क्या नेतागण उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब मधेश में लाशों के ढेर लग जाएँ : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २० अगस्त |

ghaiteक्या तमाशा है, साथ हैं तो कोई महत्व नहीं और साथ छोड़ते हैं तो चुभन होती है । सद्भावना पार्टी के द्वारा उठाए कदम का उस मिट्टी ने स्वागत किया है, जहाँ से वो हैं । क्योंकि, मधेश की जनता को अभी नेतृत्व और मानसिक उर्जा की आवश्यकता है जो उनके समक्ष जाकर ही सम्भव हो सकता है । संविधान सभा में रहकर सबने देख लिया है कि उन्होंने क्या हासिल किया है ? अपनी कमजोर उपस्थिति की नगण्यता को मधेशी दल अगर अब भी नहीं समझेंगे तो कब समझेंगे ? न जाने किस ख्याली दुनिया में जी रहे हैं । तुलसी दास ने कहा है सक्षम को नहीं दोष गुसाँई अभी इसी सक्षमता के मद में सत्ता पक्ष है ऐसे में उनकी कौन सुनेगा जो अपनी ही जमीं से जुदा हैं । वक्तव्य आ रहा है कि सद्भावना का राजीनामा जल्दबाजी में किया गया, क्या नेतागण उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब मधेश में लाशों के ढेर लग जाएँ । जनता उग्र है, सत्ता वार्ता करने मूड में नहीं है और नेतागण अपनी खिचड़ी पकाने में लगे हुए हैं । ऐसे में अगर कोई सामने आता है, तो उस पर आक्षेप लगाया जा रहा है । न खुद करो, न करने दो यह कैसी राजनीति है ? नियमों की याद तभी आती है जब मधेश और मधेशी की ओर से कोई कदम उठाया जाता है ।

madhesh andolan 2072 rajiv raut

भारदह–१ के ३५ वर्षीय राजीवराउत

संसद सचिवालय कह रहा है कि सामूहिक राजीनामा का नियम नहीं है । क्या निर्दोष जनता के ऊपर गोली चलाने का नियम है ? घरों और दुकानों में घुसकर मारने का नियम है ? क्या अस्पताल परिसर में लाठी चार्ज का नियम है ? क्या बच्चों को निर्दयतापूर्वक मारने का नियम है ? क्या प्रहरी के द्वारा अपने ही उन प्रहरियों को यातना देने का नियम है, जो निर्दोष जनता पर हथियार नहीं उठाना चाहती ? क्यों खामोश हैं सरकार और मानवअधिकारवादी ? काँग्रेस उपसभापति रामचन्द्र जी कह रहे हैं कि सद्भावना का यह कदम दबाव देने के लिए उठाया गया है, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए उनको जनता ने जो जिम्मेदारी देकर भेजा है वह पूरा करना चाहिए । जनाब अगर सरकार दबाव से ही सुनती है तो वही सही क्योंकि कहते हैं राजनीति में सभी जायज है । हर ओर से १६ बुन्दे सहमति का विरोध हो रहा है पर सत्ता उसपर डटी हुई है । मधेशी मोर्चा माँग रहा है कि २०६४ में हुए गिरिजाप्रसाद और मधेशी मोर्चा के बीच हुए आठ बुन्दे के परिप्रेक्ष्य में वार्ता होनी चाहिए किन्तु सत्ता उसे मान नहीं रही । और अभी जो दृश्य है, वह यही दिखा रहा है कि चित भी मेरी और पट भी मेरी । सत्ता की निगाह मधेश की ओर नहीं है  और अगर मधेशी नेताओं ने मधेश की भावना के विपरीत कोई भी समझौता किया तो वहाँ की जनता उन्हें माफ करेगी नहीं । ऐसे में तो मधेश की जनता अपने नेताओं से यही उम्मीद करेगी कि वो उनके बीच जाएँ और उनका साथ दें । और सत्ता से आम जनता यही चाहेगी कि वो दमन की राजनीति बन्द करें । लगातार के बन्द से अस्तव्यस्त जीवन की पीड़ा को समझें और जनता को सम्बोधित करें । नेपाल सिर्फ काठमान्डौ में नहीं है बल्कि समग्र में है इसलिए समग्र की भावनाओं का सम्मान करें और तत्काल देश को विचलन की इस दारुण परिस्थितियों से निकाले ।

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