कोढ़ पर खाज़ ” स्वराजी “…. गंगेश कुमार मिश्र

कोढ़ पर खाज़ ” स्वराजी “….
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जातीयता की,
दौड़ है,
मज़िल है,
ना, ठौर है।
यादव है,
पण्डित,
साह हैं,
काँटों भरी,
ये राह है।
उलझे हुए है,
सबके सब;
अपनी ही अपनी,
चाह है।
क्या मधेश ?
क्या मधेशी ?
जहाँ,
ईर्ष्या है, डाह है।
तिस पर,
कोढ़ पर खाज़,
” स्वराजी ”
अलग देश माँग रहे हैं;
” तिलक ” और ” भभूत ” में;
विभेद करा रहे हैं।
नहीं जानते,
” स्वराज ” के मायने,
फ़िर भी;
चिल्ल-पों, मचा रहे हैं।

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