क्या कहते हैं आम लोग

परम्परा मंे रतननाथ जैसे योगियों का हिन्दी साहित्य पश्चिम नेपाल के दाङ में उपलब्ध हुआ है। वह आगे कहती हैं कि बाबा नरहरि दास ने अपनी पुस्तक इतिहास प्रकाश मेंhindi dibas-himalini hindi magazine संधी पत्र संग्रह में कुछ अभिलेखों को प्रकाशित किया है, जो हिन्दी प्रयोग को प्राचीनतम बताती हैं। एक प्राचीनतम आदेश पत्र का भी उन्होने उल्लेख किया जो १२६१ संवत् में लिखा गया है। सुनसरी जिला के बाराहा क्षेत्र स्थित बाराहा मन्दिर हो, या जनकपुर स् िथत राम मन्दिर या राजधानी काठमांडÞू स्थित गुहृयेश्वरी मन्दिर सभी जगहों पर ऐसे बहुत अभिलेख हैं, जो यह दर्शाती है कि हिन्दी भाषा नेपाल के लिए विदेशी भाषा नहीं है। प्राचीन काल से ही इस भाषा का प्रयोग यहाँ होता आ रहा है। इतना ही नहीं अगर पत्रकारिता की बात की जाय तो २००८ साल में, जब की बहुत कम पत्रिका नेपाल में प्रकाशित होती थी। उसी समय भोज बहादुर सिंह न्यौपाने ने तरंग नाम की हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन किया था । उसके बाद २०१२ में इंद्र चन्द जैन के सम्पादकत्व मेंे जय नेपाल हिन्दी पत्रिका प्रकाशित हर्ुइ थी। ले िकन अत्याधु िनक काल की बात कर ंे तो हिन्दी उपेक्षित हो रही है और वो भी राज्य कीे तरफ से ही। और इस उपेक्षा की खुलेआम शुरुआत हर्ुइ थी तात्कालीन राजा महेन्द्र के शासन काल से। किसी एक समुदाय की भाषा को राष्टिीय भाषा घोषित कर दिया गया और शासन प्रणाली ऐसी थी की कोई विरोध नहीं कर सका।

प्रशासन ने खुलेआम हिन्दी भाषा का विरोध करना शुरु कर दिया और इसे एक विदेशी भाषा करार कर दिया गया। हिन्दी भाषा को योजनाबद्ध रूप से यहाँ समाप्त करने की कचु ष्े टा हाते ी रही। स्थिति यहा ँ तक पहचँु गयी कि पिछली बार जब जनगणना के लिए गणक लोग घर पे आये थे तो वे लोग इस तरह से प्रश्न पूछते थे कि कोई हिन्दी को अपना भाषा क्या कहतंे हैं आम लोग – भाषा का काम ही व्यक्तिओं को जोडÞना है। मनुष्य ने इसे सबसे बडÞे पुरस्कार के रूप में प्रकृति से पाया है। यह इतना शक्तिशाली है कि भौगोलिक सीमा इसे कुछ बिगाडÞ नहीं सकती और न इसे रोका, बाँधा जा सकता है। ये बहती है- निर्वाध प्रवाह की तरह, रोकनेवालों की हमेशा हार हर्ुइ है, इतिहास साक्षी है। नेपाल के पर्रि्रेक्ष्य में शासकों का स्वार्थ सीधा दिखाई देता है। खस भाषा तथाकथित नेपाली को थोपने के क्रम में हिन्दी पर सबसे बडÞा प्रहार देखा जाता है। लोकतंत्र स्थापना क्रम काल में भी यही स् िथति है।

हिन्दी अपनी सरलता, लचीलापन और ग्राहृय प्रकृति के कार ण करीब सारे नेपालियों को बैचारिक हिसाब से जोडÞने का काम कर ती है। हाँ युक्त घनत्व में भौगोलिक भिन्नता अवश्य है, तर्राई में शत प्रतिशत, पहाडÞ में पचास- साठ तो हिमाली क्षेत्र में कम। नेपाली भूभाग तो सौभाग्यशाली है कि जिस भाषा पर इतने प्रहार हुये, जिसे इतना तिरस्कार मिला, और मिल रहा है वो जिन्दा है, प्रगति में है। आनेवाला काल इस क्रम को स्वर्ण्र्ााक्षर में याद करेगा। आज सार े नपे ालिया ंे का े भाषा विवाद स े दरू , सार े पवु ार्ग ह्र ा ंे स े दरू हाके र पक्र ृ ित क े इतन े बड ेÞ परु स्कार -हिन्दी) भाषा क े सरं क्षण आरै पव्र धर्न क े लिए सचते हाने ा चाहिए। इस े आन े वाल े सं िवधान म ंे उचित स्थान मिलना चाहिए। आवश्यक्तानसु ार विद्यालय- महाविद्यालय म ंे एे िच्छक विषय क े रूप म ंे पाठय् क्रम म ंे समाहित करना चाहिए। पक्र ाशन सबं न्धी सु िवधाए ँ आरै भाषाआ ंे की तरह हाने ी चाहिए। – सुनील कुमार मिश्र प्राध्यापक, इन्जिनियरिङ अध्ययन संस्थान, थापाथली क्याम्पस, काठमांडू नहीं बता सके। परिणामस्वरूप इस जनगणना म ंे हिन्दी भाषा बाले न े वाला ंे की सख्ं या का े कम दिखाया गया यद्यपि पिछली जनगणना की तलु ना म ंे इस जणगणना म ंे हिन्दी बाले न े वाला ंे की संख्या ज्यादा है।

किसी समय शिक्षा समेत का माध्यम बनी हिन्दी आज नपे ाल म ंे विवाद का विषय बनी हर्इर्ु ह।ै विवाद सिर्फ नपे ाल म ंे ही नही,ं यह विवाद स्वयं भारत मे भी है, या हिन्दी बाले जे ान े वाल े अन्य मल्ु का ंे म ंे भी ह।ै ले िकन आर्यावर्त के पावन भूमी पर उद्भव हर्ुइ हिन्दी अपनी सरलता और सहजता के कारण विस् तृत होती जा रही है। भारत, नेपाल,A पाकिस् तान, बंग्लादेश होते हुए अपना क्षेत्र विस्तार करती हिन्दी आज फिजी, संयुक्त अरब अमिर ात, सूरिनाम, दक्षिण अप्रिmका, टि्रनिडÞाडÞ एन्डÞ टाबे ागा,े गयु ाना तक पहचँु चकु ी ह।ै अमे िरका आरै बले ायत म ंे भी एक बड ेÞ जमात हिन्दी बाले न े लग ंे ह।ै जनसख्ं या क े हिसाब स े दखे ा जाय तो पूरे विश्व के लगभग ८० करोडÞ लागे हिन्दी भाषा बाले त े ह।ंै बाले न े वाला ंे की जनसंख्या के हिसाब से ये दूसरी भाषा है। हाँ, समय-समय पर जो प्रहार हुआ है इस भाषा पे उससे रफ्तार जरूर कम हो गई है। लेकिन यह तो अपनी वेग से बहती जा रही है, निर्भय होकर, निरन्तर बहती ही जा रही है। हिन्दी को नेपाल से न हटाया जा सकता है और न ही इसे विशेष मान्यता के जरिये विस्तार किया जा सकता है। नेपाल में हिन्दी को लेकर तीन प्रकार की आवाज देखने को मिलती है। पहली- हिन्दी भाषा को भारत से जोडÞकर देखना और राजनीतिक स्वार्थ के कारण इसका विरोध करना।

दूसरी- हिन्दी को राजनीतिक या स् वार्थपर्ूर्ति के लिए र्समर्थन करना और विशेष प्राथमिकता की मांग करना। तीसरी- हिन्दी का विना किसी राजनीतिक कारण उपयोग और आनन्द लेना। इनमें पहली और दुसरी की तुलना में तीसरी हिन्दी भाषा के विस्तार में ज्यादा योगदान करती है। समान्यरूप में हिन्दी का अध्ययन नेपाल में बहुत कम होता है। हिन्दी भाषा लोगों को समझ में आने में हिन्दी फिल्म और टेलिभिजन का महइभ्वपर्ूण्ा योगदान है। बहुत लोग इस भाषा को समझते हैं लेकिन कुछ ही लोग इसको सही ढंग से बोल पाते हैं। नेपाल में हिन्दी को ना ही विशेष प्राथमिकता मिलनी चाहिए ना ही विरोध करने से इसके लोकप्रियता में कमी आयेगी। एक ही जरूरत है हिन्दी को राजनीति से अलग रखने की। युविन पुजारी बरिष्ठ संवाददाता, एभिन्युज टेलिभिजन द्दण् हिमालिनी l जनवरी/२०१४ जब वायदे पूरे नहीं किये जाते तो घनिष्ट मित्र भी साथ छोडÞ जाते हैं। नेपाल और भारत के बीच जिस प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और साँस्कृतिक संबन्ध है,

उसी का परिणाम है हिन्दी भाषा का प्रभाव और लोकिप्रियता। अभी के विश्वव्यापीकरण और हिन्दी भाषा के बढÞते प्रभाव का कोई भी विरोध करना और काला झन्डÞा दिखाकर रोकने की स्थिति में नहीं दिखता। फिर हमारे नेपाल के तरर् ाई भू-भाग में रहने वाले भिन्न भिन्न समुदाय को सर्म्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी भाषा से ही योगदान मिल रहा है। इसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है। भाषा व्यक्ति का अधिकार है कि वह किस भाषा में अपने विचारों को रखने में सुविधा महसूस करता है और इसीलिए सर्म्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को मान्यता मिलती आ रही है। इस भाषा के साथ छेडÞछाडÞ करना उचित नहीं, ऐसी मेर ी धारणा है। – सुराच पर्सर्ाा समाचार प्रमुख हेडलाइन्स एन्ड म्युजिक एफएम, रेडियो मिथिला मानव सभ्यता के विकास के क्रम में मानवद्वारा अर्जित सम्पति भाषा है। अतः किसी भी भाषा के बहिष्कार का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सर्म्पर्क भाषा अपनी सुविधा से लोग चयन करते हैं। सर्म्पर्क भाषा के रूप में इसकी -हिन्दी) की अपनी पहचान है।

किसी को स् थान दिलाने की आवश्यकता नहीं है। यह बात महइभ्वपर्ूण्ा है कि जो अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करता वह दूसरी भाषाओं के प्रति किसी अन्य कारण से क्षणिक स्नेह प्रदर्शित करे लेकिन उसकी नीति बहिष्कार की ही होगी। – श्याम शेखर झा, बल्खु, काठमांडू हिन्दी भाषा भारत में ही नहीं विश्व के बहुत सारे राष्ट्रों मे बोली जाती है। इसकी व्यापकता को ध्यान देते हुए इसे भी अन्तर्र ाष्टी्रय भाषा का दर्जा मिलना चाहिए। नेपाल की बात की जाय तो पर्ूव मेची से पश्चिम महाकाली तक लोग इस भाषा को समझते हैं, बोलते हैं इसीलिए इस भाषा को समुचित सम्मान मिलना चाहिए।

बहिष्कार समस्या का समाधान नहीं। – मनकुमारी राना -थारु) अध्यक्ष, जिल्ला कमीटी महिला, तमलोपा सबसे पहले तो भाषा के लिए विवाद होना ही नही ं चाहिए। क्याेंिक भाषा ता े एक मनष्ु य द्वारा अपन े मनाभे ाव का े दसू रा े क े समक्ष पक्र ट कर ने का माध्यम है। तर्सथ जिस किसी भाषा के द्वारा हम अपना मनोभाव पक्र ट कर ंे वह अनु िचत नही ं हागे ा। आशय यह ह ै कि हिन्दी वा किसी अन्य भाषा को विदेशी कहना, परहेज करना या बहिष्कार करना उचित नहीं कहा जा सकता है। रही बात हिन्दी की तो पचास प्रतिशत से भी ज्यादा नपे ालिआ ंे का े जाडे नÞ े वाली भाषा हिन्दी की ता े आरै भी ज्यादा आवश्यकता महससू हाते ी ह ै यहा ँ पर। सं िक्षप्त रूप म ंे यदि कह ें ता े हम यह कह सकत े ह ंै कि नपे ाल म ंे सबस े अधिक पभ्र ाव हिन्दी का ही ह।ै र ाजनीति, सीमा की निकटता तथा धमर् पच्र ार पस्र ार आदि कारणा ंे स े नपे ाल म ंे हिन्दी का पभ्र ाव आरै भी बढ Þ जाता ह।ै – पं हरे कृष्ण झा, ज्योतिषाचार्य हिन्दी केन्द्रीय विभाग, एम.ए. प्रथम वर्षहिन्दी भाषा का बहिष्कार करने की तो कोई बात ही नहीं आती।

इसकी लिपि नेपाली भाषा से मिलती जुलती है, बहुत से शब्द एक जैसे हैं। वैसे भी नेपाल और भारत पडÞोसी राष्ट्र हैं और खास कर नेपाल की सीमा भारत के उस राज्य से जुडÞा हुआ है जहाँ के अत्यधिक लोग हिन्दी ही बोलते हैं। इसीलिए हिन्दी का प्रभाव तो स्वाभाविक ही है। नेपाल के र ाजनीतिक, आर्थिक और बहुत सारे क्षेत्र में भारत सहयोग करता आ रहा है और ये दूसरा कारण है कि नेपाल में हिन्दी का प्रभाव बढÞता ही जा रहा है। वैसे भी भाषा की कोई सीमा नहीं होती। भार त का संविधान देखा जाय तो वहाँ अष्टम सूची में नेपाली भाषा को रखा गया है तो नेपाल में हिन्दी से परहेज क्यों – इतना ही नहीं अधिकांश लोग भारत में जाकर अपना अध्ययन पूरा करते हंै और वे लोग अपना विचार हिन्दी भाषा में रखने में आसानी महसूस करते हंै। भाषा तो वह जो विचार को दूसरे तक र खने में सहयोग पहुँचाए और हिन्दी में ये काबिलियत हैं इसिलिए इसे ना तो रोका जा सकता है, न रोकने की कोशिश करनी चाहिए। – रुक्सा बज्राचार्य, विद्यार्थी, काठमांडू मेरे विचार में हिन्दी नेपाल के लिए व्यापार की भाषा, संस्कृति की भाषा है। नेपाल आने वाले पर्यटक की संख्या देखें तो आधा से ज्यादा भारत से आते हैं। व्यापार में उनकी भाषा हिन्दी ही होती हैं। सिर्फपशुपतिनाथ क्षेत्र को देख लिया जाय तो पता चल जायेगा हिन्दी का नेपाल में क्या महइभ्व है।

चाहकर भी हम इसका बहिष्कार नहीं कर सकते हैं। और जहाँ तक कुछ लोग इसे विदेशी भाषा मानते हंै तो उन्हे समझना चाहिए कि सबसे बडÞी विदेशी भाषा अंग्रेजी है, फिर क्यों नहीं अंगे्रजी भाषा को बहिष्कार करने की बात आती है – मतलब बिल्कुल साफ है, हिन्दी पर राजनीति हो रही है। – नवीन महर्जन, सञ्चारकर्मी भाषा की कोई सीमा नहीं होती। भारत का संविधान देखा जाय तो वहाँ अष्टम सूची में नेपाली भाषा को रखा गया है तो नेपाल में हिन्दी से परहेज क्यों – हिमालिनी l जनवरी/२०१४ द्दज्ञ जब आप स्वयं से प्रेम करना सीख लेंगे तो दूसरे आपसे नफरत करना छोडÞ देंगे। हमारे पश्चिम नेपाल में देखिये तो सभी लोग भारत जाते हैं और वहाँ मजदूरी करतें हैं। वैसे मुझे ज्यादा पता नहीं है लेकिन कहा जाता है कि चालीस लाख से ज्यादा नेपाली भारत में रह र हे हैं।

वे लोग अध्ययन और विभिन्न रोजगार में लगे हुए हैं। अच्छी हिन्दी का अर्थ है- अच्छी रोजगारी। इसीलिए हिन्दी भाषा से पर हेज करने से अच्छा है इस भाषा को रोजगार की भाषा या कहिए की जोडÞने की भाषा के रूप में स्थान देना चाहिए। इस भाषा को लेकर राजनीति करना गलत है। लेकिन कौन समझाए स्वार्थी नेता और कथित विद्वानों को – – सोमनाथ आचार्य, विद्यार्थी, दार्चुला नेपाल में दो तरह के लोग रहते हैं। एक है आम जनता, जिसको कोई मतलब नहीं कौन क्या बोलता है। वह तो ग्राहक जिस भाषा में बात करता है, उसी भाषा में बात करने की कोशिश करता है। वे लोग नेपाल में बोले जाने वाली हर एक भाषा को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। समस्या है- दूसरी तर ह के लोग में। वैसे लोग राजनीतिज्ञ हैं, प्राज्ञ हैं, और पत्रकार हैं। इन्हें सब पता है लेकिन ये लोग भाषा को लेकर हमेशा विवाद खडÞा करतें है। भाषा तो विचार प्रकट करने माध्यम है, जिसको जिस भाषा में आसान लगता है उसे उस भाषा में विचार प्रकट करने का अधिकार अन्तरिम संविधान ने दिया है।

वास्तव में देखा जाय तो भाषा को लेकर कोई विवाद होनी ही नहीं होना चाहिए। और नेपाल में बोली जाने वाली सभी भाषा को समान अधिकार मिलना चाहिए। – सुमन पाण्डे, विद्यार्थी, विराटनगर हम लागे ता े सीमावतर्ी क्षत्रे म ंे रहत े ह।ंै हम ंे ता े वास्तव म ंे पता भी नही ं ह ै कि नपे ाली भी भाषा ह।ै बचपन म ंे स्कलू म ंे हिन्दी आरै मात ृ भाषा भाजे परु ी म ंे अध्ययन किया। एक सा ै नम्बर की नपे ाली विषय पढर्Þाई होती थी, लेकिन शिक्षक नहीं थे। परिणाम एसएलसी म ंे नपे ाली विषय म ंे फले हा े गया। मनैं े ता े नपे ाल का इतिहास भी हिन्दी भाषा म ंे अध्ययन किया ह।ै अब जब बडाÞ हा े गया ता े सामान्य बाजार लके र कर सम्बन्धी तक सब हिन्दी भाषा ही पय्र ागे करत े ह।ंै म ंै सिर्फ अपनी बात नही ं कर रहा परू े शहर की लगभग यही बात ह।ै इसीलिए म ंै ता े कहता ह ँू कि हिन्दी का े सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए संविधान के तहत। – रवीन्द्र कुमार कर्ण्र्ााविद्यार्थी, र्सलाही कमजोर राष्ट्र पर अपनी भाषा, संस्कृति थोपने की रीत कोई नयी बात नहीं है। पहले अँग्रेज ने थोपी और अब भारत थोपने की कोशिश कर रहा है।

भाषा के मार्फ गुलाम बनाने के लिए नेपाल में हिन्दी के र्समर्थन में अनेक आन्दोलन चलाए जा रहे हैं। और इस आन्दोलन में बडÞे-बडÞे नेता गण लगे हुए हैं। मेरे विचार से नेपाल की राष्ट्रीय भाषा नेपाली है और इसकी संरक्षण और पर््रवर्द्धन के लिए ही प्रयास होना चाहिए। वैसे और सभी भाषा को भी रोका नहीं गया है और रोकना भी नहीं चाहिए। लेकिन जहाँ तक हिन्दी की बात है तो एक बात स्पष्ट है, नेपाल में रहने वाले किसी भी समुदाय की यह मातृ भाषा नहीं। मैं तो कहता हूँ यह एक विदेशी भाषा है और इससे परहेज ही करना चाहिए। – पुष्प बास्तोला, विद्यार्थी, बाग्लुङ भाषा तो भाषा है, विदेशी क्या देशी क्या – हमें हर भाषा का सम्मान करना चाहिए। जहाँ तक बहिष्कार की बात है तो हिन्दी का ही क्यों और भी भाषा का विरोध होना चाहिए। हिन्दी जन मानस में आ चुकी है, और वैसे भी जो सीधी और सरलता से आपके मन में घर कर जाये वही भाषा है और हिन्दी में वो बात है। – नीना अग्रवाल, गृहिणी, विराटनगर

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