क्या मधेश-आन्दोलन और मुद्दा मधेशी मोर्चा से समाधान होगा ? कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी, ९ अक्टूबर |
मधेश अभी तिराहे पर खड़ा नजर आ रहा है । जानकारी के अनुसार जैसे नेपाली तीन प्रमुख पार्टियाें के तीन बड़े नेताओ के जैसे तीन उद्देश्य रहे है, वैसे ही मधेश के तीन प्रमुख पार्टियो के तीन प्रमुख मोर्चा नेताओ के भी तीन प्रमुख उद्देश्य दिख रहे हैं । वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सि के लाल के अनुसार नेपाली पार्टियो के नेपाली काङ्ग्रेस के सुशिल कोइराला का सपना उनके प्रधानमन्त्रीत्व काल में किसी भी प्रकार का सम्विधान जारी करने का, के पी ओली का जल्द से जल्द सम्विधान का एक पुस्तक जारी के बाद प्रधानमन्त्री बनने का और प्रचण्ड को शान्ति प्रक्रिया के कार्य को पूरा कर अपने तथा अपने पार्टी के उपर लग सकने बाली आतङ्गकारी के मुद्दों से बच निकलने का अलग अलग उद्देश्य रहा था, जिनमे उनके उद्देश्य सङ्क्रमणावस्था में है । उनकी योजना उनसे शुरू होकर उनके द्वारा निर्दिष्ट बिन्दुओ तक पहुँच न पाकर बीच में जाकर दिग्भ्रमितवस्था में है । उन्होंने मधेश को जिस रूप में विश्लेसन किया था, उससे कई गुना विपरीत मधेश निकल पडा । अब मधेश उनके लिए साँप और छुछन्दर बाला मुसीबत बन गया है ।

madhesh andolan
वही हाल इधर मधेशी नेताओ का भी है । मधेशी दल भी कर्मण्यता और अकर्मण्यता दोनाें के अवस्था मे फँस चुकी है । गच्छेदार की मोर्चा हमेशा सत्ता अवसर के तलाश में लुकाछिपी में रहती है तो उपेन्द्र यादव बाला मोर्चा अपने प्राण प्रतिष्ठा की रक्षा मे दिन रात हैरान नजर आ रही है, जबकी जे पी और मातृका मोर्चा बदले के भावना से प्रेरित होकर जे पी जी उनके पुराने सहकर्मी काङ्ग्रेस (एमाले तथा मधेशी सहकर्मी नेता भाइजनो से बदला लेने के धुन मे है, क्यूकि इन्ही दोनो वर्ग और समुदायो के नेताओ ने उन्हें उनको विशेष अदालतद्वारा सफाई दिए जाने के बाद भी उनके मन्त्री रह्ते हुए भ्रष्टाचार के मुद्दा मे जेल भेजा गया । वैसे ही मातृका यादव जिन्होने विश्वास का हर पोटली प्रचण्ड के झोली मे डालने के बाद भी प्रचण्ड ने उनके मधेश मुद्दा, भावना और भरोसे को भी धोखा दिया, मधेश को अपनी जमीन्दारी तथा वोट बैन्क ही समझा जो मातृका यादव को अन्दर से आन्दोलित कर दिया और आज वे प्रचण्डद्वारा उब्जाकर छोडे गए मधेश मुद्दो को स्थापित कर प्रचण्ड को चुनौती देना चाह रहे हैं ।

मधेश को कोई नेपाली सरकार मे जाकर भविष्य निर्माण करना चाहता है, कोई सङ्घियता सहित के मधेश प्रदेश को स्थापित होने मे मधेशियो का भविष्य सुनहरा देख रहा है तो कोई अपना बदला और अभिमान को पूरे होने को ही मधेशियो का सारा अधिकार सुनिश्चित होना मानते है ।

तो सवाल अब यह उठता है कि क्या मधेशियो का आन्दोलन और मुद्दा इन तीन मधेशी मोर्चो से समाधान होगा या नही ? बहुत सारे विश्लेसको का मानना है कि मधेशी जनता अब किसी के झांसे मे आने वाली नही है । मुझे भी लगा था कि बात सही है, मगर आन्दोलन का रफ्तार ज्यू ज्यू पकडता गया परम्परागत नेताओ से दूर ही रहकर मुिक्त के आन्दोलन मे पिले हुए मधेशी जनता भी उन्ही कमिशनखोर नेताओ के इर्द गिर्द हो गए । हमे भी लगा था कि मधेश के इस विशाल आन्दोलन से नए पुस्ते के लोग नेता बनकर उभरेंगे पर वैसा दिख नही पाया ।

पूर्ण आजादी के लिए उठे मधेश आन्दोलन रास्ते से अलग होते सङ्केत को देखते ही स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन ने शान्तिपूर्ण आन्दोलन मे राज्य का तानाशाही दमन को मध्य नजर करते हुए इसी आन्दोलन को नेपाली उपनिवेश के अन्तिम दमन करार देते हुए स्वतन्त्र मधेश देश के लिए सड़क से ही आवाज आए और अगर स्वन्त्र मधेश गठबन्धन की भी सहभागिता की आवश्यकता महशुश होने पर गठबन्धन समेत मधेशी जनता के साथ आने के उद्देश्य के साथ हरेक मधेशी केन्द्रिय तथा जिला पार्टी कार्यालय एवम शीर्ष नेताओ को गठबन्धन ने लिखित रूप से स्वन्तन्त्र मधेश के नारा को उजागर करने के लिए आह्वान किया था । मगर नेताओ के अहङ्कार और मधेशी जनता के भोलेपन तथा राजनीतिक अदूरर्द्र्शिता के कारण गठबन्धन का वह आह्वान सिर्फ कागजी आह्वान ही बनकर रह गया । मधेशी नेताओ ने यह बात मधेशियो को पढा दिया कि प्रान्त लेने मे जब इतनी परेशानी है तो स्वन्त्र देश लेने मे अभी काफी कठिनाई होगी । बहुत लोग मारे जाएँगे । पहले प्रान्त ले ले, फिर देश लेंगे कहने लगे और लोग भी सम्भवतः उन्हीं की बातों को मानकर उनके बातो मे आने का काम शुरू कर दिया, जो बेहद निरर्थक कदम रहा है ।

नेताओ के अनुसार ही अगर मधेश प्रान्त के लिए शान्तिपूर्ण आन्दोलन मे क्षति कम ही होना चाहिए था तो सरकारी तथ्यान्क के अनुसार ही ५० सों की शहादत क्यू हुई ? भैरहावा, बेथरी, नवलपरासी, कपिलवस्तु, बान्के, दाङ्ग, बर्दिया, टीकापुर, बिरगन्ज, कलैया, रौतहट, जलेश्वर, जनकपुर, सिरहा आदि में मधेशियो पर क्रुरतापूर्वक गोलिया क्यू चलायी गयी ? जनकपुर मे वेवारिसे कहे जाने वाले लोगो का दर्जनो मधेशियो का शव कहाँ से आया ? उनके परिवार वाले को जानकारी क्यूँ नही दी गयी ? सारे के सारे लाश मधेशियो का ही क्यूँ ? इससे जाहिर होता है कि सैकड़ो मधेशियो की हत्या राज्य ने की है और इसी बात को मुद्दा बनाकर मधेश को आजाद होने का बहुत मजबूत आधार बन जाता है ।

मधेशी नेताओ को ही माने तो प्रदेश के बाद आजाद मधेश देश बनाना क्या सम्भव है, जब नेपालियो का थप जमा घट मधेश मे कायम हो जाए ? क्या मधेश प्रान्त पहाड़ियो की बसाई सराई रोकने की गारेन्टी करती है ? क्या पुलिस प्रशासन तथा सेना आदि मे मधेशियो का समानुपातिक प्रतिनिधित्व की गारेन्टी करती है ? क्या मधेश के जल जमीन और जङ्गल पर मधेशियो का प्राथमिक अधिकार तथा भोगचलन कायम होगा ? कोई गारेन्टी नही हो सकता । और जब नही हो सकता तो फिर यह प्रान्त का नाटक क्यूँ ? क्यू नही इसी मधेश आन्दोलन को आजाद मधेश देश का आन्दोलन बनाए ?

याद रहे, मधेशी नेता अपने वादो से मुकरते नजर आ रहे है । कल तक उन्होंने मधेश प्रान्त नही मिलने तक काठमान्डू नही जाने का, मधेश का वार्ता मधेश मे ही करने का, मधेश का एक इन्च भी जमीन नही छोड़ने का, २२ बून्दे और ८ बून्दे सहमतियो को ही वार्ता का आधार बनाने का, काठमाण्डू से रिस्ता तोडने का, आदी दावा कर रहे थे, और आज वे अपने दावो को लात मारकर उन्हीं नेपालियो के साथ दोस्ती करने, राजनीती करने, सत्ता मे भागीदारी लेने तथा उनके ही नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए मधेशियो को उल्लू बनाने के काम को छोड़ दें और स्वन्त्र मधेश के आन्दोलन को आगे बढाए । क्यूँकी नेपाली राज्य भी न तो मधेश को कुछ देने जा रहा है, न नेताओ को मधेश कोई इज्जत के काबिल छोड़ने जा रहा है । अगर मधेशी नेता समय पर सचेत नही होते है तो यह मधेश और मधेशी दोनो के लिए अभिशाप ही साबित होने बाला है ।

 

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