क्या कार्लमार्क्स खुद मार्क्सवादी थे ?

१७ अक्टुवर

राम यादव

जर्मनी के धुर पश्चिम में एक नदी है मोज़ल. उसी पर बसा है ट्रीयर नाम का दो हज़ार साल पुराना एक सुरम्य नगर. जनसंख्या एक लाख से कुछ ही अधिक है. जर्मनी से बाहर उसे शायद ही कोई जानता अगर उसका नाम कार्ल मार्क्स से नहीं जुड़ा होता. 19वीं–20वीं सदी में मार्क्स के नाम की इतनी धूम थी कि जर्मनी से बाहर बुद्धिजीवियों के एक वर्ग विशेष के बीच वे एक पूजनीय देवता समान थे और ट्रीयर एक तीर्थस्थान. जर्मनी में तो नहीं, पर भारत जैसे कुछ देशों में मार्क्स के भक्त आज भी उनके नाम की माला जपते और उनकी तस्वीरों पर फूलमालाएं चढ़ाते हैं.

5 मई 1818 को ट्रीयर में ही जन्मे कार्ल मार्क्स की अगले वर्ष दूसरी जन्मशती पड़ेगी. इसी महीने उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘दास कपिटाल’ (पूंजी) के प्रथम खंड के प्रकाशन की 150 साल पूरे हो गए. इस मौके पर चीन ने, जो अपने आप को कम्युनिस्ट कहता है जबकि कार्ल मार्क्स के मार्क्सवाद से विमुख हो चुका है, ट्रीयर शहर को मार्क्स की छह मीटर ऊंची एक महामूर्ति भेंट करने का प्रस्ताव रखा है. ट्रीयर शहर इससे बड़े पशोपेश में पड़ गया. उसे मार्क्स पर गर्व से अधिक शर्म महसूस होती है. पर, चीन को नाराज़ करना उचित नहीं होगा, इसलिए उसने प्रस्ताव मान लिया.

चीन ट्रीयर को मार्क्स देगा तो भारत गांधी

भारत भी ट्रीयर शहर को एक प्रतिमा भेंट करना चाहता है – महात्मा गांधी की. हिंसापूर्ण क्रांति द्वारा साम्यवादी समाज बनाने की मार्क्स की डेढ़ सौ वर्ष पुरानी परिकल्पना की अपेक्षा महात्मा गांधी की सत्याग्रही सत्य–अहिंसा आज भी कुछ कम प्रासंगिक नहीं है. इसलिए भारत ने महात्मा गांधी की एक ऐसी आवक्ष प्रतिमा ट्रीयर को भेंट करने की पेशक़श की है जो विनयी गांधी के छोटे कद के अनुरूप ही विनयपूर्ण छोटे आकार की होगी.

कार्ल मार्क्स एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे. ट्रीयर उस समय जर्मनी के पूर्वगामी प्रशिया साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था. मार्क्स के नाना एक डच (हॉलैंड वासी) रबी (यहूदी धर्मगुरू) हुआ करते थे और पिता के ख़ानदान से ट्रीयर शहर के यहूदियों को अपने रबी मिला करते थे. लेकिन, पेशे से वकील और कई अंगूरी बगानों के मालिक उनके पिता हाइनरिश मार्क्स ने, यहूदियों के प्रति प्रशिया के भेदभावी क़ानूनों से तंग आ कर, कार्ल मार्क्स के जन्म से कुछ पहले ही, ईसाई धर्म के प्रोटेस्टैंट संप्रदाय को अपना लिया था. धर्मांतरण से पहले पिता का नाम हेर्शल मार्क्स हुआ करता था. पिता चाहते थे कि बेटा भी उन्हीं की तरह वकील बने. लेकिन बेटे ने स्कूली पढ़ाई के बाद बॉन विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र और साहित्य की पढ़ाई शुरू कर दी. बेटे का मानना था कि दर्शनशास्त्र के बिना कुछ भी पाया नहीं जा सकता.

मार्क्स के अंतिम दिन बदहाली में बीते

दर्शनशास्त्र के साथ अपनी बौद्धिक जीवन-यात्रा पर निकले कार्ल मार्क्स ने, 65 वर्ष का होते-होते, 14 मार्च 1883 को लंदन में जब आंखें मूंदीं, तब तक उनका नाम एक दार्शनिक से अधिक अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, पत्रकार और समाजवादी क्रांति के प्रचारक के तौर पर विख्यात हो चुका था. अर्थतंत्र, समाज और राजनीति के बारे में उनकी सैद्धांतिक स्थापनाओं को मार्क्सवाद कहा जाने लगा था. उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण यूरोपीय देशों की सरकारें उनका पीछा करने लगी थीं. पेरिस और ब्रसेल्स में पांच वर्ष बिताने के बाद 1850 से वे लंदन में रहने लगे थे. वहां भी उन्हें नाम बदल कर बार-बार नए घर ढूंढने पड़ते.

1881 में पत्नी जेनी की मृत्यु के बाद मार्क्स के अंतिम 15 महीने ग़रीबी, बीमारी और एकाकीपन में बीते. उनके पास किसी देश की नागरिकता तक नहीं थी. यार- दोस्तों ने मिल कर उन्हें लंदन की एक क़ब्रगाह में दफनाया. मृत्यु के बाद उनके परम मित्र फ्रीड्रिश एंगेल्स ने उनकी सबसे बड़ी विरासत ‘दास कपिटाल’ के बाक़ी दोनों खंड़ों वाली पांडुलिपियों को भी संपादित और प्रकाशित किया.

एंगेल्स भी मूलतः प्रशिया के ही नागरिक थे. वे राइन नदी पर बसे कोलोन और ड्युसलडोर्फ़ के पास के वुपरटाल शहर में 28 नवंबर 1820 को पैदा हुए थे. उनके पिता एक सूती कपड़ा मिल के मालिक थे. एंगेल्स भी, मार्क्स की तरह दर्शनशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार और साम्यवादी क्रांतिकारी कहलाए. कोलोन के एक अख़बार के कार्यालय में, नवंबर 1842 में वे दोनों एक-दूसरे से परिचित हुए थे. दोनों ने पाया कि उनकी सोच-समझ और विचार एक जैसे हैं. समय के साथ दोनों के बीच प्रगाढ़ मैत्री हो गयी. खूब पत्र व्यवहार होने लगा. 1870 से एंगेल्स भी लंदन में रहने लगे. लंदन में ही पांच अगस्त 1895 को उन्होंने भी अंतिम सांस ली.

वर्गसंघर्ष और वर्गचेतना

मार्क्स के मार्क्सवाद में एंगेल्स का भी बहुत बड़ा वैचारिक योगदान रहा है. संक्षेप में मार्क्सवाद का मूल कथ्य यही है कि मानव समाज वर्ग संघर्ष से बनते और चलते हैं. पूंजीवाद में यह संघर्ष ‘बुर्जुआ’ कहलाने वाले सत्ताधारी वर्ग और ‘सर्वहारा’ कहलाने वाले मज़दूर वर्ग के बीच होता है. राज्यसत्ता और कल-कारख़ानों जैसे उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों का वर्चस्व रहता है. वेतन या मज़दूरी के बदले अपना श्रम दे कर मज़दूर ज़रूरी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं. मार्क्स ने भविष्यवाणी की कि अतीत की सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों की तरह ही पूंजीवाद भी ऐसे अंतर्विरोध पैदा करता है जो एक दिन उसे ले डूबेंगे. तब, समाजवाद नाम की एक नयी प्रणाली उसका स्थान लेगी.

मार्क्स का मानना था कि सामाजिक-आर्थिक संकट पैदा करते रहने के पूंजीवाद के स्वभाव के चलते ‘बुर्जुआ’ व ‘सर्वहारा’ वर्ग के बीच एक शत्रुताभाव पनपने लगता है. वे कहते थे कि इसके चलते श्रमिकों में एक ऐसी नयी वर्ग-चेतना जागृत होगी कि वे एक वर्गहीन साम्यवादी (कम्युनिस्ट) समाज के निर्माण हेतु क्रांति करते हुए, राज्यसत्ता अपने हाथों में ले लेंगे. मार्क्स अपने इस सपने को साकार होते देखने के लिए बहुत लालायित थे. वे श्रमिक वर्ग को ललकारने से चूकते नहीं थे कि अपनी सामाजिक-आर्थिक मुक्ति के लिए एकजुट हो कर उसे क्रांति द्वारा पूंजीवादियों से सत्ता छीन लेनी चाहिये.

मार्क्स का खूब महिमा-मंडन हुआ

लेकिन मार्क्स के जीते-जी तो ऐसा कभी हो नहीं पाया! रूस में 1917 की तथाकथित ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ तत्कालीन ज़ार (सम्राट) शाही को उखाड़ फेंकने की मज़दूरों, किसानों और सैनिकों की एक मिली-जुली क्रांति थी. सोवियत संघ वाले समय के कम्युनिस्टों ने उसे खूब महिमा मंडित किया. पर, वह न तो मार्क्स की कसौटियों पर खरी उतरती थी और न ही ‘जनवादी’ थी. क्रांति के बाद ज़ारकालीन दमनकारी तानाशाही का स्थान कुछेक कम्युनिस्ट नेताओं के निरंकुश दमनचक्र ने ले लिया. अकेले तीन दशकों तक स्टालिन के शासनकाल में ही एक करोड़ 20 लाख लोगों को बंदी बना कर साइबेरिया के ‘श्रमशिविरों’ में सड़ाया गया. 20 लाख बंदी जीवित नहीं लौटे. रूसी ‘सर्वहारा’ और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद रूसी आधिपत्य वाले पूर्वी यूरोपीय देशों का ‘सर्वहारा’ भी सचमुच सब कुछ हारा. ऐसा न होता तो अपनी जनता को देश से पलायन करने से रोकने के लिए साम्यवादी पूर्वी जर्मनी द्वारा बनायी गयी बर्लिन दीवार, रूसी क्रांति के 72 साल बाद, 1989 में, जनता के धक्के से न तो गिरती और न ही देखते ही देखते सोवियत संघ सहित समूचे पूर्वी यूरोप की सभी कम्युनिस्ट सरकारों का भरभरा कर पतन हो जाता.

मार्क्स और एंगेल्स का मार्क्सवाद चाहे जितना तार्किक लगे, पूंजीवाद में अंतर्निहित विरोधाभासों की तरह ही न तो वह और न ही उसके इन दोनों प्रणेताओं का निजी जीवन विरोधाभासों से मुक्त रहा है. दोनों महाशय बात तो करते हैं सर्वहारा के उद्धार की, पर उन्होंने खुद मेहनत-मज़दूरी कभी नहीं की. दोनों खुशहाल परिवारों से थे. उच्चशिक्षा प्राप्त थे. बुद्धिजीवी थे, न कि श्रमजीवी. दोनों के बीच के अब तक अज्ञात या उपेक्षित कुछ पत्र व्यवहार इसकी पुष्टि करते हैं कि मज़दूरों, विदेशियों और खुद अपने घर-परिवार के लोगों के प्रति उनके ठेठ निजी विचार कई बार कितने पूर्वाग्रही, घटिया और वैसे ही घिसे-पिटे थे, जैसे राह चलते किसी साधारण आदमी के हो सकते हैं.

मार्क्स के अपने ही पत्र कलई खोलते हैं

जर्मनी के ब्यौर्न और सीमोन अक्स्तीनात बंधुओं ने, हाल ही में, ऐसे ही पत्र आदि जुटा कर उन्हें पॉकेट-बुक के रूप में प्रकाशित किया है. पुस्तक को नाम दिया है, ’मार्क्स और एंगेल्स अंतरंग’ (मार्क्स उन्ट एंगेल्स इन्टीम). उन्हें इस पुस्तक का विचार तब आया जब सीमोन अक्स्तीनात के हाथ अचानक कुछ ऐसे उद्धरण लगे, जो काफी घटिया या मुंहफट क़िस्म के थे. इससे दोनों भाइयों की जिज्ञासा बढ़ी कि जब इस तरह के दो-चार उद्धरण मिले हैं तो खोज करने पर शायद और भी मिल सकते हैं. दोनों भाई इस काम में जुट गये. समय के साथ उन्हें इतने सारे उद्धरण और उदाहरण मिले कि उनको संग्रहित कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना ही उन्हें श्रेयस्कर लगा. इस वर्ष ‘दास कपिटाल’ की डेढ़ सौवीं और अगले वर्ष मार्क्स के जन्म की दो सौवीं वर्षगांठ को देखते हुए इन्हीं दिनों प्रकाशित इस पुस्क से मार्क्स और एंगेल्स की एक ऐसी अविश्वसनीय-सी तस्वीर उभरती है, जिससे उनके प्रशंसकों के सिर चकरा जायेंगे.

जर्मन मीडिया के साथ बातचीत में ब्यौर्न अक्स्तीनात ने कहा कि मुख्यतः सभी लोग यही मानते हैं कि मार्क्स सर्वहारा वर्ग के मसीहा थे. पूंजीपतियों, कुलीनों और सामंतों से लड़ने की गुहार लगाते थे. पर, उनके जीवन में निकट से झांकने पर हम पाते हैं कि कहने को तो वे मेहनत-मज़दूरी करने वालों को शोषण से मुक्ति दिलाना चाहते थे, किंतु मूलतः उन्हें ’महामूर्ख’ ही मानते थे. ब्यौर्न अक्स्तीनात का कहना है, अपनी कई चिट्ठियों में उन्होंने मज़दूरों को अपमानित किया है और किसानों को भी नहीं बख्शा है. मज़दूरों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिलाने की उन्होंने लंबी-चौड़ी बातें तो खूब लिखी और कही हैं, पर वे उन्हें पसंद नहीं करते थे.’

मार्क्सवादियों में तानाशाही प्रवृत्ति होती है

अक्स्तीनात बंधुओं के मुताबिक यह अकारण ही नहीं है कि बहुत से कम्युनिस्ट या मार्क्सवाद से प्रभावित वामपंथी दावा तो करते हैं कि वे शोषितों और दलितों के हित में बलशालियों या सत्ता के एकाधिकारवादियों से लड़ना चाहते हैं. लेकिन, जब कभी सत्ता उनके हाथ लग जाती है, तो अक्सर वे खुद ही तानाशाह बन जाते हैं’ और सत्ता छोड़ने का नाम ही नहीं लेते. उनके शब्दों में ’मार्क्स के एक परिचित ने भांप लिया था कि मार्क्स यदि कभी स्वयं बहुत प्रभावशाली बन गये, तो बहुत संभव है कि वे भी तानाशाह हो जायेंगे. इस परिचित ने अपने एक पत्र में उन्हें जर्मनी का भावी तानाशाह लिखा भी था.’ अक्स्तीनात बंधुओं को यह बात दूर की कौड़ी नहीं लगती कि मार्क्स यदि कभी राजनीति में गये होते, चुनाव लड़ते और जीत जाते तो वे निश्चित रूप से मनुष्यों के प्रति मैत्रीपूर्ण नेता या सद्भावी राष्ट्राध्यक्ष नहीं होते.

अक्स्तीनात बंधुओं के अनुसार मार्क्स के लिखे निजी पत्रों में पैसे की भी प्रमुख भूमिका देखने में आती है. उनको पढ़ कर लगता है कि उनकी जीवनशैली काफ़ी ठाट-बाट वाली रही होगी. वे हमेशा इसी फ़िराक में रहते थे कि कब कहां से कितना पैसा उगाहा जा सकता है. दूसरी ओर, इन पत्रों से उन उपायों का कोई अता-पता नहीं मिलता कि ग़रीबों की मदद कैसे हो और यथासंभव सभी लोग खुशहाली में केसे रहें? यही बात उनके परम मित्र एंगेल्स के साथ भी थी. मार्क्स के पिता नामी वकील थे तो एंगेल्स के पिता नामी उद्योगपति थे. अक्स्तीनात बंधुओं का कहना, ’दोनों आरामतलब थे. दूसरों की जीवनशैली की निंदा करते थे जबकि दूसरों के पैसों पर ही परजीवी की तरह जीते भी थे. उनकी ख़र्चीली जीवनशैली कतई किसी दृष्टांत लायक नहीं थी.

मार्क्स-एंगेल्स की पूजा होती थी

पूर्वी यूरोप के उन देशों में – बर्लिन की दीवार गिरते ही जिनकी मार्क्सवादी सरकारें भी ढह गयीं – मार्क्स और एंगेल्स की इन निजी कमज़ोरियों पर न केवल पर्दा डाला जाता था, बल्कि किसी भगवान की तरह उनकी पूजा-आराधना होती थी. उनमें कोई दोष ढूंढना इस्लाम में ईशनिंदा की तरह वर्जित था. यही नहीं, रूस के लेनिन- स्टालिन, रोमानिया के चाउशेस्कू या चेकोस्लोवाकिया के हुसाक जैसे कम्युनिस्ट नेता किसी देवता की तरह अपनी भी पूजा करवाते थे. जो कोई एक बार देश का सर्वोच्च नेता बन गया उसे प्रायः यमराज ही हटा पाते थे. आज स्थिति यह है कि संसार के जिन केवल चार देशों की सरकारें अपने आप को कम्युनिस्ट बताती हैं, उनमें से चीन और वियतनाम ने अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी ढर्रा पुनः अपना लिया है. उत्तर कोरिया में किम वंश की राजशाही चल रही है और क्यूबा भी धीरे-धीरे बाज़ारवाद की ओर बढ़ रहा है. मार्क्स की शिक्षा समय की परीक्षा कहीं भी पास नहीं कर पायी. तब भी अपने आप को वामपंथी या प्रगतिशील अधिकतर वही लोग बताते हैं, जो मार्क्सवाद का मोह नहीं छोड़ पाते हैं.

कम्युनिस्ट सरकारों और दुनिया भर के मार्क्सवादियों का सबसे प्रिय नारा है, ’दुनिया भर के सर्वहारा एक हो जाओ’ (जर्मन भाषा मेंः प्रोलिटारिया आलर लैंडर, फ़ेरआनिग्त ओएश). सभी यही मानते हैं कि यह नारा कार्ल मार्क्स की ही देन है. अक्स्तीनात बंधुओं का कहना है कि यह नारा कार्ल मार्क्स नहीं, कार्ल शापर नाम के मार्क्स के एक समकालीन जर्मन मज़दूर नेता का दिया नारा है. शापर को भी जर्मनी के पूर्वगामी प्रशिया को छोड़ना पड़ा था. स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस में कुछ समय बिताने के बाद शापर भी 1840 में लंदन में बस गए. वहीं उनका कार्ल मार्क्स और फ्रीड्रिश एंगेल्स से भी परिचय हुआ. लंदन में उस समय और भी ऐसे कई जर्मनों का जमघट था, जिन्हें प्रशिया से भागना पड़ा था.

केवल उजला पक्ष ही पेश किया गया

पूर्वी यूरोप की भूतपूर्व कम्युनिस्ट सरकारों और दुनिया भर के मार्क्सवादियों को अपना हित क्योंकि कार्ल मार्क्स और फ्रीड्रिश एंगेल्स के मसीही महिमामंडन में ही दिखाई पड़ता था, इसलिए दुनिया के सामने उनका केवल उजला पक्ष ही पेश किया जाता था. जो कुछ धुंधला या काला था उसे इस तरह छिपा दिया जाता था मानो उसका अस्तित्व संभव ही नहीं है. अक्स्तीनात बंधु इसकी पुष्टि में सोवियतकालीन रूस के एक ऐसे शोधकर्ता का उदाहरण देते हैं, जिसने मार्क्स और एंगेल्स के इतने सारे कथन इकट्ठे और दर्ज कर लिये थे कि स्टालिन ने उसे गोली से उड़वा दिया! इसी कारण मार्क्स और एंगेल्स के सारे कथन, नोट या पत्र किसी एक जगह नहीं मिलते. वे अलग-अलग देशों के संग्रहालयों और पुस्तकालयों में बिखरे हुए हैं. कुछ शायद कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि उन्हें इस या उस देश की सरकार ने नष्ट करवा दिया.

‘मार्क्स और एंगेल्स अंतरंग’ में प्रकाशित सामग्रियों के संग्रहकर्ता अक्स्तीनात बंधुओं को शिकायत है कि इन दोनों ऐतिहासिक पुरुषों से संबंधित सामग्रियों को जुटाने की कभी भरपूर कोशिश भी नहीं की गई. उनकी पुस्तकों को ही उनका संपूर्ण परिचय मान लिया गया. बहुत से पत्रकार उनके बारे में आज भी अपनी मनपसंद तस्वीर ही पेश करते हैं. जनसाधारण के मन में यही छवि बैठा दी गई है कि मार्क्स-एंगेल्स सर्वहारा के मसीहा जैसे थे. हर प्रकार के राष्ट्रवाद से ऊपर थे. राष्ट्रों के बीच समानता और भाईचारा चाहते थे. जबकि सच्चाई यह है कि वे अन्य राष्ट्रों की खिल्ली भी उड़ाते थे. उनका जर्मनपन किसी राष्ट्रवाद से कम नहीं था. उनका साम्यवाद जिन देशों में अपनाया गया, वहां वह नागरिक स्वतंत्रता की भारी क़ीमत पर थोड़ी-बहुत भौतिक उपलब्धता से आगे नहीं बढ़ पाया.’मार्क्स और एंगेल्स अंतरंग’ पुस्तक की एक झलक मार्क्स के निम्नलिखित उद्धरणों से भी मिल सकती हैः

– जितना मैं जानता हूं, वह यही है कि मैं कोई मार्क्सवादी नहीं हूं. (मार्क्स अपने बारे में)

– फ्रांसीसियों को तो कूटा जाना चाहिए ( जर्मन-फ्रांसीसी युद्ध के समय).

– इस्लाम मुसलमानों और नास्तिकों के बीच एक सतत शत्रुता की स्थिति पैदा कर रहा है.

– इन मज़दूरों से भी बड़ा संपूर्ण गधा तो कोई हो नहीं सकता (उन लोगों के बारे में जो क्रांति के

उनके सपने को साकार करना चाहते थे.)

– मैं (‘दास कपिटाल’ के) इस खंड को और लंबा खींच रहा हूं, क्योंकि जर्मन कुत्ते किताबों की क़ीमत घनफल (वॉल्यूम) में आंकते हैं.

– मैंने अपनी बातें स्वाभाविक है कि इस प्रकार रखी हैं कि उनका उलटा अर्थ लगाने पर भी मैं ही

सही साबित होऊं.

– जर्मन और स्कैंडिनेवियाई, दोनों एक ही महान नस्ल के हैं. उन्हें आपस में लड़ने के बदले जुड़ने का रास्ता अपनाना चाहिये.

– कुत्ता यदि अभी ही मर जाता है तो मैं भी अपनी बला से छुटकारा पा जाउंगा. (एक अमीर रिश्तेदार के बारे में, जिससे उन्होंने पैसा उधार लिया था)

साभार सत्याग्रह से

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