क्या देउवा की जीत से मधेश को विभेद से मुक्ति मिलेगी ? श्वेता दीप्ति

 

अभी जोर शोर से एक बात और सामने आ रही है कि मधेश के एक समर्थ नेता, विमलेन्द्र निधि की निर्णायक भूमिका रही है काँग्रेस के चुनाव में और शेरबहादुर देउवा की जीत में भी । अब देखना ये है कि आगामी दिनों में काँगे्रस इनके इस महत्वपूर्ण योगदान को कितना मायने देता है । क्योंकि ये वही काँग्रेस पार्टी है जो महेन्द्र निधि जैसे अपने कर्मठ नेता का नाम भी लेने से कतराता है ।

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ९ मार्च |

काँग्रेस अध्यक्ष के पद पर शेरबहादुर देउवा ने बाजी मार ली है । इन दिनों जो सरगर्मी पूरे देश में थी उससे ये किसी पार्टी के चुनाव की लड़ाई नहीं लग रही थी वरन ऐसा लग रहा था कि देश किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की राह पर बढ़ रहा है और देश को बहुत जल्द एक नया प्रधानमंत्री मिलने वाला है । मीडिया में इतनी तवज्जो तो प्रधानमंत्री ओली को भी नहीं मिली थी, जितनी शेरबहादुर देउवा को मिली है । वैसे इन्हें बधाई है इस जंग को जीतने की । माना जा रहा है कि काँग्रेस को वंशवाद से मुक्ति मिल गई है । परन्तु देउवा की जीत से देश के एक भाग को क्या विभेद से मुक्ति मिलेगी ? क्योंकि आज तक का इतिहास बताता है कि काँग्रेस ने भी मधेश की मिट्टी को सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक के लिए ही प्रयोग किया है ।

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काँग्रेस अब तक कोइराला खानदान के नाम से पहचानी जाती थी । वो कोईराला वंश जो स्वयं मधेश से ही आते हैं, परन्तु उनकी मधेश के लिए क्या देन रही यह सर्वविदित है । यहाँ तक कि सुशील कोईराला के नेतृत्व की सरकार ने मधेशी जनता को जिस तरह मौत दिया, उस पीड़ा से आज तक मधेश उबर नहीं पाया है । काँग्रेस के हिस्से में यह श्रेय अवश्य जाएगा कि उसके कार्यकाल में संविधान का निर्माण हुआ किन्तु उसके साथ ही उसके इतिहास में यह काला पन्ना भी जोड़ा जाएगा जिसमें इसी संविधान के मुद्दे पर ६० से अधिक मधेशियों की बलि राज्य ने ली है और जिनके लिए इनकी जुवान से आज तक एक शब्द नहीं निकला हैउसी आन्दोलन के दरम्यान ये वही शेरबहादुर देउवा हैं जिन्होंने कहा था कि वो मधेश को एक रोंआ भी नहीं दे सकते हैं और कैलाली में जो नृशंस हत्याएँ हुईं उसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है । ऐसे में इस नए नेतृत्व से मधेश कितनी अपेक्षा कर सकता है, यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है । काँगे्रस मधेश की सबसे बड़ी पार्टी रही है किन्तु आज जो मधेश का रोष है और उनके जो मुद्दे हैं जिनके लिए आज भी मधेश भीतर भीतर सुलग रहा है, अगर उसे काँग्रेस नजरअंदाज करता है तो यह कहने में कोई गुरेज नहीं होगा कि कल वहाँ सिर्फ काँग्रेस के झण्डे रह जाएँगे जनमत नहीं । अगर इस बात को कोई भूल रहा है तो वो है हमारे नेतागण ।

अभी जोर शोर से एक बात और सामने आ रही है कि मधेश के एक समर्थ नेता, विमलेन्द्र निधि की निर्णायक भूमिका रही है काँग्रेस के चुनाव में और शेरबहादुर देउवा की जीत में भी । अब देखना ये है कि आगामी दिनों में काँगे्रस इनके इस महत्वपूर्ण योगदान को कितना मायने देता है । क्योंकि ये वही काँग्रेस पार्टी है जो महेन्द्र निधि जैसे अपने कर्मठ नेता का नाम भी लेने से कतराता है । इतना ही नहीं संविधान निर्माण और संविधान संशोधन के समय जिस तरह विमलेन्द्र निधि की बातों को दरकिनार किया गया वह भी सामने ही है । देखना तो अब यह भी है कि मधेश का नेतृत्व कर रही सीता देवी को आने वाली राजनीति के खेल में कितना महत्व दिया जाता है । क्योंकि ये बिन्दु ऐसे हैं जो आने वाले वक्त में मधेश के लिए काँग्रेस की नीति और नीयत दोनों स्पष्ट करने वाला होगा । नए नेतृत्व के साथ कुछ नया होगा या फिर वही पुरानी सोच और वर्चस्व की राजनीति होगी । मधेश के लिए काँग्रेस क्या तय करता है यही यह बताएगा कि काँगे्रस मधेश के कितने करीब है और कितनी दूर । क्योंकि काँग्रेस अधिवेशन की समाप्ति के साथ ही अब यह कयास लगने शुरु हो गए हैं कि बहुत जल्द सत्ता में परिवर्तन होने की सम्भावना है । अवसरवादिता राजनीति और राजनीतिज्ञों का सबसे बड़ा गुण होता है । इसलिए आज जो साथ दे रहे हैं उन्हें भी यह उम्मीद तो होगी कि आगामी दिनों में होने वाली जो भी उपलब्धि होगी वह उनके लिए विशेष होगी । एक विशेष पद की आकांक्षा के साथ ही हर नेता आगे बढ़ता हुआ दिखता है । काँग्रेस अधिवेशन के साथ ही जिस सत्ता परिवर्तन की समभाना दिख रही है उसपर मधेशी मोर्चा की निगाहें भी होंगी । परन्तु उन्हें कुछ निर्णय लेने से पहले नैतिकता के आधार पर मधेश आन्दोलन को जरुर सोचना होगा क्योंकि इस बार के उठाए कदम को मधेश की जनता कभी माफ नहीं कर पाएगी यह तो जाहिर सी बात है ।

 

 

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