कैसे बचें विष के चक्रव्यूह से : देवेश कुमार मिश्र

देवेश कुमार मिश्र
मानव अपनेको स्वस्थ्य, सुखी एवं आनन्दपूर्वक रहते हुए जीवनयापन करनेका हर संभव प्रयत्न करताहै । जिसके लिए वह तरह तरहके पौष्टिक भोजन, योग प्रणायाम, शारीरिक व्यायाम, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, इत्यादि कराता रहता है । फिर भीे आज का मानव, पहले की तुलना में अपने को विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगाें से ग्रस्त पा रहा है । वह अपने को स्वस्थ्य रखने के लिए हर संभव प्रयत्नाें के बावजूद भी स्वस्थ्य नहीं रह पा रहा है । उसकी कमाई का अधिकाशः हिस्सा स्वास्थ्य उपचार में खर्च हो रहा है । वर्तमान परिवेश में देखा जाय तो विश्व के अधिकांश मानव चाहे वह किसी भी देश के रहने वाले हो, किसी भी कौम के हो, वो किसी न किसी शारीरिक या मानसिक रोगों से ग्रस्त है । इसका प्रमुख कारण है उनका खानपान । हम जिस तरह का भोजन करते हैं हमारा स्वास्थ्य भी तो उसी तरह बनता है ।
हम देख रहे है विश्व की जनसंख्या दिन प्रतिदिन वढती ही जा रही है । खेती योग्य भूमि सीमित है उसमें भी आवास, सडक बन रहे हैं तथा उद्योग धंधें भी खुलते ही जा रहे हंै । जिसके कारण खेती योग्य जमीन का क्षेत्रफल दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है । इधर जमीन घट रही है उधर मानव संख्या वढ रही है । इस वढती हुए जनसंख्या के भरण पोषण के लिए कृषि उपज वढ़ाना बाध्यता हो गयी है । जिसके लिए पहले की तुलना मे उन्नत बीज, हाईब्रिड बीज, रासायनिक खादों, रोग तथा कीटनाशकों का प्रयोग बढता ही जा रहा है । जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में तत्काल कुछ बढोत्तरी तो हो रही है, लेकिन इन रासायनिक पदार्थो के प्रयोग से मिट्टी दूषित होती जा रही है, वातावरण में भी विष का प्रभाव पड़ रहा है, साथ ही पौधों से उत्पादन होने वाले खाद्यान्न, फलफूल, तरकारी इत्यादि भी विषयुक्त हो जाते हैं । जिसका उपयोग करने से हमारा स्वास्थ्य भी बिगड़ता जा रहा है, हम रोगी वनते जा रहे हैं तथा अल्पायु होते जा रहे है । इसी तरह विषयुक्त खाद्यान्नो का प्रयोग करते रहे तो हमारा अस्तित्व भी एक न एक दिन घोर संकट में पड सकता है । इसलिए समय रहते सचेत हो जाना जरुरी है । इसके लिए हम कुछ उपायों का उल्लेख कर रहे हैं जिस पर अमल करने से विष के दुष्प्रभाव से कुछ हद तक मुक्त हुआ जा सकता है ।
१. कम से कम अपने एवं अपने परिवार के लिए आवश्यक तरकारी एवं संभव हो तो फलफूल भी स्वय उत्पादन करने की परम्परा की शुरुवात करें क्योंकि अपने उपभोग के लिए उत्पादन करते समय फसल में विष डालने से पहले बहुत वार सोचेंगे क्योंकि उत्पादित चीज अपने को उपभोग करना रहता है ।
२. बेमौसमी तरकारी उत्पादन करते समय पौधों की विशेष सुरक्षा तथा अधिक पोषक तत्वो. की आवश्यकता होती है इसलिए उत्पादक द्वारा उसमें विष एवं रासायनिक खादों का अधिक प्रयोग किया जाता है । जिसका उपभोग हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के कारण हो सके तो एैसे बेमौसमी तरकारियों के उपभोग से बचने का प्रयत्न करे । बेमौसमी तरकारी मौसमी तरकारी की अपेक्षा महंगी भी होती है इससे इनके प्रयोग से बचने पर आपके पैसों की भी बचत होगी और साथ ही साथ स्वास्थ्य भी बढिया रहेगा ।
३. अक्सर हम देखते हैं कि लोग बाजार में तरकारी खरीदते समय साफ, सुन्दर, चमकने एवं चिकना दिखने वाले तरकारी को खरीदते हंै क्योकि उनको पता नहीं रहता है कि एैसे तरकारियों में रोग और कीटों से बचने के लिए उसमें अधिक विषों का प्रयोग किया गया रहता है जिससे वह रोग एवं कीड़ाें के प्रभाव से मुक्त रहता है । अभी तो तरकारी और फलाें को चिकना एवं टिकाउ बनानेके लिए भी कीटनाशकोका प्रयोग बढ़ रहाहै । इसलिए एैसे चिकने, साफ सुन्दर एवं आकर्षक दिखनेवाली तरकारी एवं फलफूलों के खरीद एवं उपभोग से बच सकें तो अच्छा ही रहेगा ।
४. तरकारी एवं फलफुल की व्यावसायिक खेती करनेवाले किसान अपने उत्पादन को बढ़ाकर अधिक से अधिक लाभ लेने के उद्देश्य से औसत से अधिक कीटनाशकों, रासायनिक खादो एवं पौधों तथा फल की अधिक पैदावार के लिए विभिन्न प्रकार के हार्मोन का प्रयोग करते हैं ।अतः एैसे उत्पादन को खरीदने के बजाय ग्रामीण कृषक जो अपने उपभोग के लिए उत्पादन करते हैं और उनके स्वयं के उपभोग से बचे हुए उत्पादन को बाजार में बेचने के लिए ले जाते हैंं । इनसे खरीद करने पर बहुत हद तक विषादि के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है ।
५. संभव हो तो प्राकृतिक रूप से ही रोग, कीड़ा कम लगने वाले फल तथा तरकारी जिसमे विषादि का कम प्रयोग होता है एैसे तरकारी के उत्पादन, उपभोग तथा खरीददारी को प्राथमिकता देनी चाहिए ।
६. तरकारी को पकाने से पहले उसको टुकड़ा–टुकड़ा बनाकर तेज धार वाले पानी मे कम से कम तीन वार धोवे इससे विषादि का कुछ मात्रा धुलकर निकल जाता है जिससे विषादि के विषाक्तता में कमी आ जाती है ।
७. तरकारी को पकाने से पहले उसको टुकड़ा टुकड़ा बनाकर एक साफ बर्तन में पानी रखकर उस पानी में थोड़ा सा नमक डालकर कुछ समय के लिए उसी में डुवा कर रखने से विष के प्रभाव में कमी आ जाती है ।
८. प्रकृति ने हमारे खेतो एवं बातावरण मे शत्रुजीव के साथ साथ मित्रजीव की भी उपस्थिति की व्यवस्था की है । एक जीव को दूसरे जीव पर आश्रित बनाया है । विषादि के प्रयोग करने से शत्रुजीव के साथ साथ मित्रजीव भी मर जाते हंै जिससे जैविक संतुलन विगड़ जाने से समग्र पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ रहा है । इसलिए खेतों एवं फसलाें में शत्रुजीव तथा मित्रजीव के पहचान, शत्रुजीव द्वारा हुए आर्थिक क्षति के मूल्यांकन के आधार पर ही विष का छिड़काव किया जाय । अगर शत्रु तथा मित्रजीव का अनुपात ठीक है तो विष के छिडकाव की आवश्यकता नहीं है ।
९. कडी धूप और हवा चलते समय विषादि का छिड़काव न किया जाय क्योंकि इस समय शत्रुजीव सुरक्षित स्थान पर रहते हैं । जिससे शत्रुजीवों पर विषादि का प्रभाव नहीं पड़ता है और इनका नियंत्रण नहीं हो पाता है । इसलिए धूल वाला विषादि हो तो सुबह तथा तरल विषादि शाम के समय छिड़काव करना उत्तम रहता है ।
१०. बार–बार एक ही प्रकार के विषादि का छिड़काव करते रहने से शत्रुजीवों में विषादि पचाने की क्षमता का विकास हो जाता है । जिससे हर अगली बार विषादि का छिड़काव करते समय उसकी मात्रा बढ़ानी पड़ती है । इसलिए पौधों में रोग कीड़ा के नियंत्रण हेतु विषादि का छिड़काव करने से पूर्व विषेशज्ञों से जाँच पड़ताल के वाद ही आवश्यक एवं न्यायोचित मात्रा में विषादि का छिड़काव करने से विष का मात्रा भी कम लगता है और कीटों में विष को पचाने की क्षमता का विकास भी नहीं होने पाता है ।
११. आवश्यकता अनुसार का ही विषादि खरीदें एवं लाने के बाद तुरन्त उसका प्रयोग कर ले । विषादि खरीदकर अनावश्यक रूप में घर में न रखे इससे दुर्घटना हो सकती है ।
१२. फसलों में लगनेवाले हानिकारक रोग कीड़ा तथा अन्य शत्रुजीव नियंत्रण के लिए रासायनिक विषादि के बिकल्प के रूप में वानस्पतिक एवं जैविक विषादि का प्रयोग उत्तम रहता है ।
१३. अगर फसलों में रोग कीड़ा का प्रभाव न्यून हो तो विषादि का प्रयोग न करे क्योकि फसलों पर केवल हमारा ही नहीं रोग कीड़ो तथा अन्य आश्रित जीवों का भी अधिकार है परमात्मा ने उनके लिए अलग से कोई दुनिया नहीं बनाई है ।
१४. हमारे गांव घर मे पाई जानेवाली विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ जिसका स्वाद और गंध पसन्द नहीं होने के कारण पशु इसको नहीं खाते हंै । एैसे वनस्पतियों को छोटे छोटे टुकडेÞ वनाकर गाय या अन्य पशुओं के मूत्र और पानी में २१ से ३५ दिनतक भिगोकर रखे और उसका रस निकालकर उसमें आवश्यकतानुसार ४ से ६ गुणा पानी मिलाकार छिड़काव करने से फसलों में लगनेवाले विभिन्न प्रकार के रोग तथा कीटों का व्यवस्थापन किया जा सकता है । हमारे घर में तमाम एंैसी चीजें होती हंै जिसको हम अनावश्यक समझकर फेक देते हैं । जैसे खाने के लिए अयोग्य लहसुन, प्याज, मिर्च, अदरक, इत्यादि को भी उन्हीं वनस्पतियों के साथ मिलाकर गला सकते हंै । एैसे वनस्पतिजन्य विषादि बनाते समय उसमें नीम का पत्ता, भेली, वेसन, तुलसी का पत्ता और धतूर के पत्ते का प्रयोग करने से इसकी गुणवत्ता और बढ़ जाती है । इसी तरह गाय या अन्य पशुओं के ताजे दूध, कुछ दिन की रखी हुई मट्ठा जिससे गंध निकलता हो, ३ से ४ दिन का पुराना पशुमूत्र, ताजे गोबर, रख इत्यादि का भी रोग और कीटाें के व्यवस्थापन में प्रयोग किया जा सकता हैं ।
१५. दूर्गन्ध आनेवाली चीजों तथा वनस्पतियों का प्रयोग करके कीड़ों को दूर भगाकर तथा कीड़ों को पसन्द आनेवाली सुगन्धित तथा आकर्षक वस्तुओं का प्रयोग करके उनको आकर्षित करके भी नियंत्रित किया जा सकता है । एैसी वस्तुएँ बाजार में अब सहज रूप में पायी जाने लगी हैं । बहुत से कीट रात्रि के समय प्रकाश में आकर्षित होते हैं एैसे कीटों को रात्रि में ट्यूवलाईट, बल्व, लालटेन, लैम्प, इत्यादि के प्रकाश में आकर्षित कर नियंत्रण किया जा सकता है । विभिन्न फसलों की तमाम एैसे जातियों का विकास हो गया है जिसमें रोग तथा कीड़ों का प्रभाव कम होता है । ऐसे जातियों का चुनकर प्रयोग किया जा सकता है ।
ये सब कुछ उदाहरण स्वरूप है, इसके अलावा तमाम एैसे उपाय हैं जिसका प्रयोग करके हम विषमुक्त कृषि उत्पादन करते हुए विष के चक्रव्यूह से बचने का प्रयत्न कर सकते हैं ।

 

 

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