क्रान्ति का राग आलापते विप्लव

लीलानाथ गौतम:नेपाल में बहुत से राजनीतिक आन्दोलन हुए । ००७, ०४७ और ०६२/०६३ में हुए जनआन्दोलन को छोडÞ कर राजनीति में कम्युनिष्ट आन्दोलन को लेकर ही ज्यादा चर्चा हर्ुइ है । क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टि गठन, व्रि्रोह, सशस्त्र युद्ध, जनयुद्ध आदि शब्द वषार्ंर्ेेे नेपाली राजनीति में बहस का विषय बना । ऐसी ही अवस्था में एक और बहस शुरु हर्ुइ है- नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ को लेकर । उन्होंने हाल ही में नया कम्युनिष्ट पार्टि गठन किया है । मोहन वैद्य नेतृत्व वाला नेकपा-माओवादी से अलग हो कर पार्टर्ीीचिव चन्द ने अपने नेतृत्व में नेकपा माओवादी नामक नई पार्टर्ीीा निर्माण किया है । उक्त पार्टि भावी कार्यदिशा कैसी रहेगी – इसका पर्ूण्ा खाका अभी र्सार्वजनिक नहीं हुआ । लेकिन नेपाल कि कम्युनिष्ट राजनीति में उक्त समूह को लेकर चर्चा परिचर्चा तेज हइ है ।Baidhya & Biplab
कम्युनिष्ट के नाम में हुए झापा आन्दोलन के बाद सब से ज्यादा कम्युनिष्ट आन्दोलन की चर्चा वर्तमान एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल प्रचण्ड के नेतृत्व में सम्पन्न दस वषर्ीय सशस्त्र युद्ध की ही हर्ुइ है । वि.सं. २०५२ साल में ‘दर्ीघकालीन जनयुद्ध’ नाम देकर शुरु उस युद्ध में हजारों ने अपनी जान गंवाई, लाखों विस्थापित हुए । मगर उक्त युद्ध द्वारा जनता की जीवनशैली कोई खास परिवर्तन कहीं भी नजर नहीं आया । राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उसी युद्ध के कारण कुछ परिवर्तन भी अवश्य हुए हैं । माओवादी आन्दोलन की समाप्ति के साथ-साथ सम्पन्न ०६२/०६३ का दूसरा जनआन्दोलन सफल होने की पृष्ठभूमि में दस वषर्ीय सशस्त्र युद्ध का ही प्रभाव रहा था । दूसरे जनआन्दोलन की पृष्ठभूमि में अगर दस वषर्ीय युद्ध नहीं होता तो नेपाल से राजसंस्था का विधिवत अन्त्य भी सम्भव नहीं था । इस सर्न्दर्भ में बहुतों का कहना है कि सामन्ती संस्कारयुक्त राजसंस्था की विदाई के अलावा इस युद्ध ने नेपाली जनता को कुछ भी नहीं दिया है ।
इतना होते हुए भी १२ सूत्रीय बृहत शान्ति सम्झौता द्वारा हिंसात्मक राजनीति त्याग कर शान्तिपर्ूण्ा राजनीति में पदार्पित माओवादी, वि.सं. २०६४ साल में सम्पन्न प्रथम संविधानसभा निर्वाचन में सब से बडÞी पार्टर्ीीे रूप में स्थापित हर्ुइ । लेकिन आन्तरिक रूप में एमाओवादी कमजोर होता जा रहा था । जिसकी भनक एमाओवादी नेतृत्व को नहीं थी । निर्वाचन के बाद एमाओवादी ने तत्कालीन एकता केन्द्र के साथ पार्टर्ीीकीकरण किया । एकता केन्द्र के नेताओं को हैसियत से ज्यादा ही महत्व देकर पदीय जिम्मेदारी भी दी, जनयुद्ध में योगदान देने वाले बहुत माओवादी कार्यकर्ता ने इस में असन्तुष्टि भी व्यक्त की थी । जिसके चलते माओवादी में अपना जीवन र्समर्पण करनेवाले हजारों कार्यकर्ता अवसर से वञ्चित हुए थे । इतना ही नहीं, उसके बाद माओवादी युद्ध के मूल उद्देश्य और विषयवस्तु के विपरीत नेताओं की गतिविधि दिखाई देने लगी । कितने ही माओवादी नेता ने काठमांडू में घर और जमीन खरीद लिया । रातो-रात नेता लोग करोडÞपति बनते जा रहे थे । लेकिन कार्यकर्ता अपनी दैनिकी चलाने के लिए और परिवारिक रोजीरोटी के लिए खाडÞी मुल्कों जाने के लिए बाध्य होते जा रहे थे । माओवादी जनयुद्ध में सक्रिय योगदान देने वाले हजारों लडाकू अभी भी विदेश में अपना पसीना बहा रहे हैं । राजनीतिक क्रान्ति सम्पन्न होते हुए भी सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति की ओर माओवादी नेताओं ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया । जिसके चलते माओवादी के प्रति आस्थावान और आशावान जनता निराश होने लगी । दूसरी संविधानसभा में माओवादी की शर्मनाक हार के लिए एक महत्वपर्ूण्ा कारण यह भी था ।
कम्युनिष्ट केन्द्र के नाम में दूसरी पार्टर्ीीें आवद्ध नेता तथा कार्यकर्ता को एमाओवादी ने अपनी पार्टर्ीीें प्रवेश जारी रखा । माओवादी में जीवन र्समर्पण करनेवाले कार्यकर्ता इससे असन्तुष्ट थे । पार्टर्ीीें त्याग, तपस्या और बलिदान देने वाले कार्यकर्ता को उपेक्षित करते हुए गुण्डागर्दी, अपहरण, फिरौती, डकैती, भ्रष्टाचार आदि कार्य में लिप्त अन्य दलों से आए हुए नेता तथा कार्यकर्ताओ की मनमानी पार्टर्ीीें बढÞने लगी । जिसके चलते माओवादी, जनता की नजर में दिनों-दिन नीचे गिरते गए । जातीय और क्षेत्रीय नारा भी माओवादी को कमजोर बना रहा था । इधर एमाओवादी का दम्भ और भ्रम कम नहीं हो रहा था । उससे लग रहा अब वर्षोंं तक कोई पार्टर्ीीम से लोहा नहीं ले सकती । जिसके चलते पार्टर्ीीा मूल अस्तित्व ही धराशायी होने लगा । जिस उद्देश्य के लिए पार्टर्ीीे दस वषर्ीय युद्ध किया था, उस में आवद्ध कार्यकर्ता उपेक्षित होने लगे । इसी क्रम में एमाओवादी में दबी जवान में व्रि्रोह का स्वर सुनाइ देने लगा । पहली बार माओवादी में मणि थापा और रवीन्द्र श्रेष्ठ ने औपचारिक रूप में व्रि्रोह किया था । संविधानसभा निर्वाचन सम्पन्न होने के बाद पहली बार मातृका यादव ने पार्टर्ीीे व्रि्रोह किया । उसके बाद व्यक्तिगत रूप में छोटे-मोटे व्रि्रोह बहुतों ने किया । वि.सं. २०६९ साल में मोहन वैद्य के नेतृत्व में जो व्रि्रोह हुआ, वह पार्टर्ीीतिहास में ही सबसे बडÞा व्रि्रोह था । जिसके चलते पार्टर्ीीपष्ट रूप में दो घडÞे में विभक्त हो गई । हाल मोहन वैद्य नेतृत्व में भी औपचारिक विभाजन आया है । नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ ने पार्टर्ीीे अलग होते हुए कहा है- एमाओवादी से विभाजन क्यों होना पडÞा – इसका औचित्य पुष्टि नेकपा-माओवादी ने नहीं किया, नतीजतन नयी पार्टर्ीीनाने के अलावा हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था
विप्लव के इस व्रि्रोह को सामान्य बताने वाले भी है । उन लोगों को यह बात समझना चाहिए कि ०५२ साल में सशस्त्र युद्ध की घोषणा होते वक्त उस युद्ध को भी सामान्य बताया जा रहा था । बहुतों ने इसको हँसी-मजाक का विषय भी बनाया था । जिस के परिणामस्वरुप देश कोे दस वषर्ीय सशस्त्र युद्ध झेलना पडÞा था । इसीलिए हमारे यहाँ सशस्त्र युद्ध तथा कम्युनिष्ट आन्दोलन जल्द ही ऊँचाई क्यों लेता है – इस के विज्ञान के बारे विश्लेषण होना आवश्यक है । सामान्यतः इसका सहज और छोटा उत्तर है- वर्षों से हो रहे राजनीतिक उत्पीडÞन और आर्थिक रूप से कष्टपर्ूण्ा जीवन । हाँ, जहाँ जनता रोजी रोटी, पहचान तथा अस्तित्व के लिए अपना सारा जीवन अर्पण करने के लिए बाध्य होते हैं, वहाँ क्रान्ति और व्रि्रोह समय से पहले ही उ+mचाई लेता है । इसीलिए विप्लव द्वारा उद्घोषित इस व्रि्रोह को सामान्य कहकर नजरअन्दाज करना भविष्य के लिए ज्यादा खतरनाक भी साबित हो सकता है ।
देश में संविधान निर्माण प्रक्रिया जारी है । संविधान जनचाहना अनुसार बनना चाहिए, इस बात को लेकर भी विप्लव ने व्रि्रोह किया है । उन्होंने वर्तमान संविधानसभा द्वारा जनता के पक्ष में संविधान नहीं बन सकता, ऐसा कहते हुए संविधानसभा को ही खारिज करने की मांग की है । ऐसी अवस्था में अगर सच में ही संविधान ने जनचाहना को सम्बोधन नहीं किया तो असन्तुष्ट जनता विप्लव की ओर आकषिर्त हो सकते हैं, इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । इस ओर संविधान निर्माणकर्ता का ध्यान जाना जरूरी है ।
क्या क्रान्ति सफल हो सकती है –
विप्लव ने अभी जो व्रि्रोह और क्रान्ति का उद्घोष किया है, उनके उद्देश्य के अनुसार उस क्रान्ति को परिणामदायी बनाना उतना सहज नहीं है । देश के भविष्य बनाने के लिए कैसा संविधान निर्माण होना चाहिए – इस बात को लेकर सम्पर्ूण्ा राजनीतिक दल माथा-पच्ची कर रहे हैं । अर्थात् संविधान निर्माण प्रक्रिया जारी है । ऐसी अवस्था में इस प्रक्रिया से भागना ठीक नहीं था, इस बात को उन्होंने गम्भीरता से नहीं लिया । हाँ, वे कम्युनिष्ट विचारधारा के व्यक्ति हैं । कम्युनिष्ट सिद्धान्त और दर्शन के अनुसार देश में शासन व्यवस्था स्थापित करना उन का उद्देश्य हो सकता इसके लिए क्रान्ति करना हमारा उद्देश्य है, विप्लव ऐसा बता भी सकते हैं । लेकिन इसके लिए भी उपयुक्त वातावरण और पर्ूवाधार भी होना जरुरी है । अभी वह विल्कुल नहीं है । बात रही सशस्त्र युद्ध तथा क्रान्ति की, यह भी उन के नेतृत्व में सम्भव नहीं है, कम्युनिष्ट विचारधारा के निकट रहने वाले ही ऐसा कहते हैं ।
प्रथमतः विप्लव उस पीढÞी के नेता हैं, जो दस वषर्ीय सशस्त्र युद्ध का भी नेतृत्वकर्ता थे । एक ही पीढÞी के नेता दो बार क्रान्तिकारी धार का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं, यह मान्यता सिर्फनेपाल में ही नहीं, विश्वव्यापी है । साथ में यह भी बताया जाता है कि उनका चरित्र भी ऐसा क्रान्तिकारी नहीं है, जो नेतृत्व प्रदान कर सके ।
द्वितीयतः अन्तर्रर्ाा्रीय र्समर्थन बिना कोई भी राजनीतिक क्रान्ति सफल नहीं हो सकती । आन्तरिक रूप में कुछ चर्चा हासिल की जा सकती है, लेकिन उससे अन्तर्रर्ाा्रीय मान्यता नहीं मिल सकती । दस वषर्ीय सशस्त्र युद्ध का अन्त भी कुछ ऐसे ही हुआ था । १२ सूत्रीय सम्झौता, तत्कालीन सात दलीय नेतृत्व में सम्पन्न दूसरा जनआन्दोलन और माओवादी का शान्तिपर्ूण्ा राजनीति में प्रवेश, इस तथ्य को उजागर करते हैं ।
इसी तरह राजनीतिक क्रान्ति के लिए युवा पीढÞी का साथ और र्समर्थन सख्त जरूरी होता है । हाल में जो युवा हैं, वे एक बार राजनीतिक आन्दोलन में हिस्सा ले चुके हैं । राजनीतिक दलों के ही कारण इन युवा पीढÞी में राजनीति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं बन पा रहा है । दस वषर्ीय युद्ध, जनआन्दोलन, मधेश आन्दोलन, जनजाति आन्दोलन आदि को अच्छी तरह देखने और समझने वाले ऐसे युवा समझने लगे हैंं कि राजनीति एक ऐसा व्यावसायिक पेशा है, जहाँ भ्रष्ट, बर्ेइमान और नैतिकताविहीन व्यक्तियों का वर्चस्व रहता है । विगत कुछ वर्षके राजनीतिक इतिहास ने इस कथन का र्समर्थन भी किया है । राजनीतिकर्मी के लिए इससे ज्यादा दर्ुभाग्य और शर्मनाक बात क्या हो सकती है – आजकल के युवा नेपाल की राजनीतिक क्रान्ति में सहभागी होकर अपना जीवन बर्बाद करने से बेहतर खाडÞी मुल्क में जाकर अपनी और परिवार का भविष्य बनाना चाहते हैं ।
समाज में युवाओंं का दूसरा जमात भी है, जो हरदम फेशबुक, ट्वीटर जैसे सामाजिक सञ्जाल में अपना समय व्यतीत करते हैं । इन लोगों के लिए राजनीतिक क्रान्ति और आन्दोलन बकवास का विषय माना जाता है । दूसरी बात सामाजिक सञ्चाल तथा सूचना प्रविधि के विकास के कारण संसार अपने बस में है, ऐसा सोचने वाले युवा जमात की संख्या बढÞती जा रही है । यह जमात राजनीतिक क्रान्ति नहीं, व्यक्तिगत आर्थिक उन्नति चाहता है । व्यक्तिगत आर्थिक समृद्धि के लिए बाधक नेपाल का राजनीतिक वातावरण है, ऐसा उन लोगों का मानना है । इसीलिए ऐसे व्यक्ति डीभी के माध्यम से हो या स्टुडेन्ट भिसा से, नेपाल में रहना नहीं चाहते हैं । डीभी और स्टुडेन्ट भिसा में पहुँच नहीं रखने वाले युवा, खाडÞी मुल्कों में जा कर चौकीदारी करना बेहतर समझते हैं । गाँव में खेती किसानो के लिए युवा का अभाव, शहर और औद्योगिक क्षेत्र में दक्ष कामदार का अभाव, इस बात का उदाहरण है । ऐसी अवस्था में विप्लव की क्रान्ति के लिए कंधा से कंधा मिला कर साथ देने वाले युवा कितने हो सकते हैंं –
इतना होते हुए भी नेपाली समाज में विप्लव का प्रभाव विल्कुल नहीं है, ऐसा समझना बडÞी भारी भूल हो सकती है । क्योंकि विप्लव की क्रान्ति के मुद्दे में जन-जीविका का सवाल भी जुडÞा हुआ है । विभिन्न कारण के चलते विदेश जाने के लिए असफल और रोजगार के लिए स्वदेश में ही भटकने वाले युवा कुछ देर के लिए उनकी क्रान्ति के प्रति आकषिर्त हो सकते हैं । ऐसे युवाओं के मस्तिष्क में हिंसात्मक आन्दोलन से ही क्रान्ति सफल हो सकती है, ऐसा विचार फल-फूल सकता है । राजनीति के प्रति रुचि रखनेवाले, लेकिन वर्तमान राजनीतिक गतिविधि से असन्तुष्ट व्यक्ति विप्लव का साथ दे सकते हैं, जो वर्तमान सत्ताधारियों के लिए भविष्य मेंं महंगा साबित हो सकता है । इसलिए इतिहास से पाठ सीखना जरूरी है ।
विप्लव की जन्मकुण्डली
नेत्रविक्रम चन्द ऊर्फविप्लव का जन्म रोल्पा जिला के इरिवाङ गाविस, केबरी गाँव में वि.सं. २०२४ साल फाल्गुन ११ गते हुआ था । ०४८ साल में वह कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे पर्ूण्ाकालीन सदस्य हुए थे । वि.सं. ०४३ साल में पार्टर्ीीेता काशीराम र्घर्ती के हाथों उन्होंने पार्टर्ीीदस्यता ली थी । ०५४ साल में विप्लव माओवादी के केन्द्रीय सदस्य बने थे । बचपन से ही कुछ हठी स्वभाव के विप्लव का पालन-पोषण उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था । उन्होंंने दो कक्षा तक गाँव के ही राष्ट्रीय प्रावि में अध्ययन किया । उसके बाद लिबाङ के बालकल्याण मावि में अध्ययन किया । ०४३ साल में उसी विद्यालय से उन्होंने एसएलसी उर्तीण किया । उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे रोल्पा से पहली बार काठमांडू आए थे ।
उन्होंने काठमांडू के ‘ल क्याम्पस’ में कानून की पढर्Þाई शुरु की । उसी समय वे अखिल क्रान्तिकारी के काठमांडू जिल्ला अध्यक्ष होते हुए केन्द्रीय विद्यार्थी नेता बनने में सफल हुए । लेकिन राजनीति के कारण उन्हे अपनी पढर्Þाई बीच में छोडÞनी पडÞी । उनका परिवार रोल्पा छोडÞ कर वि.सं. ०४५ साल में कपिलवस्तु के शिवगढÞी में आ गया । तत्कालीन दस वषर्ीय जनयुद्ध में विप्लव ने कर्ण्ााली को ही अपना मुख्य कार्य क्षेत्र बनाया था । जनयुद्ध काल में विप्लव अध्यक्ष प्रचण्ड के अत्यन्त निकट व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे ।
जनयुद्धकाल में उन्होंने अनेक मोर्चा का नेतृत्व किया था । कर्ण्ााली में सिर्फबन्दूक और रिभाल्वर के साथ हुए सान्नीगार्ड पुलिस पोस्ट आक्रमण के वक्त वे राजनीतिक कमाण्डर थे । ०५६ साल जेष्ठ में कालीकोट के पद्मघाट पुलिस पोष्ट में हुए आक्रमण में विप्लव की प्रत्यक्ष सहभागिता थी । उक्त पुलिस चौकी से माओवादी ने १३ थान राइफल कब्जा में ले लिया था । दाङ में नेपाली सेना के ऊपर हुए पहले आक्रमण से लेकर म्याग्दी सदरमुकाम बेनी आक्रमण तक की घटना में उनकी सक्रिय सहभागिता रही थी । इसी तरह दाङ के सतबरिया सशस्त्र पुलिस क्याम्प, दैलेख जिला के नौमुले तथा खारा आक्रमण भी उनके ही नेतृत्व में हुआ था ।
नेपाल के पश्चिमी क्षेत्र में विप्लव की पकडÞ अच्छी ही है । लेकिन पर्ूर्वीय क्षेत्र में उतना प्रभाव नहीं दिखाइ देता । तत्काल उनके साथ केन्द्रीय स्तर के नेता भी ज्यादा नहीं है । लेकिन माओवादी युद्ध में लगने वाले कुछ युवा पीढÞी, पर्ूव लडाकू आदि ने उनका साथ दिया है । देखिए- कुछ केन्द्रीय नेता तथा उनकी पष्ठभूमिर्ःर्
इश्वरी दाहाल
विप्लव समूह में सबसे बुजर्ुग नेतार् इश्वरी दहाल उर्फअसारे काका हैं । असारे काका का स्थायी निवास सिन्धुली जिला है । वह माओवादी आन्दोलन के सबसे पुराने नेता भी हैं । जनयुद्धकाल में उन्होंने पार्टर्ीीी तरफ से स्वास्थ्य विभाग का नेतृत्व किया था । असारे काका स्वच्छ और्रर् इमानदार छवि के सादगी पसन्द नेता भी माने जाते हैं । लेकिन वे पार्टर्ीीे उच्च पदों में कभी नहीं पहुँच पाए ।
खड्गबहादुर विश्वकर्मा और तिलक परियार
कालिकोट के स्थायी निवासी पर्ूव पर्यटन मन्त्री खड्गबहादुर विश्वकर्मा विप्लव समूह के एक सशक्त हस्ती हैं । उन का जन्म ०२५ साल में हुआ था । अभी वे पार्टर्ीीे प्रवक्ता भी हैं । विश्वकर्मा वैद्य माओवादी में पोलिटब्यूरो सदस्य थे । नये समूह में पदीय हिसाब से वे विप्लव के बाद दूसरे बडÞे नेता हैं । बिक ने ०४६ साल से राजनीतिक यात्रा शुरु किया था । उनका परिवार, शहीद परिवार भी है । जनयुद्ध काल में उनके दो भाइयों ने शहादत प्राप्त की थी । जनयुद्ध काल में उन्होंने कर्ण्ााली क्षेत्र में अपनी भूमिका कुशलतापर्ूवक निर्वाह की थी । कर्ण्ााली क्षेत्र से दलित समुदाय के रूप में उभरने वाले राष्ट्रीय नेता के रूप में भी वे जाने जाते हैं । विश्वकर्मा के साथ-साथ तिलक परियार भी दलित समुदाय के उच्च तह के नेता माने जाते हैं । विश्वकर्मा तथा परियार दोनों एमाओवादी में उच्च तबके के दलित नेता माने जाते हैं ।
धर्मेन्द्र वास्तोला
माओवादी में सशक्त माने जाने वाले दूसरे नेता है- धर्मेन्द्र वास्तोला ।  वे अभी विप्लव समूह में आ गए हैं । माओवादी में रह कर उन्होंने अन्तर्रर्ाा्रीय विभाग में काम किया है । अब बास्तोला विप्लव समूह में रह कर प्रवासी नेपाली माओवादी के साथ काम करेंगे । साथ में अन्तर्रर्ाा्रीय माओवादी आन्दोलन से पार्टर्ीीो जोडÞना भी उनका दायित्व बन गया है । र्सर्ुखेत जिला में वि.सं. ०१९ साल में उनका जन्म हुआ था । जनयुद्ध काल में ही धर्मेन्द्र प्रचण्ड नेतृत्व के माओवादी में केन्द्रीय सदस्य थे । उनके तीन बेटे हैं, जो पर्ूव माओवादी लडÞाकू भी हैं । लेकिन जनयुद्ध काल में धर्मेन्द्र यूरोप में थे, जहाँ से वह माओवादी के अन्तर्रर्ाा्रीय विभाग सञ्चालन करते थे । सामान्य आर्थिक हैसियत के धर्मेन्द्र सादगीपसन्द स्वच्छ छवि के नेता भी माने जाते हैं ।
अनिल शर्मा
वैद्य समूह के केन्द्रीय सदस्य अनिल शर्मा ऊर्फविरही अब विप्लव समूह में आ गए हैं । चितवन स्थायी निवासी विरही सीधे-सादे नेता के रूप में माने जाते हैं । साहित्य में रुचि रखने वाले विरही को माओवादी के भीतर सशक्त लेखक के रूप में भी माना जाता है । समसामयिक राजनीतिक विषयों को लेकर वे विभिन्न पत्रों में लिखते रहते हंै । इसी तरह काभ्रे के कृष्ण अधिकारी, बाबुराम मिजार और तेजबहादुर मिजार भी विप्लव के भरोसेमन्द सदस्य हंै । प्रचण्ड की हत्या प्रयास के आरोप में एमाओवादी कार्यकर्ता की तरफ से गम्भीर यातना पाने वाले कृष्ण अधिकारी माओवादी में ०५२ साल से क्रियाशील थे । ०६२ साल में अधिकारी ने मणि थापा के साथ माओवादी से व्रि्रोह किया था । बाद में वे वैद्य समूह में शामिल हुए थे । लेकिन अब उन्होंने वैद्य को छोडÞ कर विप्लव को साथ दिया है । इसी तरह अछाम के पर्ूवसभासद् शरदसिंह भण्डारी भी विप्लव के साथ हैं ।
सन्तोष बुढÞा
पहली संविधानसभा निर्वाचन में रोल्पा जिला से सभासद् बनने वाले सन्तोष बूढقा विप्लव समूह के लिए एक सशक्त योद्धा हैं । जनयुद्धकाल में वह रोल्पा के लिए जनसरकार प्रमुख भी हुए थे । वे रोल्पा तथा पश्चिमी क्षेत्र के लिए एक प्रभावशाली नेता माने जाते हैं । उनका प्रभाव सिर्फरोल्पा में नहीं, रुकुम और समग्र मगरात क्षेत्र में हैं । लेकिन राष्ट्रीय राजनीति मंे उनकी चर्चा कम ही होती है ।
उदयबहादुर चलाउने
विप्लव ने जब नयी पार्टर्ीीना ली, उनको साथ देने वाले सबसे उच्च तह के पर्ूवलडقाकू हैं- उदयबहादुर चलाउने । वे चितवन स्थित पर्ूवजनमुक्ति सेना के तीसरे डिभिजन के सह-कमाण्डर हैं । पार्टर्ीीें उन को दीपक नाम से पुकारा जाता है । सैन्य विभाग के लिए वे सशक्त माने जाते हैं । वैद्य माओवादी में दीपक वैकल्पिक केन्द्रीय सदस्य भी थे । वे ऐसे व्यक्ति है, जिन्होने चितवन में रहते वक्त शिविर कमाण्डर के विरोध में आर्थिक अपचलन का आरोप लगाया था । जिसके चलते उनको आन्तरिक हिरासत में भी रहना पडقा था ।
पदम र्राई
नेपाल के पर्ूर्वी भू-भाग से विप्लव को साथ देने वाले एक ही केन्द्रीय नेता हैं- पदम र्राई । शुरु में लिम्बू समुदाय से मौसम लिम्बू विप्लव का साथ दे रहे हैं, ऐसी चर्चा थी । लेकिन जब पार्टर्ीीलग हो गई, तब मौसम ने विप्लव का साथ नहीं दिया । उसके बदले पदम ने उनकी जगह ले ली ।

हिटलिष्ट आतंक
जब विप्लव ने नयी पार्टर्ीीठन का ऐलान किया, राजनीति में चर्चा होने लगी कि वे पुनः सशस्त्र युद्ध की शुरुआत कर रहे हैं । इस चर्चा के साथ कुछ व्यवसायी, उच्च तह के कर्मचारी तथा राजनीतिज्ञ आतंकित होने लगे । विप्लव ने कहा है कि पहले की तरह वह तत्काल सशस्त्र और भूमिगत युद्ध शुरु नहीं करेंगे । लेकिन उनका कहना है- आन्दोलन बडقे पूँजीपति और नवधनाढ्य की ओर लक्षित रहेगा । जिसके चलते कुछ व्यवसायी त्रसित भी होने लगे हैं । विप्लव ने कहा है- प्रथम चरण की लडقाइ राज्य की सेना, पुलिस और गाँव में रहने वाल सामन्त के विरुद्ध नहीं होगी । विप्लव से निकट रहे एक पत्रकार बताते है-  शहर के भ्रष्ट, दलाल और नवधनाढ्य के विरुद्ध भौतिक कारवाही हो सकती है । उन लोगों की सूची भी तैयार हो रही है । इस में कुछ राजनीतिक दल के नेता भी हैं । उनका मानना है कि इस कारवाही को प्रभावकारी ढंग से आगे बढقाया जाया तो जनता में पार्टर्ीीे प्रति सकारात्मक प्रभाव बहुत जल्द ही पडق सकता है ।
स्रोत के अनुसार जब पार्टर्ीीनता में स्थापित होगी, तब और नये राजनीतिक कार्यक्रम तय किए जाएंगे । यह भी बताया जा रहा है कि विप्लव के हिटलिष्ट में एमाओवादी के कुछ शर्ीष्ा नेता भी हैं । विप्लव समूह ने कहा है- अब गाँव में दो-चार सौ मन धान उत्पादन करने वाले सामन्त नहीं, दो-चार अरब लूट कर शहर में ऐश फरमाने वाले भ्रष्ट तथा अपराधी के ऊपर कारबाही की जाएगी । माओवादी नेताओं के प्रति इंगित करते हुए उन्होंने आगे कहा है- जनता का खून-पसीना चूसनेवाले, जनमुक्ति सेना की ताकत का गलत इस्तेमाल करने वाले सभी कारबाही में पडÞ सकते हैं ।
हथियार का हाल
अभी चर्चा का दूसरा विषय है- नेत्रविक्रम चन्द विप्लव के पास कितने हथियार हैं –  बताया जा रहा है कि उनके पास अभी ३ हजार से ज्यादा हथियार हैं, जो सशस्त्र जनयुद्धकाल में नेपाली सेना तथा पुलिस से लूटा गया था । बताया जाता है कि माओवादी शान्ति प्रक्रिया में प्रवेश करने के बाद ‘हथियार नदी में डूब गया’ ‘आग में जल गया’ और ‘जंगल में खो गया’ कहते हुए झूठा बयान देकर हथियारों को छिपा कर रखा था ।
एक दशक में पाँच टुकडे
०६३ साल में सम्पन्न शान्ति प्रक्रिया ने दस वर्षभी पूरा नहीं किया है । लेकिन इस अवधि में माओवादी पार्टर्ीीाँच टुकडÞो में विभाजित हो चुकी है । जिस का नेतृत्व फिलहाल क्रमशः पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’, मोहन वैद्य ‘किरण’, मातृका यादव, मणि थापा और नेत्रविक्रम चन्द कर रहे हैं । शान्ति प्रक्रिया पूरा होने से पहले ही मणि थापा ने पहली बार पार्टर्ीीे व्रि्रोह किया था । हाल मणि थापा ‘क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीका नेतृत्व कर रहे हैं । हाल उन्होंने एमाओवादी के साथ मोर्चा बनाया है । वैद्य माओवादी का ३३ दलीय मोर्चा में भी थापा समूह आवद्ध है । मणि थापा के बाद मातृका यादव ने एमाओवादी को विभाजित किया था । मातृका यादव ने ११ फेबु्रअरी, २००९ में नेकपा -माओवादी) गठन किया था । तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला के मन्त्रिमण्डल में यादव वन मन्त्री थे । उस समय भ्रष्टाचार के आरोप में एक सरकारी कर्मचारी को ट्वाइलेट में बन्द करके यादव खूब चर्चा में आए थे । यादव की इस हरकत को लेकर र्समर्थन और विरोध दोनों ने ऊँचाई पाई थी । इसी घटना के कारण यादव और तत्कालीन प्रधानमन्त्री कोइराला बीच द्वन्द्व भी चला था । इसके अलावा पार्टर्ीीध्यक्ष प्रचण्ड से भी उनका सम्बन्ध बिगडÞने लगा । उसके कुछ समय बाद प्रचण्ड ने एकता केन्द्र के साथ पार्टर्ीीकीकरण किया । उसमें असन्तुष्टी जताते हुए यादव ने अपनी नयी पार्टर्ीीा गठन किया । नयी पार्टर्ीीठन के बाद उनकी चर्चा कम होने लगी । समाचार स्रोत बताते हैं कि यादव अभी एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के साथ सम्बन्ध सुधारने का प्रयास कर रहे है ।
मातृका यादव के बाद एमाओवादी में सबसे बडÞा विभाजन, वैद्य नेतृत्व में हुआ है । वैद्य नेतृत्व में १९ जून २०१२ में पार्टर्ीीलग हुआ था ।तत्कालीन उपाध्यक्ष मोहन वैद्य और महासचिव रामबहादुर थापा के साथ लगभग ३० प्रतिशत से ज्यादा केन्द्रीय नेताओं ने प्रचण्ड का साथ छोडÞ दिया था । जो माओवादी इतिहास में ही सबसे बडÞा विभाजन है । अभी वही वैद्य नेतृत्व में से पार्टर्ीीचिव नेत्रविक्रम चन्द ने अपनी अलग पार्टर्ीीोषणा की है । वैसे तो नेकपा-माओवादी से व्रि्रोह करके इससे पहले भी महेन्द्र पासवान ने नयी पार्टर्ीीनाई थी । पासवान ने नेकपा-माओवादी -व्रि्रोही) नाम से नयी पार्टर्ीीठन किया था । लेकिन पासवान अभी प्रचण्ड नेतृत्व वाली एमाओवादी पार्टर्ीीें हैं ।

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