क्या हुआ तेरा वादा

रमेश झा

चिरप्रतीक्षित, ऐतिहासिक संविधानसभा के निर्वाचन में सम्पर्ूण्ा नेपालीजनता ने बड ही उत्साह से, शान्तिपर्ूण्ा तरीके से चुनाव सम्पन्न किया, जिसकी वैश्विक रुप

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में प्रशंसा की गई। संविधानसभा के माध्यम से संविधान लेखन की प्रक्रिया के साथ ही नेपाल अब नये युग में प्रवेश करेगा, ऐसा सोच जनता में पनपना कोई अस्वाभाविक नहीं था। जनता सोचने लगी थी कि संविधान सभा द्वारा लिखित संविधान आएगा और नेपाल में व्याप्त चतर्ुर्दिक समस्याओं का हल होगा, देश से विलुप्त शान्ति लौटेगी, राजनीतिक अस्थिरता में स्थिरता आएगी, राजनीतिक मुद्दों की इतिश्री होगी। देश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक विषमताओं का रुपान्तरण होगा। जनता का जीवनस्तर सुधरेगा। पर ऐसा नहीं हो सका। ६०१ संविधानसभा सदस्यों द्वारा चार वर्षतक राजकीय कोष से संविधान बनाने के नाम पर साढÞे ११ अरब स्वाहा किया गया। और सत्ता समीकरण में सभी छोटी-बडÞी पार्टियों के नेतृत्व ने अपने-आप को उल्झाए रखा। परिणामस्वरुप चार वर्षमें भी १४ जेष्ठ २०६९ के मध्य रात तक नेपाली जनता को नव संविधान नहीं मिला। ऐसी स्थिति में ६०१ संविधानसभा सदस्यों से जनता पूछना चाहती है कि- क्या हुआ तेरा वादा –
संविधान बने तो कैसे – क्योंकि विगत चार वर्षतक तीन बडÞी पार्टर्ीीौर मधेशी मोर्चा के कुछ शर्ीष्ास्थ नेता गण ने संविधान निर्माण प्रक्रिया को गौण समझा और सत्ता समीकरण के र्इदगिर्द कोल्हू के बैल की तरह घूमते रहे। कहने के लिए संविधानसभा में सदस्यों की संख्या ६०१ है, पर सभासद गणपूरक संख्या के रुप में ताली बजाने के लिए शर्ीष्ास्थ नेताओं द्वारा मनोनित किए गए थे, जिनका पालन मनोनित सदस्य गण बखूबी समय-समय पर तालियाँ बजाकर अपनी अपनी पार्टर्ीीे नेताओं का हौसला बढाते रहे। इसलिए शर्ीष्ास्थ नेताओं का दिमाग सातवें आसमान पर चढÞ गया और वे समझने लगे कि हम स्वनामधन्य नेता लोग जैसे जहाँ, जो करेंगे, वही अकाट्य होगा। दर्ुभाग्यवश पार्टर्ीी स्वनामधन्य शर्ीष्ास्थ नेताओं के अदूरदर्शी नीतियों, पार्टर्ीी स्वार्थो, आकांक्षाओं के आधार पर। जातीय विद्वेष फैलाकर सत्ताकब्जा करने की मनोगत लिप्सा के साथ-साथ क्षणिक स्वार्थ पर्ूर्ति करने की प्रवृत्ति हाबी रही। साथ ही चेतना के अभाव के कारण संविधान का निर्माण नहीं हुआ। अतः संविधान न आने में जनता नेता दोनों दोषी हैं।
जनता में यदि चेनता होती तो पार्टर्ीीेता दोनों की खबरदारी करती, पर ऐसा नहीं हुआ। तर्सथ नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व वर्ग चार वर्षतक जनता और देश की परवाह किए बिना सत्ता सुख जैसी मृगतृष्णा में भटकती रही। जैसे मृततृष्णा में भटकने वाले मृग को पानी नहीं मिलता, वैसे ही सत्ता सुख रुपी मृग तृष्णा में भटकने वाले नेताओं की अदूरदर्शी सोच, आपसी विद्वेष एवं आत्मघाती अडान के कारण संविधानसभा बाँझ स्त्री की तरह निष्फल रही और काल कवलित हो गई। अरवों-रुपये खर्च करने के बाद ६०१ संविधानसभा सदस्य लोग खोदा पहाडÞ निकली चुहिया जैसी कहावत को भी चरितार्थ नहीं कर पाये। अतः जेष्ठ १४ गते नेपाली जनता के लिए काला दिन रहा। इस दिन को कलंकित करने में कारक तत्व के रुप में संघीयता सम्बन्धी कुछ बिन्दुओं पर पार्टर्ीी पृथक विचार धाराओं को माना जाता है, पर वस्तुस्थिति के झरोखों से देखा जाए तो, मुख्य कारकतत्व है, प्रमुख पार्टियों के शर्ीष्ास्थ नेताओं की असक्षमता, अदूरदर्शी सोच, स्वार्थपरता एवं राष्ट्रप्रति उदासीनता। संविधान निर्माण के काम पर प्रमुख पार्टियों के शर्ीष्ा नेताओं की विगत चार वर्षो में रिसोर्ट वार्ता, होटल-वार्ता, हाथीबन वार्ता नेता निवास वार्ता जैसे नाटकों का मंच सजाया गया, पर कभी सफल मंचन नहीं हुआ। हमेशा ताली बजानेवाले शेष सांसदों एवं बेचारी जनता को रेडियो, टीबी एवं पत्रपत्रिकाओं के माध्यम से यह शब्द सुनकर, पढÞकर, संतोष करना पडÞता था कि ‘बैठक बिनानिर्ण्र्ाानै समाप्त भयो। ‘
विघटित संविधान सदस्यगणों ने संविधान न बनाने में अपनी अकर्मण्यता दिखायी। लेकिन वे एक और काम करने में सफल हुए, वह है नेपाली समाज में प्राचीन काल से स्थापित सामाजिक सौहादर््रता एवं सांस्कृतिक विविधताजन्य समरसता को तोडÞकर वर्गीय, क्षेत्रीय और जातीय विभेद को उत्कर्षपर पहुँचना। फलस्वरुप नेपाली जनता सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक भौगोलिक, न्यायिक, धार्मिक संक्रमणजन्य चक्रव्यूह में फँसकर छटपटाने के लिए बाध्य है। इस अवस्था में पहुँचाने के लिए प्रमुख पार्टियों के शर्ीष्ा नेता गणों की अकर्मण्यता एवं असक्षमता ही पर्ूण्ा दोषी है। संविधान सभा सदस्यों द्वारा बहुप्रतीक्षित संविधान की हत्या कर दिए जाने के कारण नेपाली जनता में नेपाली राजनीति के प्रति निराशा स्थापित होने के साथ साथ नेपाली जनता पार्टियों के बहकावे में आकर भविष्य में विभेदजन्य दर्ुगति भोगने के लिए अग्रसर हो गई है। यदि समय रहते हुए शर्ीष्ा नेताओं द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाने की प्रक्रिया को खत्म कर अपने-अपने गिरेवान में झाँकते हुए अपनी-अपनी कमी कमजोरियों के सुधारने की आवश्यकता है। विदेशी शक्तियों की ओर्रर् इशारा कर अपनी कमजोरी, अपरिपक्व सोच आदि को ढÞकने का प्रयास करना और जनता को मर्ूख बनाने जैसी बात होगी। जनता सब जानती है। समय आने पर जनता अवश्य सबक सिखाएगी। राज्य की बागडोर सम्भालने वाले नेताओं को आत्मनिरीक्षण करने की घडÞी आ गई है। संविधान बिना संविधानसभा को खत्म कर देने से गणतन्त्रात्मक लोकतन्त्र पर्ूण्ातः ध्वस्त हो गया है। पुनः संविधानसभा की चुनावीघोषणा करना अपने आप में हास्यास्पद लगता है, क्योंकि फिर यही पार्टियाँ और इनके ही नेतागण चुनकर संविधान बनाने के लिए आएंगे तो इनसे कैसे आशा की जा सकती है –

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