कैसा हो देश का शासकीय स्वरूप

कुमार सच्चिदानन्द

नेपाली राजनीति की सबसे बड विडम्बना यह है कि जो उपलब्ध नहीं उसकी साधना में यहाँ अधिक तल्लीनता देखी जाती है। तल्लीनता भी इतनी गहरी कि अपनी जमीन और अपनी स्थिति को हमारी राजनीति भूल सी जाती है। आज के संवेदनशील समय में संविधान निर्माण की प्रक्रिया अवरुद्ध सी नजर आ रही है। राष्ट्र का भावी संघीय स्वरूप और शासकीय स्वरूप के मुद्दे पर विभिन्न दलों का अन्तर्विरोध खुलकर सामने आया है और संविधान निर्माण की प्रक्रिया अटक सी गयी है। यहाँ की राष्ट्रीय राजनीति में तीन महत्वपर्ूण्ा दल हैं जो स्वयं को राष्ट्र का भाग्यविधाता समझते हैं और तीन विचारधाराओं में विभाजित हैं। कोई कार्यकारी राष्ट्रपति का राग आलाप रहा है,  कोई कार्यकारी प्रधानमंत्री का और कोई दोनों का मिश्रण चाहता है। सबकी अपनी डफली और अपना राग की स्थिति है। किसी भी एक विचारधारा के कार्यान्वयन को दूसरी विचारधारा अपनी पराजय मानती है। इन राजनैतिक दलों के बीच परस्पर अविश्वास इतना प्रबल है और इनकी गतिविधि इतना गैरजिम्मेवार कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधानसभा की विस्तारित अन्तिम समयावधि भी समापन की दिशा में अग्रसर है और हमारी राजनीति मतवैभिन्य के धरातल को नहीं छोडÞ पा रही।
वैसे भी नव संविधान-निर्माण और उसके कार्यान्वयन के मार्ग में नीतिगत स्तर पर सबसे बडÞी चुनौती है – राष्ट्र का संघीय और शासकीय स्वरूप का निर्धारण। मगर इन दोनों महत्वपर्ूण्ा विन्दुओं पर मौजूदा संविधान सभा दिग्भ्रमित नजर आती है। इसका मूल कारण है महत्वपर्ूण्ा राजनैतिक दलों में परस्पर अविश्वास और अपनी बात ऊपर रखने की प्रवृत्ति। इसी कारण हमेशा एक वैचारिक द्वन्द्व की स्थिति देखी जा रही है और यह द्वन्द्व किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। एक तो पहले ही हम बहुत समय गवाँ चुके हैं लेकिन अब भी जिस संवेदनशीलता की अपेक्षा की जा रही है वह इनके व्यवहार द्वारा प्रकट नहीं हो पा रही। एक तरह से देश पुनः अन्धकार की दिशा मेें अग्रसर है। यह सच है कि समय-क्रम में कोई न कोई समाधान निकलेगा। लेकिन खानापर्ूर्ति के लिए जल्दबाजी में किए गए समाधान से वैज्ञानिकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती और इसका खामियाजा किसी न किसी रूप में राष्ट्र को भुगतना पडÞ सकता है।
किसी भी देश के संविधान में उस देश का शासकीय स्वरूप उसकी आवश्यकता और विशेषता के आधार पर निर्धारित होती है। किसी भी नई व्यवस्था के अवलम्बन से पर्ूव उस देश की राजनैतिक पृष्ठभूमि, इसके प्रति विरोध या व्रि्रोह का मूल कारण, वर्त्तमान संदर्भों में राष्ट्र की आवश्यकता, उसकी सामाजिक संरचना, राजनैतिक विशिष्टता आदि आधारों पर उसका शासकीय स्वरूप निर्धारित किया जाता है। लेकिन इन सबसे ऊपर किसी भी देश की सरकार का मूल काम उस देश के नागरिकों की जान माल की रक्षा और उसके अधिकारों की सुरक्षा है। किस व्यवस्था में सरकार यह काम बेहतर ढÞंग से कर सकती है, उसी आधार पर राष्ट्र के शासकीय स्वरूप का निर्धारण किया जाना चाहिए। लेकिन इस सर्ंदर्भ में यह भी बात बेबाक ढंग से कही जा सकती है कि व्यवस्था चाहे कोई भी हो राजनैतिकर् इमानदारी के नैतिक बंधन की जब तक हम उपेक्षा करेंगे, तब तक किसी लक्ष्य पर नहीं पहुँचा जा सकता। मार्ग की साधना सम्पर्ूण्ा नहीं मानी जा सकती, मंजिल की प्राप्ति महत्वपर्ूण्ा है।
वैसे भी नेपाली राजनीति में प्रयोगधर्मिता अधिक देखी जा रही है ( शब्द से लेकर व्यवहार तक। इसी कारण विवाद का वातावरण सदैव विद्यमान रहता है। वर्तमान अंतरिम संविधान के अनुसार देश संसदीय व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है। लेकिन यहाँ कुछ प्रयोग अपेक्षित माने जा रहे हैं और प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति के पद की व्यवस्था की बात की जा रही है जो कार्यकारी अधिकार सम्पन्न हो। लेकिन इसके विपक्षमें यह तर्क दिया जाता है कि ऐसा राष्ट्रपति जो जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित हो और कार्यकारी अधिकारों से सम्पन्न हो, उसके निरंकुश होने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए इसके आग्रही किसी न किसी रूप में अनिश्चित प्रयोग की दिशा में बढÞ रहे हैं। आज अरब देशाों में तानाशाह बने कार्यकारी राष्ट्रपतियों के क्रूरतापर्ूण्ा शासन को समस्त विश्व ने देखा। यह भी देखा गया कि इस शासन से मुक्ति के लिए जो जनान्दोलन हुए उनमें हजारों लोगों के प्राणों की आहुति हर्ुइ। दूर की बात छोडÞ भी दें तो यहीं भारत और पाकिस्तान को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। एक ही दिन दोनों को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली। एक ने अपने लिए राष्ट्रपतीय शासकीय स्वरूप को ग्रहण किया, दूसरे ने संसदीय प्रणली अपनाई। जिसने राष्ट्रपतीय प्रणाली अपनाई, वहाँ कई तानाशाह पैदा हो चुके। लेकिन जिसने संसदीय प्रणाली अपनाई उसने लगभग सत्तर वर्षों की लोकतांत्रिक यात्रा पूरी की और दूर-दूर तक वहाँ तानाशाह के पनपने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे। एक ओर अभी भी आर्थिक संकट हैं, तानाशाही व्यवस्था के पुनः पनपने की आशंका है, दूसरी ओर लोकतंत्र की छाया में विकास की गाडÞी सरपट रूप से दौडÞ रही है।
संसदीय व्यवस्था जहाँ कार्यकारी अधिकार संसद द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री में निहित होता है, उसके पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि यह निरन्तर गतिशील तथा समसामयिक सुधार और परिमार्जन करते हुए चलने वाली उदार लोकतांत्रिक और लचीली व्यवस्था है। नेपाल का इतिहास साक्षी है कि यहाँ अधिनायकवादी और लोकतंत्रवादी शक्तियों के बीच निरन्तर संर्घष्ा होता रहा है और समय-समय पर लोकतंत्र का गला मरोडÞा गया है। इसलिए आम जनता किसी भी हालत में ऐसी व्यवस्था नहीं अपनाना चाहेगी जिसमें तानाशाही शक्तियों के पनपने के आसार हों। दूसरी महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि अब तक यहाँ हुए लोकतांत्रिक अम्यासों से यहाँ की आम जनता इसके गुणों और दोषों को भली भाँति पहचान चुकी है। इसलिए देश की आवश्यकतानुसार इसमें उचित परिवर्तन कर इसे अधिकतम वैज्ञानिक बनाया जा सकता है। आज इस व्यवस्था में जो कमी देखी जा रही है, यह कमी व्यवस्था की कमी न होकर यहाँ सक्रिय राजनैतिक दलों और उसके नेताओं की है। इससे बडÞी विडम्बना और क्या हो सकती है कि लोकतंत्र के मार्ग पर चलते हुए आज तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। अनेक दलों के र्समर्थन से बनी सरकारों की बात छोडÞ भी दें तो भी स्पष्ट बहुमत के साथ बनी एकदलीय सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई जबकि पडÞोसी देश भारत में कईर्-कई दलों के र्समर्थन से बनी सरकारें भी सफलता पर्ूवक अपना कार्यकाल पूरा कर रही है और राष्ट्र को अग्रगामी दिशा भी दे रही है। इसलिए कहा जा सकता है कि दोष व्यवस्था का नहीं, हमारे राजनैतिक संस्कारों का है।
एक तीसरे शासकीय स्वरूप की बात भी सामने आयी है जिसे प|mैंच माँडल कहा गया है। इसके अनुसार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों में कार्यकारी अधिकारों का विभाजन किया गया है। नेपाल के साथ विडम्बना यह है कि यह न तो यूरोपीय देशों की तरह विकसित है और न ही राजनैतिक स्तर पर यहाँ आदर्श परम्पराएँ विकसित हर्ुइ हैं। पिछले दिनों नेपाल के तत्कालीन सेनापति रुक्मांगद कटुवाल के मुद्दे पर आलंकारिक राष्ट्रपति और कार्यकारी प्रधानमंत्री के बीच खींचतान और टकराव का नजारा राष्ट्र ने देखा और भोगा। ऐसे में दो-दो कार्यकारी राष्ट्रप्रमुखों के बीच टकराव की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। यद्यपि संविधान सभा अर्न्तर्गत विवाद समाधान उपसमिति के अधीनस्थ कार्यदल ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच कार्यकारी अधिकारों का विभाजन कर शासकीय स्वरूप के मुद्दे पर सहमति जुटाने का प्रयास किया है। प्रस्ताव में जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति में आठ और संसद के बहुमत सदस्यों द्वारा चयनित प्रधानमंत्री को नौ अधिकार देने की बात कही गई है। दोनों की सहमति के आधार पर बारह अधिकारों की बात कही गई। सहमति का यही धरातल दोनों के बीच विवाद का कारण बन सकता है। नेपाल की राजनीति जहाँ अभी भी व्यक्ति केन्द्रित होने की बात देखी जा रही है वहाँ इस व्यवस्था के अनुरूप इन दो शक्ति केन्द्रों के बीच टकराव प्रायः निश्चित है।
इस तरह नेपाल के शासकीय स्वरूप के सम्बन्ध में प्रायः तीन तरह के दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। मूलतः अस्थिरता राष्ट्र की नीयति बन जाने के कारण राष्ट्रपतीय प्रणाली के पक्ष में तर्क दिया जा रहा है और बतलाया जा रहा है कि राष्ट्रपति अपने मंत्रीपरिषद् में क्षमतावान और नैतिक रूप से सशक्त व्यक्तियों को स्थान दे सकता है। ये जनता से सीधे निर्वाचित न होने के कारण सस्ती लोकप्रियता की नीति पर न चलकर राष्ट्र के दर्ीघकालीन हितों की नीति अवलम्बन कर सकेंगे। इस व्यवस्था को स्वीकार करने से गणितीय संतुलन बनाने के लिए इन्हें अनावश्यक ऊर्जा नहीं खर्च करनी होगी और सकारात्मक दिशा में उनकी सोच अग्रसर होगी। अल्पकालीन हितों की साधना के लिए दलों के भीतर और बाहर घात-प्रतिघात का दौर नहीं चलेगा। संसदीय व्यवस्था इसलिए महत्वपर्ूण्ा मानी जा रही है कि यह देश में तानाशाही प्रवृति नहीं बढÞने देगी और लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। मिश्रति प्रणाली की बात तो ऐसी ही है जैसी रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय ने जो व्यवस्था दी उसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला नहीं, पंचायत की संज्ञा दी।
सही मायने में नेपाल प्रकृति की गोद में बैठा एक शांत देश है। राजनैतिक रूप से इसे प्रयोगभूमि बनने से बचाने का प्रयास हमारे राजनैतिक दलों को करना ही चाहिए। व्यवस्था कोई भी बुरी नहीं होती। सबकी अपनी-अपनी खासियतें हैं और खामियाँ भी। हमारे साथ सबसे बडÞी विडम्बना है कि कि हम दूर का ढोल सुहावना की कहावत पर भरोसा करते हैं। इसलिए नईर्-नई व्यवस्थाओं की बात करते हैं। संसदीय व्यवस्था का अभ्यास हम दशकों से कर रहें हैं। इसलिए इसकी सीमाओं को भी हम बखूबी जानते हैं। इसकी खामियों को दूर कर देश की आवश्यकता और विशिष्टता के अनुरूप इसका परिमार्जन कर व्यवहार में लाना राष्ट्र के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। अन्ततः विवादों का न्यूनीकरण होना चाहिए, विवादों की सृजना नहीं।

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