कोई भी मधेशी नेता देश का नदी, नाला नही बेचा फिर भी देशद्रोही क्यों ? मुरलीमनोहर तिवारी

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मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), वीरगंज , १५ दिसिम्बर | बहुत दिनों से संविधान संशोधन के बारे में बहुत कुछ हो रहा है। पूर्वाग्रही मीडिया इसे बढ़ा चढ़ा के दिखा रही है, ऐसा लग रहा है, पूरा नेपाल आंदोलनमय हो गया है। साल-साल भर चलने वाले आंदोलन को जनता का आंदोलन नही माना गया, उसे भारत के इशारे का आंदोलन कहा गया, जबकि अभी एमाले द्वारा भाड़ा-भत्ता और एनजीओ के पैसा से लोगो को लाकर सेल्फी आंदोलनकारी खड़ा किया जा रहा है ?

५ दर्जन मधेशी के शहीद होने के बाद भी इसे आंदोलन मानने से इंकार कर दिया गया। विश्व की सबसे लंबी मानव शृंखला को झुठला दिया गया। इतना ही नही मानवीय आधार पर भी इनके तरफ से संवेदना के शब्द नही फ़ुटे। गज़ब की बात तो ये है कि तीन -तीन आंदोलन और साल भर चले आंदोलन में कही पहाड़ी समुदाय पर कोई हमला ना होते हुए भी उसे साम्प्रदायिक कहा गया और काठमांडू, नेपालगंज, बुटवल में मधेशी पर हमला होने पर भी उनका आंदोलन असाम्प्रदायिक कैसे कहा जा रहा है ? जब – जब मधेश में आंदोलन होता है चुरेभावर खड़ा होता है, आंदोलन ख़त्म होते ही चुरेभावर किस बिल में छुप जाता है ?

आश्चर्य है, सप्तरी से पर्सा तक प्रदेश बनाने में देश नही टुटा और नवलपरासी से बर्दिया तक प्रदेश बनने में देश कैसे टूट जाएगा ? कुछ नेताओं के वंश को सदैव नेतृत्व मिले इस उद्देश्य से हुआ सीमांकन में राष्ट्रवाद और विज्ञ द्वारा दिया सीमांकन राष्ट्रबिखण्डं कैसे हो सकता है ? मधेशी अपने पड़ोस में शादी करे और उसे अधिकार देने में राष्ट्रघात, वही सुजाता कोईराला जैसा लाखौं बिदेशी से बिवाह कर नेपाल में मन्त्री, उपप्रधानमन्त्री बनने का कोई बिरोध नही होना, ऐसा कैसे हो सकता है ?

बिडम्बना है कि मधेशी जनाकांक्षा अनुरूप गठित दल को बिदेश की पार्टी और यूरोप, रूस, चीन में जन्मे कांग्रेस-एमाले-माओवादी राष्ट्र की पार्टी कैसे हो सकती है ? कोई भी मधेशी नेता देश का नदी, नाला और देश नही बेचा फिर भी देशद्रोही और दाउरा सुरूवाल टोपी धारी नेता ने नदी नाला, देश बेचा फिर भी देशभक्त कैसे ?

ओली सरकार में इसी तरह के प्रस्ताव लेकर उप प्र.म. कमल थापा दिल्ली में अनुनय विनय करते रहे तो ठीक था, और अब राजदूत द्वारा समझाने पर हाय-तौबा क्यों ? इतिहास गवाह हरेक कालखंड में राष्ट्रीय नेता भारत की शरण लेते है और बाद में भारत का विरोध करते है। पता नही भारत ने नेपाल के लिए कौन सी भीष्म प्रतिज्ञा ले रखी है, जो इतनी आलोचना और बिरोध के बावजूद मदद को तत्पर रहती है।

गौरतलब है कि जो संशोधन होने वाला है उससे मधेश की जनता सन्तुष्ट नही है, उनकी नाराज़गी मोर्चा से भी है। मोर्चा इतनी बड़ी शहादत के बदले काग़जी संशोधन से मधेश को बहलाना चाहती है, मधेशीजन को ये भी मालूम है कि कांग्रेस और माओवादी दूध के धुले नही है, कांग्रेस के प्रधानमंत्री और माओवादी के गृहमंत्री ने मधेशियो पर खुलेआम गोलियां चलवाई, इन्होंने ही आकड़ो और संख्या से दो तिहाई के बल पर जबर्दस्ती संविधान थोपा, अब उसी दो तिहाई से संशोधन करा कर उल्टा तमाचा उनके ही गाल पर लगते हुए का आनंद ले रही है। जैसे को तैसा।

जरा सोचिए, आख़िर नेपाल में क्षेत्रीय पार्टिया क्यों खुली ? राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी क्षेत्रीय पार्टिया खुली और उन्हें समर्थन भी मिला, इसका कारण क्या है ? जो कभी राष्ट्रीय पार्टी के नेता थे, किस कारण उन्हें वे पार्टिया छोड़नी पड़ी ? जब मधेशी आवाम को लगा की राष्ट्रीय पार्टिया उनके समस्या और अधिकार प्रति ईमानदार नही है, तो मधेशी जन दबाव में मधेशी दलों का निर्माण हुआ। आज भले ही कुछ दीमक मधेशी पहाड़ी पार्टी के दुम बने हुए है, लेकिन मधेश बिद्रोह के समय के आठ साल का बालक आज अठारह साल का युवा हो गया है, जो होश सँभालते ही ‘जय मधेश’ सुनते आया है, वो किसी कीमत पर पहाड़ी दल में नही जाएगा। पहाड़ी दल की मधेश से समाप्ति की सुरुआत हो चुकी है, जिसमे सबसे पहले एमाले का पत्ता साफ़ होना तय है।

जिस प्रकार के जनदबाव में मधेशी पार्टिया खुली उसी प्रकार बार-बार के आंदोलन से निज़ात पाने के लिए अलग देश का ब्यापक जनदबाव हरेक मधेशी नेता कार्यकर्त्ता को मिल रहा है। अलग देश वालो की मांग या कार्यक्रम की सूची में सारी बाते सही होते हुए भी, अलग देश वाले बात पर मर्यादा के कारण ये लोग समर्थन नही करते, परंतु ये मर्यादा कब तक रोके रख सकती है, ये कहना मुश्किल है। किसी दिन मधेश बिद्रोह की तरह फिर मधेशी आवाम बिस्फोट करेगी तब सारे मर्यादा चकनाचूर होने से कोई नही रोक सकता।

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