क्रान्ति और संर्घष् का पर्याय सत्ता

लम्बे अर्से के अन्तरसंर्घष्ा के नाम पर सबसे बडी पार्टर्ीीकीकृत माओवादी में आए विभाजन के बाद सभी लोगों का अपना-अपना विश्लेषण है। कुछ इसे स्वाभाविक मान रहे हैं तो कुछ इसके पीछे किसी बडे रहस्य की खोज में लगे हैं। सरकार का नेतृत्व कर रही एकीकृत माओवादी में विभाजन के बाद उस पार्टर्ीीो बहुत अधिक र्फक नहीं पडा है। क्योंकि पार्टर्ीीें रहते हुए भी विरोधी गुट मोहन वैद्य समूह ने हमेशा ही संस्थापन का विरोध दूसरी पार्टर्ीीे नेता से कहीं अधिक किया करते थे। वैद्य समूह के अलग हो जाने का ना तो माओवादी के नेताओं के लिए बहुत अधिक हर्षका विषय है और ना ही विस्मय का। इस विभाजन को उन्होंने सामान्य रूप से लिया है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस दिन पार्टर्ीीवभाजन की औपचारिक घोषणा के लिए मोहन वैद्य समूह द्वारा पत्रकार सम्मेलन के जरिये की जा रही थी, ठीक उसी समय प्रचण्ड एक पार्टर्ीीे कार्यक्रम को संबोधन कर रहे थे और उन्होंने इस बारे में एक बार भी जिक्र नहीं किया। और ना ही उनके मन में किसी प्रकार का कोई असर दिख रहा था। हां पार्टर्ीीवभाजन के बाद अपनी शक्ति पर््रदर्शन करने वाले एकीकृत माओवादी के विशाल जनपर््रदर्शन के दौरान प्रचण्ड ने सिर्फइतना ही कहा कि यदि आज सभी साथ होते तो अच्छा होता। बांकी कई बार तो वैद्य समूह को माओवादी के तरफ से पार्टर्ीीें विभाजन लाने के लिए उनके नेताओं को कोसा ही गया। मोहन वैद्य ने बडÞी बडÞी बातें करते हुए पार्टर्ीीें विभाजन कर दिया लेकिन पीछे का कारण देखने पर मालूम चलता है कि उनके साथ आए अधिकतर नेता मंत्री पद नहीं पाने या फिर मनचाहा मंत्रालय नहीं मिलने के कारण सभी नाराज थे।
बात चाहे खनाल सरकार में मंत्री को भेजने को लेकर हो या फिर अपने पक्षधर नेताओं को मंत्री से वापस बुलाने की हो। हर बार मंत्रालय को लेकर मोहन वैद्य ने बार्गेनिंग की है। खनाल सरकार के समय अपने पक्ष के नेताओं को पहले तो मंत्रालय में भेज दिया लेकिन जब देखा कि उनके पक्ष के नेताओं को मनमाफिक मंत्रालय नहीं मिल रहा है तो उन्होंने अपने पक्ष के सभी नेताओं को मंत्री पद से वापस बुला लिया। यही कुछ हाल भट्टर्राई के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भी हुआ। पहले तो मनमाफिक मंत्रालय के लिए मोहन वैद्य बारगेनिंग करते रहे और जब उन्हें लगा कि यहां उनकी दाल नहीं गलने वाली है तो उन्होंने अपने पक्षधर नेताओं को मंत्रालय में भेजने से ही इंकार कर दिया। मोहन वैद्य चाहते थे कि खनाल सरकार में देव गुरूंग को गृह मंत्री बनाए जाए। लेकिन माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने अपने सबसे भरोसेमन्द नेता कृष्ण बहादुर महरा को वह पद दे दिया। इसी तरह भट्टर्राई सरकार में वैद्य की मांग यह थी कि सीपी गजुरेल को उप-प्रधानमंत्री सहित का विदेश मंत्रालय दिया जाए लेकिन वह बात भी नहीं मानी गई और नारायणकाजी श्रेष्ठ को वह मंत्रालय दे दिया गया। काफी दिक्कतों के बाद से मोहन वैद्य देव गुरूंग को संसदीय दल का उप-नेता बनाने में कामयाब हुए थे। जिस का खामियाजा यह हुआ कि संविधान के सभी विवादित विषयों पर प्रचण्ड की सहमति के बाद से उसका विरोध करना देव गुरूंग और वैद्य पक्ष के नेताओं की रूटिन बन गई।
इसके अलावा मोहन वैद्य माओवादी और मधेशी मोर्चा के नेताओं के बीच हुए चार सूत्रीय समझौता का भी विरोध कर रहे थे। उसके पीछे कारण यह था कि इस बार मधेशी मोर्चा के नेताओं को काफी महत्वपर्ूण्ा मंत्रालयों की जिम्मेवारी दी गई थी जो कि मोहन वैद्य अपने पक्षधर नेताओं के लिए मांग रहे थे। लेकिन माओवादी ने अपना सत्ता टिकाने के लिए मधेशी मोर्चा को नाखुश नहीं करना चाहती थी इसलिए वैद्य को नाराज करते हुए भी सत्ता को टिकाए रखा। नतीजा यह हुआ कि वैद्य और अधिक आक्रामक हो गए। पार्टर्ीीवभाजन के बाद भी इस समय जोर शोर से वैचारिक क्रान्ति की बात करने वाले मोहन वैद्य समूह के नेता को यह विश्वास है कि अगली बनने वाली सरकार में उनके दल को महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय मिल सकता है। इसलिए विचारधारा से कोसो दूर रही कांग्रेस के खेमे में जा मिले है और अगली सरकार में अपनी सुनिश्चितता के लिए दौड धूप कर रहे हैं। नई बनने वाली सरकार में अपनी सहभागिता को पक्की करने के लिए मोहन वैद्य और उनकी पार्टर्ीीे नेताओं ने राष्ट्रपति से भी मिलकर अनुनय-विनय किया है। सत्ता के लिए दलों में अपनी धार को त्याग देना अपने सिद्धांतों की तिलांजलि दे देना और अपने पुराने विचारधारा की धज्जियां उडाना अगर इन सभी का कोई उदाहरण देखना हो तो मोहन वैद्य की पार्टर्ीीें देखा जा सकता है।
जिस संसदीय प्रणाली का वह विरोध करते आ रहे हैं, उन्हीं संसदीय प्रणाली के पृष्ठ पोषक नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर नई सरकार बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। जिस संशोधनवादी और सुधारवादी का आरोप लगाते हुए मोहन वैद्य ने एमाले को धिक्कारा था आज उसी के साथ राजनीतिक सहकार्य कर सरकार में अपनी सुनिश्चितता को पक्की कर रहे हैं। जिस मधेशी मोर्चा को राष्ट्रद्रोह और मधेशी जनता को सेना में प्रवेश करने से रोकने के लिए चार सूत्रीय समझौते को जलाया था, उसी मांग को लेकर मंत्री पद गंवाने वाले शरद सिंह भण्डारी से भी दोस्ती करने में उन्हें हिचक नहीं है। इसलिए पार्टर्ीीें विभाजन के लिए शब्दों का कोई भी तीर मोहन वैद्य और उनके नेता चला ले, अपने कार्यकर्ताओं को भरमाने के लिए चाहे वे लाख दलीलें दें और क्रान्तिकारी भाषण दें, लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता में नहीं जाने की उनकी छटपटाहट सबके सामने आ गई है। संस्थापन पक्ष में रहकर जिस सत्ता का स्वाद वो नहीं ले पाए या अपने साथियों को मनमुताबिक मंत्रालय नहीं दिला पाए उसी सत्ता के लिए आज अपने विचारधारा और क्रान्ति की धार को छोडकर किसी के भी साथ सहकार्य करने के लिए उतावले हो रहे हैं। जिस राष्ट्रपति के एक भी कदम को कू की संज्ञा दे रहे थे आज उसी राष्ट्रपति को सरकार बर्खास्त करने के लिए उकसा रहे हैं।

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