कृषि प्रधान देश की वस्तुस्थिति

हिमालिनी संवाददाता
नेपाल कृषि प्रधान देश है । मधेश की ८० प्रतिशत से ज्यादा आबादी खेती पर आश्रित है । इस बार के बजट में कृषि को प्राथमिकता भी दी गई है, लेकिन कृषि और किसानों की जमीनी हालात कैसी है ? सदियों से होती आ रही परम्परागत खेती में क्या सुधार हुए ‘हिमालिनी’ ने इसकी पड़ताल की, जिसमे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए ।
आज से साठ साल पहले बैल से खेती होती थी, उसमे परिवर्तन के नाम पर बैल के जगह ट्रैक्टर, रासायनिक खाद और पानी के लिए पम्प सेट के अलावा कोई बदलाव नहीं आया । किसानों की दशा में सिर्फ १९–२० का ही अंतर दिखाई देता है । जिन अच्छे किसानों की बात की जाती है, उनकी गिनती उंगलियों पर की जा सकती है । बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण कृषि योग्य क्षेत्रफल में निरंतर गिरावट आई है । हमारी तलाश किसी आधुनिक और उत्कृष्ट किसान की थी, जो की कृषि जगत के लिए आदर्श सिद्ध हो । पर्सा के जिला कृषि विकास कार्यालय के पास उत्कृष्ट किसान की कोई सूची ही उपलब्ध नहीं थी, जबकि इनके पास तो मतदाता नामावली की तरह, हरेक गांव से वार्ड तक की सूची होनी चाहिए । कृषि विकास कार्यालय, कृषि औजार और जिला पशु सेवा कार्यालय के संपर्क के ज्यादातर किसान ऐसे थे जो सरकारी अनुदान पर आश्रित थे, जिनका योगदान अनुदान पर पम्पसेट लेना, अनुदान पर कोई मशीन लेना या अनुदान पर पोखर बनाना तक सीमित था ।
कुछ डेयरी या मुर्गी पालक किसान भी मिले, कुछ बीज वृद्धि कार्य में लगे हुए भी मिले, पर ऐसे किसान जो सब के लिये प्रयोगी हो नहीं मिला । वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. राम परीक्षण शाह ने एक किसान के बारे में बताया जिसने १० बीघा घास की खेती की है, सुनकर रोचक लगा । उन्होंने बताया ‘धान, गेहूँ, मुर्गी, मछली पालन तो बहुत लोग करते हंै, लेकिन इन सब का खाना–पोषण खर्च इतना ज्यादा हो जाता है कि मुनाफा कम हो जाता है, बलराम तिवारी जी इसी खर्च को कम करने के लिए, घास खेती करके डेयरी में देकर, अन्य फसल से ज्यादा मुनाफा भी काम रहे हंै, ये बिलकुल नई सोच की उपज है’ । ज्यादा जानकारी के लिए हमलोग पशु चिकित्सक अरुण सिन्हा से मिले, उन्होंने बताया कि ‘हमारे लिए तो सभी किसान अजीज हंै, लेकिन एक किसान है बलराम तिवारी, जो कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो नेपाल के हरेक किसान के लिए अनुकरणीय होगा ।’
पशु सेवा कार्यालय, पोखरिया में कार्यरत पशु चिकित्सक कौशल कुमार झा और रामनाथ चौहान के साथ हमलोग बीरगंज से २५ कि.मी.पश्चिम बिरंचीबर्वा गांव में पहुचे । वहाँ हमारी मुलाकात बलराम तिवारी से हुई, उन्होंने बताया ‘ज्यादातर किसान धान खेती करते है, जो औसतन ४–५ मन प्रति कट्ठा काटते हैं । लेकिन धान में ही चीन का विश्व रिकॉर्ड था, जिसे भारत बिहार के नालंदा जिले के दरवेश पूरा गांव के सुमंत ने २२.४ टन प्रति हेक्टेयर धान उपजा कर, नया विश्व रिकॉर्ड बनाया । ऐसा कीर्तिमान हम क्यों नहीं बना सकते ? बिहार के नालन्दा से ज्यादा उपजाऊ जमीन हमारी है । अगर हमलोग करना चाहते हंै, तो उत्कृष्ट बीज नेपाल में नही है, बाहर से लाने में बहुत ज्यादा लैब टेस्ट और औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती है, ऐसा करने तक में सीजन ही निकल जाता है, अगर छुप–छुपा के भीतर ला भी दिया जाए, तो उसकी कोई सरकारी प्रमाणिकता नही होती’ ।
देश की ७० प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है, इस देश में कृषि शिक्षा के विश्वविद्यालय और कॉलेज नाम–मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है । भूमंडलीकरण के दौर में कृषि पर आधुनिक तकनीकी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से, जो इस देश में आती हैं, उसे कृषि का प्रचार–प्रसार तंत्र उन किसानों तक पहुंचाने में लाचार नजर आता है । यह गंभीर और विचारणीय विषय है । शिक्षा का ही दूसरा पहलू, जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम–मात्र भी नहीं है । राष्ट्रीय स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविद्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं । चाहे संस्थानों का अभाव हो, वित्तीय एवं तकनीकी सुविधाओं का अभाव हो अथवा गुणवत्तापरक शिक्षकों का अभाव हो, जिसके कारण एक हरित क्रांति के बाद फिर कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ । किसान ईश्वरीय कृपा पर ही आज भी निर्भर हैं । कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार–प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए और प्रत्येक शिक्षण संस्थान में न्यूनतम माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा अवश्य होनी चाहिए । उन लोगों का उपयोग कृषि के निचले स्तर के व्यापक प्रचार–प्रसार और उत्पादन वृद्धि में किया जाना चाहिए ।
बलराम तिवारी आगे बताते हैं, ‘एकीकृत कृषि प्रणाली के तहत हम लोग मिश्रित खेती करना चाहते हैं, ऐसा पहले भी होता आया है लेकिन ये प्रणाली अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है । इसे जापान में शुरु किया गया, जिसे हमने नेपाल के जलवायु और लेबर समस्या दूर करने के हिसाब से परिमार्जित किया है । इसमें सबसे पहले खेत के चारों ओर बाँध बनाया जाता है । बाँध पर पेड़, सब्जी, घास लगाई जा सकती है । बांध बाहरी सुरक्षा का काम भी करती है । इससे बाहरी पानी आना बंद हो जाता है । बांध के भीतर चारों तरफ नाला बन जाता है, जो मछली पालन के काम आता है । उसके बाद के भीतरी हिस्से में परंपरागत खेती होती है, इसी के साथ इसमें पशु–पक्षी भी रखा जाता है । एक प्रकार से हमारी भूमि पर होने वाले सारे फसल इसमें हो सकते हैं’ ।
वे आगे बताते हैं ‘इस प्रकार की खेती में कोई फसल कम भी हो तो बाकी से उसकी भरपाई हो जाती है, इसमें एक ही समय में एक ही जमीन पर खेती करके पांच गुना आमदनी बढ़ाई जा सकती है’ । हम लोग उनके खेत देखने भी गए, वहाँ १०–१५ बीघे का तीन–तीन प्लॉट था । तीनों में बाँध बन चुका है और आगे का काम हो रहा था उन्होंने बताया ‘ये सब करने में ५करोड़ से ५०० करोड़ तक का खर्चा आएगा’ । खर्च के स्रोत के बारे में वे बताते हैं ‘कई बैंको में गया हूँ, लेकिन कही से सहयोग नहीं मिला, किसी बैंक को ये प्रणाली ही समझ में नहीं आई, तो कई बैंक तो गांव में लगानी करने को ही इच्छुक नहीं थे, कई तो आय वगैरह के इतने प्रमाण मांग रहे थे, जिन्हें देना किसान के बस की बात नहीं है । संजोग से कृषि विकास बैंक का पोखरिया शाखा खुला, उसके मैनेजर सुरेश चौधरी और राज कुमार महतो, इस प्रोजेक्ट को देखने आए । उन्होंने सहयोग का आश्वासन दिया है लेकिन ये हम लोगो का ड्रीम प्रोजेक्ट है इसके लिए हम लोग अपने शहरी जमीन बेच कर भी इसे सफल करने में लगे हैं’ ।
किसानों को ऋण दिए जाने की व्यवस्था और सुविधाओं को मजबूत तथा उदार बनाने की आवश्यकता है । ये साहूकार ५ रुपये प्रति सैकड़ा प्रति माह की दर से ब्याज पर किसान को ऋण दे देते है, जिसकी कोई गारंटी नहीं होती है और न ही कोई अभिलेख मांगे जाते हैं, बल्कि उसकी चल–अचल संपत्ति और उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए ऋण दिया जाता है । विगत माह ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण के समय सामान्य व्यक्ति की हैसियत से वार्ता की गई तो स्थिति यह है कि अब साहूकार ८ रुपये से १० रुपये तक प्रति सैकड़ा प्रति माह की दर से ब्याज ले रहे हैं, जिससे किसान आकण्ठ ऋण में डूब रहे हैं । इतनी भारी ब्याज की रकम अदा करने के बाद एक बार लिए गए ऋण का मूल धन अदा करना किसान के बस की बात नहीं होती । अतः वह लोक–लाज को बचाने के लिए आत्महत्या तक कर लेते हैं । ऐसी स्थिति में वित्तीय संस्थाओं से लिए गए ऋण तो प्रकाश में आते हैं, किंतु साहूकार द्वारा दिया गया ऋण कहीं भी उजागर नहीं होता । व्यावसायिक बैंकों द्वारा अपनी ऋण नीतियां इस प्रकार नहीं बनाई गई है, जिससे कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण सुविधाएं उपलब्ध हो सकें । अतः इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु इन क्षेत्रों में ग्रामीण बैंकों की स्थापना आवश्यक है । किसान क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था अच्छी योजना हो सकती है ।
सरकार द्वारा किसी प्रकार की भूमि एवं फसल प्रबंधन की बात देश के किसी कोने में दिखाई नहीं देती और तदर्थ आधार पर नीतियों और प्रबंधन का संचालन वे लोग करते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र की कोई जानकारी नहीं होती । यदि राष्ट्रीय स्तर पर यह नीति बनाई जाए कि देश के अंदर विभिन्न जिंसों की कितनी खपत है और वह किस क्षेत्र में है, इसके अतिरिक्त भविष्य के लिए कितने भंडारण की आवश्यकता है ? साथ ही, कितना हम निर्यात कर सकेंगे । जिंसवार उतने उत्पादन की व्यवस्था क्षेत्रीय आधार पर करनी चाहिए और संबंधित किसानों को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए । इसके अतिरिक्त जो भूमि अवशेष रहती है, उस पर ऐसे उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए जो किसानों के लिए व्यावसायिक सिद्ध हो तथा निर्यात की संभावनाओं को पूर्ण कर सकें और आयात को न्यूनतम कर सकें ।
यहां यह भी देखना होगा कि जिन फसलों को हम बोना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक जलवायु, पानी, भूमि आदि कैसा होना चाहिए । इसका परीक्षण कर संबंधित किसानों को शिक्षित किया जाए, ताकि वह सुझावानुसार कार्य करने के लिए सहमत हो । इस हेतु अच्छी प्रजाति के बीजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए और जो खेत या किसान चिन्हित किए जाएं, उन्हें ये बीज उपलब्ध कराए जाने चाहिए । फसल की बुवाई के समय कृषि क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ अपनी देखरेख में बुवाई कराएं तथा उन पर होने वाली बीमारियों, आवश्यक उर्वरकों, सिंचाई, निकाई, निराई, गुड़ाई आदि का कार्य आवश्यकतानुसार समय–समय पर कृषि विशेषज्ञों के निर्देशन में कराया जाए । इससे उत्पादन बढ़ेगा और किसान भी व्यावहारिक दृष्टि से प्रशिक्षित होंगे ।
कृषि उपयोग में लाए जाने वाली भूमि का अधिग्रहण और उस पर निर्माण प्रतिबंधित कर देना चाहिए । आवासीय औद्योगिक एवं ढांचागत निर्माणों के लिए कृषि योग्य भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण किए जाने से कृषि योग्य भूमि अत्यधिक संकुचित होती चली जाएगी, जो तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के भरण हेतु कृषि उत्पादन के लिए अक्षम होगी ।
पंचायत अथवा ग्रामसभा स्तर पर एक कृषि केंद्र होना चाहिए जहां ग्रामीण कृषि क्षेत्र से संबंधित सभी कर्मचारी आवासीय सुविधाओं के साथ कार्यालय में कार्य कर सकें । यहां एक सहकारी समिति भी होनी चाहिए अथवा कृषि सहकारी समिति का विक्रय केंद्र होना चाहिए जिस पर कृषि मानकों के अनुसार बीज, उर्वरक, कीटनाशक आदि की व्यवस्था कराई जाए, जो किसानों को ऋण के रूप में उपलब्ध हो । साथ ही, ऐसे यंत्र उपकरण जिनकी किसानों को थोड़े समय के लिए आवश्यकता पड़ती है, वह उपलब्ध रहने चाहिए और निर्धारित किराए पर उन्हें उपलब्ध कराया जाना चाहिए । जैसे– निकाई, निराई, गुड़ाई, बुवाई अथवा कीटनाशकों के छिड़काव से संबंधित यंत्र अथवा कीमती यंत्र जिन्हें किसान व्यक्तिगत आय से खरीदने में असमर्थ है, आदि संभव हैं तो ट्रैक्टर, थ्रेशर, कंबाइन हार्वेस्टर आदि की सुविधाएं भी किराए पर उपलब्ध होनी चाहिए ताकि लघु एवं सीमांत वर्ग के किसान बिना किसी बाधा के खेती कर सकें । इस संबंध में कृषि औजार के अधिकारी ईश्वरी उपाध्याय और सचिन मिश्रा बताते हैं कि ‘कृषि औजार बनने तो बंद हो ही गए है, पर जिन आधुनिक औजारों को हमलोग प्रदर्शन और जानकारी के लिए मंगाते है, उससे सीखने के लिए तिवारी जी सरीखे कुछ किसान के अलावा कोई देखने तक नहीँ आता । किसानों में जागरुकता की कमी और नए प्रविधि अपनाने मे दूरी बनी रहती है’ ।
ये भी जरुरी है कि खेती में जो भी फसल बोई जाए, उस फसल को सहकारी समिति के माध्यम से बीमाकृत कराया जाए और सरकार की नीतियों में आवश्यकतानुसर परिवर्तन करके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिस किसान की फसल को जिस तरह से भी क्षति हुई जैसे अतिवृष्टि, सूखा, ओलावृष्टि, आग, चोरी, बाढ़ या कोई अन्य कारण हो तो उस व्यक्ति को उसका क्लेम तत्काल दिया जाना चाहिए । अधिकांश बीमा कंपनी बीमा करने के बाद इसकी खबर नहीं लेती और यदि कोई किसान संपर्क भी करता है तो उसे कानूनी दांव–पेंच में फंसाकर परेशान कर देती हैं जिससे वह इसके लाभ से वंचित रह जाता है । कृषि उपज प्रबंधन के लिए बीमा अति महत्वपूर्ण और उपयोगी है जिससे किसानों को ऋणग्रस्तता से बचाया जा सकता है ।
यह विचारणीय विषय है कि किसान की फसल छः माह में तैयार होती है और उस फसल को तैयार करने के लिए आज भी किसान नंगे पांव जाड़ा, गर्मी, बरसात में खुले आकाश के नीचे रात–दिन परिश्रम करके फसल तैयार कर लेता है । खेतों में रात–दिन कार्य करते समय दुर्भाग्यवश यदि कोई जानवर काट लेता है या कोई दुश्मन उसकी हत्या कर देता है तो ऐसी दशा में उसका कोई बीमा आदि नहीं होता । ऐसे में उनके बच्चे सड़क पर आ जाते हैं, दिन–रात एक करके देश की सूरत बदलने वाला किसान और उसका परिवार न केवल भूखा सोने को मजबूर होता है बल्कि सदैव के लिए निराश्रित हो जाता है । अतः फसल बीमा के अतिरिक्त कृषक बीमा भी कराया जाना चाहिए ।
इस प्रोजेक्ट के सामाजिक असर के बारे में वे बताते हैं कि ‘गांव के लोगों को ये समझ ही नहीं आया, शुरु में तो उन्हें लगा उनके खेतों का पानी रोकने के लिए ये साजिश के तहत किया जा रहा है । स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया । हम लोगों का ज्यादा समय तो इसका प्रयोजन समझाने में ही लग गया । हमारे समाज में सहयोग से ज्यादा विरोध को बढावा दिया जाता है । एक समय तो ऐसा भी आया की इस प्रोजेक्ट पर काम करना नामुमकिन लग रहा था, लेकिन कहते है ना हिम्मते मर्दा मददे खुदा, बस इसी उम्मीद में हमलोग लगे हुए है’ ।
तिवारी जी बताते है की ‘प्रोजेक्ट तो पूरा हो ही जाएगा, पर असली समस्या उसके उत्पाद के बिक्री और सही मूल्य निर्धारण की आएगी’ । विडंबना है कि जब भी कृषि उत्पाद बाजार में आता है तो उसके मूल्य निरंतर गिरने लगते हैं और मध्यस्थ सस्ती दरों पर उसका माल क्रय कर लेते हैं जिससे कृषि घाटे का व्यवसाय बना हुआ है । दुर्भाग्य है कि संबंधित लोग औद्योगिक क्षेत्रों के उत्पादन की दरें लागत, मांग और पूर्ति का ध्यान में रखते हुए निर्धारित करते हैं किंतु किसान की जिंसों का मूल्य या तो सरकार या क्रेता द्वारा निर्धारित किया जाता है उसमें भी तत्काल नष्ट होने वाले उत्पाद की बिक्री के समय किसान असहाय दिखाई देता है । ऐसी दशा में क्रय–विक्रय व्यवस्था को मजबूत और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए और उसके उत्पाद का मूल्य भी मांग, पूर्ति और लागत के आधार पर किसान को निर्धारित कर लेने देना चाहिए । सर्वविदित है कि किसानों का कहीं उत्पाद इतना अच्छा और अधिक हो जाता है कि सड़ने लगता है और किसान उसे फेंकने को मजबूर हो जाता है और कभी–कभी उत्पाद इतना कम होता है कि उसे मध्यस्थ सस्ती दरों पर क्रय कर उच्च दरों पर बिक्री कर बीच का मुनाफा ले लेता है और किसान ठगा–सा रह जाता है ।
आज भी किसान के पास कोई ऐसा तंत्र–मंत्र नहीं है जो यह तय कर सके कि उसके उत्पाद का उचित मूल्य आज किस बाजार में क्या है और भविष्य में मूल्य घटने–बढ़ने की क्या संभावनाएं हैं ? जब वह अपने उत्पाद को मंडी में ले जाता है तब उसे उस दिन का भाव पता चलता है । उत्पाद को पुनः घर वापस लाने पर किराया–भाड़े का बोझ, परेशानी आदि को देख मजबूर होकर क्रेता के चुंगल में फंसता है और क्रेताओं का संगठित गिरोह उसके उत्पाद का मनमाने दामों में क्रय कर लेते हैं । इसलिए किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलने के लिए उन्हीं के मध्य व्यक्तियों के माध्यम से कोई सम–सामयिक रणनीति बनाई जानी चाहिए । मंडी में गोदामों में सहकारी समितियों के माध्यम से यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि यदि किसी दिन किसान को उसके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है तो उसके उत्पाद का भंडारण सहकारी क्रय–विक्रय समितियों के गोदामों में कर दिया जाए और उसके उस दिन के ताजा मूल्य का ५० से ८० प्रतिशत अग्रिम दे दिया जाए ताकि वह अपने घरेलु व सामाजिक कार्य को कर सके । जब बाजार मूल्य उच्च स्तर पर हो तो बिक्री कर, समिति का किराया और लिए गए अग्रिम को वापस कर अपनी बचत पूंजी को अपने उपयोग में ला सके । यह अत्यंत गंभीर और विचारणीय विषय है । इससे लघु और सीमांत कृषकों की तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति और फसल के उचित मूल्य प्राप्त करने में सुविधा होगी ।
सरकार को यह भी ध्यान देना चाहिए कि किसान का जो उत्पाद है, वह किस प्रकार का है और उसकी उपयोगिता क्या है । जैसे हर वर्ष हमारे देश में विभिन्न भागों में विभिन्न फसलें खेतों में ही नष्ट हो जाती हैं । एक क्षेत्र में आलु गोदामों में छोड़ देते हैं या मिट्टी में दबा देते हैं, लहसुन की उपज लागत न मिलने के कारण खेतों में दबा रहने देते हैं, आम जैसे अनेक फल सस्ती दरों पर बिक्री करने अथवा बिना मूल्य लिए वितरित करने के लिए किसान मजबूर होता है । कहीं–कहीं प्याज, केला, अंगूर और अनेक सब्जियां नष्ट हो जाती हैं जबकि दूसरे भागों में इनकी आवश्यकता होते हुए भी महंगे परिवहन के कारण उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कराई जा पाती है । जहां जिस क्षेत्र में किसी चीज का उत्पादन अधिक है, उन क्षेत्रों में उत्पाद से संबंधित प्रक्रिया इकाइयां लगाई जानी चाहिए जिससे उत्पाद को खराब होने से बचाया जा सके तथा उसका उचित मूल्य भी किसान को मिल सके । इस व्यवस्था का पूरे देश में नितांत अभाव है ।
किसान का ऐसा उत्पाद जो विभिन्न समितियों के माध्यम से क्रय किया जाता है, उसे किसी न किसी गोदाम में रखने की व्यवस्था अथवा निर्यात की व्यवस्था की जानी चाहिए । उस क्रय किए गए उत्पाद की ग्रेडिंग व्यवस्था भी होनी चाहिए ताकि कुल उत्पाद की मात्रा पर उसके ग्रेड के अनुरुप बिक्री मूल्य मिल सके ।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित ऐसे उद्योग–धंधों की स्थापना की जानी चाहिए जिनमें न्यूनतम प्रशिक्षण से स्थानीय आबादी के व्यक्तियों को रोजगार मिल सके तथा किसानों के उत्पाद की उसमें खपत हो सके जैसे– फ्लोर मिल, राइस मिल, तेल कोल्हू, फलों से बनने वाले विभिन्न सामान, पापड़, बड़ीयां, चिप्स एवं आचार आदि के उद्योग लगने चाहिए तथा उनको देश के दूसरे भागों में भेजने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए । ग्रामीण बेरोजगारों को ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए वहां के स्थानीय उत्पाद को ध्यान में रखते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना भी की जानी चाहिए । यहाँ बलराम तिवारी एक प्रतीक है, लेकिन ऐसा हरेक किसान को होना होगा, इसमें सरकारी उदासीनता ऐसे किसानों का गला घोंट देती है, यदि सरकार इन सुझावो पर ध्यान दे तो फिर दूसरी हरित और स्वेत क्रांति करके किसानों के जीवन स्तर को बेहतर किया जा सकता है, और देश भी खाद्य सामग्री पर आत्मनिर्भर हो सकता है ।

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