क्यों विफल हुए बाबा –
मनीषा सिन्हा

दो मुहिम, मकसद एक । जनमानस को उद्वेलित करने वाला पहला आंदोलन गांधीवादी अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला । शांति और सादगी से ओतप्रोत इस आंदोलन में भ्रष्टाचार के खिलाफ मौन जनाक्रोश हर जगह दिखा । शासन को भी इस गंभीरता का शीघ्र ही अहसास हो चला । परिणामस्वरुप भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जरुरी तरकीबों को ढूंढने का चरणबद्ध सिलसिला शुरु हुआ ।
भ्रष्टाचार के खिलाफ ही दूसरे आंदोलन का सूत्रपात योगगुरु बाबा रामदेव ने किया । बाबा का आक्रमक तेवर और तडक-भडक वाला यह आंदोलन लोगों की चर्चा का न केवल विषय बना बल्कि शुरुआती दौर में नीति-नियंता भी इसके असर में दिखाई दिए । लेकिन फिर इस सत्याग्रह को लेकर उपजे विवाद दर विवाद से ऐसा लगने लगा जैसे यह अपनी राह से भटक गया है । परिणास्वरुप धीरे-धीरे यह आंदोलन बाबा बनाम सरकार होता गया । एक ही नेक मकसद के लिए शुरु की गई दोनों मुहिम का अलग-अलग दिखायी पडÞता भावी अंजाम जहाँ चौंकाने वाला है, वहीं इन परिस्थितियों में अन्ना हजारे के सादगीपर्ूण्ा आंदोलन या बाबा रामदेव के आक्रमक आंदोलन की प्रासंगिकता एक बडÞा मुद्दा भी ।
सालों से ‘सब चलता है’ के साथ चल रही भारतीय जिंदगी में बीते दो महीनों में कुछ ऐसा हुआ जिसने कहा कि अब ऐसा नहीं चलेगा । जिंदगी में रवायत की तरह शामिल हो चुके भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में आक्रोश तो था लेकिन उसे व्यक्त करने का उन्हें मौका नहीं मिल पा रहा था । अन्ना हजारे और रामदेव के आंदोलनों ने भ्रष्टाचार के मोर्चे पर आम आदमी का नारा बुलंद कर बनी सरकार के खिलाफ इस नाराजगी को निकलने का मंच दे दिया । वहीं इन आंदोलनों में अधिकतर मांगें मानने के बावजूद सरकार जनता के भरोसे के पैमाने पर खाली हाथ ही नजर आ रही है ।
पाँच अप्रैल को अन्ना हजारे के अनशन की शुरुआत और पाँच जून को बाबा रामदेव के सत्याग्रह पर पुलिसिया कार्रवाई की दो तारीखों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी के गुस्से और नाराजगी के इजहार को एक आंदोलन की शक्ल देने में मदद की है । गांधीवादी जीवन व भ्रष्टाचार के खिलाफ लडर्Þाई की लंबी साख वाले ७४ वषर्ीय अन्ना तथा योग शिक्षा से घर-घर पैठ रखने वाले बाबा रामदेव की कोशिशों ने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया । इन आंदोलनों ने सत्यम से लेकर स्पेक्ट्रम और राशन से लेकर राष्ट्रमंडल खेल आयोजन तक घोटालों की लंबी फेहरिस्त से खीझी जनता को जमा होने का मंच दे दिया । कालाधन वापस लाने और भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए लोकपाल बनाने से शुरु हर्ुइ बात अब व्यवस्था परिवर्तन के नारे में तब्दील हो गई है ।
वैसे अन्ना के अनशन और बाबा के सत्याग्रह की जडÞ में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडर्Þाई का ही मुद्दा है । लेकिन इसके तरीकों में नजर आ रहे भेद ने कुछ महीने पहले तक मंच साझा कर रहे दोनों सुधारकों को कुछ फासले पर जरुर खडÞा कर दिया है । अन्ना के चरणबद्ध एजेंडे में फिलहाल लोकपात पर जो है वहीं बाबा की जिद विदेश में मौजूद भारत के कालेधन को लेकर है । बाबा के पीछे निष्ठावान अनुयायियों की भीडÞ है तो अन्ना के अनशन को युवाओं और मध्यमवर्गीय तबके के अलावा सेलेब्रिटी और संभ्रांत तबके का भी र्समर्थन मिला है । दोनों ही आंदोलनों में लोगों की भावनाओं के ज्वार का दबाव बनाने की रणनीति है । र्फक इतना है कि भ्रष्टाचार से मुकाबले के खिलाफ लडर्Þाई में रामदेव की अपील में भावुकता पर जो है तो अन्ना के अनशन में भावनाओं को तार्किकता के रैपर में परोसने की खूबी ।
हालांकि अन्ना का अनशन हो या बाबा का सत्याग्रह । सरकार इनके मोर्चे पर कमजोर ही नजर आई । दोनों घटनाओं ने सत्ता की कई अंदरुनी कमजोरियों की खुली नुमाइश कर मसले को काफी उलझा दिया । अन्ना के अनशन के प्रति सरकार ने शुरुआत में सख्ती दिखाई वहीं सत्याग्रह का संकल्प लेकर दिल्ली आए बाबा रामदेव की अगवानी को चार वरिष्ठ मंत्रियों की मौजूदगी ने शर्ीष्ा स्तर पर भ्रम का नजारा पेश किया । लेकिन दोनों घटनाओं के पटाक्षेप के वक्त सरकार का रुख उलट चुका था ।
बाबा के सत्याग्रह के खिलाफ रामलीला मैदान में आधी रात हर्ुइ पुलिसिया कार्रवाई से सिविल सोसाइटी की अधिकतर मांगों पर तेजी से अमल के बावजूद सरकार की साख को बट्टा ही लगा । शासन में बैठे लोग कहते हैं कि सत्ता व्यवस्था बोलने की इजाजत और जगह देती है । ऐसे में वह न तो मूक दर्शक बन गालियाँ खा सकती है ओर नहीं अराजकता के लिए रास्ता देना संभव है । साफ है कि बाबा रामदेव के आगे मानमनौव्वल करती सरकार कमजोर दिखाई दे रही थी तो कानून-व्यवस्था के नाम पर हर्ुइ पुलिस कार्रवाही के बाद उसकी छवि संकल्पवान सत्ता की नहीं बल्कि जुल्मी हुकूमत की बनी ।
हालांकि रामदेव के सत्याग्रह में सरकार और उनके बीच गुप्त सहमति की चिट्ठी के सामने आने और बाद के घटनाक्रम में योगगुरु के रुख ने इस मुद्दे को गहरा किया वहीं, सत्ता और सियासत के खेल को भी जगह दी । इसी के चलते सरकार ने आंदोलन के पीछे आरएसएस, भाजपा की भूमिका के आरोपों द्वारा सिविल सोसाइटी की ओर से बढÞ रहे नैतिक दबाव से बचने का गलियारा ढूंढ लिया ।
व्यवस्था परिवर्तन के नारे वाला यह पहला मौका नहीं है । पर्ूव प्रधानमंत्री वीपी सिंह बोफोर्स सौदे में दलाली और स्विस बैंको में जमा धन का मामला उठाकर सत्ता परिवर्तन के नायक बने । वहीं जयप्रकाश नारायण के व्यवस्था परिवर्तन के नारे के मुकाबले में लगाये गये आपातकाल ने कांग्रेस को उसके चुनावी इतिहास की सबसे करारी शिकस्त दी, लेकिन तारीख यह भी बताती है कि आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टर्ीीरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई वहीं वीपी सिंह प्रधानमंत्री कार्यालय में महज नौ महीने ही रुक पाए । विश्लेषक मानतें हैं कि व्यवस्था सुधार के मौजूदा आंदोलन की कमान संभालने वालों को इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि जनता बनाम सरकार की रस्साकशी में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली का ढाँचा न लडÞखडÞाए । साथ ही व्यवस्था बदलने के जोश में लोग संविधान में दिए नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण न करें ।
गरम मुद्दा, बडÞा र्समर्थन वर्ग फिर कहाँ चूक गए बाबा रामदेव ! उनकी लडर्Þाई हालांकि जारी है । लोगों के मन में यह सवाल उठाने लगे हैं कि उन्होंने आखिर ऐसी क्या चूक कर दी कि उनके कुछ साथी ठिक गए तो कुछ दूरी बनाने लगे – फरवरी में रामलीला मैदान से ही जब रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेडÞी तो अन्ना हजारे, जीआर खैरनार, विश्वबंधु गुप्ता, डाँ सुब्रमण्यम स्वामी, स्वामी अग्निवेश समेत कई विख्यात लोग उनके साथ खडेÞ थे । चार जून आते आते कुछ दूर हो गए तो कुछ के मन में असमंजस घिरने लगा । योग के जरिए करोडों के मन में श्रद्धा पा चुके बाबा के व्यापक र्समर्थक वर्ग को लेकर शायद ही किसी के मन में आशंका हो । यह उनकी सबसे बडÞी ताकत है । भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने जंग छेडÞी तो उनकी यह ताकत दिखी भी । शायद यही कारण है कि शुरुआती दिनों में सरकार घुटनों पर चलती उन्हें मनाने आई । पर रणनीतिक कमजोरी ने ताकत को कम कर दिया ।
बाबा के पास अनुकरण तो था पर रणनीति नहीं थी । योग गुरु शायद यह आंकने में भूल कर गए थे कि राजनीतिक महत्वांकाक्षा उनके साथियों को अलग कर देगी । उनकी इसी घोषणा ने बाद में सरकार को भी मौका दे दिया । बाबा कैंप की खामी यह थी कि उनके पास कोई ऐसा लेफ्टिनेंट नहीं था जिसके सहारे बाबा सीधी वार्ता से खुद को दूर रख सकते । वर्ना आचार्य बालकृष्ण की चिट्ठी भी सरकार को आक्रामक होने का मौका नहीं देती । गंभीर मुद्दे थे पर तैयारी नहीं थी। लिहाजा सरकार की राह आसान थी । माना जा रहा है कि पुलिस कार्रवाई ने उन्हें एक मौका दिया था जिसे उन्होंने गंवा दिया । समय थोडÞा और गुजरा तो उन्होंने फौज बनाने की बात कर साथियों को और दूर कर दिया । बाबा अपने भक्तों के अलावा समाज के दूसरे वर्गो को जोडÞने में असफल हो गए । लिहाजा मुद्दे तो हैं पर उनका नेतृत्व संकुचित हो गया ।
अन्ना ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का मुद्दा उठाया । यह काफी जटिल और तकनीकी मसला था । देश के सारे बडेÞ अर्थशास्त्री या कानूनविद एकजूट हो कर लोगों को भरोसा दिलाने कि इस तरीके से देश में भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है तो भी लोग संदेह करते । मगर अन्ना द्वारा सुझाए उपाय पर किसी को रति भर संदेह नहीं हुआ । उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था में लोकपाल नाम की एक एजेंसी होनी चाहिए । इसके लिए अलग से एक कानून बनाना पडेÞगा । और मैं बता रहा हूँ कि यह कानून कैसा हो । देखते ही देखते देश के सबसे पढेÞ-लिखे तबके के लोग इस मामूली से दिखने वाले शख्स के पीछे-पीछे चल रहे थे । लोगों को पता चला कि इसने पहले भी अपने इलाके में इस बीमारी का कामयाब इलाज किया है और लोगों को मर्ूख नहीं बनाया ।
सरकारी व्यवस्था में लोकपाल नाम की एक एजेंसी हो या नहीं इस बारे में आम लोगों को इससे पहले बहुत मालूम नहीं था । कानून के मसौदे में सरकार से बाहर के लोगों की भूमिका के बारे में भी अपने देश में कभी सुना नहीं गया था । लेकिन लोग तुरंत साथ आ गए । लोगों को इस आदमी कर्ीर् इमानदारी और जिद पर भरोसा था । अन्ना को हर तबके का र्समर्थन जरुर मिला, लेकिन बाबा रामदेव जैसे शुरुआती साथी का अलग आंदोलन शुरु करना उन्हें एक कमजोर रणनीतिकार साबित कर गया । इसी तरह वर्ेर् इमानदार छवि वाले बहुत से दूसरी सामाजिक कार्यकर्ताओं ओर कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को भी अपनी बातें नहीं समझा सके । उनके तरीके और फार्मूला से असहमत आवाजें लगातार आती रही हैं । साझा मसौदा समिति के गठन के रुप में अन्ना को शुरुआती कामयाबी भले मिली हो, लेकिन अभी बडÞी लर्डाई बाकी है । ऐसे में यह आम लोगों को तय करना होगा कि वे इस ऐतिहासिक मौके का फायदा उठा पाते हैं या फिर यह आंदोलन गैर-जरुरी सवालों और टकराव में उलझ कर टूट जाता है ।

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