केशवदास जी का जीवन परिचय और उनकी साहित्यिक प्रेरणा

यकीनन साहित्य एक असीम विस्तृत सागर है जिसमे जितने गहरे उतरेंगे उतने ही रत्न प्राप्त होंगे ………
नमस्कार, मैं मनीषा गुप्ता हिंदी साहित्य की इस श्रंखला को बढ़ाते हुए आप लोगो के समक्ष रीतिकालीन कवि # केशव जी का जीवन परिचय और उनकी साहित्यिक प्रेरणा …….
‘केसव’ चौंकति सी चितवै, छिति पाँ धरिकै तरकै तकि छाँहीं।
बूझिये और कहै मुख और, सु और की और भई छिन माहीं॥
दीठि लगी किधौं बाइ लगी, मन भूलि पर्यो कै कर्यो कछु काहीं।
घूँघट की, घट की, पट की, हरि आजु कछू सुधि राधिकै नाहीं॥
केशवदास का सम्बन्ध उस युग से है जिसे साहित्य और अन्य कलाओं के विकास एवं सांस्कृतिक सामंजस्य की दृष्टि से मध्यकाल के इतिहास में स्वर्णयुग कहा जाता है। केशवदास का जन्म भारद्वाज गोत्रीय सना ब्राह्मणों के वंश में हुआ। इनको ‘मिश्र’ कहा जाता है । अपनी कृति रामचन्द्रिका के आरंभ में सना जाति के विषय में उन्होंने कई पंक्तियां कही हैं।सना जाति गुना है जगसिद्ध सुद्ध सुभाऊ
प्रकट सकल सनोढियनि के प्रथम पूजे पाई
भूदेव सनाढयन के पद मांडो, तथा सना पूजा अद्य आद्यदारी आदि। इन उक्तियों से प्रकट होता है कि केशवदास जी किस जाति में पैदा हुए थे।
जन्मतिथि  केशवदास जी ने अपनी तिथि के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है। विभिन्न आधारों पर विद्वानों ने केशवदास जी की जन्म – तिथि निश्चित करने का प्रयास किया है। इस सम्बन्ध में विभिन्न मतों की सारिणी निम्नलिखित है:विद्वान उनके अनुसार जन्मतिथि
विभिन्न मतों के बावजूद संवत् १६१८ को केशव की जन्मतिथि माना जा सकता है। रतनबावनी केशवदास जी की प्रथम रचना और उसका रचना काल सं० १६३८ वि० के लगभग है। इस प्रकार बीस वर्ष की अवस्था में केशव ने ‘रतनबावनी’ रचना की तथा तीस वर्ष की अवस्था में रसिकप्रिया की रचना की। अतः केशवदास जी की जन्म – तिथि सं० १६१८ वि० मानना चाहिए। इस मत का पोषण श्री गौरीशंकर द्विवेदी को उनके वंशघरों से प्राप्त एक दोहे से भी होता है:
संवत् द्वादश षट् सुभग, सोदह से मधुमास।
तब कवि केसव को जनम, नगर आड़छे वास।।


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सुकवि सरोज
केशव का जन्म स्थान :केशव का जन्म वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत ओरछा नगर में हुआ था। ओरछा के व्यासपुर मोहल्ले में उनके अवशेष मिलते हैं। ओरछा के महत्व और उसकी स्थिति के सम्बन्ध में केशव ने स्वयं अनेक भावनात्मक कथन कहे हैं। जिनसे उनका स्वदेश प्रेम झलकता है। केशव ने विधिवत् ग्राहस्थ जीवन का निर्वाह किया। वंश वृक्ष के अनुसार उनके पाँच पुत्र थे। अन्तः साक्ष्य के अनुसार केशव की पत्नी ‘विज्ञानगीता’ की रचना के समय तक जीवित थीं। ‘विज्ञानगीता’ में इसका उल्लेख इस प्रकार है:
वृत्ति दई पुरुखानि को, देऊ बालनि आसु।
मोहि आपनो जानि के गंगा तट देउ बास।।वृत्ति दई, पदवी दई, दूरि करो दु:ख त्रास।
जाइ करो सकलत्र श्री गंगातट बस बास।।
केशवदास : राजदरबार में
केशव राज्याश्रित कवि थे। उनके पूर्वज भी राजाओं से सम्मानित होते आ रहे थे। ओरछेन्द्र महाराजा रामशाह के छोटे भाई इन्द्रजीतसिंह के द्वारा केशव को आश्रय और सम्मान मिला। राजा इन्द्रजीतसिंह के द्वारा केशव को आश्रय और सम्मान मिला। राजा इन्द्रजीतसिंह साहित्य और संगीत के मर्मज्ञ थे। केशवदास को इन्होंने ही रसिक-प्रिया की रचना की प्रेरणा दी। इससे इनकी साहित्यिक अभिरुचि का अंदाजा होता है। उनके दरबार में रायप्रवीण संगीत-नृत्य कुशला वेश्याएं भी रहती थीं।केशव इन्द्रजीत सिंह के दीक्षा-गुरु थे और रायप्रवीण के काव्यगुरु हुआ करते थे। इन्द्रजीत सिंह के दरबार के कलात्मक वातावरण में केशव और रायप्रवीण कविता भी कहा करती थी। रायप्रवीण ने अपने काव्य-कौशल से अकबर को छकाकर अपनी प्रतिभा का परिचय करा ही साथ-साथ अपने गुरु केशवदास की प्रतिष में भी चार चाँद लगवा दिया था। इन्द्रजीत सिंह के बाद वीरसिंहदेव ओरछा के राजा बने। केशव वीरसिंहदेव के दरबार से जुट गए। वीरसिंहदेव की प्रेरणा पाकर केशव ने विज्ञानगीता की रचना की। बीच में मन मुटाव के बाद केशव को अपना राज्याश्रय खोना पड़ गया। फिर बाद में वीरसिंहदेव ने केशव को सम्मानित करके राज्याश्रय प्रदान करके अपनी साहित्यिक रुचि का परिचय दिया। केशवदास ने वीरसिंहदेव के बारे में अपनी कृति वीरसिंहदेव रचित में काफी विस्तार से लिखा है। केशवदास को इन्द्रजीतसिंह तथा वीरसिंहदेव के अलावा रामशाद, रतनसेन, अमरसिंह तथा चन्द्रसेन ने सम्मान देकर आश्रय प्रदान किया। इन सभी राजाओं के बारे में केशव ने अपनी कृतियों में कुछ छन्दों की रचना करके, उनको अपने लक्षण ग्रंथों में दे दिया है। रतनसेन की प्रशंसा में ही रतनबावनी की रचना की गई थी।
केशव का सम्बन्ध राणा वंश से भी मालूम पड़ता है । यदा राणा प्रताप के पुत्र राणा अमर सिंह की प्रशस्ति में केशव ने कई छन्द लिखे जो कविप्रिया में संग्रहित किया गया है।
 केशव का सम्बन्ध जहांगीर और अकबर के दरबार से वीरसिंहदेव के मित्र जहांगीर की प्रशस्ति में केशव ने जहांगीरजसचन्द्रिका लिखी। यहाँ यह कहना कठिन है कि केशव के जहांगीर आश्रयदाता थे। वीरसिंहदेव के विपत्ति के दिनों में जहांगीर ने उनकी सहायता की थी, इसीलिए केशव ने अपने आश्रयदाता के मित्र को अमर बता दिया। केशव ने रहीम की प्रशंसा कई स्थानों पर की है। अकबरी दरबार के एक और प्रतिष्ठित रत्न रोडरमल का भी केशव ने एक स्थान पर उल्लेख किया है –
रोडरमल तुव मित्र, मरे, सब ही सुख सोयी।
मोरे हित बरबीर बिता टुकु दीननि शेयो।।
केशव की कृतियों में उच्च कोटि के लोगों के अलावा सामान्य लोगों का भी उल्लेख किया गया है। सामान्य लोगों में एक उनका पड़ोसी सोनार जिसका नाम पतिराम था, उनकी रचनाओं में पतिराम का उल्लेख मिलता है। केशव एक स्थान पर पतिराम के बारे में कहते हैं कि वह अत्यन्त निगरानी रहने के बावजूद सोना चोरी कर लेता था -तुला तोल कसवान बनि, कायथ लिखत अपार।
राख भरत पतिराम पे, सोनो हरति सुनार।।
केशव का निधन : केशव के निधन के काल और स्थान पर विद्वानों में मतभेद पाये जाते हैं। मिश्रबन्धु, गणेशप्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी एवं रामचन्द्र शुक्ल इत्यादि विद्वान केशवदास का निधन काल १६७४ में हुआ मानते हैं। स्व० चन्द्रबली पाण्डेय ने निधन काल सं० १६७० माना है। लाला भगवानदीन और गोरीशंकर द्विवेदी के अनुसार केशव का निधन १६८० में हुआ था। केशव के प्रेत योनि में पड़ने और तुलसी द्वारा उनके उद्धार की किंवदन्ती से भी स० १६८० वाले मत की पुष्टि होती है क्योंकि तुलसी का भी देहान्त इसी वर्ष हुआ था।
केशवदास का व्यक्तित्व विश्लेषण केशवदास के व्यक्तित्व में काफी निखार हो चुका था क्योंकि हर कवि या साहित्यकार के व्यक्तित्व के निर्माण में युग का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। केशव युग की सबसे प्रमुख विशेषता आचारमूलक धर्म और जनवादी दर्शन की भावात्मक संस्कारिता मानी जा सकती है। इसी प्रक्रिया में भावात्मक धर्म और साहित्य का गठबन्धन हुआ।केशव के व्यक्तित्व में आत्माभिमान पाया जाता है। केशव का व्यक्तित्व पौराणिक और शास्रीय ज्ञान से मंडित होकर भाषा की ओर झुक गया था। ओरछा के राजवंश से तो केशव का वंश संबाद था ही इसके अलावा ब्रज के वैष्णव संप्रदायों से भी उनका सम्बन्ध होने का प्रमाण मिलता है। यह कहा जा सकता है कि केशव बल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित थे। विट्ठलनाथ जी उनके मंत्र गुरु थे उनकी प्रशस्ति में केशव ने लिखा है –
हरि दृढ़ बाल गोबिन्द विभु पायक सीतानाथ।
लोकप बिट्ठल शंखधर गरुड़ध्वज रघुनाथ।।
केशवदास के अग्रज केशव को वंश परंपरा से बहुलता के संस्कार मिले थे। इनके एक पूर्वज भाऊ-राम ने भाव-प्रकाश की रचना की थी। केशव के पिता काशीराम ज्योतिष के विद्वान थे। इनके पिता ने शीघ्रबोध नामक एक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की थी। इनके अग्रज बालभद्र मिश्र हिन्दी के एक अच्छे विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने नखशिख भागवत भाष्य हनुमान्नाटक टीका का प्रणयन किया था। इन बहुमुखी पांडित्य और ज्ञान दरबारों से केशव के व्यक्तित्व पर काफी असर डाले।
केशवदास की कृतियाँ
वर्गीकरण केशव की रचनाओं का विषय और रुप की दृष्टि से वर्गीकरण निम्नलिखित है –
वीरभाव
रतनबावनी
मुक्तकप्रबन्ध
प्रबंधकाव्य
प्रशस्तिमूलक
वीरसिंहदेवचरित
चरितकाव्य
(प्रबन्धकाल)
 
जहांगीरजस चन्द्रिका
 
 
रामभक्ति
रामचन्द्रिका
महाकाव्य
 
श्रृंगार रसराजत्व
रसिकप्रिया
 
 
अलंकारशास्र
 
लक्षणग्रन्थ
आचमित्व संबंधी
कविशिक्षा
कविप्रिया
 
 
छन्दशास्र
छन्दमाला
 
 
ज्ञान वैराग्य
विज्ञानगीता
प्रबोधचन्द्रोदयशैली
 
 विश्लेषण“रतनबावनी’ बावनी काव्यरुप में आती है। इसे छ छंद में लिखे गए हैं। इसकी मूल प्रेरणा वीर-पूजा की है। केशवदास ने राजकुमार रतनसेन की वीर-गति को जातीय राष्ट्रीयता का संदर्भ प्रदान करने का प्रयास किया है। वीरसिंहदेवचरित को धर्म-प्रतीकों के माध्यम से एक उदात्त संदर्भ प्रदान किया गया है। यह प्रतीक योजना दान, लोभ और विंध्यवासिनी देवी में परिलक्षित है। जहांगीरजस चन्द्रिका में उद्यम और भाग्य का संवाद दिया गया है। इसके आरंभ में शाही दरबार का विशद चित्र है।
 प्रकृति–चित्रण काव्य में प्रकृति का वर्णन कई प्रकार से किया जाता है जैसे – आलंबन, उद्दीपन, उपमान, पृष्ठभूमि, प्रतीक, अलंकार, उपदेश, दूती, बिम्ब-प्रतिबिम्ब, मानवीकरण, रहस्य तथा मानव-भावनाओं का आरोप आदि। केशव ने भी ‘कविप्रिया’ में वर्ण्य-विषयों की तालिका इस प्रकार दी है:
देस, नगर, बन, बाग, गिरि, आश्रम, सरिता, ताल।
रवि, ससि, सागर, भूमि के भूषन, रितु सब काल।।
फिर इन वर्णनों में आने वाली वस्तुओं की सूची दी गई है। इससे प्रतीत होता है कि काव्य में केशव भी प्रकृति-वर्णन को आवश्यक मानते थे।अपनी कृतियों में केशवदास ने प्रकृति-वर्णन की सभी शैली को अपनाया है। आलम्बन-रुप में प्रकृति-चित्रण भी उन्होंने पर्याप्त मात्रा में किया है। उन्होंने कृत्रिम पर्वत और नदी का वर्णन किया है, जिनका उल्लेख संस्कृत संस्कृत काव्यों में क्रीड़ाक्षेत्र के नाम से हुआ है। केशव का आदर्श माघ, श्रीहर्ष, बाण आदि का आदर्श था। केशव के काव्य-सिद्धान्तों के अनुसार, वन, वाटिका तथा कहीं समुद्र आदि के वर्णन में कुछ विशिष्ट बातें अनिवार्य हैं। इन वस्तुओं के वर्णन में उन्हें गिनाकर काम चला लेने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, विश्वामित्र के आश्रम के निकटस्थ वन का वर्णन प्रस्तुत है:
तरु तालीस तमाल ताल हिताल मनोहर।
मंजुल बंजुल तिलक लकुच कुल नारिकेर बर।
एला ललित लवंग संग पुंगीफल सोहैं।
सारो सुककुल कलित चित्त कोकिल अलि मोहैं।
सुभ राजहंस कुल, नाचत मत्त मयूरगन।
अतिप्रफुलित फलित सदा रहै “केसवदास’ बिचित्र बन।।
 भाव – व्यंजना: रस
प्रारंभिक अवस्था में रस का अर्थ श्रृंगार ही माना जाता था और रस के प्रवर्तक आचार्य कामशास्र के भी आचार्य माने जाते थे। विश्वनाथ जैसे विद्वान ने श्रृंगार रस को आदिरस कहा है। बाणभ ने रस शब्द का प्रयोग श्रृंगार के अर्थ में किया है। भोजदेव ने तो “श्रृंगार प्रकाश’ में स्पष्ट ही कहा है:
श्रृंगारवीरकरुणाद्भुतरौद्रहास्
बीभत्सवत्सलभयानकशान्तनाम्नः ।
आम्नासिषुर्दशरसान् सधियो वयं तु
श्रृंगारमेव रसनाद्रसमामनामः ।।
श्रृंगारसंयोग श्रृंगारकेशव ने संयोग श्रृंगार का विस्तार से वर्ण किया है। केशव का जीवन सुखमय परिस्थितियों में व्यतीत हुआ। राज-दरबारों में संयोग-श्रृंगार से संबंधित सूक्ष्म तथा चमत्कारपूर्ण छन्दों का ही विशेष आदर होता था। अतः केशव ने संयोग-वर्णन में सौन्दर्य वर्णन, रुप वर्णन, हाव-भाव वर्णन, आभूषण वर्णन अष्टयाम, उपवन, जलाशय, क्रीड़ा-विलास आदि का चित्रण विस्तार से किया है। उन्होंने अपनी श्रृंगार-नायिकाओं के अत्यन्त स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किए हैं। किसी नायिका का पति परदेश जा रहा है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ है कि अपने प्रियतम को किन शब्दों में विदाई दे। अतः वह स्वयं प्रियतम से ही पूछ रही है:
जौ हौं कहौं “रहिजै’ तौ प्रभुता प्रगट होति,
“चलन’ कहौं तौ हित-हानि, नाहिं सहनै ।
“भावै सो करहु’ तौ उदास भाव प्राननाथ,
“साथ लै चलहु’ कैसे लोलाज बहनै ।।”कसोराइ’ की सौं तुम सुनहु छबीले लाल,
चले ही बनत जौ पै नाहीं राजि रहनै।
तैसियै सिखावौ सीख तुम ही सुजान पिय,
तुमहिं चलत मोहि कैसो कछू कहनै ।।
 विप्रलंभ श्रृंगार रीतिकालीन कवियों की दृष्टि प्रधानतः जीवन के सुख-विलास पर थी, अतः उन्होंने अपने काव्य में भी विलास एवं रसिकता का ही विशद चित्रण किया है। वे परम्पराभुक्त ऊहा एवं अतिश्योक्ति के द्वारा ही विरह-चित्रण करते रहे। केशव ने भी विरह के प्रसिद्ध उद्दीपकों, परम्परित वर्णन-परिपाटियों एवं शैलियों का उपयोग किया है। सीता के वियोग में चन्द्रमा की शीतल किरणें राम के हृदय को दग्ध कर रही हैं :
हिमांसु सूर सो लगै सो बात बज्र सो बहै ।
दिसा लगै कृसानु ज्यों बिलेप अंग को दहै ।।
बिसेष कालराति सी कराल राति मानिये ।
बियोग सीय को न, काल लोकहार जानिये ।।
 पूर्वराग किसी के गुण-श्रवण अथवा सौंदर्य-दर्शन से उत्पन्न प्रेम की इच्छा को पूर्व-राग कहा जाता है:
केसव कैसेहुं ईइनि दीठि ह्मवे दीठ परे रति-ईठ कन्हाई ।
ता दिन तें मन मेरे कों आनि भई सु भई कहि क्यों हूं न जाई ।।
होइगी हांसी जौ आवै कहूं कहि जानि हितू हित बूझन आई ।
कैसें मिलौं री मिले बिनु क्यों रहौं नैननि हेत हियें डर माई ।।
मान “रसिकप्रिया’ में कवि ने प्रेमियों के मान का तथा मान-मोचन-विधि का वर्णन किया है।
 करुण जहां किसी आधिदैविक तथा अन्य विशेष कारण से संयोग की आशा समाप्त हो जाती है, वहां करुण-विप्रलम्भ होता है। “रसिकप्रिया’ में केशव ने इसका वर्णन किया है।
प्रवास प्रियतम के किसी कारण-विशेष से चले जाने पर हृदय में जो संतापमयी वृत्ति जागरित हो जाती है, उसे प्रवास कहते हैं। “रसिकप्रिया’ में इसका वर्णन मिलता है।
विरह –दशाएं विरह की शास्रीय दस दिशाएं निम्नलिखित हैं : – अभिलाषा, चिन्ता, गुण-कथन, स्मृति, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता तथा मरण। “रसिकप्रिया’ में केशव ने मरण को छोड़कर, अन्य सभी विरह-दशाओं का वर्णन किया है, क्योंकि राधा कृष्ण के सम्बन्ध में – 
मरन सु केशवदास पै,
बरन्यो जाहि न मित्र ।
करुण रस केशव ने करुण रस के चित्रण में भाषा की सांकेतिकता की अपेक्षा गंभीरता की अभिव्यंजना के लिए व्यंजना-शक्ति का आश्रय लिया है। राम लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजते हुए दशरथ की मनःस्थिति का चित्रण कितना गंभीर है:
राम चलत नृप के जुग लोचन ।
बारि भरित भए बारिद-रोचन ।।
पाइन परि रिषि के सजि मौनहिं।
“केसव’ उठि गए भीतर भौनहिं ।।
 वीर : रौद्र कठोर भावों की अभिव्यक्ति में अलंकार-योजना तथा ध्वन्यात्मक चमत्कार उच्च कोटि के हैं। राजसी प्रताप, राज-ऐश्वर्य, वीरता, युद्ध, सेना का अभियान, आतंक आदि के वर्णन इसलिए उत्कृष्ट प्रतीत होते हैं। केशव का इन वर्णनों का उत्साह भी बढ़ा-चढ़ा था और ऐसे वर्णनों की शास्रीय परम्परा भी समृद्ध मिलती है। केशव ने कठोर भावों के चित्रण में पर्याप्त कौशल का परिचय दिया है और उसमें उनको पर्याप्त सफलता भी मिली है। युद्ध प्रसंगों में वीर, रौद्र तथा भयानक रसों की समुचित व्यंजना केशव ने की है। कवि का इन भावों के साथ साक्षात सम्बन्ध था। यह सब एक राजकवि के लिए स्वाभाविक था।”रामचन्द्रिका’ में युद्ध-वर्णन दो अवसरों पर हुआ है : राम-रावण युद्ध के अवसर पर एवं राम की सेना के साथ लवकुश का युद्ध होने पर युद्ध वर्णन में प्रायः वीर, रौद्र तथा भयानक की त्रिवेणी रहती है। सबसे पहले हमें वीरों की वीरतापूर्ण उक्तियां गूंजती हुई मिलती हैं। मकराक्ष की गर्वोक्ति इस प्रकार है :
सु जौलौं जियौं हौं सदा दास तेरो ।
सिया को सकै दै सुनौ मन्त्र मेरो ।
हतौं राम स्यों बन्धु सुग्रीव मारौं ।
अजोध्याहि लै राजधानी सुधारौं ।।
 भयानक भयानक रस वीररस का सहवर्ती होता है। यह वीरता या रौद्र का एक प्रकार से ज्ञापक रस है। इसके अवसर भी रामचन्द्रिका में कई आए हैं। मुख्य स्थल ये हैं : धनुभर्ंग, परशुराम का आगमन, लंका दहन आदि। धनुभर्ंग के अवसर पर समस्त जगत् आतंकित हो जाता है। भयानक रस की इससे अधिक व्याप्ति अत्यन्त उपयुक्त है :
प्रथम टंकारि झुकि झारि संसार-मद चन्डको दंड रह्यो मंडि नवखंड कों ।
चालि अचला अचल घालि दिगपालबल पालि रिषिराज के बचन परचंड कों ।
बांधि बर स्वर्ग कों साधि अपबर्ग धनु भंग को सब्द गयो भेदि ब्रह्मांड को ।।
 बीभत्स युद्धक्षेत्रीय रक्त-सरि के वर्णन में कुछ बीभत्स का आभस भी मिलता है। अन्यत्र भी कुछ अवसरों पर बीभत्स की व्यंजना मिलती है। मेघनाद हनुमान को बन्दी बना लेता है। रावण मेघनाद को आज्ञा देता है कि इसको जितना ज्ञास दिया जा सके, उतना दो। यहां रौद्र का सहवर्ती होकर बीभत्स सूच्य रुप में आया है:
कोरि कोरि जातनानि फोरि फोरि मारिये ।
काटि काटि फारि बांटि बांटि मांसु डारिये ।
खाल खैंचि खैंचि हाड़ भूंजि भूंजि खाहु रे ।
पौरि टांगि रुंडमुंड लै उडाइ जाहु रे ।।
बीभत्स का युद्धक्षेत्रीय विवरण भी उल्लेखनीय है।
हास्य : व्यंग्य हास्य की परिस्थितियां भी रामचन्द्रिका में है। रौद्र-वीर की परिस्थिति में भयानक की व्यंजना कभी कभी हास्यास्पद हो जाती है। परशुराम के आने पर कुछ भयभीत राजाओं ने स्री वेश धारण कर लिया – “काटिकै तनत्रान एकह नारि भेषन सज्जहीं।” हास्य ओर व्यंग्य की एक मिश्रित परिस्थिति परशुराम की दर्पोक्ति में प्रकट होती है:
लक्ष्मन के पुरिषान कियो पुरुषारथ सो न कह्यो परई।
वेष बनाइ कियो बनितानि को देखत “केसव’ ह्यो हरई ।।
इसी प्रकार के कटु व्यंग्यों की सृष्टि लव-कुश संवाद में केशव ने की है।
शान्त “रामचन्द्रिका’ के भाव-विधान में शान्त रस का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अत्रि-पत्नी अनसूया के चित्र से ऐसा प्रकट होता है जैसे स्वयं ‘निर्वेद’ ही अवतरित हो गया हो। वृद्धा अनसूया के कांपते शरीर से ही निर्वेद के संदेश की कल्पना कवि कर लेता है:
कांपति शुभ ग्रीवा, सब अंग सींवां, देखत चित्त भुलाहीं ।
जनु अपने मन पति, यह उपदेशति, या जग में कछु नाहीं ।।
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