खतरे में है हिमालय:बाबुराम पौड्याल

मेरे नगपति ! मेरे विशाल !himalya nepal
साकार, दिव्य, गौरव विराट !
पौरुष के पूंजीभुत ज्वाल !
मेरी जननी के हिम-किरीट !

युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,
युग युग गर्वोन्नत, नित महान
निस्सीम व्योम में तान रहे,
युग से किस महिमा का वितान ।
  -रामधारी सिंह दिनकर ।
बहुतों को शायद यह पता भी न होगा कि हमारा आर्थ्र्िाक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के रूप में परापर्ूव काल से उत्तर की ओर सीना तानकर खडÞा हिमालय भारी खतरे से जूझ रहा है और इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दक्षिण एशिया के विशेष कर नेपाल, भारत, बंगलादेश, भूटान पर पडÞ रहा है । शीतल, सुन्दर, निरन्तरता, त्याग, प्रेम, भक्ति जैसे पर्ूर्वीय दर्शन का आधार और संस्कृति का प्रतीक हिमालय की गोद में कई संस्कृतियो ने जन्म लिया तो कई आगन्तुक सस्कृतियों को आश्रय भी मिला । इन सभी को प्रेम और सम्मान से ओत-प्रोत, समय के साथ एकता के सूत्र में बंधने की प्रेरणा भी हिमालय से ही मिलती रही । हिमालय से निकलने वाली पतित पावनी नदियों की उर्वर जमीन प्राचीन काल से ही कई जातियों का आकर्षा बनी रही । भारत में गंगा और ब्रम्हपुत्र नदी की घाटी और नेपाल में कोशी, गण्डकी और कर्ण्ााली इसके नजीर हैं । यहां पर अब भी क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया में सब से अधिक आवादी है । सिन्ध और बक्षु नदी जिसे आज आमु दरिया के नाम से जना जाता है के आसपास की भूमि हिन्दुओं का प्राचीन देवलोक के रूप में वणिर्त है । पश्चिमोत्तर के हिन्दकुश पर्वत श्रृंखला को पार करते हुये आर्य, किरात, खस, हूण, शक, यवन, मुगल जैसी कई जाति उपजातियां भिन्न काल और रूप में कब हिमालय के छंाव तले आ गई यकीन करना मुश्किल है । इस भूमि पर समय के प्रवाह के साथ ऐसे ही कई सभ्यताओं के बीच हुए संर्घष्ा, सम्मिलन, उत्थान और पतन का साक्षी भी रहा है हिमालय ।
हमारे पुरखों ने हिमालय की इस गौरवशाली धरोहर को जिस रूप में हमें दिया है । बदलते समय के साथ उसी रूप में हम शायद ही आनेवाली पीढÞÞी को दे पायंे । हिमालय पर मडÞराते खतरे की गम्भीरता को किसी नारे जुलूस, आन्दोलन, धरने और व्रि्रोह के जरिए नहीं निपटा जा सकता । उसके लिए बडÞी गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है । हिमालय में बर्फन हो, सदाबहार बहने वाली नदियो में जल न हो, फसलों से भरे खेतों के बदले धधकता रेगिस्तान हो तो उस समय हमारे अस्तित्व का क्या होगा –
तमाम अनुसंधान और अनुभवों से लगातार सावित हुआ है कि वायुमंडल में बढÞते कार्बन के परिणाम के कारण दुनिया के तापक्रम में लगातार वृद्धि हो रही है । मौसम वैज्ञानिकों का कहना है पहले भी ज्वालामुखी के फटने के कारण तापक्रम में वृद्धि हो जाती थी परन्तु कुछ समय बाद तापमान सामान्य हो जाता थ्ाा । पर अब यह घटने का नाम ही नहीं ले रहा है । इसके चलते हिमालय का बर्फभी अस्वाभाविक रूप से पिघल रहा है । चांदी की तरह सफेद और मनोरम दिखाई देने वाले बफिर्ले पहाडÞो का अधिकांश भाग अब काला दिखाई देने लगा है ।
वैज्ञानिकों का दावा है कि २००५ तक के सौ सालों में दुनिया में ०.ठ६ ड्रि्री सेल्सीयस तापमान बढÞा है । वैसे इस का असर पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव विशाल बर्फराशि पर भी पडÞा है । बर्फके शीघ्र पिघलने से समुद्र में जल स्तर बढÞ रहा है जिस के कारण प्रलयकारी सामुद्रिक तूफान आने और समुद्र से कम ऊचाई वाली जमीन के डूब जाने का खतरा हो गया है । पर्वतीय क्षेत्र में काम कर रहे इसीमोडÞ नामक अन्तर्रर्ााट्रय संस्था के मुताबिक केवल हिमालय में सिर्फदस सालो में ०.१२ से ०.६३ ड्रि्री सेल्सियस तक औसत तापमान रिकार्ड किया गया है । यह भयावह भविष्य की ओर संकेत करता है । नतीजा यह है कि पिछले चार दशकों में अर्थात् सन् २०१० तक तकरीवन ४०० नये ग्लेसियर अर्थात् बर्फके जमाबडे जिसे हिमताल भी कहा जाता है, बन गये हैं । गत साल भारत के उत्तराखण्ड में हर्ुइ तबाही, उससे पहले कई बार नेपाल की कोशी नदी और भारत के ब्रम्हपुत्र नदी में सालिन्दा बाढÞ से होनेवाली तबाही का यही सब से बडÞा कारण है ।
दूसरा कारण है, हिमालय क्षेत्र में करोडÞों साल से चल रही भौगर्भिक गतिविधियां । भर्ूगर्भविदों के मुताविक अस्थिर अष्ट्रोइंडियन और तिब्बती प्लेट के कारण परापर्ूव काल में टेथिस -जिसे बाद में वैज्ञानिकों ने नामाकरण किया है) नामक समुद्र उ+mचे पर्वतों वाले हिमालय के रूप में उठ खडÞा हुआ और बंगाल की खाडÞी से उत्तर की आनेवाली मौनसूनी वायु को रोककर न्यून तापक्रम के कारण खुद बर्फसे ढका रहा और दक्षिण की ओर बारिश होने में मददगार बना । यह क्रम चल रहा है । प्रकृति के इसी चक्र के बदौलत हमारा वर्तमान और हम हैं ।
हिमालय से बर्फपिघलकर उत्तरपर्ूव की ओर निकलने वाली सांगपो नदी मानसरोवर से निकलकर तिब्बत से भारत के अरुणाचल प्रदेश होते हुए जब असम में प्रवेश कर जाती है तब इसका नाम ब्रम्हपुत्र पडÞ जाता है । गंगोत्री से निकलने वाली हिमनदी गंगा नदी भी पर्ूव की ओर बहती है । नेपाल से बहनेवाली कर्ण्र्ााी, सप्तगण्डकी, सप्तकोशी भी दक्षिण की ओर बहती हर्ुइ गंगा में जा मिलती हंै । वेदों में वणिर्त सिन्ध नदी भी हिमालय की ही देन है । वेद में कई बार वर्ण्र्ााकी जानेवाली सरस्वती नदी का अब अस्तित्व नहीं है । वैज्ञानिकों का मानना है कि भर्ूगर्भ में आये किसी हलचल के कारण वैदिक काल के बाद के किसी समय में इस नदी का अस्तित्व समाप्त हो गया ।
ग्लेसियरों के फट जाने से अचानक नदियों में बाढÞ आने का खतरा बना रहता है । सन् २०१० तक हमारे हिमालय में कुल ३८०८ ग्लेसियर हैं जो नदी के आसपास वालर्ेर् इलाके विशेष कर निचले तटीय इलाके, नेपाल का मधेश और भारत के उत्तराखण्ड, बिहार, बंगाल और बंगलादेश के सर पर लटकते तलवार की तरह है ।
पहाडÞों में हो रहे वनों के विनाश से भूस्खलन में तीव्रता आ रही है । जिस से नदियां बडेÞ तादाद में मिट्टी बहा कर ले आती है और मैदानी भुभाग पर लाकर छोडÞ देती है इससे नदी अपना पारम्परिक बहाव बदल देती है । नेपाल की कोशी नदी ऐसी ही नदियो में जानी जाती है । बंगलादेश में ब्रम्हपुत्र और गंगा मिलन और विभाजन भी इसी का एक उदाहरण है ।
दक्षिण एशियाइ देशों का संगठन र्सार्क के संभवतः ढाका में हुये सातवें शिखर सम्मेलन में हिमालय से आनेवाली नदियों के उपयोग और संरक्षण के लिए सम्बन्धित देशों को मिल कर काम करने के बारे में कुछ देशों ने प्रस्ताव रखा था । परन्तु पता नहीं क्यों इस पर आगे कुछ नहीं हो सका । अब तक जो कुछ भी हुआ हो किन्तु अभी भी सभी को सोचना आवश्यक है ।

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