के पी ओली ने मधेशियों को मूर्ख क्यूँ कहा… ?

कैलाश महतो, परासी, ४ मार्च |

भारत भ्रमण के तुरन्त बाद ओली की बोली ने फिर से मधेशियों पर धमाका किया । उन्होंने मधेशियों को मूर्ख ही कह डाला । उनका कहना था कि मधेशी जनता मूर्ख होने के कारण तीन पार्टीयों द्वारा बनाये गये संविधान को उन्होंने पढा नहीं और संविधान को मधेश विरोधी कहा रहा है

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यहाँ गौर करने बाली बात है कि नेपाल में रहते ओली ने मधेशियों को गाली तो दिया ही । मगर भारत भ्रमण से लौटने के बाद गाली क्यूँ दिया होगा ? थोडे से गहरेपन में जायें तो स्पष्ट होता है कि भारत ने ओली को कुछ न कुछ नसीहत जरुर देकर भेजा है, जिसका भडास उन्होंने नेपाल आकर निकाला हैं । सजा स्वरुप भारत ने उसके तरफ से सलाना नेपाल को दे रहे आर्थिक सहयोग रु.४२० करोड से घटाकर रु. ३०० करोड में ला दिया है ।
जहाँतक मधेशी का मूर्ख होने का सवाल है, ओली ने ठीक ही कहा है । संसार को मानव सभ्यता और साहित्य पडोसने बाले मध्य देशीय शिक्षा, सभ्यता और साहित्यों को ताक पर रखकर चाप्लुस और भद्दे दलाल मधेशी नेताओं ने मूर्खतापूर्ण रबैयों से सारा मधेश और मधेशियों को वो प्राथमिक स्तर के प्रमाण–पत्रधारी ओली के द्वारा बेइज्जत जो करबा रहे हैं । मधेशी नेता तो मधेशी जनता का प्रतिक है और जब नेता ही इतना मूर्ख हो तो उनके जनता सहपाठी तो मूर्ख कहलाना स्वाभाविक ही है ।
अब ओली और मधेशी नेता दोनों के शैक्षिक योग्यता की प्रमाण पत्रों को मूल्यांङ्कन के घेरे में लाया जाय तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मधेशी नेताओं की शैक्षिक योग्यता भले ही मास्टर या ब्याचलर डिग्री का हो, वे मधेश सेवा, समाज सेवा या देश सेवा के लिए नहीं, अपितु उन्होंने पेट और परिवार सेवा के लिए ज्यादा पढे ता कि अपने कल्पना के मुताविक बडे नौकरी पाकर ज्यादा पैसे कमायें, घुस खायें, भ्रष्टाचार करें और समाज में बडा आदमी कहलाकर शान से जिएँ । मगर बेचारों को न तो नेपालियों के राज में या कहीं विदेशों में कोई नौकरी वगैरह मिल पायी और न उनके सपनों का जिन्दगी सज पायी । देखें तो लगभग सारे शीर्षर्थ मधेशी नेताओं का हवीगत वही है । लेकिन जब उन्हें वो नौकरी नसीब नहीं हो पायी तो संयोग से ही सही, राजनीति का सुन्दर दरबाजा नसीब हो गया और उनके पहले के सपनों से कई गुणा ज्यादा पैसे और आराम की जिन्दगी नसीब हो गयी ।
मगर ओली और उनके टोली को देखिये । ओली और उनके टोली के लोगों ने पढना लिखना छोड डाली । क्यूँकि उन्हें नौकरी नहीं करनी थी । राजनीति करनी थी । अपने समाज को मधेश पर विराजमान करबानी थी । इसिलिए तो जिन मधेशी गुरुओं ने ओली लगायत उनके बाप दादों को पढाया, उन्हीं गुरुओं का गुरुखोर ओली ने मधेशियों को मूर्ख कह डाला ।
नेपाली और मधेशी दोनों नेताओं से राजनीति में शिक्षा की बात करें तो उनका जबाव सुनने को मिल जाती है कि राजनीति में शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं होती है । सारे दुनियाँ के राजनीति में शिक्षा की मापदण्ड तोका जा चुका है । मगर ये दोनों समुदाय के पढेलिखे मूर्ख और औंठे छाप या अल्प शिक्षित नेतागणों का मानना है कि राजनीति में इसका कोई जरुरत नहीं है ।
खास तौर पर देखें तो ये दोनों चोर चोर मौसेरे भाइ जैसे ही नजर आते हैं । दोनों की उद्देश्य भी एक जैसा ही है । एक नेपाली ओली की टोली है, जो जान बुझकर अल्प शिक्षितों की, अन्धराष्ट्रवादियों की जमात खडे किये गए हंै, जो चाहे कुछ भी बोल लें, लाज शरम नहीं होगी । लोग भी समझ लेते हैं कि अरे भइ, बेचारे लोग ज्यादे पढे लिखे नहीं है तो क्या करें और वे बच जाते हैं । दुसरी ओर मधेशी नेता लोग यह जानकर अपने पार्टीयों में अब्बल शिक्षा प्राप्त लोगों को जगह देना नहीं चाहते कि उनसे हमेशा उनके पद और पैसे कमाने के रास्ते में दीबार न बन पडे । सीधे साधे अनपढ और अल्प शिक्षितों को तो गुमराह में रखकर ठगने का इनकी धर्म जो बन चुकी है ।

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