क्या कहते हैं चुनावों के नतीजे : कुमार सच्चिदानन्द

मधेश के मुद्दे के दृष्टिकोण से देखें तो पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा और केपी ओली में कोई अन्तर दिखलाई नहीं दे रहा था । ठीक इसी तरह भीम रावल और कृष्ण सिटौला में भी कोई अन्तर दिखलाई नहीं दे रहा था ।

लोकतंत्र में सत्ताधारी और विपक्ष जब एक ही थाली चट्टे–बट्टे बन जाएँ, एक ही राग आलापने लगे तो अपनी असन्तुष्टि को अभिव्यक्त करने के लिए जनता तीसरी शक्ति की तलाश करेगी ही


विगत ऐतिहासिक चुनाव का ऐतिहासिक परिणाम आया और पहली बार देश ने नेपाली काँग्रेस जैसे लोकतंत्र के संस्थापक तथा पक्षधर राजनैतिक दल को हाशिये पर धकेलते हुए वामगठबंधन के पक्ष में जोरदार मतदान किया । दूसरी ओर दो नंबर प्रदेश के रूप में मधेश ने मधेशी दलों के पक्ष में अपनी प्रचण्ड एकबद्धता जाहिर की और एक तरह से राष्ट्र को यह संदेश दिया कि उसकी संवेदनाएँ मरी नहीं हैं तथा उसकी राजनैतिक इच्छाओं को कमतर नहीं आँका जाना चाहिए । इस परिघटना को नेपाल की जनता में राजनैतिक सोच के परिवर्तन का संकेत माना जा सकता है । यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आमलोगों की दृष्टि में राजनीति का अर्थ बदल गया है । यह महज सत्ता के बन्दरबाँट का माध्यम मात्र नहीं, यह राजनैतिक दलों और उसके आला नेताओं के दिवास्वप्न के खेल का मैदान मात्र भी नहीं, यह आम लोगों की आकाँक्षाओं के फलीभूत होने का माध्यम भी है, यह बेहतर भविष्य के सपने देखने का आधार भी है और इस कसौटी पर जो राजनैतिक दल उतरेगा उसी के हाथ में देश की बागडोर होगी ।
वर्तमान चुनावों में वामगठबंधन को अप्रत्याशित और प्रचण्ड बहुमत मिला है । इसका कारण साफ है कि राजनैतिक दल के रूप में नेपाली काँग्रेस ने पूरे अराजनैतिक चरित्र का परिचय दिया और विपक्ष से निबटने की कोई कारगर रणनीति या नारा उसके पास नहीं था । इसकी नेतृत्व पंक्ति में एक अहंकार की भावना पहले से ही विद्यमान थी कि वह देश की प्रथम पार्टी है और प्रथम रहना इसका नैसर्गिक अधिकार है । यद्यपि इससे पूर्व भी इसका यह वहम टूटा है लेकिन इससे भी इस दल ने कोई सीख नहीं ली और सम गति से डग भरते रहे । कितना हास्यास्पद लगता है कि बिना किसी राजनैतिक एजेण्डा का कोई नेता जनता के बीच यह कहता है कि वह सात बार या नौबार देश का प्रधानमंत्री बनेगा ! इसे लफ्फाजी नहीं तो और क्या कहा जाए ? इसका नतीजा यह हुआ कि सत्ता की सीधी साधना के अतिरिक्त इसका कोई एजेण्डा नहीं बन सका जिसे जनता ने पूरी तरह नकार दिया । नेपाली काँग्रेस के नेता यह कहकर आम लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करते रहे कि अगर कम्युनिस्ट सरकार आएगी तो देश में तानाशाही प्रवृतियाँ हावी हो जाएगी, लोकतंत्र का पौधा झुलस जाएगा । लेकिन आमलोग यह मानने को तैयार नहीं थे । उनका स्पष्ट मानना था कि जब इन वामपंथी पार्टियों ने चुनाव को स्वीकार कर लिया है तो लोकतंत्र की हत्या इससे कैसे हो सकती है ?
अगर मुद्दों की बात छोड़ दें नेपाली काँग्रेस और नेपाल की वामपंथियों में नीतिगत स्तर पर कोई भेद नहीं दिखलाई देता । संविधान के मुद्दे पर ही देखें तो विमति को भी इस दल ने सहमति मानकर मतदान किया । संविधान के कई बिन्दुओं पर असहमति रखने वाले अपने राष्ट्रपति को भी इन्होंने विपक्षी की मर्यादाहीन आलोचना का शिकार होने के लिए छोड़ दिया । मधेश के मुद्दे के दृष्टिकोण से देखें तो पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा और केपी ओली में कोई अन्तर दिखलाई नहीं दे रहा था । ठीक इसी तरह भीम रावल और कृष्ण सिटौला में भी कोई अन्तर दिखलाई नहीं दे रहा था । लोकतंत्र में सत्ताधारी और विपक्ष जब एक ही थाली चट्टे–बट्टे बन जाएँ, एक ही राग आलापने लगे तो अपनी असन्तुष्टि को अभिव्यक्त करने के लिए जनता तीसरी शक्ति की तलाश करेगी ही । इसलिए इन मुद्दों के प्रति सारी सकारात्मकता को समेट कर एमाले ले गया और नकारात्मकता का प्रयोग मधेश की ताकत के रूप में हुआ । माओवादी केन्द्र ने भी समय की नब्ज को समझा और राष्ट्रवाद के प्रति चरम ध्रुवीकरण में अपना हिस्सा बटोर कर वह देश की दूसरी राजनैतिक शक्ति बन गया । नेपाली काँग्रेस के पास अब तीसरी शक्ति बनने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा । इस रूप में भी उसका कद अपेक्षाकृत बौना ही नजर आता है ।
अगर सैद्धान्तिक रूप से विचार करें तो नेपाली काँग्रेस जैसी मध्यममार्गी पार्टी ने सत्ता का बन्दूक से रिश्ता तोड़कर समाज के हर तबके के कल्याण की बात को अपनी नीतियों में शामिल कर समाजवाद के जिस आधारभूत संरचना को राजनीति का आधार बनाया, ठीक इसी तरह वामपंथी पार्टियों ने बंदूक की राह छोड़कर, जनता की सम्पत्ति के अधिकार को मान्यता देकर तथा सत्ता प्राप्ति का माध्यम चुनाव को स्वीकार कर समाजवाद के जिस स्वरूप को अपनाया है उसे काँग्रेस के समाजवाद से अलग कैसे माना जा सकता है ? फिर जो सरकार संसदीय गणित के आधार पर चलती है उससे तानाशाह के जन्म की आशंका को कैसे अमली जामा पहनाया जा सकता है ? बात साफ है कि आज भी राजनीति करने वाले लोग इस बात को समझते हैं कि उनकी जनता नादान है और उन्हें वह जैसा पाठ पढ़ाएँगे वैसा ही वह समझेगी । लेकिन इन चुनावों के नतीजों ने बतला दिया कि जनता समझदार है । वह सोचती–विचारती और निर्णय भी करती है ।
एक बात तो निश्चित रूप से कही जा सकती है इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा था–स्थिरता । औसतन एक साल में सरकारे गिरती रही हैं । इससे किसी भी सरकार की न तो कोई ठोस योजना सामने आती थी और न ही उन योजनाओं और नीतियों के कार्यान्वयन का अवसर उन्हें मिल पाता था । एक तरह से सत्ता नेपाल में भोग और लूट का केन्द्र का पर्याय हो गयी थी । भद्र सहमति के नाम पर सारे दल इसका बन्दरबाँट करते थे । यही कारण था कि इसे प्राप्त करने के लिए हर दल में आपाधापी की अवस्था थी । लेकिन आम लोगों के लिए यह एक निराशाजनक स्थिति थी । ठीक उसी तरह जिस तरह राजसंस्था द्वारा बार–बार लोकतंत्र की हत्या के प्रयासों के परिणामस्वरूप जनान्दोलन– २ हुआ उसी तरह बार–बार सरकारों के बनने और गिरने से परेशान राष्ट्र ने एक दल को पूर्ण ही नहीं प्रचण्ड बहुमत दिया । इसके लिए लोगों ने वामगठबंधन को बेहतर विकल्प माना और एक तरह से उन्हें यह पाठ भी दिया है कि वे संसदीय गणित के जोड़–घटाव में न उलझकर राष्ट्र–निर्माण की दिशा में सोचें और देश के तीव्र विकास की दिशा सुनिश्चित करें ।
नेपाली काँग्रेस के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह घटित हुई कि समय की नब्ज के समझने में वे सर्वथा कमजोर सिद्ध हुए । कहा जाता है कि अतिविश्वास कभी–कभी व्यक्ति को धोखा में डाल देता है । यही बात काँग्रेस के साथ भी घटित हुई । पिछले दो–तीन वर्षों में नेपाल की राजनीति ने जो करवट बदली उसकी पहचान इसके नेता नहीं कर पाए । बात साफ है कि नेपाल में भारत का विरोध राष्ट्रवाद का मूल माना जाता है और हर वामपंथी पार्टियाँ कमोबेश इस बात को समझती है और समय–समय पर इस अस्त्र का उपयोग भी करती है । मधेश आन्दोलन यद्यपि नेपाल की आन्तरिक समस्या है लेकिन इसे एक हद तक भारत से जोड़कर देखा गया और विश्लेषित किया गया । दो वर्ष पूर्व नाकाबंदी के बाद हालात में तेजी से परिवर्तन हुआ और इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिया गया और इसका नेतृत्व ओली ने किया और एक तरह से नेपाली जनमानस में उन्होंने स्वयं को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया । लेकिन इसके प्रतिकार के लिए नेपाली काँग्रेस के पास जनता को वामपंथी तानाशाही का डर दिखलाने के सिवा और कुछ नहीं था और इसे तलाशने की कोशिश भी उन्होंने नहीं की । परिणाम यह हुआ कि पहाड़ ने उनपर भरोसा तो नहीं ही किया । मधेश ने भी उसे ठुकरा दिया । यह अलग बात है कि कुछ सीटों पर जीत उन्हें भी मिली है मगर यह माना जा सकता है कि यह पार्टी की नीतियों के कारण नहीं बल्कि उम्मीदवारों वयक्तित्व के कारण हो पाया है । कहा जा सकता है कि राजनैतिक लड़ाई राजनीति के स्तर पर ही होती है, कसीदे पढ़ने से कुछ नहीं होता ।
अगर देखा जाए तो विगत स्थानीय, संसदीय और प्रादेशिक चुनावों में एक प्रकार का राजनैतिक अतिवाद जनता के मनोविज्ञान पर हावी रहा । पहाड़ में एमाले को प्रचण्ड बहुमत मिला और मधेश में मधेशी दल को । इसका मूल्यांकन दूसरे तरीके से भी किया जा सकता है कि विगत एक दशक में जनता के स्वाभिमान का स्तर तेजी से बढ़ा है और इसकी रक्षा के लिए वे आगे आए हैं । जिन राजनैतिक दलों ने जनसंवेदना के इस सूत्र को पकड़ा उसे विजय मिली और जिसने इस सन्दर्भ में ढुलमुल रवैया अपनाया उसे एक सिरे से आमलोगों ने नकार दिया । इस दृष्टि से कहा जाए तो नेपाली जनमनोविज्ञान नेपाल में भारतीय कूटनीति से असंतुष्ट है और इसका प्रकटीकरण इससे पूर्व भी कई बार और कई तरह से यहाँ के लोगों ने किया है । इसलिए जो प्रचण्ड बहुमत आज एमाले के पक्ष में देखा जा रहा है उसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ–साथ एक विशेष समुदाय का एक विशेष देश के विपरीत भी माना जा सकता है । यह अलग बात है कि आगामी सरकार इस जनाकांक्षा को भविष्य में किस तरह व्यवस्थापन करती है ? दूसरी ओर २ नंबर प्रदेश अर्थात् मधेश में जनता ने समस्त राष्ट्रीय दलों को खारिज करते हुए मधेश समर्थक दल के पीछे स्वयं को खड़ा होने का संकेत दिया है । यह भी एक तरह से क्षेत्रीय स्वाभिमान है जो उनके हितों के विरुद्ध बात करने वाले दल और लोगों के विरुद्ध प्रतिक्रिया का संकेत है । एक तरह से इसने टकराव की एक जमीन भी पैदा कर दी है और अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया है कि उनके मुद्दे अभी जीवित हैं और इसकी उपेक्षा कर कोई भी राजनैतिक दल कम से कम इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम नहीं कर सकता ।
यह कटु यथार्थ है कि राजनैतिक लड़ाई राजनैतिक चालों से ही जीती जा सकती है । खोखली संवेदनाओं के आधार पर जनता को गुमराह करने के दिन अब लद गए । एक बात तो निश्चित थी कि जिस तरह राष्ट्रीय स्वाभिमान और राष्ट्रवाद एजेण्डे को लेकर नेकपा एमाले चल रहा था और इसके प्रखर प्रवक्ता के रूप में ओली जनमानस में स्थापित होते जा रहे थे उसे देखते हुए नेपाली काँग्रेस द्वारा चुनावों में नए समीकरण तलाशने की आवश्यकता थी । निश्चित रूप से सरकार चलाने में नेकपा माओवादी केन्द्र नेपाली काँग्रेस का सहयोगी था । लेकिन इस गठबंधन को चुनावी रणनीति में परिवर्तित करने में नेपाली काँग्रेस ने पूरी लापरवाही बरती । यद्यपि इन चुनावों से पूर्व भी कई राजनैतिक विश्लेषकों ने एमाले को रोकने के लिए इस गठबंधन की सान्दर्भिकता पर बल दिया था । लेकिन राजनीतिकर्मी तब तक विश्लेषकों की बातों को अहमियत नहीं देते जब तक उन्हें ठोकर नहीं लगती । आज इसी का खामियाजा नेपाली काँग्रेस को भुगतना पड़ रहा है । आश्चर्य इस बात का है कि सत्ता में साथÞ–साथ सहभागिता करते हुए भी वे इस बात को नहीं समझ पाए कि नेकपा माओवादी केन्द्र भले ही सैद्धान्तिक रूप से नेकपा एमाले के करीब दिखलाई देता हो लेकिन व्यावहारिक रूप से वह नेपाली काँग्रेस से ज्यादा करीब था । अगर नेपाली काँग्रेस माओवादी केन्द्र द्वारा माँगे गए ३५ फिसदी सीट उन्हें दे दिया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती । लेकिन थोड़ी सी अदूरदर्शिता का परिणाम यह हुआ कि आज उसका आँसू पोंछने वाला कोई नहीं ।
किसी ने खूब कहा है कि ‘समय चूक सम चूक नहीं समय लाभ सम लाभ ।‘ इस कथन के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि बाबा ओली ने इस बात को बखूबी समझ लिया था और इसे समझा राजपा तथा संघीय समाजवादी फोरम के आला नेताओं ने । यही कारण है कि अपने–अपने स्तरों पर इन्होंने प्रशंसनीय सफलता हासिल की । लेकिन दोनों दलों के नेतागण जिन्हें दलगत आधार पर विजय मिली है उन्हें इस बात को भलीभाँति समझ ही लेना चाहिए यह उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं बल्कि दलगत नीतियों की जीत है और जनता ने दलों के पक्ष में अपना मतदान किया है । उन्हें यह भी भलीभाँति समझना चाहिए कि दल के बाहर उनका कोई अस्तित्व नहीं । कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दल से विद्रोह कर अपने बूते चुनाव जीतने का सपना लेकर मैदान में उतरने वाले बड़े–बड़े वीर चुनाव परिणामों की दृष्टि से धूल चाटते नजर आए । इन चुनावों ने एक तरह से उन्हें भी संदेश दिया है कि अगर राजनीति करते हैं तो धैर्य का पाठ भी उन्हें अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए । उलट–पुलट की राजनीति और तत्काल लाभ की राजनीति का युग समाप्त हो गया है ।

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