क्या होगा देश का अगला परिदृश्य ?-डॉ. श्वेता दीप्ति

जिनका खून आज दार्जिलिंग के लिए खौलता है उन्हें अपनी ही मिट्टी की माँग विखण्डनकारी लगती है





सबसे महत्तवपूर्ण प्रश्न यह है कि मधेश के मुद्दों को लेकर जो मधेशी नेता आगे बढ़ रहे हैं वो क्या करेंगे ? किसी दवाब के तहत अपनी नीति बदलेंगे या उड़ती सी खबर के अनुसार एमाले का दामन थाम कर आगे की राह चुनेंगे ?


अखण्ड देश के लिए अखण्ड सोच की आवश्यकता होती है, क्योंकि संविधान, नियम कानून, निर्वाचन ये समग्र जनता के लिए होते हैं अगर चंद जनता भी इसके विरोध में खड़ी हो जाय तो देर सबेर इसका असर दिखता जरुर है

दूसरे चरण का चुनाव अटकलों और दहशत के बीच देउवा सरकार सम्पन्न करा चुकी है । ७५ जिला का चुनाव हो चुका है और अब सरकार द्वारा आठ जिलों में सीमित कर दिए गए मधेश का चुनाव बाकी है । समुदाय के आधार पर देश दो भागों में बँटा हुआ स्पष्ट दिख रहा है । मधेश की समस्या और उसकी माँगों को नजरअँदाज कर मधेश के नेतृत्व को चुनाव में शामिल होने से तकरीबन रोका गया और अब चुनाव सम्पन्न हुए एक सप्ताह होने को है पर अभी तक मधेश मुद्दों के लिए कोई पहल नहीं दिखाई दे रही । तो क्या एक बार फिर बुलेट के साए में आश्विन दो गते चुनाव सम्पन्न करा लिया


जाएगा ? या फिर अपने मुद्दों से समझौता कर राजपा नेपाल चुनाव में शामिल होगी ? स्थानीय चुनाव के बाद तत्काल ही माघ सात गते के भीतर प्रदेश और केन्द्र का चुनाव कराया जाना है । विश्व में नेपाल का यह अकेला अलबेला संविधान है जहाँ चुनाव के लिए समय सीमा पूर्व ही तय कर दी गई है । इसलिए यह चुनौती देउवा सरकार के सामने है कि निर्धारित समय पर चुनाव सम्पन्न कराया जाय । आश्विन दो गते स्थानीय चुनाव की तिथि निर्धारित की गई है ऐसे में कार्तिक के प्रथम सप्ताह में प्रदेश का चुनाव सम्पन्न होगा इस विषय में संदेह है । चुनाव से पहले सरकार निर्वाचन आयोग को प्रदेश या केन्द्र के चुनाव की तैयारी के लिए कह नहीं सकती है और तीसरे चरण के चुनाव के बाद समय काफी कम है । ऐसे में चुनाव कराना सम्भव नहीं लग रहा है । लेकिन सबसे महत्तवपूर्ण प्रश्न यह है कि मधेश के मुद्दों को लेकर जो मधेशी नेता आगे बढ़ रहे हैं वो क्या करेंगे ? किसी दवाब के तहत अपनी नीति बदलेंगे या उड़ती सी खबर के अनुसार एमाले का दामन थाम कर आगे की राह चुनेंगे ? क्योंकि मधेश मुद्दों को लेकर पहले इन्होंने माआवादी का साथ दिया, फिर काँग्रेस का और फिलहाल परिणाम यह है कि इनकी हथेली खाली है । इधर चुनाव के परिणामों ने एमाले का मनोबल बढा दिया है, ऐसे में सत्ता बनाने और बिगाड़ने का खेल जारी रहने वाला है और मधेशी दल का इसमें प्रयोग करने की पूरी सम्भावना सामने है । यानि समीकरणों के जोड़तोड़ का खेल शुरु होने वाला है इस अंदेशे से इनकार नहीं किया जा सकता है ।



बीते दिनों पर अगर नजर डालें तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मधेश को जगाने में माओवादी जनयद्ध का बहुत बड़ा योगदान है । “गर्व से कहो हम मधेशी हैं, विदेशी नहीं धरती पुत्र हैं ।” जैसे नारा ने मधेश को चेतना प्रदान किया ।

अतिराष्ट्रवाद की नीति का पुरजोर असर

पहले और दूसरे चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया कि पहाड़ी समुदाय पर राष्ट्रवाद की घुट्टी ने भरपूर असर किया है, जिसका पूरा फायदा एमाले को मिला है । यानि एक विष बेल का बीजारोपण हो चुका है । जो भविष्य में बरगद की तरह अपनी जड़ें फैलाएँगी इसकी पूरी सम्भावना है । क्योंकि नई पीढ़ी पीछे मुड़कर देखने के मिजाज में नहीं है । विभेद का घाव नासूर ना बन जाय क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो भले ही ऊपरी तह पर सब सामान्य दिखे भीतर इसका विष बरकरार रहेगा । जो समय दर समय रिसता रहेगा और अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहेगा । नेल्सन मंडेला ने कहा था कि जातीयवाद मानवता विरोधी अपराध है । यह अभिव्यक्ति उन्होंने ऐसे ही नहीं दी थी । उन्होंने इसे भोगा था । विद्यार्थी जीवन में उन्हें रोजÞ याद दिलाया जाता कि उनका रंग काला है और सिर्फÞ इसी वजÞह से वह यह काम नहीं कर सकते । उन्हें रोजÞ इस बात का एहसास करवाया जाता कि अगर वे सीना तान कर सड़क पर चलेंगे तो इस अपराध के लिए उन्हें जेल जाना पड़ सकता है । ऐसे अन्याय ने उनके अन्दर असंन्तोष भर दिया । एक क्रान्तिकारी तैयार हो रहा था ।

जिनका खून आज दार्जिलिंग के लिए खौलता है उन्हें अपनी ही मिट्टी की माँग विखण्डनकारी लगती है । विभेद का यह जहर फैलता ही जा रहा है और इसके परिणाम गम्भीर हो सकते हैं । इतिहास गवाह है कि मधेश का संघर्ष किसी जाति या धर्म के विरुद्ध नहीं था, यह राज्य के भेदभाव के विरुद्ध था ।



अपनी जिन्दगी के सत्ताइस साल उन्होंने कैद में गुजारी । पूरा दक्षिण अफ्रीका को हिला दिया था उन्होंने और अंततः रंगभेद के विभेद से अफ्रीका को मुक्त कराया । उन्होंने कहा कि “अपने पूरे जीवन के दौरान मैंने अपना सबकुछ अफÞ्रीकी लोगों के संघर्ष में झोंक दिया । मैं श्वेत रंगभेद के खिलाफÞ लड़ा हूँ, और में अश्वेत रंगभेद के खिलाफÞ भी लड़ा हूँ । मैंने हमेशा एक मुक्त और लोकतांत्रिक समाज का सपना देखा है । जहाँ सभी लोग एक साथ पूरे सम्मान, प्रेम और समान अवसर के साथ अपना जीवन यापन कर पायेंगे । यही वह आदर्श है, जो मेरे लिए जीवन की आशा बनी और मैं इसी को पाने के लिए जिन्दा हूँ, और अगर कहीं जÞरूरत है कि मुझे इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मरना है तो मैं इसके लिए भी पूरी तरह से तैयार हूँ ।”
मधेश की परिस्थितियाँ अफ्रीका से अलग हो सकती हैं, विभेद का स्वरूप अलग हो सकता है किन्तु पहचान, समानता और अधिकार की लड़ाई यहाँ भी है । मधेश सदियों से राज्य पक्ष की ओर से असमानता का विभेद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर झेलता आ रहा है । यह सच है कि आज परिस्थिति बदली है परन्तु एक पक्ष की मानसिकता आज भी नहीं बदली । वो आज भी शासक और शोषित की स्थिति कायम है । बीते दिनों पर अगर नजर डालें तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मधेश को जगाने में माओवादी जनयद्ध का बहुत बड़ा योगदान है । “गर्व से कहो हम मधेशी हैं, विदेशी नहीं धरती पुत्र हैं ।” जैसे नारा ने मधेश को चेतना प्रदान किया । जातीय, जनजातीय और शोषित उत्पीडि़त के लिए माओवादी जनयुद्ध सामाजिक, साँस्कृतिक परिवर्तन लाने में महत्तवपूर्ण कारक बना । माओवादी द्वारा उठाए गए अपनी भाषा, संस्कृति, संघीय शासन की अवधारणा की वजह से माओवादी मधेशियों के लिए आकर्षण का कारण बने । किन्तु जब माओवादी देश की राजनीति में सक्रिय रूप से सामने आए तो उनकी यही मान्यता खण्डित होती चली गई । मधेश अपनी ही जगह खड़ा रहा, वह जनलहर लाने का सिर्फ माध्यम बना । पर जो चेतना उनके अन्दर जगी थी, वो पहले से अधिक जाग्रत हो चुकी थी जिसका परिणाम था महेन्द्र राष्ट्रवाद के विरुद्ध का मधेश आन्दोलन । जिसने तत्कालीन परिस्थितियों को हिलाकर रख दिया था । मधेश विद्रोह के बाद ही वंचित तथा सीमान्तकृतों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा । परन्तु इनकी स्वार्थी राजनीति ने मधेश की उपलब्धि को शून्य पर ही रखा ।

मधेश का बढ़ता असंतोष

इतिहास गवाह है कि देश की हर लड़ाई में मधेश साथ रहा है और अपनी राष्ट्रीयता की पहचान दी है । देश के २००७, ४६, ६२ और ६३ के आन्दोलन में बहने वाला मधेश का रक्त नेपाली ही था । ये आन्दोलन प्रजातंत्र की प्राप्ति के लिए हुए थे और २०६३ के आन्दोलन में शायद पहली बार था कि जब मधेशी समुदाय जगा था और ३५ से अधिक शहादत दी गई थी । यह जनविद्रोह मधेशी मूल की राष्ट्रीय पहचान, स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और राज्य में सम्मानजनक उपस्थिति के लिए थी । मधेशी कातर होते हैं और इन्हें दबा कर रखा जा सकता है यह धारणा उस वक्त खण्डित हुई थी । २०६३ की लड़ाइ आज भी जारी है । २०७२ के आन्दोलन ने तो दमन की अपनी सारी सीमाएँ पार कर दी । मौत का विभत्स खेल खेला गया और पहाड़ी समुदाय खामोशी के साथ नजारा देखते रहे । जिनका खून आज दार्जिलिंग के लिए खौलता है उन्हें अपनी ही मिट्टी की माँग विखण्डनकारी लगती है । विभेद का यह जहर फैलता ही जा रहा है और इसके परिणाम गम्भीर हो सकते हैं । इतिहास गवाह है कि मधेश का संघर्ष किसी जाति या धर्म के विरुद्ध नहीं था, यह राज्य के भेदभाव के विरुद्ध था । आज भी स्वरूप वही है किन्तु मधेशी के प्रति घृणा इसका स्वरूप कभी भी बदल सकती है । मधेश को आज भी अपनी राष्ट्रीयता सिद्ध करनी पड़ रही है । आज भी उन्हें विदेशी कहने वालों की कमी नहीं है । हिटलर की एक चर्चित उक्ति है कि अगर एक ही झूठ को बार बार सच कहा जाय तो वह सच बन जाता है । मधेशी के लिए यह उक्ति बहुत सही साबित हो रही है । बार–बार सोची समझी नीति के तहत मधशियों को भारतीय तथा गैरनेपाली के रूप में दिखाया जाता रहा है । आज की पीढ़ी मधेश के इतिहास को जानने की आवश्यकता नहीं समझते बस मधेशियों के लिए बार–बार कहा जा रहा यह झूठ उनके लिए सच बनता जा रहा है और मधेशियों को अनागरिक समझ कर उनके अन्दर द्वेष की भावना बलवती होती जा रही है । जहाँ पहाड़ी समदाय मधेश के इतिहास को जानना या उसे मानना नहीं चाह रहे वहीं यही वजह मधेश को अपने इतिहास के प्रतिमोह पैदा कर रहा है । वो अब अपने इतिहास को कुरेदने लगा है और जैसे–जैसे वो अपने इतिहास के प्रति सम्मोहित होंगे उनके अन्दर राज्य के प्रति असंतोष बढ़ेगा । अकाट्य सत्य है कि संस्कृति, अस्तित्व, परम्परा, अधिकार की पहचान पर प्रहार और कटौती ही परिवर्तन का कारक बनती है । इस गम्भीरता को शासक वर्ग को समझना होगा । परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदल रही हैं, ऐसे में मधेश की बदलती मनोभावना को समझना सरकार के लिए अत्यन्त आवश्यक है । आज भले ही मधेश में विभेद के विरुद्ध खड़ा होने वाला कोई नेल्सन मंडेला नहीं हो पर देश का परिदृश्य यही रहा तो कल इनके बीच से ही कोई मंडेला भी निकलेगा यह तय है ।

सत्ता को सोच बदलने की आवश्यकता

एक अपरिपक्व राजनीति के तहत देश का विकास और स्थायित्व दोनों असम्भव है । सत्ता को अपनी सोच बदलनी होगी क्योंकि आगे का वक्त अत्यन्त संवेदनशील होने वाला है । देश के लिए संविधान, कानून, निर्वाचन जितने आवश्यक हैं, उससे अधिक आवश्यक है देश की जनता, चाहे वो किसी भी क्षेत्र की हो उसकी भावनाओं को समझना और नब्ज को पकड़ने की जरुरत है । अखण्ड देश के लिए अखण्ड सोच की आवश्यकता होती है, क्योंकि संविधान, नियम कानून, निर्वाचन ये समग्र जनता के लिए होते हैं अगर चंद जनता भी इसके विरोध में खड़ी हो जाय तो देर सबेर इसका असर दिखता जरुर है । कुछ क्षणों के लिए ग«बार धूल की परतों में छिप जाय पर उसका अस्तित्व बरकरार रहता है । मधेश के नेतृत्व को साथ लेकर चलना ही देश को सही दिशा प्रदान कर सकती है । दो नम्बर प्रदेश का चुनाव इनके बगैर कराना उचित नहीं होगा । मधेश की जनता चुनाव परिणाम और मतदाताओं के मनोभाव को समझ रही है, ऐसे में तीसरे चरण के चुनाव में उन्हें अपनी अडिगता दिखानी होगी ।


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