क्या–क्या लेकर आएँगे मोदीजी क्या लेकर जाएँगे ?

narendra modi

नरेंद्र मोदी गुजरात की खूंखार सास?

कुमार सच्चिदानन्द, ३० जुलाइ । भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी आगामी १ जुलाई से नेपाल की यात्रा पर आनेवाले हैं । यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री के सत्रह वर्षाें बाद नेपाल का औपचारिक भ्रमण है । इसलिए यह यात्रा महत्वपूर्ण है और दोनों देशों के लिए सम्बन्धों के सुदृढ़ीकरण का महत्वपूर्ण अवसर भी । इस यात्रा की पूर्वपीठिका के रूप में सम्पन्न हुई भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की त्रिदिवसीय यात्रा को जिस तरह सकारात्क और सफल कहकर प्रचारित किया गया उससे तो यह सम्भावना बनती है कि माननीय मोदी जी का भ्रमण भी निरर्थक नहीं जाएगा लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जो आशंकाओं की जमीन तैयार करतीं हैं । सर्वप्रथम, यहाँ की सरकार किसी भी समझौते की जिम्मेवारी लेना नहीं चाहती क्योंकि भारत और नेपाल के पूर्व में हुए कुछ द्विपक्षीय सन्धि–समझौते नेपाल की दृष्टि से विवादास्पद हैं और अब जलस्रोत तथा जलविद्युत सम्बन्धी कोई भी समझौता कर सरकार विवाद में आना नहीं चाहती, इसलिए वह अन्य दलों के साथ सहमति की बात करती है ।

मीडिया का अधिकांश प्रतिशत भारत विरोध—  दूसरी जमीनी सच्चाई यह है कि यहाँ की मीडिया का अधिकांश प्रतिशत भारत विरोध की भावना से भरा हुआ है । भारतीय विदेशमंत्री की यात्रा के साथ–साथ ही अद्र्धसत्य या मिथ्या को आधार बनाकर ये अपने पृष्ठ भरने का काम कर रही है । दूसरा यथार्थ यह है कि नेपाल की राजनीति में संयुक्त रूप से वामपंथियों का प्रभाव अधिक है । सामान्यतया जनस्तर पर इन वामपंथियों को राष्ट्रवादी माना जाता है और राष्ट्रवाद नेपाल में भारत विरोध का पर्याय माना जाता है । यही कारण है कि इन वामपंथियों का भारत के प्रति नजरिया सत्ता के समीकरण के साथ बनते–बिगड़ते रहते हैं । आज भी संसद के भीतर और  बाहर अनेक वामपंथी दल हैं जो भारत के साथ रिश्तों को लेकर गंभीर नहीं हैं और कुछ तो विरोध की आवाज भी बुलंद कर रहे हैं ।

‘हम तो डूबे ही सनम तुमको भी ले डूबे —  यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि पूरे दक्षिण एशिया में जनस्तर पर नेपाल में भारत का विरोध सर्वाधिक गहरे रूप में होता है । यह सच है कि उसका पारम्परिक शत्रु पाकिस्तान है,  लेकिन युद्ध के दिनों की बात छोड़ दें तो आम रूप मे यह विरोध अतिवादियों के द्वारा ही होता है । नेपाल भारत का मित्रराष्ट्र है और दोनों के बीच कभी युद्ध की स्थिति भी नहीं आई, इसके बावजूद आज भी सड़कों पर भारत का विरोध करते लोग देखे जा सकते हैं । आज सामाजिक संजाल में भी इस यात्रा के सम्बन्ध में चर्चे गर्म है और जलस्रोत तथा जलविद्युत सम्बन्धी किसी भी समझौते को अंजाम न देने के लिए कुतर्कों का अम्बार खड़ा किया जा रहा है, जबकि भारत की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह समझौता ही है जिससे दोनों ही देशों के लाभ होना निश्चित है । लेकिन मनोविज्ञान यह है कि ‘हम तो डूबे ही सनम तुमको भी ले डूबे ।’  यह सच है कि भारत के समर्थकों की भी यहाँ एक जमात है जो दक्षिणी तराई में निवास करती है मगर वह सत्ता और पहुँच से दूर है और जो तथाकथित राष्ट्रवादी हैं, वे राजनीति से लेकर खेलों तक में भारत का विरोध करते हैं चाहे भारत की प्रतिद्वन्द्विता कर रहे दुनिया का कोई भी देश क्यों न हो, वे उनके पक्ष में होने का स्वांग भरते हैं । गलत सही बातों को आधार बनाकर कई बार भारत के विरोध में आन्दोलन और राजनीतिक बयानबाजी भी हुई है और इस पंक में यहाँ के अधिकांश शीर्षस्थ नेता पंकिल हैं । यही कारण है कि जिन विकास परियोजनाओं को केन्द्र में रखकर मोदी की वत्र्तमान यात्रा है, उसको नेपथ्य में रखकर पूर्व में किए गए सभी सन्धि समझौतों के पुनरावलोकन की बात पहले की जाती है । नेपाल को क्या–क्या चाहिए, इसकी रूपरेखा तो स्पष्ट है मगर आगामी यात्रा में मोदीजी को क्या–क्या मिलेगा, इस पर सहमति होना बाकी है । ‘आगे–आगे देखिए होता है क्या ?’ …और कुछ नहीं तो पशुपति दर्शन का पुण्य बटोरकर वे जाएँगे ही ।

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