क्षेत्रीय और जातीय राजनीति का सम्मिश्रणः एक नया प्रयोग

अब उत्थान या पतन ?

For Lila Upendra-Uadav

Lila Nath Gautam

लीलानाथ गौतम

प्रजातन्त्र पुनस्र्थापना के साथ–साथ वि.सं.२०४७ से ही मधेश के नाम में क्षेत्रीय राजनीति शुरु हुआ था । जातीय राजनीति की चहल–पहल डेढ़ दशक से हो रही है । विशेषतः माओवादी के दस वर्षीय सशस्त्र युद्ध ने जातीय राजनीति का बीजारोपण किया था । माओवादी के उस युद्ध ने राज्य की पहुँच से दूर रहे बहुत सर्वसाधारण में राजनीतिक चेतना को जागृत किया और अपने अधिकार के लिए विद्रोह करना सिखाया । तत्कालीन अवस्था में सर्वसाधारण में व्याप्त उसी विद्रोही मानसिकता का गलत प्रयोग करते हुए कुछ राजनीतिक खिलाडि़यों ने जातीय और क्षेत्रीय राजनीति को विकृत बना दिया । सम्प्रादायिक मानसिकता का बीजारोपण करनेवाले उन्हीं राजनीतिज्ञों में से कई तो आज भी अपने भविष्य को ऐसी ही जातीयता और क्षेत्रीयता में सुरक्षित देखते हैं । और दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो अधिकार विहीन जनता को अधिकार देने से इन्कार करते हैं, और उनकी दृष्टि में मुल्क में विखण्डन नजर आता है । इस तरह के दो अतिवादी विचारों के बीच जारी अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण ही पहली संविधानसभा नकाम रही ।

नवगठित संघीय समाजवादी फोरम के पदाधिकारी अध्यक्षः उपेन्द्र यादव (फोरम नेपाल) वरिष्ठ नेताः अशोक राई (संघीय समाजवादी) सहअध्यक्ष ः राजेन्द्र श्रेष्ठ (संघीय समाजवादी) उपाध्यक्ष लालबहादुर राउत (फोरम नेपाल) रेणुकुमारी यादव (फोरम नेपाल) रकम चेम्जोङ (संघीय समाजवादी) हेमराज राई (संघीय समाजवादी) युवराज कार्की (खस समावेशी पार्टी) महासचिव रामसहाय यादव (फोरम नेपाल) रणध्वज कन्दङ्वा (संघीय समाजवादी) उपमहासचिव अभिषेकप्रताप शाह (फोरम नेपाल) दानबहादुर बिक (संघीय समाजवादी) कोषाध्यक्षः विजय यादव (फोरम नेपाल) सचिवः रत्नेश्वर लाल कायस्थ (फोरम नेपाल) परशुराम बस्नेत (खस समावेशी पार्टी) केन्द्रीय सल्लाहकार समिति सभापतिः डा. मंगलशिद्धि मानन्धर केन्द्रीय निर्वाचन समिति सभापतिः दुर्गा बहादुर देवान ——————————- सदस्य (फोरम नेपाल से) १. मो. ईस्तियाक राई, २. सहसराम यादव, ३. रन्जु वर्मा, ४. कृष्णदेव यादव, ५. जगदीश बहादुर सिंह, ६. हरिनारायण यादव, ७. रामविलास यादव, ८. जयराम यादव, ९. रामवावुप्रसाद यादव, १०. डा. रामस्वार्थ राय, ११. राम किशोर प्रसाद यादव, १२. अशोक सिंह कोईरी, १३. चुमनवावु केवट, १४. नागेन्द्र प्रसाद यादव, १५. विश्वेश्वरराय यादव, १६. विन्देश्वर प्रधान, १७. जगदेव यादव, १८. शैलेन्द्र प्रसाद साह १९. रेखा यादव, २०. मन्जु अंसारी, २१. अरुणसिं मण्डल, २२. कृष्ण प्रसाद यादव, २३. तेजनारायण यादव, २४. साधु यादव, २५. वीरेन्द्र प्रसाद यादव, २६. करिमा वेगम, २७. केदार प्रसाद चौधरी, २८. वसी उद्दीन खाँ, २९. श्रवणकुमार अग्रवाल, ३०. अशोककुमार यादव, ३१. डा. खालीद हुसैन हक, ३२. उदयकान्त मिश्र ३३. गुलाम सखर शैख, ३४. हरेराम यादव, ३५. सञ्जयकुमार सिंह, ३६. अभिरुद्ध सिंह यादव, ३७. सदस्य राजकिशोर यादव, ३८. शंकरप्रसाद राजवंशी, ३९. सूर्यनाथ प्रसाद यादव, ४०. डा. विरेन्द्र प्रसाद महतो ४१. राजलाल यादव, ४२. महमद खालिद ४३. मुन्नालाल गुप्ता ४४. अशोककुमार यादव, ४५. अजयकुमार श्रविास्तव, ४६. चमेलीदेवी दास, ४७. समिर राणा, ४८. दुर्गाप्रसाद राजवंशी, ४९. अर्जुन थापा, ५०. अमरेशनारायण झा, ५१. असरारुद्दीन मुसलमान ५२. कृष्णशंकर शाह, ५३. मनोरंजन गोईत, ५४. प्रमोद प्रसाद गुप्ता, ५५. रामकिशोर प्रसाद यादव, ५६. रवीन्द्र प्रसाद यादव, ५७. डा. शिवजी यादव, ५८. रामविर यादव, ५९. रामेश्वर प्रसाद यादव, ६०. चुल्हाई राई यादव, ६१. वालकिशोर यादव, ६२. रीता अग्रवाल, ६३. पल्टन ठाकुर, ६४. ललितबहादुर यादव, ६५. छाया शर्मा पन्त, ६६. उमेश प्रसाद यादव, ६७. किशोरी यादव ७८. बच्चा यादव, ६९. विश्वनाथ पटेल, ७०. ववन सिंह, ७१. सीमा सिंह, ७२. खुर्सिद हबिव इराकी ७३. संध्या देव, ७४. धर्मेन्द्र मैरवैता, ७५. रामप्रसाद रिजाल, ७६. संजय यादव, ७७. निर्माला यादव, ७८. प्रकाश चौगाई ———————————————– सदस्य, (सघीय समाजवादी की तरफ से) १. दुर्गामणी देवान, २. वीर वहादुर लामा ३. प्रेमकृष्ण पाठक ४. रिजवान अन्सारी ५. केन्द्रीय राजकुमार राई ६. सुशिला श्रेष्ठ ७. अजम्बर काङ्माङ राई ७. राधा तिमिल्सिना ९. नोर्साङ शेर्पा १०. महेन्द्र थापा मगर ११. प्रविण नेम्बाङ १२. होरीलाल चौधरी १३. कर्णवहादुर बुढा मगर १४. डिबि नेपाली १५. धिरेन्द्र वहादुर श्रेष्ठ १६. आङ्देण्दी शेर्पा १७. गणेशमान गुरुङ १८. कृष्णबहादुर घःजु १९. रमेश राई २०. आंकाजी शेर्पा २१. सुरेन्द्र थापा मगर २२. नवीन रोका मगर २३. नरेश ताम्राकार २४. मानवहादुर राई २५. सुनी लामा २६. चितनारायण यादव २७. जुद्ध ढाक्रे राई २७. गणेश योञ्जन २९. शान्तकुमार प्रधान ३०. धन प्रसाद तामाङ ३१. देवराज राई ३२. सानुराजा शाक्य ३३. न्हुच्छेलाल महर्जन ३४. उर्मिला देवी साह ३५. आर. सि.तुम्बा ३६. दुर्गामाया ँलिम्बू ३७. लालवहादुर तामाङ ३७. भूराज राई ३९. भाग्यनारायण यादव ४०. भुपेन्द्र नेम्बाङ ४१. पूर्णवहादुर बस्नेत ४२. कृष्ण कुमारी वाइवा ४३. बोमबहादर लामा ४४. भीम राई ४५. उत्तमकुमार लामा ४६. शाक्य सुरेन ४७. नहेन्द्र प्रधान ४७. सनवहादुर राई ४९. केशव उदाश ५०. हिमाल पुनः ५१. राजकुमार यादव ५२. राम सिं राई ५३. रमेशचन्द्र प्रधान ५४. देवराज शर्मा ५५. लिला सिटौला ५६. योगराज लिम्बू ५७. चन्द्र विक्रम राई ५७. नित्यानन्द ताजपुरिया ५९. दीपककुमार याक्खा ६०. पानवहादुर धर्ति ६१. देवीराज गुरुङ ६२. कुमवहादुर तामाङ ६३. विश्वदीप लिङ्देन ६४. महेन्द्र लाल राई ६५. धनप्रसाद गुरुङ ६६. बाबुरामशर्मा भुषाल ६७. रामवहादुुर नेपाली ६७. गोपालकुमार राई ६९. विजय योक्पाङ्देन ७०. मुकुम नेम्बाङ ७१. लोक सागर साँवा ७२. प्रचण्ड पौडेल ७३. चिरञ्जिवी रामथारु ७४. विनोद चौधरी ७५. खेमजङ गुरुङ ७६. लक्ष्मण गुभाजु ७७. वीरेन्द्र वहादुर बोगटी ७७. विद्युत प्रसाद वज्राचार्य ७९. टोपवहादुर वली ८०. पवित्र वज्राचार्य ८१. डा. पुस्पराज राजकर्णिकार ८२. ध्यानवहादुर राई ८३. बुद्धराज राई ——————————————– वैकल्पिक सदस्यगण १. कासीमअलि सिद्धिकी २. यामवहादुर चर्मकार ३. सुशिला शाक्य ४. प्रकाश अधिकारी ५. हेमन्त मान्डव्य ६. भगवान चाम्लिङ ७. पेम्बा गेल्बु शेर्पा ७. मीनवहादुर परियार ९. कृष्ण उदाश १०. निर्माला तावा लिम्बू सदस्य (खस समावेशी की तरफ से) १. राजन केसी, २. प्रेमनारायण थापा, ३. पृथ्वीनारायण कार्की, ४. शिवबहादुर बस्नेत ५. रणबहादुर भण्डारी, ६. बिरबहादुर शाही, ७. मित्र चापागाइँ, ८. राधा थापा, ९. गोबिन्दमानसिंह कार्की, १०. सदस्य विष्णुजंग बस्नेत, ११. लक्ष्मीराय खड्का, १२. कृष्णकुमार घलान, १३. नविन कुवँर, ———————————————— बैकल्पिक केन्द्रीय सदस्य १. मानबहादुर धामी, २. खिरबहादुर भण्डारी ३. राजेश थापा
समय और परिस्थितियाँ बदलीं, जातीय और क्षेत्रीय राजनीति में रमने वालों की मानसिकता में भी परिवर्तन आने लगा । शायद इसी का एक संकेत हो सकता है– मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल (उपेन्द्र यादव), संघीय समाजवादी (अशोक राई) और खस समावेशी पार्टी (युवराज कार्की) बीच का एकीकरण होना । इन तीन पार्टियों के बीच सम्पन्न एकीकरण ने जातीय और क्षेत्रीय राजनीति में नयाँ बहस और तरंग पैदा किया है । विशेषतः वि.सं.२०६३÷०६४ के मधेश विद्रोह से स्थापित उपेन्द्र यादव समग्र मधेश के सवाल में क्रान्तिकारी नेता के रूप में जाने जाते हैं । मधेशवादी अन्य पार्टी की तुलना में तराई में यादव का जनाधार भी अच्छा माना जाता है । लेकिन पहाड़ केन्द्रित जनजाति और खस पार्टी के साथ हुए एकीकरण के बाद उपेन्द्र यादव के राजनीतिक भविष्य को लेकर बहस करनेवाले लोग कुछ ज्यादा ही नजर आते हैं । अपने को मधेशवादी कहनेवालों का मानना हैं– अब यादव का उत्थान होना सम्भव नहीं है, वह तो पतन की ओर चले गए हैं ! इस तरह का विश्लेषण का भविष्य क्या है, यह तो वही जाने ।
हाँ, क्षेत्रीय और जातीय राजनीति में परिचित नेताओं की मानसिकता में कुछ परिवर्तन तो आया है, तब भी नेपाल के भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषिक बनावट ऐसी है, जहाँ कुछ वर्ष तक ऐसे क्षेत्रीय और जातीय राजनीति की खेती समाप्त होने वाली भी नहीं है । लेकिन जातीय राजनीति का भविष्य दीर्घकालीन नहीं है, इस बात की पुष्टि तो दूसरे संविधानसभा निर्वाचन के बाद प्राप्त परिणाम ने साबित कर दिया है । यह बात बहुत नेता लोग समझ भी रहे हैं । इसीलिए जातीय राजनीति के जन्मदाता एमाओवादी अभी उक्त मुद्दा को छोड़ते हुए और परिष्कृत करते हुए आगे बढ़ने लगे हैं । अन्य जातीय दल और नेताओं की मानसिकता भी परिवर्तित नजर आती है । ऐसी ही अवस्था में फोरम नेपाल, संघीय समाजवादी और खस समावेशी पार्टी के बीच एकीकरण होना, सिर्फ संयोग ही नहीं हो सकता । कुछ कहते हंै– क्षेत्रीय और जातीय राजनीति में मोह भंग होने के कारण ही यह एकीकरण सम्भव हो पाया है । लेकिन दूसरी तरफ और भी लोग है, वह कहते हैं– इस एकीकरण में तो सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ ही हावी हैं, कोई मानसिक परिवर्तन नहीं है । क्योंकि यह तीनों पार्टी ऐसे राजनीतिक पृष्ठभूमि से स्थापित हुए है, जो राजनीतिक मामलों में एक–दूसरे के विरुद्ध जानी–दुश्मन थे ।
इसके लिए कुछ दशक पीछे जाना होगा । मधेश के नाम में राजनीति करनेवालें लोग, मधेश में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी, पिछड़ापन आदि में पहाड़ी समुदाय जिम्मेवार ठानते हैं और उसी के अनुसार प्रचार–प्रसार भी करते हैं । यह क्रम आज भी जारी है । उन का कहना है– ‘शासन और प्रशासन में वर्षों से पहाडीÞ ही बैठे हैं । जिसने कभी भी मधेश पर विश्वास नहीं किया, हरदम शंका की नजर से देखता रहा । मधेश को अधिकार से वञ्चित रखा, मधेश के भाषा और वेष का तिरष्कार किया ।’ यही कारण है कि मधेश ने पहाड़ को अपना शत्रु ठान लिया । जिसके चलते मधेश और पहाड़ के बीच मित्रवत व्यवहार नहीं हो सका ।
बाद में वही पहाड़ी समूह में से एक समूह जनजाति के नाम में अलग हो गया और कहने लगा– ‘पहाड़ तथा पहाड़ी शोषक नहीं है, खस शासक वर्ग शोषक हैं ।’ जनजाति का भी मानना है कि खस शासक वर्ग ने ही जनजाति को अधिकार नहीं दिया है, हरदम शोषण किया है । जिसके चलते मधेशी और पहाड़ के जनजाति नजदीक हो गए । उस के बाद दोनों संयुक्त रूप में कहने लगे–
‘शोषक तो खस वर्ग है, जिन्होंने मधेशी और जनजाति को अधिकार से वचिञ्त रखा ।’ अब तो यह परिभाषा भी नयी मोड़ ले रही है । वे लोग कहने लगे हैं– शोषक तो खस भी नहीं है, ब्राह्मण जाति हैं ! इस तरह शोषक और शासकों के दायरे में बदलाव आ रहा है ।
क्षेत्रीय और जातीय राजनीति चरम अवस्था में रहते वक्त बहुत जातीय और क्षेत्रीय पार्टी का गठन हुआ । क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के पीछे पड़ते हुए एक पार्टी का गठन हो गया– खस समावेशी पार्टी । अन्य दो समूह के परिभाषा अनुसार खस समुदाय शोषक और पीड़क वर्ग हैं । अब प्रश्न उठ रहा है– मधेशी और जनजाति को अधिकार से वञ्चित रखने वाले पहाड़ी है या खस ? अथवा नई परिभाषा के अनुसार ब्राह्मण जाति ? लेकिन तत्कालीन शासन–सत्ता में खस, मधेशी, जनजाति सभी थे, उन्हीं के कारण सर्वसाधारण को अपने अधिकार से दूर रहना पड़ा । तत्कालीन शासकों की मानसिकता, संस्कार और संरचनागत त्रुटि के कारण आज ब्राह्मण जाति विभिन्न आरोपों से आरोपित हो रहे हैं । खैर, यह तो विश्लेषण का अलग पार्ट है ।
लेकिन एक समय परस्पर विरोधी राजनीति करनेवालें तीन समूह आज एक ही जगह गोलबन्द हो रहे हैं । क्यों ? मानसिकता परिवर्तन या व्यक्तिगत स्वार्थ ? जवाब अपने–अपने दृष्टिकोण से दे सकते हैं । मधेश राजनीति को केन्द्र में रख कर स्थापित क्षेत्रीय पार्टी और जातीय अधिकार के नाम में गठित दो (पहाड़ी) पार्टी के बीच एकीकरण होना कुछ असामान्य ही है । कुछ आलोचक कहते हैं– उपेन्द्र यादव और अशोक राई ने जातीय और क्षेत्रीय राजनीति में अपना भविष्य देखना छोड़ दिया है, इसीलिए राष्ट्रीय राजनीति के लिए वे लोग एकीकृत हुए हैं ।’ लेकिन समर्थक कहते है– ‘इस में जातीय और क्षेत्रीयता की बात नहीं है । समान राजनीतिक मुद्दा होने के कारण एकीकरण हुआ है । लेकिन एकीकृत पार्टी के अलग–अलग पृष्ठभूमि और इतिहास  इस बात को पुष्टि नहीं करता है ।
हाँ, हमारी राजनीति के लिए मधेसी और पहाडी पार्टी के बीच एकीकरण होना, नया प्रयोग है । इस प्रयोग के शीर्षस्थान में उपेन्द्र यादव और अशोक राई हैं । इसने नेपाली राजनीति में कोई प्रभाव छोड़ सकता है या नहीं, अभी तो यह नहीं दिख रहा है । एकीकरण पक्षधर अपने को नया राजनीतिक शक्ति दावा करने में से पीछे नहीं पड़ते है । एकीकरण व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया हो या नयाँ शक्ति निर्माण के लिए ! एक बात तो सच है कि अब दोनों (यादव और राई) को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए एक नई चुनौती को सामना करना पड़ेगा । मधेश राजनीति में जनाधार बनानेवाले और उसी प्रकार के राजनीति से प्रशिक्षित उपेन्द्र यादव को पहाड़ी लोग क्यों और कैसे विश्वास करे ? स्थापित पार्टी एमाले छोड़ कर जनजाति अधिकार के नाम में नया जातीय पार्टी बनानेवाले अशोक राई से मधेशी जनता क्या अपेक्षा कर सकती है ? मधेश और मधेशी पहचान को छोड़ कर पहाड़ी दलों के साथ यादव विलीन हो गए हैं, इस तरह की आलोचना करनेवाले स्वयं अपने कार्यकर्ता के लिए यादव का जवाब क्या है ? मधेशी मोर्चा में रहे यादव का जो परिचय है, वह अब क्या होगा ? और जातीय धरातल छोड़ने के लिए ‘महाभारत’ समझनेवाले अशोक राई समग्र पहाडी समाज और अलग समुदाय के मधेशी जनता के बीच क्या कह कर संगठन विस्तार करेंगे ? यह सारे प्रश्न अनुत्तरित हंै ।
हो सकता है, दोनों नेताओं को जातीय और क्षेत्रीय राजनीति ठीक नहीं लग रही हो, इसीलिए यह एकीकरण हुआ हो । दोनों का उद्देश्य अपने को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना है तो यह सकारात्मक ही कहा जाएगा । अभी तक कोई भी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ नेता में मधेशी और जनजाति नहीं है । पहली बार यह प्रयोग में आ रहा है । यादव, राई और कार्की कैसे वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से असन्तुष्ट जनता को विश्वास में ले सकते हैं, यह परीक्षण होना बाकी है ।
विगत अध्ययन करने से पता चलता है कि दोनों नेता लीडरशीप और पार्टी व्यवस्थापन के लिए सक्षम नहीं हैं । उपेन्द्र यादव की पार्टी बार–बार विभाजित होना इसका उदाहरण है । एमाले के भीतर प्रभावशाली और शक्तिशाली दिखाई देनेवाले अशोक राई, अपने ही नेतृत्व में नयी पार्टी गठन करने के बाद कमजोर दिखाई देना, नेतृत्व क्षमता में प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है । लेकिन यादव और राई के संयुक्त लीडरशीप कैसा रहेगा, यह तो भविष्य ही बतलाएगा ।
अन्य मधेशवादी दलों की तुलना में उपेन्द्र यादव ने अपने को सत्ता राजनीति से कुछ दूर ही रखा है । राजनीतिक दृष्टिकोण और मुद्दा में भी वह कुछ अलग दिखाई देते हैं । इतना होते हुए भी यादव को पहाड़ में जा कर जनाधार बढ़ाना उतना आसन नहीं है । पहाड़ी दलों के साथ एकीकरण करने के कारण क्षेत्रीयता में विश्वास रखनेवाले पार्टी के ही नेता लोग और मधेशी जनता में आशंका पैदा हो रहा है । ऐसी अवस्था में क्षेत्रीयता के पक्षधर नेता÷कार्यकर्ता उनका साथ छोड़ सकते हैं । अगर ऐसा हुआ तो यादव तराई में कमजोर हो जाएंगे । अपने ही बल–बुते पर पहाड़ में स्थापित होने में समय लगेगा । यादव को पहाड़ में ले जाकर कैसे स्थापित कराना है, इसकी जिम्मेदारी उनके ही सहयात्री राई और कार्की के हाथ में भी है ।
बहुत जनता कांग्रेस, एमाले और माओवादी की राजनीति से असन्तुष्ट हैं । वे लोग विश्वास के लायक नई राजनीतिक शक्ति ढंूढ रहे हैं । ऐसे में जनता को विश्वास में कर पाएंगे तो यादव और राई का नेतृत्व नया वैकल्पिक शक्ति भी बन सकता है । लेकिन इसका संकेत अभी दूर तक नहीं दिखाई देता । इसीलिए यादव और राई के राजनीतिक भविष्य किस ओर जाएगा ? अभी नहीं कहा जा सकता ।
बात जो भी हो, यादव और राई के कंधे पर चुनौती का पहाड़ आया है । क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के लिए कौन क्षेत्र और किस समुदाय को पकड़ा जाए, यह नजर नहीं आ रहा है । राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित होना, तिल का पहाड़ चढ़ना है । लेकिन कदम तो उठ चुका है ।  ऐसी अवस्था में पहाड़ी मनोविज्ञान और मधेसी मनोविज्ञान बीच रहे अन्तरविरोध का हल करना सबसे जरूरी है । लेकिन कैसे ? उसके लिए नया और वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति मधेशी के नेतृत्व में भी सम्भव है, यादव को इस तथ्य को प्रमाणित करना होगा । लेकिन इसके लिए जो बहस सृजना करनी चाहिए थी, यादव वह नहीं कर पा रहे हैं । इसके लिए सिर्फ ‘मधेश–मधेश’ कहने से नहीं होगा, जनजाति का मुद्दा भी बिकनेवाला नहीं है । यादव को अपने व्यक्तिगत इतिहास को भी परिस्कृत करना जरूरी है । इसी में समाजवादी फोरम का भविष्य निर्धारण होता है । नहीं तो अन्य मधेशवादी नेताओं के विश्लेषण अनुसार उनके अधोगति को कोई नहीं रोक पाएगा । अशोक राई के सवाल में भी यही बात लागु होती है । राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित एमाले छोड़ कर राई जिस तरह जातीय राजनीति में घुस पड़े, पुनः राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित होने के लिए राई को भी बहुत संघर्ष करना पड़ेगा । सिर्फ जनजाति को ही नहीं, पहाड के अन्य समुदाय को भी मनाना होगा । उससे भी ज्यादा चुनौती है– तराई निवासी जनता से विश्वास का मत लेना । क्योंकि बहुसंख्य मधेशी के दृष्टिकोण में राई भी कांग्रेस–एमाले के अन्य नेता (पहाडी) समान ही हैं ।
एकीकरण के तीसरे पात्र हैं– युवराज कार्की । वह नेपाली राजनीति के मूल चरित्र और वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं । लेकिन खस जाति के राजनीति कर उसमें अपना भविष्य खोजनेवाले कार्की, खस समुदाय में ही स्थापित नहीं हो सके । अन्ततः विरोधी राजनीतिक मुद्दा से उभरे पार्टी में समाहित होना पड़ा । इसीलिए तो कहते है– यादव, राई और कार्की का मिलन अजीब का है । परस्पर विरोधी धार मिल कर एक नयी धार का निर्माण हुआ है । सच में ही यह तो नया वैकल्पिक शक्ति होना चाहिए । अगर ऐसा नहीं कर पाएंगे तो तीनों का पतन सुनिश्चित है, इसीलिए नया शक्ति निर्माण करना हीं होगा ।

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