क्या हो पाएगा निर्णायक आन्दोलन ?

अमरेन्द्र यादव :कुछ ही दिन पहले नेपाल की राजनीति में एक नई मोर्चाबन्दी का उदय हुआ है । नामाकरण किया गया है – संघीय गठबन्धन । इस में संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा का विलय हुआ है या अन्य राजनीतिक÷सामाजिक शक्तियों ने मधेशी मोर्चा के आधिपत्य को स्वीकारा है, ये अभी कह पाना मुश्किल है । मगर मुख्यतः मधेशी और जनजाति राजनीतिक शक्ति को एक साथ लाकर नया राजनीतिक केन्द्र बनाने का एक नायाव प्रयास किया गया हैं । खस आर्य समुदाय के अधीनस्थ रहे नेपाली राज्यसत्ता को टक्कर देने के लिए । सड़क संघर्ष के द्वारा मधेशी और जनजाति समुदाय को अधिकार दिलवााने के लिए ।

यह गठबन्धन एक वर्ष पहले तक अस्तित्व में देखे गए संघीय लोकतान्त्रिक गठबन्धन की याद दिलाता है । दोनों गठबन्धन में कोई खास अन्तर दिखाई नही पड़ता । पुराने गठबन्धन मे ३० दल थे, जिस में पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड और विजय गच्छदार थे और अभी के गठबन्धन मे २७ दल आबद्ध हैं । इस गठबन्धन में वो दोनों नहीं हैं । क्योकि दोनों की पार्टियाँ वर्तमान सरकार में हैं । दूसरा फर्क यह है कि उस गठबन्धन का नेतृत्व प्रचण्ड किया करते थे । नया गठबन्धन का नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है , फिलहाल यह नेतृत्वविहीन है । प्रचण्ड के नेतृत्व के गठबन्धन का क्या हश्र हुआ ये तो सब को मालुम ही है । प्रचण्ड के द्वारा नेकपा एमाले अध्यक्ष केपी ओली और नेपाली कांग्रेस के तत्कालीन सभापति सुशील कोइराला से ‘याराना’ कर लेने के बाद ३० दलीय गठबन्धन का सिर्फ विघटन नही हुआ, पहचानवादी आन्दोलन को बहुत बड़ा झटका भी लगा ।
इस गठबन्धन का क्या हश्र होगा ? क्या गठबन्धन कोई परिणाम दे पाएगा ? भविष्य के गर्भ में छिपा ये सब से बड़ा सवाल है । लेकिन गठबन्धन निर्माण की पृष्ठभूमि और औचित्य पर थोड़ी नजर डाली जाय तो बहुल कुछ मालुम पड़ सकता है । अन्य मधेशी पार्टी सहित मधेशी मोर्चा में आबद्ध दलों ने अपने बलबूते पर पिछला आन्दोलन किया था । उस वक्त आम हड़ताल से लेकर ‘नाकाबन्दी’ तक भी की गयी थी । मगर परिणाम शून्य निकला । इसलिए मधेश के आदिवासी थारु समुदाय और पहाड़ की जनजाति शक्तियों से तालमेल मिलाकर संघीय गठबन्धन बनाया गया है ।

राष्ट्रीय आन्दोलन ः एक दिवास्वप्न ?

संघीय गठबन्धन के नेताओं ने पत्रकार सम्मेलन के दौरान आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी बनाने का उद्घोष भी किया था । राष्ट्रीय आन्दोलन की परिस्थिति निर्माण करते हुए सिंहदरवार का घेराबन्दी करना और उसी आन्दोलन के बल पर संविधान में मनचाहा संशोधन करते हुए मधेशी और जनजाति समुदायों का अधिकार सुनिश्चित करना घोषित आन्दोलन का सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है ।
इस सन्दर्भ में सब से बड़ा सवाल उभर कर आता है कि क्या आन्दोलनकर्मी घोषित आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी बना पाएँगें ? पहाड़ी इलाकों मे बड़े आन्दोलन का इतिहास नही रहा है । बिक्रम सम्वत् २००७ साल की जनक्रान्ति से लेकर आज तक के आन्दोलनों का इतिहास पलटाया जाए तो आन्दोलन का केन्द्र मधेश और राजधानी काठमाडों ही रहा है । तो इस बार क्या चमत्कार हो पाएगा ? किस आधार पर मधेशी और जनजाति नेता लोग कह रहे हैं कि वो लोग पहाड़ में भी आन्दोलन का सैलाव ले आएँगें ?
इस बार के आन्दोलन का सब से बड़ा आधार भी मधेश ही है । पिछले आन्दोलन से सन्तोषजनक परिणाम नहीं निकलने के कारण मधेश की जनता निराश तो है । मधेशी नेताओं के प्रति अविश्वास का संकट भी बढ़ा है । मगर राज्य और नया संविधान के प्रति जो आक्रोश और असन्तुष्टि थी मधेश में, वो कम नही हुई है । बल्कि बढ़ी है । इसी आधार पर कहा जा सकता है कि अगला आन्दोलन का सब से बड़ा आधार मधेशियों का वही आक्रोश और असन्तुष्टि है ।

काठमाडों केन्द्रित आन्दोलन का भविष्य

संघीय गठबन्धन ने आन्दोलन को राजधानी केन्द्रित करने का ऐलान भी किया है । काठमाडों में वैसे तो नारा, जुलुस, धर्ना और अन्तरक्रिया तो मधेशी लोग करते आए हैं । आने वाले दिन में भी कर ही लेंगें । मगर विरोध के इन सब गतिविधियों को आन्दोलन के स्तर पे ले जा पाएगें ये कह पाना मुश्किल है । काठमाडों में आन्दोलन का सैलाब लाने के लिए स्थानीय जनता का साथ अपरिहार्य है । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो स्थानीय आदिवासी नेवार समुदाय का समर्थन अनिवार्य है । क्या नेवार समुदाय इस आन्दोलन का समर्थन करेंगे ?
नेवार समुदाय द्वारा आन्दोलन को समर्थन नही करने का तीन आधार है । पहला, मधेश के प्रति राज्य और शासक समुदाय का जो नजरिया है, नेवार खुद को उस से बहुत ज्यादा अलग नहीं रखते । दूसरा, नया संविधान के प्रति मधेशियों के जैसी असन्तुष्टि नेवार समुदाय में नहीं दिख रही है और तीसरा, मधेशियों के द्वारा किए गए पिछले आन्दोलन में भारतीय सरकार का खुलेआम साथ और समर्थन मिल जाने के बाद पहाड़ के जनजाति सहित नेवार समुदाय भी मधेशी नेताओं के प्रति और ज्यादा सशंकित हो गए हैं ।
नेपाल के पहाड़ी भूभाग में बड़ा और निर्णायक आन्दोलन का इतिहास नहीं रहा है । इस बार जनजाति समुदाय ने साथ दे दिया तो आठवाँ आश्चर्य घटित हो जाएगा । मगर पहाड़ी क्षेत्र में धर्ना, जुलुस और विरोध कार्यक्रम से ज्यादा बड़ा आन्दोलन हो पाना मुश्किल लगता है । क्योंकि इस के पीछे भी तीन÷चार कारण हैं । पहला, जनजाति समुदाय छोटे–छोटे जाति मे विभक्त हैं और उन लोगों का जातीय कलस्टर भी ज्यादा सघन नहीं है । दूसरा, जनजाति लोग मधेशी समुदाय से खुद को ज्यादा स्तरीय नेपाली मानते हैं । उन में भेदभाव की मात्रा भी कम है । तीसरा, अपने खास समुदाय के बहुल के आधार पर संघीय प्रदेश मिलने का आत्मविश्वास भी जनजाति समुदाय में अभी तक उत्पन्न नहीं हो पाया है और चौथा, भारत के समर्थन में नाका अवरोध करने के बाद मधेशियों से साथ पिछले समय कम होती दूरी फिर बढ़ी है ।

मधेशी नेताओं का गहराता मतभेद

मधेशी मोर्चा में जारी बेमेल और गहरी मतभेद कोई नई बात नहीं है । पिछले आन्दोलन के क्रम में भी ये बेमेल और खींचातानी खुलकर सामने आई थी । जो मधेश आन्दोलन को बदसूरत ही करने का प्रयास किया था । संघीय गठबन्धन निर्माण के सन्दर्भ मे भी मोर्चा सम्बद्ध पार्टियोंँ के बीच वही सब खुलकर सामने आया है । खासकर आन्दोलन को निर्णायक बनाने के लिए जनजाति समुदाय के साथ सहकार्य किया जाए या नही, और किया न जाए तो किस तरह का तालमेल बैठाया जाए, इस सन्दर्भ में मोर्चा को गम्भीर मतभेद से गुजरना पड़ा । इसी दौरान नेताओं द्वारा एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला भी देखा गया ।
मधेशी मोर्चा द्वारा अपने बलबूते पर किया गया पिछला आन्दोलन प्रत्युत्पादक हो जाने के बाद मधेशी नेता लोग बड़े असमन्जस में पड़ गए थे । बड़ी तीन पार्टियाँ और एकल जातीय राज्यसत्ता को घुटने टिकाने के लिए क्या किया जाए ? तब जाकर मधेशी नेताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि मधेश के थारु के अलावा पहाड़ के जनजाति केन्द्रित पार्टियों के साथ मिलकर आन्दोलन के लिए बड़ा गठबन्धन बनाया जाए । इस के लिए सब से बड़ा माध्यम बने उपेन्द्र यादव । क्योंकि जनजाति बहुल अशोक राई के पार्टी से एकीकरण करने के बाद जनजाति राजनीतिक पार्टी और नेताओं के साथ उनकी निकटता बढ़ी है । इसी आधार पर जनजाति नेता और पार्टियों के साथ तालमेल बैठाने का जिम्मा उपेन्द्रजी को ही मिला ।
जनजाति पार्टियाँ और संगठनों के साथ गठबन्धन निर्माण के लिए जब उपेन्द्र यादव अग्रसर हुए तो उन पर मधेशी पार्टी और मधेशी नेताओं को कम महत्व देने का आरोप लगने लगा । मधेशी मोर्चा सम्बद्ध कुछ पार्टी के नेताओं ने गठबन्धन निर्माण के क्रम में उपेन्द्र यादव द्वारा मधेशी मोर्चा और विगत के मधेश आन्दोलनों को नजरअन्दाज किये जाने का आरोप भी लगाया गया । सामाजिक सञ्जाल पर आरोप लगाने वाले अधिकांश नेताओं का मानना था कि संघीय गठबन्धन निर्माण के सन्दर्भ में उपेन्द्र यादव जी महन्थ ठाकुर और राजेन्द्र महतो जैसे नेता और मधेशी मोर्चा को कम तरजीह दे रहे हैं । इस सन्दर्भ में ठाकुर और महतो जी की असन्तुष्टि भी किसी न किसी रूप में खुलकर सामने आयी । मधेशी मोर्चा के ज्यादातर नेताओं ने जनजाति शक्तियाँ को समेटकर मधेशी मोर्चा को ही बृहत्तर स्वरूप देने की बात भी सामने आयी । इस अडान के पक्ष में मधेशी मोर्चा का बहुत बड़ा हिस्सा सक्रिय था । परन्तु अन्त में मतभेद के बीच से रास्ता निकाला गया और संघीय गठबन्धन का जन्म हुआ ।
पिछले समय मोर्चा के भीतर देखे गए मतभेद के कारण ही संघीय गठबन्धन के संयोजक का चयन नहीं हो पाया । उपेन्द्र यादव और महन्थ ठाकुर में किसको किस आधार पर गठबन्धन का मुखिया बनाया जाए, गम्भीर मतभेद के कारण इस विषय को नही सुल्झा पाए । सारथी बिना का जो संघीय गठबन्धन नामक संघर्ष का रथ तैयार किया गया है । इस बार ये रथ अपने लक्ष्य पर पहुँच पाएगा कि नही, ये अभी कह पाना मुश्किल है ।

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