क्या नेपाल भारत का रिश्ता अविश्वास से विश्वास की ओर कदम बढाएगा ? श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | भारत अपनी स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष तीन दिनों के बाद पूरा करने वाला है । इस अवसर पर भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बिमस्टेक के लिए नेपाल आइ हुईं भारतीय विदेशमंत्री सुषमा जी को सुनने का अवसर मिला । यों तो उनकी शख्सियत और वाक्पटुता के सभी कायल हैं मैं भी हूँ । उनकी शैली और अपनी बातों को कहने का अंदाज सभी को बाँधे रखता है चाहे वो पक्ष के हों या विपक्ष के । आज के सन्दर्भ में कही गई उनकी कई बातें काफी गहन मायने रखती है, नेपाल भारत के सम्बन्ध के विषय में । नेपाल भारत के रिश्ते को अगर खंगाला जाय तो बाह्य तौर पर सबकुछ स्वाभाविक दिखते हुए भी यह एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है ।

सच है कि नेपाल भारत सम्बन्ध आज का नहीं और कब का है यह निश्चित तिथि भी कोई बता नहीं सकता । राजनीति के रिश्ते बनते और बिगड़ते रहते हैं पर जो रिश्ते संस्कृति और धर्म से सम्बद्ध होते हैं उसे तोड़ना मुश्किल होता है । यह सत्य नेपाल भारत के रिश्ते के साथ जुडा हुआ है । पर जाने अन्जाने इस रिश्ते के बीच कटुता ने जगह ले ली है । सुषमा जी ने भारत की आजादी को याद किया और साथ ही भारत के बढ़ते कदम का जिक्र भी । आपने याद दिलाया कि अँग्रेजों को यह उम्मीद थी कि अनपढ़ और गरीब भारत उनके बिना चल नहीं पाएगा और एक दिन उसकी झोली में फिर आ गिरेगा । पर भारत ने अपनी गति दिखाई और विकास का दर दिनप्रतिदिन बढता ही जा रहा है । एक गम्भीर वाक्य सुषमा जी ने कहा कि “भारत ने विकास की राह को विवादों का बन्धक नहीं बनने दिया ।” यही वजह है कि भारत निरन्तर विकास की राह पर अपने कदम बढा रहा है । भले ही ये सारी बातें भारतीय परिपेक्ष्य में है परन्तु कई मायनों में यह परिदृश्य नेपाल की राजनीति को भी लक्षित करती है । सच है कि नेपाल कभी परतंत्र नहीं रहा, पर लोकतंत्र का स्वाद इसके लिए नया ही है । इसे अक्षुण्ण रखना राजनीतिक पार्टी की जिम्मेदारी है । क्योंकि यहाँ भी एक पक्ष ऐसा है जिसे यह लगता है कि लोकतंत्र से तो राजतंत्र बेहतर था । यह सोच इसलिए जेहन में आती है क्योंकि विकासे से अधिक विवाद की नींव गहरी होती जा रही हैं ।

भारतीय संविधान कहता है कि हम एक हैं और यह सर्वमान्य है । नेपाल की जनता ने भी अपने नए संविधान को पाया है पर अफसोस कि आजतक नवनिर्मित संविधान को देश का एक वर्ग स्वीकार नहीं कर पाया है, क्योंकि उन्हें वहाँ खुद के लिए बेइमानी दिख रही है । सुषमा जी ने कहा कि आज तक भारत ने मत की महत्ता को स्थान दिया है वहाँ बुलेट से नहीं बैलेट से सरकार आती है और जाती है क्योंकि यह जनता का हक है । भले ही उन्होंने भारत के मजबूत लोकतंत्र की बात कही हो पर जब बात यहाँ की आती है तो बहुत दिन नहीं हुए हैं जब हमने देखा कि नेपाल ने बुलेट के साए में बैलेट को जगह दी । जहाँ मत प्रयोग की खुशी से अधिक त्रास का माहोल था । जहाँ आज भी एक क्षेत्र यह नहीं तय कर पा रहा कि उनके अमूल्य मत का उपयोग हो पाएगा या नहीं ? जहाँ उन्हें चुनाव से वंचित रखने की पूरी कोशिश की जा रही है ।
विचारों को रखने के क्रम में ही आपने याद दिलाया कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जी जब नेपाल आए थे तो उन्होंने नेपाल की परिवर्तित राजनीति के लिए कहा था कि नेपाल ने युद्ध से बुद्ध की ओर, और शस्त्र से शास्त्र की ओर कदम बढाया है इसमें ही एक वाक्य उन्होंने जोड़ा कि नेपाल ने अविश्वास से विश्वास की ओर अपना कदम बढाया है जो सराहनीय है । यह वाक्य उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री प्रचण्ड के द्वारा सत्ता हस्तांतरण को लक्षित कर के कहा था । उन्होंने कहा कि यह विश्वास ही था कि देउवा जी ने प्रचण्ड जी को पहले प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया और यह प्रचण्ड जी का विश्वास था कि उन्होंने अपने वादे को पूरा किया और समय पर देउवा जी को सत्ता सौंप दी जो अपने आप में एक मिसाल है । सम्भव है कि यह उक्ति कूटनीतिक पक्ष का एक हिस्सा हो पर “अविश्वास से विश्वास की राह” की जो उन्होंने बात कही, उसने मुझे यह सोचने पर विवश किया कि भारत को लेकर जो अविश्वास नेपाल की आबोहवा में घुली हुई है और जिसे वक्त वेवक्त हवा देकर राजनीति की रोटियाँ सिकती रही हैं, क्या उसमें कोई बदलाव आया है ? वर्तमान आँकड़ा कोई और संकेत कर रहा है अब देखना यह है कि आनेवाला कल क्या आइना दिखाने वाला है ? क्या नेपाल भारत का रिश्ता अविश्वास से विश्वास की ओर अपना कदम बढाएगा ??

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