कैसे हर्इ कू की साजिश नाकाम

 

एकीकृत माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड के घर पर एक दिन आनन-फानन में स्थायी समिति की बैठक बुलाई गई। इन दिनों माओवादी की सिर्फपदाधिकारी बैठक बुलाई जाती रही है और सभी फैसले पदाधिकारी बैठक में ही किए जाते है। लेकिन उस दिन की स्थायी समिति की बैठक में की गई एक रिपोर्टिंग ने सबको चौंका दिया। दरअसल वह रिपोर्टिंग राष्ट्रपति के द्वारा कू की योजना बनाने के बारे में थी। इस रिपोर्टिंग के बाद प्रधानमंत्री ने भी खुफिया जानकारी का हवाला देते हुए राष्ट्रपति के द्वारा कू की योजना के बारे में विस्तृत विवरण दिया था।
इस योजना के बारे में माओवादी स्थायी समिति की बैठक में जो रिपोर्टिंग की गई उसके मुताबिक भट्टर्राई सरकार को हटाने और सत्ता अपने कब्जे में लेने के लिए राष्ट्रपति ने नेपाली सेना के प्रधान सेनापति गौरव शमशेर राणा को बुलाकर सत्ता पर अपने नियंत्रण की बात बताई। राष्ट्रपति ने माओवादी के द्वारा सत्ता कब्जा करने, देश की जनता के अनुरूप संविधान निर्माण पर काम नहीं होने और माओवादी को छोडकर बांकी दलों का र्समर्थन भी उनको रहने की बात बताते हुए सेना से सहयोग का आग्रह किया।
राष्ट्रपति को यह गलतफहमी थी कि नेपाली सेना अब भी माओवादी के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखती है। और उनकी कू की योजना में सेना का र्समर्थन आसानी से मिल जाएगा। सीधे तौर पर ना मिले तो कम से कम सेना का मौन र्समर्थन तो उन्हें मिल ही जाएगा। लेकिन राष्ट्रपति नेपाली सेना को ठीक से शायद समझ नहीं पाए। प्रधानसेनापति ने राष्ट्रपति को साफ शब्दों में जवाब दे दिया कि सेना उनके इस कदम में कोई भी सहयोग नहीं कर सकती है और न इस कदम का र्समर्थन ही कर सकती है।
जेनरल राणा ने राष्ट्रपति को र्समर्थन देने के बजाए उन्हें इस तरह के अपरिपक्व कदम को नहीं उठाने की नसीहत भी दे डाली। नेपाली सेना के प्रधान सेनापति ने कहा कि बिना राजनीतिक सहमति के कोई भी कदम उठाना ठीक नहीं होगा। प्रधानसेनापति ने राष्ट्रपति के इस कदम को घातक बताते हुए संक्रमण के इस घडी में कू करने से देश की छवि भी बिगडेगी और देश को मूठभेड में जाने से कोई नहीं बचा सकता है।
राष्ट्रपति की अपेक्षा के विपरीत प्रधानसेनापति के द्वारा जबाब देने पर राष्ट्रपति ने इस योजना को छोडÞा नहीं बल्कि इस कदम के लिए अपनी आगे की तैयारी जारी रखी। प्रधानमंत्री ने खुफिया विभाग के हवाले से आगे बताया कि राष्ट्रपति ने इसके बाद भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद को भी बुलाकर इस योजना के बारे में बताई थी। भारतीय राजदूत से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ने उन्हें भी माओवादी द्वारा सत्ता का डर दिखाकर उन्हें बर्खास्त करने की योजना के बारे में बताया। माओवादी स्थायी समिति की बैठक में जो रिपोर्टिंग की गई उसके मुताबिक राष्ट्रपति ने भारतीय राजदूत को इस बारे में आश्वस्त किया कि उनके इस कदम का माओवादी को छोडकर सभी दल र्समर्थन करने वाले हैं और उन्होंने सभी दलों से बात भी कर ली है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि खुद मधेशी होने के कारण मधेश का सेण्टीमेण्ट भी उनके साथ होगा और पहाड के लोग भी उनके बारे में सकारात्मक ही सोचते हैं। इसलिए कहीं से कोई भी दिक्कत या विरोध की बात नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अभी माओवादी को सत्ता से नहीं हटाया गया तो माओवादी पूरी तरह से सत्ता पर कब्जा कर लेगी। इसलिए अब और अधिक इंतजार नहीं किया जा सकता है।
राष्ट्रपति की इस योजना को भारतीय राजदूत ने सिरे से खारिज करते हुए इसमें कोई भी सहयोग नहीं करने की बात स्पष्ट कर दी थी। राजदूत जयन्त प्रसाद ने भारत को लोकतंत्र का हिमायती बताते हुए कहा कि नेपाल में लोकतंत्र के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार नहीं किया जा सकता है। देश में जो इस समय राजनीतिक संकट है उसका समाधान सभी दलों के नेता ठण्डे दिमाग से कर सकते हैं ऐसा उन्हें विश्वास है।
पहले नेपाली सेना के प्रधान सेनापति और बाद में भारतीय राजदूत के द्वारा राष्ट्रपति को र्समर्थन करने से इंकार करने के बाद उनकी योजना ही नाकाम हो गई। एक खबर ऐसी भी आई कि राष्ट्रपति डाँ रामवरण यादव ने भारत में अपने पुराने मित्र और फिलहाल भारत के राष्ट्रपति रहे प्रणव मुखर्जी से भी र्समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन व्यक्तिगत जान पहचान होने के बावजूद सरकारी स्तर पर भारत के राष्ट्रपति से बात करना उनके लिए आसान नहीं हुआ। जिस समय राष्ट्रपति यादव अपनी इस योजना को बनाने में लगे थे, उस समय भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी अधिकांश समय दिल्ली के बाहर ही रहे। इस कारण भी अपनी इस योजना को रामवरण यादव आगे नहीं बढा सके।
इस तरह से राष्ट्रपति रामवरण यादव की सहमति के नाम पर सत्ता हथियाने की योजना नाकाम हो गई।

 

“कू” की साजिश रचते राष्ट्रपति

कू की साजिश में शामिल नेता

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