क्लबफूट

डा. अजय यादव
परिचय
नवजात शिशुओं में पाई जानेवाली हड्डियों और जोडों से सम्बन्धित सामान्य विकृति है । करीब हर १००० नवजात शिशुओं में १ नवजात शिशु में पाया जाता है । हालांकि १९९४ के अध्ययन दिखाता है कि यह संख्या बढकर २.४१ हो गया है । लेकिन इसका खास कारण पूरी तरह अभी नहीं समझा जा सका है ।
यह पुरुष बच्चों में अधिक पाया जाता है, स्त्री बच्चों के मुकाबले (२.५ः१) यह एक प्राचीन रोग है और मातापिता के कर्मो से सम्बन्धित रोग समझा जाता था– जबकि यह सच नहीं है– इसलिए अगर किसी बच्चे को यह विकृति है तो उनके मातापिता को किसी प्रकार का अपराधभाव महसूस करने की जरुरत नहीं है । अगर किसी का एक बच्चा इस विकृति के साथ पैदा हुआ है तो इसका मतलव यह बिल्कुल नहीं है कि उनका दूसरा बच्चा भी इस विकृति के साथ पैदा होगा । किन्तु पारिवारिक इतिहास अगर है तो ऐसे परिस्थिति में केवल ३० में से १ शिशु को हो सकता है । इसलिए ऐसे मातापिता जिनका पहला शिशु इस विकृति का शिकार है तो उनको अधिक सजग रहना चाहिए और जन्म से पहले डाक्टरी जाँच और नियमित सलाह लेनी चाहिए ।
कैसे पहचान करें–
प्रायः इस विकृति को सिर्फ देखकर भी पहचान किया जा सकता है तथा शीघ्र उपचार किया जा सकता है । याद रहे कि शिशु के जन्म के वाद उसके पैर अगर टेढेÞ हैं, जिनमें कि पैर अन्दर की तरफ मुड़ी हुई हो (जैसा कि लैटर– व्) तो सजग रहना चाहिए और तुरन्त डाक्टरी सलाह लेनी चाहिए– यह क्लबफूट हो सकता है । जहाँ अस्पतालों से अधिक घरों में बच्चों का जन्म अभी भी अधिक मात्रा में होता है ।
इसका कारण
निश्चित रूप से क्लबफूट का कारण पता नहीं लग पाया है । किन्तु अनुवांशिकी इसका प्रमुख कारक के रूप में विभिन्न अध्ययन में देखा गया है । अध्ययन यह दिखाता है कि अगर परिवारिक इतिहास है, इस विकृति का तो ऐसे परिवारों में इस विकृति का जोखिम करीब २५ प्रतिशत अधिक हो जाता है । अनुवांशिकी के अलावा अन्य कारण निम्न हो सकते हैं–
िजुड़वा बच्चे ः जिसकी वजह से गर्भ में कम जगह होने से विभिन्न हिस्सों पर बल पड़ता है– उसी के दौरान शिशुओं के पैरों पर भी बल पड़ता है, जिससे पैर मुड़ जाते हैं ।
िगर्भनिरोधक गोलियां, जैसे कि ःष्कयउचयकतय िका प्रयोग करना ।
िधुम्रपान करती महिलाए और माताओं के शिशुओं में यह विकृति अधिक पाई जाती है ।
िकुछ विशेष जाँच विधियाँ जैसा कि ब्mलष्यअभलष्भकष्क की वजह से भी क्लबफूट हो सकता है ।
िमस्तिष्क सम्बन्धी विकार जैसा कि स्पाइना, बाइफिडा, सेरिब्रल, पाल्सी, अर्थोगाइरोसिस की वजह से क्बलफूट होता है । इन कारणों से हुए क्लबफूट का उपचार विधि सम्भव है आम क्लबफूट के उपचार विधि से यह बात महत्वपूर्ण है और याद रखने योग्य है । यहाँ तक की मस्तिष्क सम्बन्धी विकारों से होनेवाली क्लबफूट का उपचार पूर्ण रुप से सफल नहीं भी हो सकता है इसलिए अपने डाक्टर से संयमित व्यवहार और आशा रखे और खुलकर बात करें ।
उपचार
सामान्य तौर पर बिना किसी विशेष जाँच के इस विकार की पहचान की जा सकती है, किसी–किसी समय साधारण एक्स–रे की जरुरत पड़ती है ।
हो सके तो जन्म के तुरन्त बाद, जैसा कि अगले दिन से ही उपचार शुरु किया जा सकता है । जितना अधिक बिलम्ब होगा, उपचार उतना कठिन होता जाता है । नवजात शिशुओं की हड्डियोँ और मांसपेशियाँ लचकदार और नरम होती हैं । इसलिए अगर तुरन्त उपचार किया जाए तो अधिक सफल उपचार किया जा सकता है और आपरेसन या किसी अन्य प्रकार की विशेष विधियों कि जरुरत नहीं पड़ती ।
अगर नवजात अवस्था में ही उपचार किया जाए तो साधारण प्लास्टर या टेपिङ्ग के द्वारा पैर को ठीक किया जा सकता है । बिना चीरफाड़ किया जानेवाला विधि अमेरिकी चिकित्सक डा. पोनसेती ने अविष्कार किया, जिसका प्रयोग करीब–करीब दुनियाँ के हर जगह ऐसे शिशुओं के इलाज में प्रयोग किया जाता है– जिसको एयलकभतष् ःभतजयम भी कहा जाता है । यह एक कारगर उपचार विधि है, जिसमें शिशु के पैरों को प्लास्टर किया जाता है– यह प्लास्टर हर हफ्ते किसी एक विशेष विकृति को ठीक किया जाता है । धीरे–धीरे पैरों को सीधा किया जाता है । यह खुद में एक विशेष उपचार विधि होने के कारण केवल विशेषज्ञ के द्वारा ही किया जाना चाहिए । मातापिता को याद रखना चाहिए कि अन्तिम प्लास्टर चढाने से पहले आपके डाक्टर एक छोटा सा घाव बनाएंगे, जिसको एचिलिज टेनोटोमी ९ब्अजष्ििभक त्भलयतयmथ० कहते हैं । यह घाव जल्दी सूख जाता है और अधिक रक्तश्राव या दर्द नहीं होता है । लेकिन यह विशेष विधि है, अन्तः केवल विशेषज्ञ डाक्टर ही कर सकते हैं क्योंकि कभी–कभी अनभिज्ञता वश पैर की नसें कट जाती है ।
प्लास्टर कट जाने पर भी स्मरण रखें कि आप के डाक्टर आपके बच्चे को ब्रेस या स्पलिन्ट पर रखेंगे जो कि एक विशेष प्रकार के जुते हैं, जो एक डंडे से जुड़े होते हैं । इनका प्रयोग अन्तिम प्लास्टर कटने के बाद ३ महीनों तक दिन के २३ घण्टे पहनाए रखना अनिवार्य है । इसके बाद २–४ साल तक सोने के दौरान पहनाया जाता है और जागते समय बूट पहनाया जाता है । यह विधि इसलिए अपनाया जाता है– क्योंकि यह विकृति पुनः होने की प्रवृति रखती है । ५ साल की उम्र तक यह प्रकृति अधिक होती है ।)
जिन बच्चों में देरी से उपचार किया जाता है, फिर ऊपर बताया गया विधि कारगर न हुआ हो या पुनः हो गई हो, ऐसे बच्चों को ऑपरेसन के द्वारा ठीक किया जाता है– जो उम्र के मुताबिक विभिन्न प्रकार के हैं– इसकी जानकारी, मातापिता को अपने डाक्टर से जरुर लेनी चाहिए ।
याद रहे– क्लबफूट किसी अपराध या पाप का नतीजा नहीं है । जल्दी उपचार करने से आपका बच्चा पुनः आम बच्चों की तरह चल फिर सकेगा । हमेशा अपने विशेषज्ञ डाक्टर की सलाह माने और उपचार के दौरान सहयोग करे ।

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