कौन सी डगर हो अपनी

कुमार सच्चिदानन्द:देश चुनाव की दहलीज पर खड है। प्रधानन्यायाधीश की अगुआई में बनी चुनावी सरकार अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। लेकिन इसके upendra yadavर्समर्थन और विरोध में आवाजें भी उतनी ही मुखर हैं। यद्यपि इससे पर्ूव देश में जो राजनैतिक घटनाएँ घटित हर्ुइ हैं, उससे khilraj regmiएक आशंका का मनोविज्ञान देश के आकाश में छाया ही हुआ है। आज भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि वर्त्तमान सरकार चुनाव करवा पाएगी भी या नहीं, चुनाव हो भी गया तो संविधान बन पाएगा या नहीं, संविधान बन भी गया तो लागू हो पाएगा या नहीं, लागू हो भी गया तो हर वर्ग इसे अंगीकार करेगा या नहीं – यद्यपि ये सारे सवाल निराशावादी हैं, लेकिन ये आशंकाएँ निराधार भी नहीं। क्योंकि आगामी संभावित चुनाव के पक्ष और विपक्ष में जो ध्रुवीकरण देखा जा रहा है वह सत्ता को केन्द्र में रखकर बनता सा प्रतीत हो रहा है। जो दल निवर्त्तमान सरकार में सत्ता की बागडोर सँभाले हुए थे और जो थोडÞी दूर तो थे मगर चुनाव के द्वारा सत्ता में वापसी की संभावना देख रहे हैं, वे आज चुनाव के पक्ष में हैं और जो सत्ता से दूर थे वे चुनाव के विपक्ष में ध्रुवीकृत हो रहे हैं। एक बात तो निश्चित है कि मौजूदा सरकार अगर चुनाव करा लेती है तो कुछ दिनों के लिए राजनैतिक समस्याओं का समाधान दिखलाई देता है अन्यथा उसके बाद की स्थिति राजनैतिक रूप से और जटिल होगी। इसलिए हर दल को चुनाव में सहभागिता देनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बडÞा पर्व यही है।
इस चुनावी माहौल में मधेश और मधेश के मुद्दे न केवल मधेश वरन राष्ट्र के लिए महत्वपर्ूण्ा हैं और राष्ट्रीय राजनीति में मधेशी नेताओं की नहीं, मधेशी दलों की उपस्थिति कितनी दमदार है, इस बात से न केवल देश की राजनैतिक दिशा बल्कि मधेश के भविष्य की दिशा भी तय होगी। एक बात तो निश्चित है कि एकीकृत नेकपा माओवादी का भूत समस्त राजनैतिक दलों पर सवार है। इसलिए राष्ट्र की दो बडÞी राजनैतिक शक्तियाँ लोकतांत्रिक विचारों वाली पार्टियों से एकीकरण चाहती है और एक भय की स्थिति एकीकृत नेकपा माओवादी के भी मनोविज्ञान में भी देखा जा रहा है। इसलिए अपनी सत्ता के साझेदार रहे मधेशी मोर्चा से वह गठबंधन चाहता है। एक तरह से देखें तो तीनों बडÞी राजनैतिक शक्तियों की नजर मधेश के जनाधार पर है और मधेशी दलों की समस्या यह है कि उसका जनाधार मधेश में ही है। वह पहाड में अपना पंख नहीं फैला सकता। इसलिए मधेश को समेटकर रखना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर विचारधारा और लक्ष्य समान है तो अलगाव का कोई अर्थ भी नहीं। लेकिन सवाल है कि विभाजित मधेशी राजनीति जो विगत समय में सत्ता को केन्द्र में रखकर निरन्तर विभाजित होती रही, क्या समग्र रूप में उनके लक्ष्य मधेश के मुद्दे हो सकते हैं –vijay_kumar_gachhdar
ब्ााद के दिनों में मधेशी राजनीति में जो विचलन और अवसरवादिता देखी गई, मधेश व्रि्रोह का यह अभीष्ट नहीं था। वास्तव में यह व्रि्रोह राज्य के साथ सम्बन्धों में नया अध्याय तलाश रहा था। राज्य में स्वामित्व, सम्मान और स्वतंत्रता की आकांक्षा उसकी थी। लोकतांत्रिक प्रणाली के अर्न्तर्गत इन चीजों की प्राप्ति उनकी इच्छा थी और इन सब की प्राप्ति के लिए संघीयता और वृहत्तर मधेश की अवधारणा भी उभर कर सामने आयी। बाद में इनके प्रति प्रतिबद्धता न तो मधेशी राजनीति में रही और न ही इन माँगों के प्रति संवेदना नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में देखी गई। यह सच है कि मुखर होकर इन राजनैतिक माँगों का विरोध तो किसी भी पक्ष द्वारा नहीं हो रहा। मधेशी राजनीति करनेवाले भी मुँहर्छर्ुइ भक्ति की तरह समय-समय पर इसकी चर्चा तो करते हैं मगर इसकी प्राप्ति के लिए जिस ठोस कार्यनीति की जरूरत है, वह उनमें नहीं देखी जा रही।rajendra mahato
विज्ञ मानते हैं कि अभी का समय संधिकाल मात्र नहीं संक्रमणकाल भी है। नेपाल दक्षिण एशिया के अन्य देशों से पुराना है। इस बात पर गर्व किया जा सकता है। लेकिन यहाँ एक बडÞा वर्ग स्वयं को राज्य के मूलधार में समाहित नहीं समझ रहा। इसी सोच के तहत मधेश व्रि्रोह हुआ था, जिसने राष्ट्र और समाज की अनेक मान्यताओं को विखण्डित किया। वास्तव में आज भी आम मधेशी राज्य के साथ सम्बन्धों की पुनर्व्याख्या चाहता है। वह चाहता है कि विगत के दिनों महेन्द्रपथीय राजनैतिक चिन्तन के कारण उसे जो उपेक्षा और अवसरहीनता का दंश झेलना पडÞा, वह आगामी दिनों में नहीं हो। राज्य में सबको स्वामित्व, सम्मान और सहभागिता प्राप्त हो। मगर इन आकांक्षाओं के फलित होने के लिए जिस संगठित राजनैतिक तेवर की आवश्यकता है, सत्ता की साधना करते हुए उसे मधेश आधारित राजनैतिक दलों ने गुमा दिया है। आज उनकी स्थिति यह है कि अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए इन मुद्दों को जिन्दा रखना और इन्हें प्रचारित करना उनकी मजबूरी है और जब इस संवेदना को लेकर वे लोगों में जाते हैं तो उनकी बातें लोगों को विश्वसनीय नहीं लगती, क्योंकि उनका राजनैतिक अतीत बडÞा ही बेढंगा रहा है।
मधेश की सबसे बडÞी समस्या है कि उनकी आवाज मुखर करनेवाले राजनैतिक दल आज लगभग डेढÞ दर्जन घटकों में विभाजित हैं। इनमें से कुछ निवर्त्तमान सरकार में सहभागी थे और कुछ सत्ता के बाहर। इसी आधार पर आज कुछ दल चुनाव के पक्ष में हैं और कुछ इसके विरोध में। एक बात तो निश्चित है कि नेपाल की राजनीति में मुद्दों से अधिक सत्ता हावी रही है और मधेशी राजनीति भी इस प्रवृत्ति से पृथक नहीं। अतीत में देश को जो भी राजनैतिक या संवैधानिक संकट झेलने पडÞे हैं, उसके मूल में इन्हीं तत्वों का हाथ रहा है। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदली हर्ुइ हैं। सारे राजनैतिक दल सरकार से बाहर हैं और एक तरह से सकारात्मक राजनैतिक माहौल बना है। इसलिए राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ मधेशी राजनीति के लिए भी सबसे आवश्यक है मतभेदों को त्यागना। अगर मधेश की राजनीति करने वाले दल एकजुट नहीं होते तो मधेश में मधेश र्समर्थक मतों का विभाजन होना तय है और इससे राष्ट्रीय राजनीति पर उसका प्रभाव निश्चित रूप से कम होंगे जो एक तरह से मधेश आन्दोलन की संवेदना के विरुद्ध होगी।
आज स्थिति यह है कि मधेश आधारित दलों के हर नेता आम मधेशियों की दृष्टि से कठघरे में हैं। एक नकारात्मक वातावरण चारों ओर फैला हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है कि आम मधेशियों के पास विकल्प क्या है – क्या वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय राजनैतिक दलों के प्रति अपना र्समर्थन जतलाकर तथा उनके मुखापेक्षी रहकर अपने सुखमय भविष्य का, राज्य में आत्म सम्मान और समान अवसर का सपना देखें या अपना राजनैतिक-संवैधानिक भविष्य निर्माण का दायित्व एक बार फिर इन्हीं मधेशी दलों को दें। सही मायने में निरंकुश राजतंत्र की बात छोडÞ भी दें तो बाद के प्रजातांत्रिक शासनकाल में भी मधेश को सम्यक् सम्मान नहीं मिला, समान अवसर और सत्ता में समान सहभागिता नहीं मिली। कारण यह था कि व्यवस्था तो बदली लेकिन राजनैतिक मनोविज्ञान नहीं बदला, मधेश के प्रति इनके दृष्टिकोण में परिवर्त्तन नहीं आया। शासक और शासित का मनेविज्ञान इन पर हावी रहा। आज मधेश आन्दोलन से मिली ऊर्जा की बदौलत परिस्थितियों में थोडÞा परिवर्त्तन तो आया है, मगर राजनैतिक मनोविज्ञान में कोई परिवर्त्र्ाानहीं आया है। इसलिए लुंज-पुंज ही सही मधेश के लिए मधेशी राजनैतिक दलों का ही सशक्त होना अधिक आवश्यक है और महत्वपर्ूण्ा भी।
यह भी एक महत्वपर्ूण्ा राजनैतिक यथार्थ है कि मधेश आन्दोलन के बाद से लेकर अब तक के राजनैतिक घटनाक्रमों के मद्देनजर मधेश की राजनीति करने वाले दलों की प्रतिष्ठा में ह्रास आया है। अवसरवादिता और दायित्वहीनता का सम्मिलित आरोप इन पर है। आज जब देश चुनाव की ओर अग्रसर है तो ऐसी घडÞी में आम जनता को यह विश्वास उनके द्वारा दिलाया ही जाना चाहिए कि अतीत को भूलकर वे नई सोच के साथ उनके सामने खडÞे हैं, इसलिए उन्हें आम मधेशियों का सहयोग मिलना चाहिए। विभाजित रूप में चुनाव मैदान में उनकी उपस्थिति और आम लोगों के समक्ष उनके राजनैतिक चिन्तन में सुधार की बात कितना न्यायोचित होगी, कहना मुश्किल है। इसके लिए आवश्यक है कि वे आपसी वैरभाव को भूलकर एक सूत्र में बँधे । अब तक की मधेशी राजनीति में एक विचित्रता यह देखी गई कि दलों में विभाजन तो होता है लेकिन दूसरे दलों में विभाजित समूह का विलय नहीं होता। छोटे-छोटे दल हैं और छोटे-छोटे अवसर ही इन्हें विभाजन के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसलिए छोटे-छोटे दलों का मोर्चा बनाने से बेहतर है एक वृहत दल का निर्माण और एक संयुक्त घोषणा पत्र।
आज मधेश की राजनीति की आवश्यकता यह है कि किसी को भी अछूत नहीं माना जाना चाहिए। जयप्रकाश गुप्ता जो सजा भुगतकर जेल से निकले हैं, जिन्हें सजा मिलने पर मधेशी दलों द्वारा ही मिठाइयाँ बाँटी गई थी, चुनाव के मौके पर उनके सजामुक्त होकर निकलने पर भी मधेश की राजनीति करनेवाले दलों द्वारा मिठाइयाँ बाँटी जानी चाहिए। यह सच है कि वे चुनाव नहीं लडÞ सकते मगर चुनाव में मधेश की जनभावना को समेटने में कारगर हो ही सकते हैं। शरत सिंह भण्डारी जिन्हें मधेश मुद्दे से जुडÞे एक विवादास्पद बयान के कारण अपमानजनक ढÞंग से सत्ता छोडÞनी पडÞी, वे भी मधेशी राजनीति में सक्रिय हैं, इसलिए उन्हें भी वृहत्तर राजनैतिक दल में समेटा जाना चाहिए और मधेश समर्थित मतों के विभाजन को रोकने का प्रयास करना चाहिए। इस बात से प्रायः सभी राजनौतिक दल और उसके नेता सहमत हैं कि राज्य की प्रशासनिक शक्तियाँ किसी न किसी रूप में पर्ूवाग्रह ग्रसित हैं और मधेशविरोधी फैसले करती है। ऐसी परिस्थिति में किसी को भी अछूत मानना और अलगाव या विभेद का कोई भी प्रयास मधेशी राजनीति के लिए घातक मानी जाएगी।
आज मधेश की राजनीति करनेवाले हर दल इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि उनका जनाधार मधेश मात्र है, जबकि राष्ट्रीय पार्टियों का जनाधार मधेश में भी है। यह भी माना जा सकता है कि राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय अनेक ऐसी पार्टियाँ हैं जो आम चुनाव के यथार्थ को झेलना नहीं चाहती थी लेकिन निवर्त्तमान सरकार के प्रति चरम वर्जना के कारण ही उन्होंने गैर राजनैतिक सरकार का यथार्थ वरण किया। लेकिन भय का माहौल अब भी उनमें है। इसलिए वे गठबंधन की राजनीति पर भरोसा जतला रहे हैं। इन सबकी महत्वाकाँक्षा का केन्द्र मधेश है। इसलिए संभव है कि वे अपने-अपने स्वार्थ के लिए मधेशी शक्तियों का उपयोग करना चाहें, व्यक्तिगत रूप से यह मधेशी नेताओं के लिए उपयोगी भी हो, लेकिन सामुदायिक रूप से इसे लाभप्रद नहीं माना जा सकता। वस्तुतः इस तरह के गठबंधन अगर होते हैं तो इससे मधेशी राजनीति के अस्तित्व पर भी प्रश्न-चिहृन उठेगा। यह सच है कि कोई दल वैचारिक या रणनीतिक दृष्टिकोण से उनके करीब हो, लेकिन अपना अस्तित्व बरकरार रखना उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
मधेश की राजनीति की एक विशेषता है- इसकी जातीय संरचना। लेकिन जाति आधारित राजनीति की अपनी सीमाएँ होती हंै और देरसबेर ये सीमाएँ टूटती भी हैं। आज मधेश की आवश्यकता मुद्दों को मंजिल तक पहुँचाना है। इसलिए जाति को आधार बनाकर की जानेवाली राजनैतिक प्रवृत्तिको हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए भी आवश्यक है- दलों की एकजूटता। आपसर्ीर् इष्र्या-द्वेष को भूलकर सारे राजनैतिक दल और उसका नेतृत्व अगर एक छाते के नीचे संगठित होते हैं और एक चर्टाई पर बैठते हैं तो वह दल मधेश का होगा और इसके हर नेता मधेश के होंगे। इस तरह वे अपनी संगठित शक्ति के द्वारा राष्ट्रीय राजनीति में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कर पाएँगे।

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