमिका चाहे जो हो लेकिन जरूरत पडने पर मैं कैसे भी कडे कदम उठाने से पीछे नहीं हटूंगा। मैं उन नेताओं में से नहीं जो संविधान को धूप बत्ती दिखाकर सिर्फपूजा करता है।’
ये सब कुछ ऐसे बयान हैं जो कि राष्ट्रपति डाँ रामवरण यादव द्वारा पिछले एक महीने के भीतर दिए गए हैं। काठमाण्डू से लेकर जनकपुर और भक्तपुर से लेकर पोखरा तक में राष्ट्रपति डाँ. यादव के द्वारा दिए गए है।
राष्ट्रपति के इन बयानों से शायद किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि आखिर इसके पीछे का असली मकसद क्या है – विपक्षी दल भी लगातार राष्ट्रपति को इस बात के लिए उकसा रहे थे कि भट्टर्राई सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए। लेकिन संविधान के तहत संसद से चुनी गई सरकार को बर्खास्त करना या फिर माओवादी के सरकार को हटाना मधुमख्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा है यह बात रामवरण यादव काफी अच्छी तरह से समझते हैं। बावजूद इसके कांग्रेस-एमाले के उकसाहट में उन्होंने एक खतरनाक साजिश रची। बार-बार अपने बयानों में देश के लोकतंत्र को खतरे में बताने और देश में फिर से निरंकुशता के लौटने की ओर राष्ट्रपति सभी दलों का ध्यान आकृष्ट कराया करते थे। लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि इसकी तैयारी वो खुद ही कर रहे थे।

“कू” की साजिश रचते राष्ट्रपति

राष्ट्रपति के द्वारा कू करने की तैयारी का सनसनीखेज खुलासा हुआ तो सभी दंग रह गए। तब जाकर सभी को समझ में आया कि आखिर राष्ट्रपति वैसा बयान क्यों दे रहे थे। नेपाली सेना के बल पर भट्टर्राई सरकार को बर्खास्त करना और भारत के सहयोग से सत्ता शासन अपने हाथ में लेने की योजना में थे राष्ट्रपति डाँ रामवरण यादव। जिस संविधान की रक्षा की जिम्मेवारी उनके हाथों में दी गई थी उसी संविधान को दरकिनार करते हुए खुद को र्सवाेच्च बनाने की तैयारी में जुटे थे डाँ रामवरण यादव।
जैसे ही यह खबर बाहर आई तो किसी को भी यकीन नहीं हुआ कि आखिर लोकतंत्र की दुहाई देने वाले और निरंकुशता के खिलाफ दम्भ भरने वाले राष्ट्रपति के द्वारा ही कू की साजिश रची गई थी। राष्ट्रपति ने सोचा था कि माओवादी का डÞर दिखाकर नेपाली सेना और भारत दोनों का ही र्समर्थन हासिल किया जा सकता है और बांकी बची पार्टियां तो उनको इस बात के लिए दबाब ही बना रही हैं।
सरकार को बर्खास्त करने और सत्ता शासन अपने हाथ में लेने के लिए राष्ट्रपति ने दिन भी तय कर लिया था। छठ की पूजा के बाद राष्ट्रपति अन्तरिम संविधान की कुछ धाराओं का उल्लेख करते हुए एक विज्ञप्ति निकाल कर वर्तमान सरकार के अस्तित्वहीन होने और सभी कार्यकारी अधिकार खुद में होने की योजना बना ली गई थी। लोगों को यह नहीं लगे कि वो देश में निरंकुशता लाद रहे हैं इसलिए सत्ता अपने हाथ में लेते ही वह सहमतीय सरकार गठन का आहृवान भी करते। लेकिन राष्ट्रपति को यह अच्छी तरह से मालूम है कि दलों के बीच सहमतीय सरकार का गठन होना इतना आसान नहीं है। और वह भी भट्टर्राई सरकार को बर्खास्त करने के बाद सहमति होने की तो कोई भी गुंजायश ही नहीं थी। इसी का फायदा उठाते हुए राष्ट्रपति अधिक दिनों तक सत्ता अपने हाथों में टिकाना चाह रहे थे। बाद में उनकी योजना थी कि किसी कांग्रेस के नजदीक व्यक्ति के नेतृत्व में ही वो अन्तरिम सरकार का गठन करते लेकिन सत्ता का बागडÞोर अपने ही हाथों में रखते।
माओवादी पर सत्ता कब्जा का आरोप लगाते रहने वाले राष्ट्रपति के द्वारा ही कू करने की योजना का खुलासा से सभी दंग रह गए। जैसे-जैसे लोगों को यह खबर मालूम पडÞती गई। लोगों के आर्श्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। जिस निरंकुशता को हटाने के लिए नेपाल में २४० वष तक निरन्तर संर्घष् होता रहा उसी निरंकुशता को एक बार फिर से सहमतीय सरकार के नाम पर लादने की साजिश की गई थी। इस खबर के विस्तृत रूप से प्रकाशित होने के बाद से इसका नकारात्मक असर राष्ट्रपति पर पड सकता है। हो सकता है कि माओवादी को अपने सत्ता कब्जा के लिए एक और बहाना मिल जाएगा। अब माओवादी पार्टी सभी को यह बताने में सफल रहेगी कि राष्ट्रपति के इस खतरनाक कदम के पीछे की असली योजना कांग्रेस-एमाले की थी।
मगर नेपाली सेना और भारत दोनों ने ही राष्ट्रपति के कू करने की योजना का र्समर्थन नहीं किया और राष्ट्रपति की योजना धरी की धरी रह गई। देश में लोकतंत्र की पर्ुनर्बहाली के बाद यह कू करने का दूसरा प्रयास था जिसे नाकाम कर दिया गया। आपको याद होगा कि माओवादी के नेतृत्व में बनी पहली सरकार को हटाकर नेपाली सेना के तत्कालीन प्रधान सेनापति रूक्मांगद कटुवाल के कार्यकाल में भी कू की योजना बनाई गई थी जिसे समय से पहले ही सेना के कुछ अधिकारियों ने लीक कर दिया और वह कू की योजना भी नाकाम कर दी गई थी।
एक बार फिर से संसद से चुने गए राष्ट्रपति के द्वारा संसद से ही निर्वाचित सरकार को हटाकर संविधान की रक्षा के नाम पर कू की खतरनाक योजना नाकाम हो गई है। निश्चित ही सेना की भूमिका इस में प्रशंनीय है। भारत ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि नेपाल में परिस्थिति चाहे जितनी भी खराब हो लोकतंत्र ही नेपाल के लिए बेहतर है राजनीतिक दलों को मिलकर ही इस संकट से उबरना चाहिए।
लेकिन राष्ट्रपति की कू करने की खतरनाक योजना से एक बात तो साबित हो गई है कि नेपाल में अभी अभी आए लोकतंत्र से खतरे का बादल छंटा नहीं है और इसे बाल्य अवस्था में ही समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।

कैसे हर्इ कू की साजिश नाकाम

कू की साजिश में शामिल नेता

पंकज दास

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