क्या घुँघट के कारण ही मधेशी महिला न्यायलय से बंचित है ? मोहन कुमार कर्ण

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मोहन कुमार कर्ण, विराटनगर ,२१ नवम्बर | ह्में खेद है,
नेपाल के सर्वोच्च अदालत के पधान न्यायाधीश जैसे गरिमामय पद पर जब सम्माननिय सुशीला कार्की जी ने पदभार संभाला तो नेपाल के सभी महिलाओँ को एक सुखद अनुभूति हुई थी | क्योंकि वे नेपाल के एक कर्मठ, ईमान्दार महिला प्रधान न्यायााधीश बनी हैं । इनके नेतृत्व मे न्यायपालिका मे स्ववच्छता, निष्पक्षता, भ्रष्टाचार उन्मुलन द्रुत, प्रभाावकारी तथा न्याय प्रणाली गतिमान होगी ऐसा विश्वास लिया गया था । संविधान और कानुन से निर्दिष्ट संविधान अन्तर्गत होनेवाले पारदर्शी और समावेशी नियुक्ती से न्यायपाालिका के प्रति जनविस्वास मे अभिवृद्धि होगी ऐसा विस्वास भी किया गया था । नेपालके न्यायपालिका दवारा वनाए गए तिसरी पंचवर्षिय याोजना मे भी न्यायपालिका के प्रति जनविस्वास अभिवृद्धि करने की बात कही गई है । इसी पंचवर्षीय योजना मे न्यायपालिका में होनेवाले न्यायाधीश नियुक्ति को प्रतिनिधिमुलक और समावेशी वनाने के लिए न्याय परिषाद से समन्वय करके नीति वनाने की बात भी हुई थी ।
इसी सन्दर्भ मे नेपाली समाचार जगत में पिछले दिनो छपी इनकी अभिव्यक्ति अगर सच है तो ऐसी अभिव्यक्ति नेपाल मे रहनेवाले कुछ खास समुदाय के महिलाओं के लिए अपमानवोध करानेवाली अनुभूति हो सकती है | साथही ऐसी अभिव्यक्ति अदालत के प्रति वितृष्णा जगानेवाली भी हो सकती है यह मेरा मानना है । महिलाओं को घुँघट मे रखके अदालत मे समानुपाातिक समावेशी की माँग नहीं करनी चाहिए जैसी प्रधान न्यायाधीश की अभिव्यक्ति निश्चित ही मधेसी और मुस्लीम महिलाओं के लिए खेदजनक है | और ईससे आम मधेसी और मुस्लीम महिलाओ का अपमान हुआ है यह मेरा मानना है । हाँ मै सहमत हुँ आपके ईस वात से कि अदालत के न्यायाधीश पद को मंत्री पद से तुलना नही की जानी चाहिए और अदालत मे सक्षम व्यक्ति की नियुक्ति ही न्यायाधीश के लिए अनिवार्य होना चाहिए ।

पर आज ईक्कीसवीं सदी मे भी कुछ प्रथा, कुप्रथा या संस्कार, कुसंस्कार के कारण कोई खास समुदाय के सम्पुर्ण महिला असक्षम है ऐसा निष्कर्ष निकालना तर्कसम्मत नहीं होगा । समावेशी सिद्धान्त के तहत नियुक्ती की जानेवाली सम्पुर्ण व्यक्ति या महिलाये असक्षम है कहना केवल दुराग्रह ही होगा । प्रधान न्यायाधीश की अभिव्यक्ति राजनितिक नेता जैसे होना और भी घातक है ।

इसी सन्दर्भ मे अधिवक्ता दिपेन्द्र झा ने न्याय परिषद मे कुछ ही दिन पहले एक ध्यानाकर्षण पत्र दर्ज करवाएँ है जिसमे नेपाल की संविधान के धारा ३८ (४), ४०(१)(७) और धारा ४२ (१) अन्तर्गत राज्यके सम्पुर्ण निकाय मे समानुपातिक सिद्धान्त के आधारपर सहभागीता सुनिश्चित करने की माँग की गई है । न्याय परिषद ऐन २०७३ के दफा ५, और न्याय सेवा आयोग ऐन २०७३ के दफा १०(२) मे न्यायाधीश नियुक्ति तथा न्यायपालिका के काम कारवाइ को समानुपातिक समावेशी ढंग से करने के लिए निर्दिष्ट किया गया है । संविधान अ‍ौर कानून अन्तर्गत न्यायधिश नियुक्ति कीे माँग करने से संविधान और कानुन कार्यान्वयन के लिए सहयोग होगा ईसलिए इसको अन्यथा अर्थ लागाना उचित नही है । ध्यानाकर्षण पत्र दर्ता करने के कुछ ही दिन वाद ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक नही है ।
स्मरण रहे ईन्ही समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त को अंगीकार कराने हेतु विगत के वर्षो मे अनेकानेक आन्दोल हुये है और उसके बुरे परिणाम ईस देश ने झेला है । संविधान पहले कार्यान्वयन या संशोधन जैसी उहापोह से गुजर रही है | इसलिए वर्तमान हालात मे न्यायपालिका सक्षम, सुदृढ और जनविश्वास पर आधारित वनाने के लिए इसके कर्ताओं को न्यायसम्पादन मात्र नही अपितु अपनी वोली, व्यवहार और कार्यशैली मे भी न्यायीक संयमता अपनाने की उतनी ही जरुरत है ।
अगर घुँघट ही कोई खास समुदाय के महिलाओं को न्यायपालिका मे ना पहुँचने का कारण है तो नेपाल के आदीवासी जनजाति और दलित महिलाओ की भी अदालतमे उपस्थिति कम क्यों है ? क्या हमे यह प्रश्न नहीं करना चाहिए ? और फिर आज तराई के मुस्लीम, मधेसी महिलाा आज सिर्फ घुँघट मे ही कहाँ छुपे हैँ ? संस्कारगत, परम्परागत, संरचनागत विभेद, हिंसा और भी कई विभीषिकाओ को चिरती हुई शिक्षा, रोजगारी, राजनिति अ‍ौर सामाजीक अभियान हर क्षेत्र मे अग्रसर होने की कोशिश कर ही रही है ये महिलाए भी । ईन प्रयासो को सराहते हुये इन्हे उत्प्रेरित करने की जरुरत है ना की निरुत्साहित करने की । राज्यके अँग को तो स्वतः और भी ज्यादा जिम्मेवार होने की जरुरत है ।
हाँ सदियो से जकडा हुआ संरचना मे एकाएक समानुपातिक समावेशीता संभव नही भी हो सकता है । शिक्षा, चेतना, पहुँच, राज्यके निति और हरेक क्षेत्र मे समयानुकुल परिवर्तन आवश्यक है ईसके लिए । पर ऐसे नितियो को क्रियाान्वयन करने के लिए राज्य के अंगोका ईसपर प्रतिवद्धता और जवाफदेहिता दिखना जरुरी है । आजके लोकल्याणकारी राज्यमे कोई समुदाय पिछडा होने के कारण इन समुदाय के लोगो को राज्य के निकाय मे वंचित करने के वजाय राज्य को चाहिए कि ऐसे पिछडे हुवे वर्ग, लिंग समुदाय वा जाति क्षेत्र के लोग को राज्य के मुल प्रवाह मे लाने के लिए विशेष व्यवस्था लागु करे । नेपाल मे भी दलित, मुस्लीम, आदीवासी जनजाति, मधेसी, महिला लगायत अन्य उत्पिडीत, उपेक्षित जाति क्षेत्र के वासिन्दा को राज्य के निकायो मे पहुँच वढाने के उद्देश्य के साथ किया गया है ।
प्रधान न्यायाधीश जैसे गरिमामय पद पर विराजमान व्यक्ति की सार्वजनिक अभिव्यक्ति से जनमानस मे बड़ा असर होता है । प्रधान न्याायाधीश के उक्त अभिव्यक्ति सिर्फ एक आक्रोश था या मिडिया वालो ने तोडमरोड कर दिया है, मुझे मालुम नही पर ईससे सकारात्म सन्देश का संप्रेषण नही हुआ है । ये कहते हुये मैने अदालत के प्रति जनविस्वास अभिवृद्धि के लिए ही ये सारी भावनाए प्रकट किया है । आगामी दिनो मे आपके पहल से नेपाल मे रहनेवाले हरेक नागरिक के आस्थाका केन्द्र अदालत वन सके यही आशा व्यक्त करता हुँ ।

क्या घुँघट के कारण ही मधेशी महिला न्यायलय से बंचित है ? मोहन कुमार कर्ण

 

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