क्या सचमुच नेपाली भारत विरोधी हैं ?

प्रकाश प्रसाद उपाध्याय, काठमांडू, 15 फरवरी ।
nepal‘नेपाली भारत विरोधी हैं या नेपाल भारत विरोधी लहर से प्रभावित है ।’ जब भी ऐसे वाक्यांश पढ़ने या सुनने को मिलते हैं तो मुझे हँसी आती है, हाँलाकि उपर्युक्त बातें हँसने की नही है । लेकिन हँसी आती है, क्योंकि नेपाल में भारत विरोधी लहर कहीं है ही नहीं । जहाँ के शासक, प्रशासक,चिकित्सक, ईन्जिनियर और स्कूल–कॉलेज के शिक्षकगण भारत के शिक्षा के केन्द्रों से प्रशिक्षित हों, जहाँ की बहुएँ भारत से हों या बेटियाँ भारत में ब्याही गईं हों, जिस देश के साथ रोज का व्यापारिक लेनदेन हो, वहाँ के लोग क्या भारत विरोधी हो सकते हैं? जिस देश के लोग अपनी दिनचर्या का आरंभ हिंदी के भजनों के साथ करते हों, मनोरंजन हिंदी गीतों से करते हों और हिंदी धारावाहिकों या न्यूज चैनलों को देखकर अपनी दिनचर्या समाप्त करते हों, क्या वे भारत विरोधी हो सकते हैं? जिस देश के लोग मोक्ष की कामना करते हुए वाराणसी के तट पर अंतिम साँसे लेना पसंद करते हों या चारधाम की यात्रा पर जाकर आत्मिक आनंद प्राप्त करते हों क्या वहाँ के लोग भारत विरोधी हो सकते हैं ?
इतिहास के पन्नों को ही पलटा जाय तो पता चलता है कि राणाओं के १०४ वर्षाें के निरंकुश शासन काल में भी शासन को सुचारु रूप देने के लिए भारत सरकार की विभिन्न रूप से सहायता ली गई थी या ब्रिटिश भारत के शासन काल में राणा शासकों ने तत्कालीन भारत सरकार को सैनिक सहायता पहुँचाई थी । अतः यह कहना अन्याय होेगा कि नेपाल में भारत विरोधी भावनाएँ हंै ।
हाँ, एक बात कहने में मुझे संकोच नही होगा कि जब अपने निकट के मित्रों के द्वारा चोट पहुँचाने का काम किया जाता है तो जनता उस पीड़ा से उसी प्रकार कराह उठती है या आक्रोशित हो विरोध के स्वर निकाल देती है जिस प्रकार घर के अंदर अपने भोलेभाले और प्यारे बेटे–बेटियों के लिए माँ बाप क्रोधवश कभी–कभार अप्रिय शब्द निकाल देते है या कह देते हैं कि ‘जाओ, घर से निकल जाओ या आज से तेरा हमारा कोई रिश्ता नही है ।’ लेकिन यथार्थ में माँ–बाप संतान विरोधी नही होते या न ही उनकी मंसा बच्चों को घर से बेदखल करने की होती है । नेपाल की जनता इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ है कि भारत और नेपाल शताब्दियों से मित्रता के विभिन्न बंधनों से बँधे हैं, दोनों दुःख सुख के साथी हैं, नेपाल के विकास में भारत हमेशा से साझेदार रहा है और भारत की ओर से ऐसा कोई कार्य नही होगा जो नेपाली जनता के अिए अरुचिकर या अमैत्रीपूर्ण प्रमाणित हो ।
नेपाली जनता की यह भी मान्यता रही है कि जब एक घर दो भिन्न विचारधाराओं के पडोÞसियों के बीच अवस्थित हो तो एक को अंकमाल कर दूसरे को नजरअंदाज करना जिस प्रकार शोभनीय नही होता और असामाजिक कृत्य माना जाता है उसी प्रकार नेपाल को दोनों ओर के पड़ोसियों से वास्ता रखना आवश्यक होता है और अभाव की स्थिति में उसी प्रकार सहायता की गुहार करनी पड़ती है जिस तरह गाँव घरों में चाय बनाते हुए सुबह सुबह ही चाय की पत्ती या चीनी समाप्त हो जाने पर हमें तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उस पड़ोसी के पास जाना आवश्यक हो जाता है जिससे हमारे धार्मिक या सांस्कृतिक रीतिरिवाज नही मिलते । इस प्रकार की सहायता को भारत विरोधी क्रियाकलाप के रूप में नही देखी जानी चाहिए ।
अतः नेपाल को एक अच्छे और विश्वसनीय पड़ोसी के रूप मे देखने की आवश्यकता है और थोड़ी बहुत गीले शिकबे या आक्रोश के स्वर को तुल नही दी जानी चाहिए । चार दशक भारत की राजधानी में व्यतीत कर स्वदेश लौटे इस पंक्तिकार को एक दशक से ऐसी कोई लहर नही दिख रही है जिसे भारत विरोधी की शास्वत संज्ञा दी जाय । विगत के महीनों में द्वीपक्षीय संबंधों में जो भी उतारचढ़ाव देखे गए उसे असमझदारी की संज्ञा देना ही उपयुक्त होगा क्योंकि वह जिन गलतफहमियों की वजह से उत्पन्न हुईं थी वह सब समाप्त हो गईं हैं ।
अब चूँकि नेपाल के प्रधान मंत्री के.पी. ओली भारत की यात्रा पर जा रहे हैं नेपाली जनता यह उम्मीद करती है कि अब उतार–चढ़ाव के सारे कारण दूर ही नही होंगे, संबंध को सुमधुर बनाने में भारत के प्रधान मंत्री उदारता का प्रदर्शन कर नेपाली जन मन को जीतने मे फिर उसी प्रकार सफल होंगे जिस प्रकार वह अपनी नेपाल यात्रा काल में सफल हुए थे ।

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