क्यों कहा सिके लाल ने, प्रधानमन्त्री ओली इंसानीयत भूल गए हैं : विजेता चौधरी

विजेता चौधरी, काठमांडू , २२ मई |

राजनीतिक विश्लेषक सिके लाल ने नए संविधान को नेपाल का संविधान न होकर जंगल राज्य का संविधान होने की टिप्पणी की है ।

देश के जाने–माने राजनीतिक विश्लेषक को आखिर ऐसी टिप्पणी करने की क्या जरूरत आन पड़ी होगी ? जाहिर सी बात है सरकार की नीति और मनमानी रवैए ने उन्हें ऐसा कहने को विवश किया होगा । क्योंकि सरकार का रवैया असहिष्णु होता जा रहा है । देश के प्रधानमन्त्री ओली, संविधान जारी होने के बाद और चीन से समझौता करने के बाद कुछ अधिक ही मुखर हो गए हैं । जिसकी वजह से वो रोज एक नई उड़ान भरते नजर आ रहे हैं और खुद के साथ ही जनता को भी अन्धा बनाए हुए हैं । वो अपने ही देश के ग्रासरुट राजनीति से गिरते हुए नजर आ रहे हैं ।

12109807_1184168201599213_6544293808968352211_o

 

नया संविधान जारी करने भर से ही सरकार इस कदर उछल रही है मानो कोई बड़ा तीर मार लिया हो । पर यह भूलने वाली बात नहीं है कि इस नई संविधान की नींव और सिचाई ६० से भी अधिक मधेशियों की लाश से हुई है । आज भी मधेश आन्दोलित है और आज २९ दल एक साथ संगठित होकर सिंहदरबार की दीवार तोड़ने को आमादा है । क्या ये सरकार की अपनी ही भू–राजनीतिक हार नही ?

एक अन्तरक्रिया कार्यक्रम में बोलते हुए विश्लेषक सिके लाल ने कहा जंगल राज्य में शेर को जो मन लगता है वो करता है पर मानव राज्य में ऐसा नही होता क्योंकि जंगल में कोई लिखित कानून नही होता पर मानव राज्य में लिखित कानून होता है ।

क्या उस लिखित कानून में देश के सभी जनता समायोजित नही हो सकती है ? सभी प्रदेश स्वायत्त और अधिकार सम्पन्न बनाने की जिम्मेबारी इस सरकार की नही है ? परन्तु बिडम्वना, आखिर सवाल तो फिर भी ज्यों का त्यों है । क्या उत्पीड़ित और सीमान्तकृत जनता की लड़ाई कभी खत्म नही होगी ? कब तक दहाड़ता रहेगा अकेला शेर ?

लाल ने मनोमानी संविधान कहते हुए ये भी कहा कि उस को संस्थागत करने का प्रयास राज्य कर रही है । नेपाल टेलीभिजन से प्रसारित सीधा सवाल में प्रधानमन्त्री से प्रस्तोता ने पूछा की असंतुष्ट दलों की माँग ऐसी भी क्या है जिसे पुरा नही किया जा सकता ? उनकी ओर से उल्टा प्रश्न आया कि पहचान क्या है ? हम सभी दलों को वार्ता में बैठ सभी मुददों को वार्ता द्वारा सामाधान करने को आह्वाहन करते है । पर वो मान नहीं रहे ।

वार्ता शायद सरकार का हठ बन गयी है । परन्तु उनके पिछले रवैए को देखकर तो स्पष्ट है कि यह कथित वार्ता बुलाने की नीति भी सिर्फ दिखाने के लिए ही है । क्योंकि विगत के किसी वार्ता में सरकार द्वारा कोई सकारात्मक पहल होती नहीं दिखी है । यही कारण है कि मधेशी दल संगठित होकर इसका विरोध करते आ रहे हैं और आन्दोलन आज भी जारी है ।

बहरहाल मापन हीन ज्वारभाटा की तरह लड़ाई की एक सीमा अवश्यमेव है । सरकार को उस परिस्थिति को संभवतः नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए शायद इसी बात को लाल ने सलिके के लहजे में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रधानमन्त्री केपी ओली इंसानीयत भूल गए हैं । लाल ने रामराज्य नही मानव राज्य की बात उठाई है । प्रश्न अधूरा है– आखिर क्यों जरुरत आन पड़ी मानव राज्य बात करने की ? क्या असहिष्णु सरकार शान्ति विरोधी है वा उपेक्षित जनता तथा आन्दोलन रत सभी दल मूर्ख ? जवाव आने वाला समय देगा ।

loading...