क्या डा. राउत के शान्तिपूर्ण आन्दोलन का औचित्य समाप्त हो गया है ? ई. दीपक कुमार साह

ई. दीपक कुमार साह, लेखक मधेशी अधिकारकर्मी है।

ई. दीपक कुमार साह, लेखक मधेशी अधिकारकर्मी है।

ई. दीपक कुमार साह, काठमाण्डौ २८ मार्च २०१७|  मधेश बलिदानी दिवस अर्थात माघ ५ गते लहान में करिब एक लाख जनता को सम्बोधन कर जनकपुर स्थित किराये के घर में  लौटने से ही डा. सिके राउत गिरफ्तार होने का हल्ला फैल चुका था । जनकपुर में किराये के घर में वे एक बर्ष से रह रहे थे किन्तु नयाँ किराये के घर मे गए हुए महिना भी नही हुआ था। प्रहरी दवाब के कारण पुराने मकान मालिक ने आचानक घर खाली करने के लिए मजबूर कर दिया था। कहीं भी किराया घर ना मिल्ने पर  जनकपुर- ४  मछली बजार नजदीक कई दिनों से खाली पड़े घर मे रहने को गए थें। पहला घर ढुंडने मे भी काफी परेशानी हुई थी। राजबिराज मे माता-पिता के साथ रहने पर पुलिश किसी भी वक्त वृद्ध माता-पिता को सताया जाना, मध्यरात को भी केरकार कर धमकी दिया जाता  था । वहाँपर रहने वाले छोटे-छोटे भान्जे–भान्जीयों को भी बारम्बार डराने का काम पुलिश द्वारा किए जाने से राजबिराज छोड्ने का निर्णय डा.राउत को करना पडा था माता-पिता की सेवा कोई खास नही कर सके, वृद्धावस्था मे भी पुलिस द्वारा बारम्बार दुःख दिए जाना राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग को समेत बारम्बार ध्यानाकर्षण कराने पर भी कुछ ना होनेपर राजबिराज छोडकर जनकपुरधाम जाने पर बिवस हुए थें ।

वे काठमाण्डौ नही गए, पहाडी के कब्जे में लगभग हो चुके नजदीक के बिराटनगर जाना उन्हें उचित नही लगा, इसलिय जनकपुर ही चुने थें। जनकपुर जैसे तीर्थस्थल चुन्ने की अध्यात्मिक समवन्ध भी था, उधर ही आश्रम स्थापना करके कालान्तर मे अपना अध्ययन, ध्यान और धार्मिक– अध्यात्मिक प्रवचन के आयाम को विस्तार करना । डा.राउत ने अपनी संसारिक अशक्ति के विषय मे ३-४ वर्ष पहले ही सार्वजनिक कर चुके थें । जनकपुरधाम और लुम्बिनी मे आश्रम स्थापना करने सम्वन्ध मे । परन्तु जनकपुर मे ६ महिना लगातार किराये का घर खोजने से भी न मिल्ने पर अन्त मे पिछले फागुन को फेसबुक पेज मे भी विज्ञापन देना पडा था । उतना करने से भी ना होनेपर खुद ही जनकपुर पहुँच क्षदमभेष मे कुछ दिन डेरा तलाश कर अन्त मे एक कमरे रहे एक फ्लायट मे बसे हुए थे । एक ही कमरे होने पर सपरिवार रखने से डा.राउत की पढाई–लेखाई का क्रम ही ठप्प हो गया था, लेकिन उससे भी ज्यादा दिक्कत अतिथ्य सत्कार मे होता था । कोई मिलने को आने पर कभी सिढ़ी के निचे कोना मे तो कभी बाहर धूंप की गर्मी मे मिलने को बाध्य होते थे। जनकपुर के रामानन्द चौक मे भक्तजन को पानी पिला रहे स्वराजीयों की पानी के बर्तन फैंकते हुए गालि गलौंच करते हुए प्रहरी उपरीक्षक सहित की टोली ने धरपकड़ किया था । मंसिर २१ गते विवाह पञ्चमी के मेला ने छोडकर गए कचरा को स्वराजीयों द्वारा सफा करने जाने पर धरपकड़ कर सार्वजनिक मुद्दा लगाए जाने का दृश्य सहित का समाचार स्थानीय टेलिभिजनों से प्रसारण किए जाने से मकान मालिक का घर प्रहरी द्वारा बारम्बार घेरे जाने पर डरकर मकान मालिक ने शीघ्र अति शीघ्र  घर खाली करने के लिए कहा।

दो बर्षीय बेटी और अभी-अभी ही स्कूल जाने लगे ६ वर्ष के बेटे सहित परिवार को लेकर किधर जाऊ कहकर वो सोच ही ना पाऐ । अन्तत: वो वहीं जनकपुर के मछली बजार स्थित किराये घर मे रहने गए । माघ २० गते छत मे बच्चें साथ ही बैठे थे, अगले दिन सरस्वती पूजा के अवसर पर बच्चों के साथ उसके स्कूल नही जा पाना वा उससे पहले भी अभिभावक दिवस हो या अन्य निमन्त्राणों मे नही जा सक्ने की अपनी आत्मग़लानी को धो रहे थें । जाए भी कैसे ? किसी की  शादी मे गया तो वही प्रहरी छापामार शैली मे आकर विवाह ही भंग करने का डर। कूछ दिन पहले एक गाउँ के दोस्त ने जनकपुर मे बनाने लगे घर देख्ने जानेपर वही पुलिस पहुँचकर ऊनलोगो को ही दिक्कत देते हुए हप्तौ दिनतक परेशान किया । कभी कहि भोजभात खाने गए उसके घरमे अनुसन्धान और पुलिस की कारवाही । यहाँ तो बेटे के स्कूल मे मैं पहुँचा तो वहाँ भी प्रहरी आंतक पहुँचा तो, बेटा ही स्कूल से निकाले जानेका डर । इसलिय दुर ही रहते है डा.राउत । पर ग्लानी महसुस नही करते। इसलिय कुछ समय बेटे-बेटीयों के साथ बिताने की कोशीस करते है । क्यूँकि दो बर्ष पहले अर्थात २०७१ साल मे गिरफतारी होनेपर और उसके बाद भी बारम्बार गिरफतार होते रहने पर बेटे-बेटीयों से प्रायः दुर रहने को मजबुर हुए । बेटा तो ५ वर्ष तक स्कूल का मूँह भी नही देख पाया । उस दिन भी वो बच्चा-बुच्ची के साथ कुछ पल बिता रहे थे ।

अचानक नीचे से एक दोस्त ने फोन किया ‘पुलिस चारौं ओर  से घर घेर रही है, बहुत सारे पुलीस वाले है ।’ फिलहाल कईवार गिरफतार होने के कारण कूछ अजीब नही लगा, क्यूँकि अभीतक कार्यक्रम से वा रास्तों से गिरफतारी हुआ करता था, घर से नही । वैसे भी घर बाहर ५-७ सिविल ड्रेश वाले पुलीस पहरा देती है । घर से निकलने पर हमेशा ही एक हुल पुलिश पिछा करने के कारण प्राय: माहिने मे एक या दो-वार ही घरसे बहार निकलने वाले डा.राउत लगभग नजरबन्द की स्थिति में रहते थे। दुसरी बात, किसी मुकद्मा मे डा.राउत का नाम पडने के अनौपचारिक स्रोत से मालुम होते ही स्वयं अदालत पहुँकर हाजीर हो रहे थें । ताकि कारवाही प्रक्रिया जल्द आगे बढ सके, कभी भी अदालत को जाहिरी पूर्जी समेत जारी नहीं करना पडा । अभी ऐसा क्या हुआ की, ३ दर्जन से अधिक पुलिस मिलकर घर ही घेरने को जरूरी पड़ा ? डा.राउत को खबर कर देते हो जाता, वो स्वयं जिल्ला प्रहरी कार्यालय या अदालत पहूँच जाते । ऐसी बातें मन मे आने पर भी डा.राउत ने फोन मे उतर दिया ‘पक्राउ पुर्जी है क्या जरा पुछिये’ ईतना कहकर फोन क्या काटा एक मिनेट भी शायद नही बिता होगा उतने मे ही २ ग्रील का ताला तोडकर बन्दुक हाथ मे लेकर जूता फटफटाते दर्जन से ज्यादा पुलीसकर्मी डा.राउत के अगाडी खड़ा हो चुका था । लगता था कमाण्डो की कोई छापामार ओपरेशन है । डा.राउतने पुछा,‘पक्राऊ पूर्जी है ना ? । एकने दिखाया राज्य विरुद्ध कि संगठित अपराध मे अनुसन्धान । ‘मुझे कपडे लगाने दिजिए, १-२ ही बेडरुम तक चलिए डा.राउत ने कहा ऐसे ही चलिए कहकर बहस करनेपर भी डा.राउत द्वारा जिद करने पर कपडा पहने देने को प्रहरी राजी हुए। लेकिन १/२ नही दर्जनौ ने डा.राउत को घेरकर अंदर ले गया । उस भिड़-भाड़ मे बच्चों को भूल चुके थें । वो सीढी मे ‘स्टाच्यू’ हो चुके थें । बेटी तो छत मे ही छुप चुकी थी । कपडा पहनकर आने तक वैसा का वैसा ही था । ‘मम्मी को परेशान मत करना बेटा कहते रहने पर बेटे ने पलके भी नही झपकी । प्रहरी घेरा से डा.राउत उनको छु भी ना पाए । निचे उतरकर गेट बाहर निकलने पर सच मे ही पुलिस के  ३ गाड़ी थे, दर्जनौ दर्जन पुलिस द्वारा घेरा डाला गया है, डराए हुए लोग दुरदुर ही खडा होकर मुकदर्शक बना हुआ था । एक आदमी मोबाइल लेकर खडा रहे डा.राउत ने देखा । कम समय मे दो चार शव्द कहकर पुलिस गाड़ी में जाकर बैठ गये। किधर ले जाएगा पता नही था।

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जिल्ला प्रहरी कार्यालय धनुषा में ले जाकर गाड़ी को  भितर ही एक घण्टा रखा । बाद मे मालुम हुए अनुसार उसी अवधि मे पुलीसवाले फिरसे डा.राउत के डेरा मे पहुँचकर पत्नी और बच्चों के साथ दुव्र्यबाहर कर छापामारी, तोडफोड कर बच्चों को आंतकित करके कुछ सामान बरामद कर लाया है । जिप्रका धनुषा ढल्केबर मे लाकर ४ घण्टे तक पुलिस गाड़ी में ही रखा। कहाँ लेजाना है कूछ खबर नही दिया । राज्य विरुद्ध अपराध मे काठमाण्डौ तो लेजाना है ना कहते डा.राउत ने अडकल करते करते अन्ततः रातको ११:०० बजे के आसपास लहान इलाका प्रहरी कार्यालय मे लाकर रखा। लहान मे हालही हजारौ जनता ‘फ्री मधेश’के समर्थन मे उतरे थे । २०६३ साल मे उपेन्द्र यादव को गिरफतार किए जाने से आधा दर्जन गाडी मे आग लगाकर मधेश आंदोलन उठा हुआ जगह । डा.राउत ने तुरुन्त मेसेज देना चाहा ‘नो रिएकसन, कीप क्वाइट, मेन्टेन पीस।’ अफसोस डा.राउत को वकील और परिवार के साथ बिति दिनतक सम्पर्क करने नही दिया गया । सुबह शुक्रबार जिल्ला अदालत ले जाकर १० दिन का म्याद पकडाया। वहाँ पता चला, संगठित अपराध निवारण ऐन अन्तर्गत ये म्याद दिया गया है । डा.राउत काठमाण्डौ ले जाएगा कि सोचके मानकर बैठे थे। वहाँ लौटते वक्त रास्ते में डीएसपी ने लहान मे हो रहे प्रदर्शन बारेमे जानकारी कराया था। शान्त करवा दिजिए कहा । डा.राउत ने फोन मै एक समर्थक को कूछ ना करने को और यही मेसेज और जिल्ला मे भी ‘रिले’ करने को आग्रह किया । तवतक लहान भारदह, जनकपुर, जलेश्वर, रौतहट, बिराटनगर, रुपन्देही, कैलाली लगायत के जगहों मे प्रदर्शन हो चुका था । प्रहरी का दमन और गिरफतारी भी हो चुका था । सिर्फ लहान मे २१ लोग गिरफ्तार हुआ था, लाठी चार्जसे दर्जन से ज्यादा घायल हो चुका था । दी गई मेसेज एकवार ‘रिले’ होजाने के बाद प्रर्दशन रोका गया था ।

 

दिएगए १० दिन के म्याद भितर प्रहरी ने कोई ब्यान नही लिया, फगुन १ गते अदालत मे पेश कर फिर से १० दिन को म्याद दे दिया गया । थुना मे राखना म्याद देना, संगठित अपराध निवारण ऐन २०७० के दफा १४ अनुसार ना तो अदालत ने अनुसन्धान का प्रगति देखना पडा ,ना तो सरकारी वकील ने कोई बहस किया । ना तो अदालत ने वो ऐन उचित होगा कि नही जरुरी सम्झा । ना तो हम प्रतिवादी तर्फ से बहस करनेवाले एक दर्जन वकीलों की बसह ही वहाँ सुना । उस ऐनके दफा ३ (३ क) अनुसार आकर्षित होने पहला क्रियाकलाप ‘३ बर्ष से ज्यादा सजाय होना’ ‘अपराध’ साबित होना पडा की तो परिच्छेद (३ बमोजिम न्यायिक कारवाही मे अबरोध वा विध्वांसात्मक कार्य या अपराधिक लाभ (एलसर्टसन) लिया हुआ होनापडा । वो तो कही भी नही है । माघ ५ गते लहान मे सभा को सम्बोधन कर प्रहरी प्रतिवेदन अनुसार ‘स्वायत्त मधेश’ और ‘अलग देश’के लिए भाषण किया कहते हुए जो अपराध ऐनसे आकर्शित करने को कोशिस है, उस विषय मे वादी नेपाल सरकार प्रतिवादी डा.सीके. राउत रहे ०७२-CR-०३१३ न. कि राज्यविपलव मुद्दा मे सर्वोच्च अदालत ने डा.राउत की गतिविधियाँ राज्यविपलव ना रहे स्पष्ट ठहर कर २०७२ माघ ३ गते फैसला कर नजीर कायम कर चुका है ।

 

स्मरणीय है उस मुद्दा मे राउत के घोषणापत्र, मधेश को सार्भौम सम्पन्न ‘स्वतन्त्र देश की जय’ के साथ ९ बुँदे माँग, मधेश का नक्शा, झण्डा, राष्ट्रगान, राउत द्वारा लिखित किताबें, राउत ने किए कार्यक्रम का और भाषणों का सभीपर बहस होकर विशेष अदालत ने पहले २०७२/१/१० में राउत के पक्ष मे फैसला किया था । (०७२–CR-०३१३) और उसी निर्णय को सर्वेच्च अदालत ने सदर किया था । ईतना होने पर भी राउत के उसी गतिविधी और भाषण को ‘राज्यविरुद्ध के अपराध’ कहना सम्मानीय सर्वोच्च अदालत का अपहेलना है और राज्य के अन्य अंग की तुलना मे आंगिक अदालत स्वयं उस मर्यादा उल्लघन करना सम्मानीत संस्था का ही अवमुल्यण है । संविधान और ऐन कानुन की सर्बोच्च व्याख्याता सम्मानिय सर्वोच्च अदालत ने ही राउत का वो गतिविधीयाँ राज्यद्रोह या राज्यविपलव नही है कहकर स्पष्ट कर देने के बाद राज्य के प्रहरी या कोई पत्रकार द्वारा राउत को राजद्रोही या राज्यविपलव का बिल्ला लगाना सम्मानित सर्वोच्च अदालत का उपहास नही तो क्या है ? और, अनुसन्धान के दुसरा म्याद समाप्त होकर तीसरे म्यादतक भी कहीसे कोई देखने आया नही है । ईतना सब होनेपर भी वो ऐन जबरजस्ती आकर्षित कराने का मुख्य प्रयोजन यातना देना ही है। ईस ऐन अनुसार हिरासत मे ६० दिनतक रख सकता है, जिल्ला अदालत के ही वर्षौ अल्झाने दफा ३५ अनुसार काल्पनिक तथा सांकेतिक नाम से ही साक्षी, सुराकी और उजुरीकर्ता का बयान या वकपत्र करवा सकने तथा हाजीर करने नापाने से झुठा विवरण बनाकर फसाने मे सहुलियत हो सकता है । ऐसा होने से ये ऐन प्रयोग कर फसाने और यातना देने मे सहुलियत होने के  कारण ही जबरजस्ती राउत उपर ये ऐन आकर्षित कराने की कोशिस किया है ।

उस ऐन के दफा ५७ अनुसार और मुद्दा मे परिणत करने का मुख्य आश्य याताना देना ही है ईतना तक कि सिरहा मे राउत के साथ रहे अन्य नौ लोग में से कुछ ईसी कारण से हिरासत भोग रहे है । क्यूँकि उनलोगों को एकबार ६ महिना पहले राउत के साथ फोन सम्पर्क हुआ था या माघ ५ गते के सभा मे वो उपस्थित थें । उधर माघ २० गते की गिरफतारी के बिरोध करने पर रौतहट से दो और रुपनदेही से ६  शुभचिन्तकों को उसी ऐन अन्तरगत ही कारवाही अगाडी बढाया गया है । हिरासत मे रहनेवाले कितना तक आतंकित और प्रताडित है की कभी मध्य-रात डीएसपी के अंगरक्षक ने ‘दो को टपका दो एक ये देशद्रोही को, तेरा ट्रान्सफर करवा दुँगा’ कहकर जाता है तो कभी देढ घण्टा तक दवाई पिने के लिए भी पानी के लिए छटपटाने पर‘अर्डर नही है, चुप रहो, पिना है तो ट्वालेट का पानी पिओ’ बोलकर जाता है । समय मे आनेपर परिवारजन को भी मिलने नही दिया जाता है । वकील और पत्रकार तो दुर की बात है । ऐसे जान मार्ने की धम्की के बारे में अदालतमै बात उठाने पर भी कोई सुनुवाई नही हुआ । विमार पडनेपर जैसेतैसे सम्हलकर रहना पड रहा है। किन्तु वाहर काठमाडौं मे राउत पर कारवाही कराने को चाहने वालो की जमात बडी है । वानेश्वर के सडक से संसद तक ।

 

राणाकाल के क्रुरता मे भी ऐसा नही हुआ । एक वर्ष की अवधि मे राउत के ४० लोग से ज्यादा समर्थक को तो राज्यविपलव का मुद्दा पहले ही दर्ता है । फाल्गुन १ गते सिरहा जिल्ला अदालत आगे गिरफतारी के विरोध करने शांतिपूर्ण प्रर्दशन में उत्रेहुए निहथा जनतापर लाठी चार्ज हुआ । जिसमे १७ आदमी सिरहा हस्पिटल मे भर्ना हुआ था । कुछ दिनो तक रामवली यादव और तेतरीदेवी महरा ईलाज क्रम मे ही रही । फाल्गुन ७ गते प्रजातन्त्र दिवस मनाया जारहा था, उसी वक्त रुपन्देही के मर्चवार मे राउत की गिरफतारी का विरोध करने का छुट किसी जनता को नही हुआ, उनलोगो पर गोली और टीयरग्यास बर्साया गया । सौ से अधिक जनता घायल हुए । घायल हुई संगीता पासी, सरस्वती देवी मलहा, शिव चरण केवट, गिता कुमारी, सुप्रभा यादव, जशुद्रा भार, रामजतन कुहार, रामकेश गुप्ता और शेषमन जी जीवन मरन के दोधार मे हस्पिटल मे था। हजारौ जनता के घर मे बन्दुक लुटेजाने के नाम मे खोज तलाश कर त्रशित बनाएजाने का अवस्था था। फिर पुलिस स्वयं बन्दुक मिल गया कहना,  प्रहरी मधेशी जनता उपर दमन करने को किस हदतक घिनौनी हरकत करती है ये बात रुपनदेही घटनासे प्रष्ट समझ सकते है । फिर भी प्रेस काउन्सिल पत्राचार करने को छोड्नेवाला नही है उनलोगो ने सीके राउत का नाम लिखा तो कारवाही होगा । फिर भी मानवआधिकार आयोग के चेहरा किसी लाज या ग्लानि वोध की रेखा नही दिखता। निहत्था, घायल, यातना भोगरहने पर भी नेपाली पत्रपत्रिकाएँ राउत विरुध अफवाह फैलाने को नही छोडेगें, एक भी मौका चुकेगा नही ।

क्या शान्तिपूर्ण मार्ग अपनाना ही राउतका अपराध है ? क्या गांधी और मंडेला को आर्दश मान्ना ही अपराध है ? शायद है ! शायद विष नहुए ‘हरहरा’ साँप होना ही अपराध है, ईसीलिए तो कभी राज्य कभी प्रहरी तो कभी मिडिया तो कभी कथित मानवअधिकारकर्मी राउत की पुँछ पकडर नचाए रखते है । प्रताडित करके रखते है। सर्बोच्च अदालतद्वारा पक्राऊ पुर्जी जारी किएगए राज्यका मन्त्री और प्रहरी प्रमुखके साथ सार्वजनिक कार्यक्रम करते चलते है, नरसंहारक बन्दुकधारी खुलमखुल्ला है। ऊनलोगो को पकडने की हिम्मत नेपाल प्रहरी मे नही लेकिन राउत जैसा एक निरीह प्राणी को घर घेरकर बारम्बार गिरफतार कर अपना झुठा मर्दानगी सावित करने को खोजा जा रहा है । करौंड़ो अर्बौं मे भ्रष्टाचार करनेवाले नेताओं की सम्पति स्रोतबारे मूँह नही खोल सकते, लेकिन जिल्ला के कार्यक्र मे जानेपर बस टेम्पुभाड़ा और रिचार्ज कार्ड का पैसा कहाँ से आया बोलते हुए पूछकर अपनी तिक्षणता दिखाते है । ‘छिद्दान्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठान्ति पादयास्’ कह के ही हो २०६३ सालमे उपेन्द्र को हिरासत मे रखने पर लहान मे आधा दर्जन गाडीयों आग मे झोंकें जैसा राउत के कार्यकर्ता गाडी मे आग नही लगा सके सायद यही कारण है लहान के ईस बिच रस्ते मे हिरासत मे आठवें सप्ताह तक  यातना भोग रहे है। क्या राउत के पास वो हैसियत नही है ? २०६३ साल मे उपेन्द्र यादव हिरासत में जानेपर उनका भाषण सुन्ने लहान में २०-२५ लोग भी जम्मा नही होते थें । राउत के पास लाखौ समर्थक होनेसे वो हैसियत नही है क्या।

 

माओवादी को तिरस्कार कर जंगल धकेल्ते वक्त कितने लोग थें और क्या हैसियत था ? और, स्मरण रहे राउत के कार्यक्रम मे अभी आए लाखौ जनता ‘निहत्था होकर पुलिस की मार खाने को तैयार, स्वेच्छिक गिरफ्तारी देने’ तैयार जनता है । वो लोग मार्ने नही, मर्ने के लिए तैयार रहनेवाले जनता है । ऊनलोगो ने कदाचित दर्शन बदला तो फिर कौन से दिनका दर्शन होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है, यदि जरा सा भी होश है तो । यद्दपी शासक मे हमेसा शक्ति का माद होता है, अपना सेना, पुलिस और बन्दुक का नशा होता है, अपने को अविनाशी मान्ने का अहंकार होता है। परन्तु बहौत सिकन्दर नेपोलियन और हिटलर पैदा होकर मरके गए, जनता हमेसा ही जितती है। यदि शासक की शक्तिसे देखना है तो राजा ज्ञानेन्द्र सौ लोग भी नही मार सके क्यूँ पुरखौली गद्दी छोडना पडता ? यदि शासक की शक्ति से ही हो सकता है तो बितीवर्ष नाकावंदी जैसी विकराल घटना होनेपर भी सिर्फ ६० गुलाम मधेशी को ही मारकर नेपाली शासक को क्यूँ रुकना पडता, हजार-दश हजार लाखौं को भूँज देते ना । राउत चाहते है नेपाली खुसहाल जीवन जिए और मधेशीयों को भी जीने दे । इसलिए तो राउत ने ‘फर्ष्ट क्वाडरेन्टके’ को ‘वीन वीन’को चुनने के लिए ही शान्तिपुर्ण मार्ग अनुसरण किया है ।

लेकिन जरा सोचिए, एक विल्ली अपनी छोटी-छोटी दो बच्चों के साथ रह रही है, आपको बगैर कोई वाधा अवरोध उत्पन्न कर । लेकिन उसको आप भितेमे खदेडकर, लाठी से मारकर, टाँग तोड के सडक मे पहुँ चा देते है । वहाँ भी उसने एक तरफ के अँधेरी कोना में ओट लगकर अपने बच्चो को आपकी पत्थर और लाठी प्रहारसे बचाने की कोशिश करती है । फिर भी आप रुकते नही है । अपने बच्चो को जैसे तैसे रक्षा कररही वह निरीह बिल्ली को घेरा डालकर, हवालात मे बन्दकर, अपने बन्दुक की कुन्दा से उसके बच्चो को माररहे हो तो आखिर वो करे क्या ? क्या डा.सी. के. राउत की शान्तिपूर्ण आन्दोलन का औचित्य समाप्त हो गया है ?

(डा. राउत के साथ पहले मेरे और हिरासत मे अनेक लोगो के साथ भेठघाट होते वक्त की गई बातचीत मे आधारित)

(लेखक मधेशी अधिकारकर्मी है।)

 

 

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