क्या ईश्वर है ?

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महात्मा गाँधी
एक ऐसी अव्यक्त, अपरिभाषित, रहस्यमयी शक्ति अवश्य है, जो विश्व के कण कण में व्याप्त है । मुझे उसकी प्रतिित होती है, हालाँकि मैं उसेदेख नही. पाता । यही वह अदृश्य शक्ति है, जिसके प्रभाव का अनुभव तो होता हैपर वह किसी ची प्रमाण्न के पकड़ में नहीं आती । क्योंकि मैं अपनी इन्द्रियों के जरिए जिन चीजों का अनुभव कर पाता हूँ, वह उन सबसे सर्वथा भिन्न है । वह अतीन्द्रिय है । विश्व के समस्त जीवन का नियमन करनेवाला नियम ही ईश्वर है । नियम और नियामक एक ही है । चूँकि मैं उस नियम और नियामक ईश्वर के बारे में इतना कम जानता हूँ, इसीलिए मुझे उसके अस्तित्व को मानने से इनकार तो नहीं करना चाहिए । जिस प्रकार किसी भौतिक शक्ति को मानने से मेरे इन्कार करने या उसके बारे में अज्ञान बने रहने से मैं उसके प्रभाव से मुक्त नहीं रह जाता, उसी प्रकार ईश्वर या उसके नियम को स्वीकार न करने से तो मैं उसके प्रभाव से अछूता नहीं रह पाऊँगा । दूसरी ओर नतशिर होकर मूक भाव से ईश्वरीय शक्ति को स्वीकार लेने से जीवन यात्रा उसी प्रकार सुगम सरल हो जाता है जिस प्रकार कोई व्यक्ति यदि उस साँसारिक सत्ता को, जिसके अधीन वह रहता है, स्वीकार कर ले तो उसकी जिन्दगी आसान हो जाती है ।
मुझे एक आभास सा तो अवश्य होता है कि इस सतत परिवर्तनशील और नाशवान विश्व के पीछे कोई ऐसी चेतन शक्ति है, जो स्वयं अपरिवर्तनशील है, जो कण कण को एक सूत्र में बाँधे है, जो सृजन, संहार और नव सृजन करती रहती है । वह सर्वज्ञ शक्ति ही ईश्वर है और चूँकि अपने मात्र इन्द्रियज्ञान के बल पर मैं जितनी भी वस्तुओं की प्रतीति कर पाता हूँ, वे सभी नाशवान हैं, अनित्य हैं, इसलिए एक ईश्वर ही अनश्वर और नित्य है । और यह शीकत मंगलकारी है या अमंगलकारी ? मुझे तो वह पूर्णतया मंगलकारी ही लगती है । इसलिए कि मैं देखता हूँ कि मृत्यु के वातावरण में जीवन, असत्य के घमासान में सत्य और अन्धकार की चपेट में प्रकाश अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं । इसी से मैं निष्कर्ष निकालता हूँ कि ईश्वर जीवन, सत्य और प्रकाश रूप है । वह प्रेम है । वह परम शिव तत्व है । (साभार ः हिन्दू धर्म क्या है ?)

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