क्या लोकतंत्र खतरे में है ? डॉ. श्वेता दीप्ति

 बन्दूक और बारुद के भय को तो नेपाल की जनता ने बहुत सालों तक झेला है और उस दर्द को अभी तक वो नहीं भूले होंगे जिन्होंने अपनों को खोया और जिनकी लाश तक को वो प्राप्त नहीं कर पाए ।

डॉ. श्वेता दीप्ति, काठमांडू | नेपाल नई–नई लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजर रहा है । या यूँ कहें कि लोकतंत्र अभी अपने बाल्यकाल में है और साथ ही नेपाल इसी लोकतंत्र का हाथ पकड़ चुनावी दौर में हिचकोले खा रही है । वर्तमान में वामगठबन्धन समाजवाद और जनता की सरकार, मधेशी दल मधेशी समस्या और संविधान संशोधन के वादे, नया शक्ति परिवर्तन जैसे वायदों के लुभावने सपने बाँट रहे हैं, वहीं इस सपने के साथ एक डर भी काँग्रेस की ओर से बाँटा जा रहा है । डर इस बात का कि नेकपा एमाले और माओवादी केन्द्र के बीच का चुनावी तालमेल और पार्टी एकता नेपाल में पनप रहे लोकतंत्र के लिए खतरा है । यह तो तय है कि संविधान बनने के बाद नेकपा एमाले और माओवादी केन्द्र के बीच का तालमेल एक बड़ी घटना है और अगर यह आगामी चुनाव में सफल होती है तो निश्चय ही एक नया अध्याय नेपाल की राजनीति में जुड़ सकता है । जुड़ सकता है, परन्तु जुड़ेगा ही यह यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इसके साथ ही एक गहन सवाल यह है कि क्या नेकपा एमाले और माओवादी केन्द्र सचमुच माक्र्सवाद के विचारधारा को लेकर आगे बढ रहे हैं ? नेकपा एमाले के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री अपने सभी चुनावी भाषण में यह कहते नजर आ रहे हैं कि, नेपाल समाजवाद की ओर बढ़ रहा है । गठबन्धन के पोस्टरों पर यह लिखा हुआ मिल रहा है कि, अब जनता की सरकार बनेगी इसलिए वामगठबन्धन को वोट दिया जाय । क्या जनता इनसे यह सवाल नहीं पूछेगी कि पार्टी वही, नेता वही और नीति वही तो इससे पहले किसकी सरकार थी ? क्या वो सिर्फ नेताओं के लिए या पूँजीवादियों के लिए थी ? अगर हाँ तो माओवाद, कम्युनिष्ट और समाजवाद का चोला पहने हुए ये नेता या इनकी पार्टी आज से पहले क्या कर रही थी ? जिस कम्युनिष्ट या माओवाद के नाम पर ये आगे बढ़ रहे हैं क्या इस वाद के विचारधाराओं को इन्होंने आत्मसात किया है ?
क्या है मार्क्सवाद ?
मार्क्सवाद एक विचारधारा है, जो कि मार्क्स एवं एंगेल्स तथा अन्य दार्शनिकों के लेखन पर आधारित है । जिसके अनुसार समाज में मौलिक विभाजन एवं वर्ग आधारित विभाजन है । समाज में वर्ग विभाजन निजी सम्पत्ति संस्था का परिणाम है । मानव सभ्यता के इतिहास में हमेशा से दो वर्ग रहे हैं — उत्पादन के साधन के मालिक (अमीर) एवं दूसरा श्रमिक (वंचित) । यह सामाजिक व्यवस्था है जो विश्व के हर देश और समाज में पाया जाता है । आज उत्पादन के साधन के मालिक को पूँजीपति कहा जाता है । मार्क्सवादी शब्दावली में आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था में दो वर्ग हैं बुर्जुआ और सर्वहारावर्ग । शोषक और शोषित, यह सामाजिक व्यवस्था हमेशा से थी और आज भी पूर्ववत है । पूँजीवाद की इस व्यवस्था को माकर््स कहता है कि क्रांति से ही गिराया जा सकता है । क्रांति के बाद पूँजीवाद व्यवस्था समाप्त हो जाएगी और एक वर्गविहीन, राज्य विहीन समाज का उदय होगा । हालाँकि वो यह भी मानता है कि क्रांति के तत्काल बाद राज्यविहीन समाज नहीं उत्पन्न हो सकता, बल्कि एक बीच का चरण आएगा इसी बीच के चरण को माकर््सवादी लेखन में समाजवाद एवं इसके अंतिम चरण को साम्यवाद कहा जाता है ।
क्या वामगठबन्धन माओवाद की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं ?
अब प्रश्न यह है कि दस वर्ष के जनयुद्ध के बाद जो शक्ति युद्ध से बुद्ध की ओर आई थी, क्या वो माओवाद के इस विचारधारा के एक बिन्दू तक भी पहुँच पाई ? जिस जनसेना के बल पर युद्ध लड़ा गया था, क्या उनके साथ न्याय हुआ ? नहीं, उनका हश्र सर्वविदित है । एक हिंसक क्रांति हमेशा किसी ना किसी तानाशाही को लेकर आई है, क्रांति के बाद धीरे धीरे एक नया विशेषाधिकार प्राप्त कर शासकों एवं शोषकों का वर्ग खड़ा हो जाता है । जो कमोवेश हमें देखने को मिल चुका है । सीधी सी बात है जो अपनी सैनिकों के साथ समन्वयवाद की परिकल्पना को साकार नहीं कर पाए वो जनता की सरकार अर्थात पूँजीवाद का अंत और सर्वहारा वर्ग का उत्थान कैसे कर पाएँगे और कैसे जनता की सरकार लाएँगे ? जिस समाजवाद का नारा बुलन्द किया जा रहा है क्या यह सिर्फ एक भ्रामक और मिथ्या प्रचार नहीं है ? जो स्वयं पूँजीवाद के पोषक और उसके साकार छवि हैं वो पूँजीवाद का न तो अन्त कर सकते हैं और न ही सर्वहारावर्ग का उत्थान ही कर सकते हैं । समाजवाद शब्द से भारत की राजनीति के उस पुरोधा का नाम याद आता है जिन्हें लोकनायक कहा गया और समाजवादी नेता की पहचान के साथ आज भी भारतीय राजनीति में एक महत्तवपूर्ण स्थान रखते हैं । लोकनायक जयप्रकाश नारायण समाजवादी नेता थे । पदमोह से मुक्त और शालीनता तथा सहजता के प्रतिमूर्ति, जिनके लिए जनता सर्वोपरि थी पद नहीं और जिनकी अडिगता ने १९७७ में वो आँधी लाई कि वर्षों से सत्ता में रही काँग्रेस की जड़े हिल गई थीं । क्या आज हमारे नेता जिस समाजवाद के नारे पर अपनी सत्ता प्राप्ति के सपने सजा रही है उसमें लोकनायक बनने के गुण हैं ?
कहीं मैंने पढा था, “साम्यवाद यानि उल्टापंथ जो सिद्धान्ततः व्यक्तिपूजक, निरंकुशता और अराजकता का पोषक है जहाँ राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जाती है । वामपंथ कुसामाजिक, कुराजनीतिक दर्शन के अन्तर्गत एक ऐसी विचारधारा है जिसमें अराजकता और संगठित अपराध को क्रांति का नाम देकर कहा जाता है कि , क्रांति बंदूक की नाल से निकलती है ।” यह उक्ति तो चरितार्थ हो चुकी है । बन्दूक और बारुद के भय को तो नेपाल की जनता ने बहुत सालों तक झेला है और उस दर्द को अभी तक वो नहीं भूले होंगे जिन्होंने अपनों को खोया और जिनकी लाश तक को वो प्राप्त नहीं कर पाए । परन्तु जिस क्रांति के परिणामस्वरुप लोकतंत्र और गणतंत्र का जन्म हुआ वहाँ समाजवाद और साम्यवाद की परिकल्पना कितनी यथार्थवादी है ? क्या जनता इस गहराई तक सोच पाएगी ? शायद नहीं, क्योंकि इसके पहले ही राष्ट्रवाद की हवा चलाकर वामपंथियों ने एक पक्ष को अपने हिस्से में कर लिया है और उसी के बलबूते पर बहुमत की सरकार बनाने का स्वप्न भी बड़े ही उत्साह और उमंग से देखा जा रहा है । इतना ही नहीं कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि वामगठबन्धन नेपाली राजनीति का मानचित्र बदल डालेगा और विगत में चले आ रहे मतभेदों का अन्त होगा । नेकपा एमाले अध्यक्ष ओली और माओवादी केन्द्र अध्यक्ष प्रचण्ड ये दोनों ही दावी कर रहे हैं कि, यह एकता किसी के पक्ष या विरोध में न होकर नेपाली जनता की समृद्धि और न्याय के पक्ष में है । अब अगर यह दावा सच है तो नेपाली राजनीति के इतिहास में जरुर किसी क्रांतिकारी परिवर्तन के कयास लगाए जा सकते हैं वरना इनकी एकता सिर्फ और सिर्फ सत्ता हथियाने का प्रयास मात्र है । वषों तक एक दूसरे की आलोचना करने वाले और गाली देने वाले की सूरत और सीरत इतनी जल्दी तो कदापि नहीं बदल सकती और अगर सचमुच बदलाव आया है, तो नेपाल की राजनीति को जिस स्थिरता की तलाश थी वो पूरी हो जाएगी । लेकिन ये बात गले के नीचे उतर नहीं रही क्योंकि ओली और प्रचण्ड दोनों ही महत्वाकांक्षी नेता हैं और यह सम्भव नहीं लग रहा कि कोई किसी के दवाब में रह सकता है ।
कांग्रेस का डर
वाम गठबन्धन और पार्टी एकता ने काँग्रेस के होश जरुर उड़ा दिए हैं । परन्तु देखा जाय तो डरने की कोई ठोस वजह नजर नहीं आ रही है । वैसे भी कार्लमाकर््स ने ही कहा है कि, लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है तो निश्चय ही कार्लमाकर््स के अनुयायी लोकतंत्र की सुरक्षा अवश्य ही करेंगे । समाजवाद सिर्फ कम्यूनिष्ट का नारा नहीं रहा है, नेपाल में यह नारा एक वक्त काँग्रेस का भी था । परन्तु आज काँग्रेस काफी हद तक समाजवाद के नारे से परे जाकर पूँजीवाद के पोषक के रूप में उभर कर सामने आ रहा है । जबकि अगर माकर््स के ही कथन पर नजर डालें कि लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है तो निश्चित तौर पर ये दोनों ही एक दूसरे के पोषक हैं और नेपाल की जनता को इन दोनों की ही आवश्यकता है तभी विकास की राह पर इसके कदम बढ़ सकते हैं । किन्तु अफसोस तो इस बात का है कि आज एकता या गठबन्धन का नीतिगत आधार नहीं दिख रहा है । दल सिर्फ शब्दों को भजा रहे हैं, कोई लोकतंत्र को तो कोई समाजवाद को, जबकि इसके मर्म को कोई नहीं समझ रहा है । वाम की एकता अगर यह आइना दिखा रही है कि नेपाल में अब मध्यमवर्ग का उदय हो रहा है और कल यही केन्द्रबिन्दू बनेंगे तो वहीं काँग्रेस अपनी छवि पूँजीवाद के साथ आबद्ध कर चुका है और यही उसके डर का कारण भी है । जबकि वाम गठबन्धन और काँग्रेस दोनों ही मजबूत नीतिगत पहलु पर कमजोर ही नहीं दिशाहीन भी नजर आ रहे हैं । यही वजह है कि आगामी चुनाव में विकास या उपलब्धि भाषण के मुद्दे नहीं बन रहे बल्कि एक दूसरे की कमी, अपशब्द, व्यक्तिगत आक्षेप और चरित्रहनन का अखाड़ा बना हुआ है जहाँ खुले आम शालीनता और संस्कार की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं ।
कहां हैं मधेशवादी दल ?
इन सबसे परे मधेशवादी दल मधेश के भूले बिसरे मुद्दों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं जो मुद्दे आज सिर्फ सीढ़ी नजर आ रही है । मधेशवादी दल को पहले ही ग्यारह जिलों में सीमित कर दिया गया है । इस परिस्थिति में इन ग्यारह जिलों में भी यह अपनी शाख कितना बचा सकती है, इस पर सबकी नजर टिकी हुई है । अब देखना यह है कि मधेश की जनता शहीदों की शहादत, पहचान, अधिकार और विभेद के पुलिन्दों को लेकर मधेशवादी दलों का कितना साथ देती है ? क्योंकि मधेश की समस्या भले ही वाम और काँग्रेस के लिए महत्तवपूर्ण ना हो पर सत्ता प्राप्ति के लिए इनके बहुमूल्य मत की चाहत ने इनके दरवाजे पर जरुर इन्हें खड़ा कर रखा है जहाँ साम, दाम और दण्ड की नीति को पूरे जोर शोर से लागू किया जा रहा है । जहाँ खुलेआम यह कहा जा रहा है कि मधेश को मालिक बनाया जाएगा । मजे की बात तो यह है कि यह उक्ति मधेश के विगत और वर्तमान दोनों की व्याख्या कर रही है, बस देखना है कि मधेश की जनता की नीयत बिकती है या वो अपनी नियति एकबार फिर खरीदते हैं खुद को बेच कर । क्योंकि, मधेशवादी दल का भविष्य मधेशी जनता की नीयत पर ही निर्भर है ।

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