खलनायक जब नायक बनते हैं !!!

लीलानाथ गौतम

जनता के खून-पसिने से जमा अरबों की राशि के लागत पर गठित संविधानसभा नये संविधान जारी करने में असफल रही। संविधान जारी नहीं होने के पीछे विभिन्न राजनीतिक दल के नेता तथा अन्तर्रर्ााट्रय शक्तिकेन्द्र का हाथ भी हो सकता है। लेकिन हमारे राजनीतिक दल के नेता के चरित्र, र्सवसत्तावादी चिन्तन और सत्ता मोह ही इस के प्रमुख कारणों में हैं।

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संविधानसभा के ६०१ सदस्यों में कितने तो विचित्र और लगभग पागल के समान व्यवहार करते थे। सभासदों की कूल संख्या ६०१ होने पर भी संविधान तथा सरकार निर्माण में मुख्य दल के कुछ शर्ीष्ा नेता ही हाबी थे। वे हमेसा संविधान निर्माणकर्ता के बदले सत्ता के खिलाडÞी के रुप में प्रस्तुत हुए, इससे वे हमेसा सञ्चार माध्यमों में छाए रहे। कुछ ऐसे भी थे, जो सुरा और सुन्दरी के पीछ मतवाले थे। कुछ तो कूटनैतिक पासपोर्ट बेचकर करोडÞपति बनने का ख्वाब देखने लगे थे। कुछ की पृष्ठभूमि आपराधिक थी, वैसे लोग भी मन्त्री हुए। संविधान बनाने की कसम खानेवाले सभासद् जब ऐसे होंगे, तब संविधान कैसे बनता –
दर्ुगम क्षेत्र की जनता खाद्यान्न के अभाव मंे भूखों मर रही थी। एक वक्त का भोजन उपलब्ध न होने पर अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करने के लिए अभिभावक बाध्य हुए थे। अस्पताल में उपचार खर्च देने में अर्समर्थ बीमार छत से कूदकर आत्महत्या कर रहे थे। उसी तरह तर्राई में शीतलहर का प्रकोप था। जिससे बहुतो ने जान गंवाई। कोसी नदी के कटान और डूवान से बहुत लोग बेघरबार हुए। दूसरी तरफ हमारे नेतागण संविधान बनाने के बदले विदेश भ्रमण में करोडो प+mूक रहे थे। गरीब और अधिकारबिहीन जनता के पक्ष में संविधान कैसे बनाया जाए, इस बारे में शायद ही कभी संविधानसभा में बहस हुआ हो। ऐसे अनेक कारण हैं, संविधान न बनने के पीछे। इस में प्रमुख कारक तत्व नेता का चरित्र ही है। तर्सथ संविधानसभा के चार वर्षों में कौन सदस्य कैसे सञ्चार माध्यम में छाए रहे, उसका  संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत हैः
सत्ता के खिलाडी
पुष्पकमल दहाल, “प्रचण्ड”
राजनीति और सत्ता दोनों के प्रमुख केन्द्र में रहनेवाले पात्र है, एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल, ‘प्रचण्ड’। सत्ता में अपना बर्चस्व कायम रखने के लिए ही उन्होंने तत्कालीन प्रधानसेनापति रुक्माङ्गद कटूवाल को बर्खास्त किया था। लेकिन राष्ट्रपतिद्वारा उनके निर्ण्र्ााको बदर किए जाने पर प्रचण्ड को खुद सत्ता त्याग करना पडÞा। उसके बाद व्यक्तिगत और पार्टर्ीी पगलपन में एक वर्षक संविधानसभा को बन्धक बनाकर उन्होंने अघोषित जनव्रि्रोह भी किया। समूचे देश से जनसाधारण को राजधानी में उतारा गया। अनिश्चितकालीन आमहड्ताल का आहृवान हुआ, जो ६ दिनों में ही टंाय-टंाय फिसस् हुवा।
खासकर नेकपा एमाले के नेता माधवकुमार नेपाल की सरकार को ‘कठपुतली सरकार’ कहकर आन्दोलन भारत की ओर लक्षित हुआ। आन्दोलन के क्रम में नयाँ बानेश्वर में सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने भारत को भरपेट गालियां दी। यहाँ के सारे राजनीतिक दल भारत से सञ्चालित हैं, ऐसा भी आरोप लगाया गया। उसी तरह अब यहाँ के राजनीतिक दलों के बदले सीधे भारत से वार्ता होगी, ऐसा उद्घोष भी किया गया। आन्दोलन के क्रम में चलचित्र नायिका रेखा थापा के सँग नाचकर भी प्रचण्ड चर्चित हुए। अपने दल को संविधानसभा का सबसे बडा दल दाबी करते हुए नेतृत्व अपने ही दल का होना चाहिए, इस बात पर वे अडेÞ रहे।
र्सार्वजनिक सभा समारोह में गरीब जनता के पक्ष में क्रान्तिकारी नारा लगानेवाले और आँसु बहानेवाले प्रचण्ड ने गरीब जनता के लिए कुछ नहीं किया। दूसरो के भ्रष्टाचार का उन्होंने पुरजोर विरोध किया, मगर खुद भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो सके। जैसे मासिक १ लाख १० हजार घर किराया देकर आलीशान महल में उन के निवास करने से वे किस किसिम कें र्सवहारा नेता हैं, इससे प्रष्ट होता है।
विभिन्न जनजाति और अन्य समुदायों को उकसाकर हमेसा चर्चा में रहनेवाले अध्यक्ष प्रचण्ड अपने वचन में कभी भी दृष्ढÞ नहीं रहे। उनकी कथनी और करनी में कोई समानता नहीं थी। हमेसा सत्ता कब्जा की बात करते थे। इस प्रकार प्रमुख दल के प्रमुख नेता ही सिर्फसत्ता केन्द्रित होकर राजनीति करें तो संविधान कैसे बनता –
बाबुराम भट्टर्राई
वैसे तो एमाओवादी नेता डा. बाबुराम भट्टर्राईको सत्ता के खिलाडÞी के रुप में नहीं देखा जाता। लेकिन माओवादी के अन्दर रहते हुए आन्तरिक विवाद के कारण उनको सत्ता के सर्वोच्च शिखर प्रधानमन्त्री पद में आसीन होने का मौका मिला। प्रधानमन्त्री होते ही ‘मुस्ताङ म्याक्स’ गाडी में सवार होकर वे चर्चित हुए। आर्थिक मितव्यायिता, खर्च में कमी आदि आकर्ष नारा देनेवाले प्रधानमन्त्री भट्टर्राई ने थोडÞे समय बाद में चायपान के लिए सबसे ज्यादा खर्च करके ठीक उलटा रर्ेकर्ड कायम किया।
डा. भट्टर्राई के शासनकाल में देश का विकास होगा, आम जनता में ऐसा विश्वास था, लेकिन यह विश्वास भी चकनाचूर हुआ। प्रधानमन्त्री बनकर मन्त्रिपरिषद गठन करते ही उनपर जो विश्वास किया गया था, वह निष्फल प्रमाणित होने लगा। इतिहास में सबसे बडा मन्त्रिमण्डल इन्ही का रहा। साथ ही मन्त्रिमण्डल में हत्यारे और महाभ्रष्ट नेता लोग भी सहभागी थे। व्यक्तिगत रुप से प्रधानमन्त्री स्वयं भ्रष्टाचार में कही भी सहभागी नहीं दिखते, फिर भी उनकी श्रीमती हिसिला यमी और अन्य मन्त्रियों का भ्रष्टाचार रोकने में वे असफल रहे। सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने मधेशवादी दल के साथ अनेक विवादास्पद सम्झौता भी किया। इन का कार्यान्वयन तों नहीं हुआ, अन्त में संविधानसभा ही विघटित हर्ुइ।
झलनाथ खनाल
नेकपा एमाले के अध्यक्ष झलनाथ खनाल भी सत्ता के लिए मरमिटनेवालों में से एक हैं। सहमतीय सरकार का नारा लगाकार उन्होंने अपनी ही पार्टर्ीीे नेता माधव कुमार नेपाल की सरकार को पदच्युत किया और बहुमतीय सरकार में प्रधानमन्त्री बने।
प्रधानमन्त्री बनसे पहले वे खूब चर्चा में थे। प्रधानमन्त्री निर्वाचित होने से पहले सुनसरी भरौल-५ की देवीप्रसाद रेग्मी ने ‘संविधान क्यों नहीं बना -‘ कहते हुए उन को एक थप्पडÞ जडÞ दिया था। इस कारण भी वे चर्चा में रहे।
माधव कुमार नेपाल
एमाले के अन्दर दूसरे सत्ता के खिलाडÞी माधव नेपाल भी है। संविधानसभा के चुनाव में पराजित होने पर भी उन्हें प्रधानमन्त्री होने का अवसर मिला। चुनाव में पराजित होने के बाद पार्टर्ीीहासचिव के पद से राजीनामा देकर नैतिकता पर््रदर्शन करनेवाले नेपाल ने प्रधानमन्त्री बनने के लिए अपनी नैतिकता छोडÞ दी।
रामचन्द्र पौडेल
पार्टर्ीी दृष्टिकोण से देखने पर यह चार वर्षका शासनकाल नेपाली कांग्रेस के लिए अशुभ सिद्ध हुआ। ०४६ साल के बाद अधिकांश समय नेतृत्व सम्हाले हुए और हमेसा सत्ता में काबीज रहे नेपाली कांग्रेस इन चार वषोर्ं में थोडÞे से समय के लिए सत्तासीन हर्ुइ। वैसे तो सत्ता और नेतृत्व हथियाने के लिए एंडी चोटीका पसीना बहाया था। इसी चरित्र के एक पात्र हैं, पार्टर्ीीपसभापति रामचन्द्र पौडेल। प्रधानमन्त्री बनने के लिए १८ बार चुनाव लडÞकर हारनेवाले पौडेल एक जीवट राजनीतिज्ञ है।
जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता
मधेशी समुदाय में बौद्धिक तर्कशील और कुछ भिजनवाले नेता के रुप में परिचित गुप्ता भी सत्ता के नम्बर वन खिलाडÞी हैं। सत्ता के लिए ही मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल से अलग होकर उन्होंने फोरम गणतान्त्रिक पार्टर्ीीठन किया। नेपाली कांग्रेस में लम्बे समय तक रहने से सत्ता कैसे प्राप्त की जा सकती है, वह उनको पता था। उस समय मन्त्री पद में रहकर किया गया भ्रष्टाचार के कारण वे अभी जेल जीवन बिता रहे है।
विजयकुमार गच्छदार
सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कुछ इस टाइप के खिलाडÞी है, गच्छदार। पञ्चायतकाल में पञ्च तथा प्रजातान्त्रिककाल में प्रजातान्त्रिक योद्धा और गणतन्त्र में कट्टरगणतन्त्रवादी अपने को दिखानेवाले गच्छदार ने कांग्रेस पार्टर्ीीोडÞकर मधेशवादी पार्टर्ीीें प्रवेश किया। सत्ता के लिए ही वे अभी एक नई पार्टर्ीीनाकर उसी के माध्यम से राजनीति कर रहे हैं। इसलिए इन चार वर्षो में वे प्रायः सत्ता से सटे रहे। गणेश लामा जैसे प्रहरी के रर्ेकर्ड में मोस्टवान्टेड व्यक्ति उन का दाहिना हाथ हुआ। उन्होंने दावा किया था कि वे नेपाल के प्रहरी प्रशासन में बहुत सुधार करेंगे लेकिन गृहमन्त्री बनने के बाद उन्होंने वैसा कुछ नहीं किया। इसके विपरीत गृहमन्त्रालय के उच्च पदस्थ कर्मचारियों का उन्होंने पदोन्नति और स्थानान्तरण किया। इस के चलते वे बहुत आर्थिक लाभ में रहे, वैसी आम चर्चा हैं। जन्म के आधार में नागरिकता पानेवालों की सन्तान को वंशज के आधार पर नागरिकता देने का फरमान जारी कर वे विवाद में पडÞ गए।
राजेन्द्र महतो
सत्ता के दूसरे भूखें है, राजेन्द्र महतो। सत्ता के लिए उन्होंने अपनी पार्टर्ीीो बहुतों बार विखण्डित किया। फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव के कथनानुसार महतो लोकसेवा पास कर स्थायी मन्त्री हुए है। यह उनकी पदलोलुप्ता के लिए बहुत बडा व्यंग्य है। एक-दूसरे को भ्रष्टाचारी कहते हुए सबसे ज्यादा विभाजित पार्टर्ीीहतो की सद्भावना पार्टर्ीीी है। ‘एक मधेश एक प्रदेश के विरोध करनेवाले की अंगुली काँट दी जाएगी’ ऐसा कहनेवाले महतो बारम्बार सत्ता में रहे और संविधान निर्माण के लिए कुछ नहीं किए। और मजे की बात यह है कि इसके लिए उनको कोई ग्लानि भी नहीं है।
उपेन्द्र यादव
मधेसी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव भी सत्ता की खिलाडÞी है। मगर दर्ुभाग्यवश संविधानसभा के चार वषर्ीय कार्यकाल में मुश्कील से दो बार सरकार में सहभागी हो पाए। पार्टर्ीीे अन्दर एक पक्षीय सोच बनाने वाले और सिर्फअपनों को साथ लेकर चलनेवाले चरित्र के कारण उनकी पार्टर्ीीी दो बार विभाजित हर्ुइ। वे पार्टर्ीी”mट के चलते तो विवादित थे ही, पार्टर्ीीभासद् रेणु यादव प्रकरण से भी वे चर्चा में रहे। पार्टर्ीीें आधिकारिक निर्ण्र्ााकरते समय अथवा सरकार में मन्त्री रहते समय उपेन्द्र सिर्फरेणु की ही बात सुनते थे। उसी तरह जिला भ्रमण करते समय वे रेणु को साथ में लेकेर ही चलते थे, और फोरम कार्यकर्ताबीच इस प्रेम प्रसंग के लिए वे चर्चित रहे। रेणु के नाम में सम्पत्ति रखना और पार्टर्ीीे अन्दर रेणु का ही निर्ण्र्ााचलना, इन बातों का आरोप भी उपेन्द्र पर है। बहुतों ने पार्टर्ीी”mट के लिए उपेन्द्र-रेणु प्रेम प्रकरण को कारण माना है।
कृष्णबहादुर महरा
माधव नेपाल के नेतृत्ववाली सरकार को गिराकर अपनी पार्टर्ीीे नेतृत्व में सरकार गठन करने के लिए एमाओवादी के सभासद् कृष्णबहादुर महरा ने चीन से ५० करोडÞ की रकम माँग की थी। यह टेपकाण्ड बहुत चर्चित हुआ। अपने नेतृत्व में सरकार गठन के लिए सभासद् खरीदने के लिए ५० करोडÞ चाहिए, कहकर टेलिफोन में हुए वार्तालाप सञ्चार माध्यम से र्सार्वजनिक होने पर भी उनपर कोई अनुशासनात्मक कारवाही नहीं हर्ुइ।
मधेशवादी दल के कुछ नेता तो सत्ता के लिए मरमिटने को तैयार है। तर्राई बासी के लिए अधिकार सुनिश्चित करेंगे, इस नारा के साथ कोई भी मधेशवादी दल फूट से नहीं बच सका। नारा मंे ‘मधेशी जनता के अधिकार के लिए’ ऐसा होने पर भी आन्तरिक उद्देश्य सिर्फमन्त्री बनना ही था। मन्त्री बनने के लिए ही पार्टर्ीीmुटाउनेवाले में गच्छेदार और गुप्ता तो थे ही, इनके अलवा महेन्द्र राय, अनिल झा, महेन्द्रराय यादव, खोभारी राय भी थे।
संविधानसभा से बाहर के खिलाडÞी और गणतन्त्र विरोधी
संविधानसभा के सदस्य न होते हुए भी कुछ दल के नेता चर्चा में रहे। संसद सदस्य न रहने पर भी उनकी व्यक्तिगत निर्ण्र्ााने सरकार निर्माण और तथाकतिथ संविधान निर्माण प्रक्रिया में बडी भूमिका निर्वाह की। सिर्फ८/१० व्यक्ति गणतन्त्र के विरोधी थे। गणतन्त्र विरोधी दिखनेवाले वे लोग सञ्चार माध्यम के लिए अच्छे कच्छा माल साबित हुए। प्रस्तुत है, उन लोगों की संक्षित जन्मकुण्डली ः
मोहन वैद्य
जातीय गणराज्य के कट्टर पक्षपाती दिखनेवाले एमाओवादी उपाध्यक्ष मोहन वैद्य ने संविधानसभा में खूद की उपस्थिति नहीं जनाई। लेकिन बाहर रहते हुए भी उन्होंने और उनके र्समर्थकों ने संविधानसभा को अनेक प्रकार से परेशानी में डाला। अभी एमाओवादी को फोडÞकर नई पार्टर्ीीनाने की तैयारी में रहे वैद्य पक्ष की गतिविधि ने सरकार, संविधान निर्माण और सरकारी कामकाज में बहुत बुरा प्रभाव डाला।
चित्रबहादुर केसी
ये ऐसे, व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने संविधानसभा की पहली बैठक से ही नेपाल के लिए संघीयता आवश्यक नहीं है, इस धारणा को प्रस् तुत किया था। संघीयता विरोधी उनकी अभिव्यक्ति और कोशीस को देखते हुए कुछ सञ्चार माध्यम ने तो उनको ‘अकेला बृहस्पति’ की भी संज्ञा दे दी। संविधानसभा द्वारा संघीयता सहित का संविधान जारी न होने पर सब से ज्यादा खुश होनेवाले वे भी एक हैं। अभी उन का कहना है- संविधान जारी न होने से कम से कम देश तो टुकडÞा-टुकडÞा होने से बच गया।
केपी ओली
पार्टर्ीी और देखावटी रुप में संघीयता के पक्षधर दिखनेवाले लेकिन संघीयता के विरोधी दूसरे धुरन्धर पात्र है, नेकपा एमाले के नेता केपीशर्मा ओली। खासकर माओवादी का विरोध करने के नाम मे अप्रत्यक्ष रुप से उन्होंने संघीयता का खूब विरोध किया। जनआन्दोलन २०६२-०६३ के दौरान आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं थी कहकर उन्होंने विरोध भी किया। अन्तरिम संविधान में देश को संघीय रचना में लेजाने के लिए बहस के समय ओली उसके विरोध में थे। लेकिन जब देश का संघीयता में जाना निश्चित हुआ, वे भी संघीयता के पक्ष में खडेÞ होने के लिए बाध्य हुए।
पद और जिम्मेवारी के हिसाब से पार्टर्ीीे अन्दर उनकी कोई हैसियत न होने पर भी समूची पार्टर्ीीो वे अपनी इच्छानुसार चलाने का प्रयास करते रहे और उनको इस में कुछ सफलता भी मिली। नेता ओली सिर्फएमाले के अन्दर ही नहीं, कांग्रेस के अन्दर भी अपना प्रभाव रखते है। संविधानसभा के निर्वाचन में पराजित होने पर भी उन्होंने संविधानसभा में एक सामान्य सभासद् से बहुत ज्यादा सक्रियता दिखाई। यहाँ तक कि संविधानसभा का सदस्य नहोने पर भी ओली का व्यक्तिगत निर्ण्र्ाासभा के लिए निर्ण्ाायक होता था। संविधानसभा की अवधि बढाने के विषय में हर्ुइ बहस में ओली का एकल प्रयास बहुत र्सार्थक दिखाइ दे रहा था। साथ ही सरकार में किस को प्रधानमन्त्री अथवा मन्त्री बनाना है, इस भूमिका को वे निर्वाह करते थे।
कमल थापा
संघीयता विरोधी अभियान में खुलकर लगनेवाले कमल थापा राजा के प्रत्यक्ष शासन काल में गृहमन्त्री थे। उस समय उन्होंने संघीयता का विरोध ही नहीं किया, बल्कि ०४७ साल का संविधान लागू होना चाहिए, इसकी माँग भी की। संघीयता, राजतन्त्र और धर्म निरपेक्ष इन विषयों को जनमत संग्रह में ले जाना चाहिए, ऐसा कहते हुए उन्होंने देशव्यापी अभियान छेडÞा और उन्हें जनर्समर्थन भी मिला। लेकिन संघीयता के विरोध में और राजतन्त्र के र्समर्थन में जनता जिस मात्रा में थी, राजनीतिक दलों की असफलता के कारण वह मात्रा बढÞती चली गई।
पासपोर्ट  तस्करी
६०१ सभासदों में कुछ ऐसे भी दिखाइ दिए, जो अपनी कूटनैतिक राहदानी बेचकर करोडÞपति बनने का सपना सजोए हुए थे। राज्य के विशिष्ट व्यक्ति होने के नाते प्राप्त कूटनैतिक राहदानी बेचने में सबसे आगे अनेक दलों के तर्राई केन्द्रित नेता लोग बहुसंख्यक थे। उन में से कुछ इस प्रकार हैः
गायत्री साह
जनता दल की सभासद् गायत्री शाह को लाल पासपोर्ट बेचने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बाद में अख्तियार में मुद्दा चला और उनका सभासद् पद भी निलम्बित हुआ। ६०१ सभासदों में सब से कम उम्र की सभासद् के रुप में इनको जाना जाता था।
बिपी यादव
फोरम नेपाल के केन्द्रीय सदस्य तथा सभासद् बिपी यादव को लाल पासपोर्ट दुरुपयोग के आरोप में पुलिस ने दबोचा था। गायत्री साह के साथ ही उन पर भी अख्तियार मंे मुद्दा चला, बाद में जमानत में रिहा हुए। पार्टर्ीीध्यक्ष उपेन्द्र के दाहिना हाथ कहलाने वाले यादव तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा से मिलने के कारण भी कुछ रोज चर्चा में थे।
शिवपूजन राय
मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल के सभासद् शिवपूजन यादव ने भी वही किया। र्सलाही क्षेत्र नं. ६ से निर्वाचित राय द्वारा राहदानी बेचने की बात जब पुष्टि हर्ुइ तो वे फरार हो गए। बाद में पकडÞे जाने पर वे जमानत में रिहा हुए। इन पर जान मारने का अभियोग भी लगा है।
नारदमुनी राना
एमाले सभासद् नारदमुनी राना भी कूटनीतिक राहदानी बेचनेवालों में एक हैं। कैलाली के स्थानी निवासी राना समानुपातिक कोटा से सभासद् बने है। पासपोर्ट बेचने के आरोप में पुलिस द्वारा वे पकडÞे गए, लेकिन बाद में काठमांडू जिला अदालत में बहस के दौरान वे फरार होने में सफल हुए। तत्कालीन एमाले की सरकार और कर्मचारी के सहयोग में वे फरार होने में सफल हुए, ऐसी आम धारणा है।
ल्यारक्याल लामा
नेकपा एमाले के ल्यारक्याल लामा के पास भारत और नेपाल दोनों देश की नागरिकता तीन देश की राहदानी मिली। समानुपातिक कोटा से सभासद् बने हुए लामा को तीन वर्षतक सभासद् के रुप में कोई नहीं पहचानते थे। लेकिन जब वे एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल के नेतृत्ववाली सरकार में अर्थराज्य मन्त्री हुए, उसके बाद उनके करतूत र्सार्वजनिक होते गए। दो देशो की नागरिकता और तीन देश की राहदानी रखनेवाले तथा स्वतन्त्र तिब्बत के पक्षधर को सहयोग करने के आरोप में लामा की तीव्र चर्चा हर्ुइ। जिसके कारण मन्त्री होने के दास रोज बाद ही उनको राजीनामा देना पडÞा। यहाँ तक कि मोटी रकम लेकर लामा को सभासद् बनाया गया है, यह बात भी चर्चा में थी।
इसी तरह एमाले के प्रकाश पाखरिन और हसिना मियाँ, लोकतान्त्रिक फोरम की निलम बर्मा, गणतान्त्रिक की सलमा खातून और फोरम नेपाल की रम्भादेवी यादव भी पासपोर्ट दुरुपयोग करनेवाले सभासद् के रुप में चर्चित हैं। उन पर भी अनुसन्धान हुआ था।
मानसिक असन्तुलन
संविधानसभा के कुछ सदस्य ऐसे थे, जिन की गतिविधि को देखते हुए लगता था कि उनकी मानसिक अवस्था ठीक नहीं है और उन्हें मानसिक अस्पताल में दाखिला करना जरुरी है। ऐसे विक्षिप्त लगनेवाले सभासद् भी संविधानसभा में अपनी हैसित कायम रखने में सफल रहे।
विश्वेन्द्र पासवान
सबसे अराजक सभासद् में से एक दलित जनजाति पार्टर्ीीे विश्वेन्द्र पासवान को भी जाने जाते हैं। र्सार्वजनिक कार्यक्रम और संसद भवन में कसकर नारेबाजी करना उनकी विशेषता है। ‘बेटी को भगाकर ले गया’ कहते हुए अपने ही दामाद को पकडÞाने के लिए भी वे चर्चित हुए। उसी तरह संवैधानिक समिति की बैठक में उन्हों ने अपनी कर्ुर्सर्ीीठाकर चार मञ्जिला ऊपर से नीचे फेंक दी। उस समय उन्होंने कहा था- जरुरत पडÞने पर मैं आदमी को भी इस तरह फेंक सकता हूँ। फिर अपनी र्सट फाडÞते हुए अच्छा तमासा उन्होंने किया। इस हरकत के लिए वे सात दिनों तक संविधानसभा से निलम्बित रहे।
मातृका यादव
एकीकृत नेकपा माओवादी के तत्कालीन सभासद् मातृका यादव भी एक प्रकार के मनमौजी सभासद् के रुप में पहचाने जाते थे। जब वे वनमन्त्री हुए, स्थानीय विकास अधिकारी को शौचालय में बन्द कर चर्चित हुए। लेकिन उनके इस कदम को बहुतेरे र्सवसाधारण और इमानदार कर्मचारी ने प्रशंसा भी की थी। यादव कभी तत्कालीन कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला से बादविवाद करते तो कभी अपनी सुरक्षा के लिए नियुक्त नेपाली सेना को अपमानित कर वापस कर देते थे। वे अपनी पार्टर्ीीे अध्यक्ष प्रचण्ड का भी खूब विरोध करते थे। जिसके चलते उन्हें पार्टर्ीीे अलग होना पडÞा।
कमला शर्मा
संविधानसभा की बैठक के पहले दिन अर्थात १५ जेष्ठ ०६५ के रोज एमाले सभासद् कमला शर्मा ने कांग्रेस सभासद् पर्ूण्ाबहादुर खड्का को संविधानसभा के अन्दर ही चप्पल प्रहार किया।  संविधानसभा के चुनाव में एमाले ने कमला के पति ऋषिराम अधिकारी को उम्मेदवार बनाया था। पति की हत्या में कांग्रेस सभासद् खड्का की संलग्नता थी, ऐसा कमला शर्मा का कहना है। चुनाव प्रचार के क्रम में उन को गोली मार दी गई। बाद में एमाले ने पति के जगह में पत्नी को खडÞा किया और इस तरह वे सभासद् बनी थी।
करिमा बेगम
मूल पार्टर्ीीधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल से फोरम लोकतान्त्रिक में प्रवेश करनेवाली सभासद् करिमा बेगम ने अपने मन्त्रित्व काल में पर्सर्ााे प्रमुख जिला अधिकारी दर्ुगाप्रसाद भण्डारी को थप्पडÞ प्रहार किया था। जिला भ्रमण के क्रम में मन्त्री करिमा के स्वागत में विमानस्थल में सिडिओ का नहीं पहुँचना और उन के लिए पुरानी गाडी भेजना इन दो कारणों से कृषिराज्य मन्त्री बेगम ने सिडिओ भण्डारी को कार्यकक्ष में ही थप्पडÞ प्रहार किया था। र्सवसाधारण, कर्मचारी संगठन एवं प्रमुख प्रतिपक्ष दलों की ओर से बेगम पर कारवाही होनी चाहिए, ऐसी माँग होने पर भी तत्कालीन माधवकुमार नेपाल सरकार ने इस मांग को गम्भीरता से नहीं लिया।
प्रकाशशरण महत
पार्टर्ीीे अन्दर स्वयं को प्रखर बौद्धिक कहनेवाले नेपाली कांग्रेस के सभासद् डा. प्रकाशशरण महत ने संविधानसभा में राज्य के शासकीय स्वरुप निर्धारण समिति की निर्ण्र्ााुस्तिका फाडÞ दी। समिति के सदस्य भी रहे महत ने शासकीय स्वरुप के बारे में दलों के बीच विवाद होने पर निर्ण्र्ााुस्तिका फाडÞ दी। अपनी बात नहीं माने पर महत ने कांग्रेस सभासद् शम्भुहजरा दुसाध के हाथ से निर्ण्र्ााुस्तिका झपट ली थी। उस समय वे ऊर्जा मन्त्री थे। इस कारवाही के लिए उनपर कोई अनुशासनात्मक कारवाही नहीं हर्ुइ।
संजयकुमार साह
मधेसी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक के सभासद् संजय कुमार साह ने संविधानसभा बैठक में माइक तोडफोड किया था। एक साल से सभामुख ने सदन में बोलने की अनुमति मुझे नहीं दी कहते हुए उन्हों ने माइक तोडÞफोडÞ किया। उनकी इस हरकत के विरुद्ध सभामुख ने उनको दस दिन के लिए निलम्बित किया और तोडÞफोडÞ की क्षतिपर्ूर्ति के आदेश दिए। उन्होंने फोरम लोकतान्त्रिक में रहते हुए पार्टर्ीीवभाजन के लिए भी प्रयास किया था।
मोहम्मद इस्तियाक र्राई
मधेसी जनअधिकार फोरम के सभासद् मोहम्मद इस्तियाक र्राई भी बन कटानी के काण्ड में आरोपित रहे। बन काटने की अनुमति होनी चाहिए, यह मांग करते हुए वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ जुलूस लेकर जिला बन कार्यालय बाँके में गए थे। कानून द्वारा जंगल कटानीको प्रतिबन्ध लगाने पर भी इस की विरोध में वे खडे हुए थे।
मदिरा और अनैतिक सम्बन्ध
वैसे तो हरेक जीवित प्राणी सेक्स की ओर आकषिर्त होता है और जैसे तैसे अपनी इच्छापर्ूर्ती भी करता है। आदमी भी इस नियम का अपवाद नहीं है। आधुनिक जमाने में तो सेक्स को विल्कुल साधारण और अतिआवश्यक कहकर व्याख्या की जाती है। फिर भी हमारा सामाजिक परिवेश सेक्स को लेकर इतना उदार नहीं हुआ है। इस विषय में खुली बहस भी नहीं होती। लेकिन मन मिलने पर और समझदारी होने पर आज के जमाने में सेक्स कोई बडी बात नहीं है। लेकिन हमारे कुछ सभासद् यौनकाण्ड में चर्चित रहे। कुछ ने शराब पी कर सडÞक में तमाशा किया। कुछ घरवाली को छोडÞकर बाहरवाली के भाग गए, कुछ कोठे में रंगेहाथ पकडÞे गए। ऐसे कुछ चर्चित सभासद्ः-
खोभारी राय
सद्भावना गणतान्त्रिक के सभासद् खोभारी राय बहुत ही कामुक प्रकृति के माने जाते है। बाहुतो बार पुलिस ने उन को रासलीला करते हुए रंगेहाथ पकडÞा है। बाद वे तुरुन्त छूट जाते है। मन्त्री रहते हुए भी उन्हें नईर्-नई युवतियों की खोज में बार और रेष्टुरेन्ट में घूमते हुए पाए जाते है। देश में गणतन्त्र आने से पहले ही चर्चा में रहने वाले राय संविधानसभा चुनाव में सद्भावना की ओर से समानुपातिक कोटे में थे। चुनाव के बाद अध्यक्ष राजेन्द्र महतो के घर के सामने सराब पीकर गालीगलौज करने पर वे चर्चा में आए। उसी तरह एक बार उन को पेस्तोल के साथ पुलिस ने पकडÞा था। लेकिन कोई कारवाही नहीं हर्ुइ।
कृष्णप्रसाद यादव
रौतहट क्षेत्र नं. ४ से निर्वाचित नेपाली कांग्रेस के सभासद् कृष्णप्रसाद यादव को भी पुलिस ने ४ यौनकर्मी सहित रंगेहाथ पकडÞा था। यादव को १८ फागुन ०६५ के रोज महाराजगन्ज स्थित कान्ति बाल अस्पताल के पीछवाडे कोठी में से रासलीला करते हुए पकडÞा गया था। इस तरह पुलिस ने भी सभासद् को छूट दे दी।
अच्युतराज पाण्डे
नेपाली कांग्रेस के सभासद् अच्युतराज पाण्डे जुवा खेलते हुए पुलिस द्वारा पकडÞे गए। काठमांडू भोटेबहालस्थित दिनेश शेरचन के घर में जुवा खेलते समय पुलिस ने छापा मारी में उनको पकडÞा था। लेकिन कांग्रेसी दबाव के कारण कुछ देर बाद में ही उनको छोडÞ दिया गया।
गुणखर बस्याल
एकीकृत नेकपा माओवादी सभासद् गुणखर बस्याल ने अपनी प्रेमिका के लिए सभासद् पद का ही त्याग कर दिया। पर्वत क्षेत्र नं. २ से निर्वाचित बस्याल ने पहली पत्नी को छोडÞकर कमला तामाङ नाम की बाहरवाली को लेकर फरार हो गए। बाद में उसी युवती के लिए बस्याल ने संविधानसभा सदस्य पद ही त्याग दिया। पार्टर्ीीे बार-बार संसद में उपस्थित होने के लिए हृविप जारी करने पर भी वे अनुपस्थित रहे और ‘हमने उस पद से इस्तिफा दे दिया है’ वे ऐसा कहते थे।
रवीन्द्र श्रेष्ठ
माओवादी से एमाले में प्रवेश करनेवाले मन्त्री रवीन्द्र श्रेष्ठ ने दूसरी पत्नी के लिए अपना मन्त्रीपद ही छोडÞ दिया। विवाहयोग्य अपनी बेटी और अपनी श्रीमती को छोडकर श्रेष्ठ मन्त्री क्वाटर से ही फरार हुए थे। लगभग ५० की उमरवाले श्रेष्ठ अपने से आधी उमरवाली धादिङ की एक पार्टर्ीीार्यकर्ता को लेकर भागते बने। मन्त्री पद में रहते वक्त वे उस युवती से बहुतों बार डेटिङ में भी गए थे।
मिनेन्द्र रिजाल
नेपाली कांग्रेस की समानुपातिक सभासद् सीता गुरुङ और कांग्रेसी नेता मिनेन्द्र रिजाल के बीच भी सुमधुर सम्बन्ध को लेकर कार्यकर्ता खूब रस लेते हुए चर्चा करते थे। सभासद् रहते हुए वे दर्जनों बार डेटिङ में गए थे। नेता रिजाल को कांग्रेस के अन्दर बेडपार्टनर बदलते रहनेवाले नेता के रुप में पहचाना जाता था। किसी समय रिजाल के साथ कांग्रेस की ही डीना उपाध्याय का सुमधुर सम्बन्ध मी चर्चा का विषय रहा।
शारदा नेपाली
नेकपा माले की सभासद् शारदा नेपाली ने दिन दहाडेÞ मदिरा पीकर सडÞक में तमाशा किया। माले की ओर से समानुपातिक कोटा अर्न्तर्गत सभासद् बनी हर्ुइ नेपाली नशे में धूत होकर अर्धनग्न अवस्था में बाहर सडक में दिखाइ दी थी। शराब पीने की आदत से परेशान नेपाली ने ‘पार्टर्ीीो लेबी देना पडÞता है’ कहकर ‘घरगृहस्थी चलना भी मुश्किल है’ कहते हुए बहुतो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया था। उन का स्थायी निवास बर्दिया है।
सरोज यादव
राजेन्द्र महतो नेतृत्व की सद्भावना पार्टर्ीीे सभासद् सरोज यादव ने मन्त्री रहते समय शराब पीकर वीर अस्पताल में कर्मचारियों के साथ दुर्व्यर्वहार किया। इतना ही नहीं सुन्धारा स्थित ‘गाजलु आँखा’ नामक डान्स बार में बिना पेमेन्ट किए वे भागते हुए पकडÞे गए। यादव भी युवती के पीछे दिवाना रहनेवालो में से है।
टोपबहादुर रायमाझी
वैसे तो टोपबहादुर रायमाझी प्रत्यक्ष रुप से यौनकाण्ड के आरोपी नहीं है। मगर उनकी श्रीमती योगमाया रायमाझी के कारण वे भी यौन प्रसंग में चर्चित रहे। टोपबहादुर मन्त्री पद में रहते हुए श्रीमती योगमाया ने अपने पति की मर्दानगी पर र्सार्वजनिक स्थलों में प्रश्न उठाया था। इधर टोपबहादुर ने अपने मन्त्रित्वकाल में अपने कार्यकर्ताओं को करोडों की रकम उदारतापर्ूवक वितरित की थी, ऐसा समाचार र्सार्वजनिक हुआ था।
निरु दर्लामी
एकीकृत नेकपा माओवादी की सभासद् निरु दर्लामी के अनेक यौनपार्टनर है, ऐसा कहा जाता हैं। यह बात माओवादी कार्यकर्ता के बीच भी चर्चित है। जनयुद्धकाल में पति शेरमान कुँवर की मृत्यु के बाद शहीद पत्नी की हैसियत से पार्टर्ीीनर्ण्र्ााविपरित उन्होंने संविधानसभा चुनाव में उम्मेदवारी दी थी। माओवादी ने लीलामणि पोखरेल को आधिकारिक उम्मेदवार बनाया था, फिर प्रतिद्वन्द्वी निरु दर्लामी दोब्बर मत से विजयी हर्ुइ। तीन सन्तान की माँ दर्लामी विधवा होने से पहले भी माओवादी नेताओं के साथ अनैतिक सम्बन्ध में संलग्न थी, ऐसा कहा जाता है।
माओवादी के अन्दर इस प्रकार की विकृति बहुत मात्रा में है। माओवादी नेतागण हेमन्तप्रकाश ओली, शक्तिबहादुर बस्नेत, रामबहादुर थापा, पम्फा भुषाल, हरिबोल गजुरेल, शान्तिमान कार्की, टेकेन्द्र भट्ट, लेखनाथ न्यौपाने आदि नेता भी प्रेम और यौनकाण्ड के कारण समय-समय पर चर्चित रहते आए हैं। इसी तरह प्रेम, सेक्स और मदिराकाण्ड के लिए चर्चित होने वालो में राप्रपा नेपाल की सभासद् कुन्ति शाही, नेपाली कांग्रेस की सभासद् लक्ष्मी परियार, एमाले के रामचन्द्र झा आदि भी हैं।
अपराध की दुनियां
    कुछ ऐसे सभासद् भी थे, जिन की पृष्ठभूमि को देखते हुए बडेÞ-बडेÞ अपराधी भी शर्मा जाएं। उन पर किसी ने कारवाही नहीं की, बदले में कुछ तो मन्त्री भी हुए। देखिए उन के चेहेरेः
बालकृष्ण ढुंगेल
ओखलढुंगा से निर्वाचित एमाओवादी सभासद् बालकृष्ण ढुंगेल को सशस्त्र युद्धकाल में रामेछाप के उज्जनकुमार श्रेष्ठ की हत्या का अभियोग लगा था। उस अभियोग में सर्वोच्च अदालत ने उन को जन्मकैद और र्सवस्वहरण की सजा सुनाई है। मगर अभीतक उन पर कोई कारवाही नहीं हर्ुइ।
श्यामसुन्दर गुप्ता
व्यापारी पवन संर्घाई के अपहरण के आरोप में सद्भावना -आनन्दीदेवी) पार्टर्ीीे सभासद् श्यामसुन्दर गुप्ता पकडÞे गए। अपनी गिरफ्तारी के लिए उन्होंने सरकार और मधेशी नेताओं के षड्यन्त्र को जिम्मेवार ठहराया। लेकिन पुलिस ने हिरासत में रख कर अनुसन्धान जारी रखा और उनके द्वारा अपहरण हुआ है, इस बात की पुष्टि हर्ुइ। अभी वे जेल जीवन बिता रहे है।
बबन सिंह
स्वतन्त्र सभासद् केे रुप में निर्वाचित बबन सिंह की पृष्ठभूमि हत्या, अपरहण, डकैती जैसे अपराध से जुडी हर्ुइ है। नेपाल और भारत दोनों देश की पुलिस ने उन को मोस्टवान्टेड की सूची में रखा था। मगर वे संविधानसभा चुनाव भूमिगत रुप में ही जीत गए। राजधानी में हुए अनेकों विस्फोट के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है। १४ जेष्ठ २०६५ में सभासद् पद तथा गोपनीयता का शपथ वे ले रहे थे और पुलिस उनको ढूंढ रही थी। पुलिस से बचकर संविधानसभा भवन में शपथ लेने पहुँचे सिंह पर कोई कारवाही नहीं हर्ुइ। इधर आकर वे शान्ति और बुद्ध के अनुयायी जैसे बने हुए हैं।
अग्नि सापकोटा
एमाओवादी नेता अग्नि सापकोटा, ऐसे व्यक्ति है, जिन को सशस्त्र युद्धकाल में व्यक्ति हत्या का आरोप लगा था। मन्त्री पद में नियुक्त उनको काभ्रे छत्रबास-५ के अर्जुन लामा की हत्या का आरोप भी लगा है। ‘एक हत्यारे को मन्त्री बनाया गया’ कहते हुए मानव अधिकारकर्मी सुबोधराज प्याकुरेल, इन्दिरा शर्मा तथा पत्रकार कनकमणि दीक्षित आदि ने सर्वोच्च अदालत में उन के विरुद्ध रिट भी डाला था।
प्रभु साह
एकिकृत माओवादी के सभासद् प्रभु शाह पर भी हत्या का अभियोग है। विश्व हिन्दू संघ के संस्थापक अध्यक्ष काशी तिवारी के हत्या प्रभु साह ने कर्राई, उन पर यह अभियोग लगा था। इस अभियोग से बचने के लिए जब वे मन्त्री हुए, पीडित परिवार को मोटी रकम देकर खरीदने का प्रयास भी हुआ। लेकिन परिवार ने यह स्वीकार नहीं किया और बाध्य होकर प्रभु शाह को मन्त्री पद छोडÞना पडÞा।
र्सर्ूयमान दोङ
एमाओवादी के सभासद् र्सर्ूयमान दोङ पर भी हत्या का अभियोग है, जिन को डा. बाबुराम भट्टर्राई नेतृत्व की सरकार में ऊर्जा राज्यमन्त्री बनाया गया था। र्सर्ूयमान दोङ प्रहरी के रर्ेकर्ड में फरार व्यक्ति है। काभ्रे जिला अदालत में अभी भी उन पर मुकदमा चल रहा है।
भ्रष्टाचार, घुसखोरी  और अन्य
जिन नेताओं पर भ्रष्टाचारी होने का आरोप लगता है, उन में से अधिकतर कानूनन भ्रष्टाचारी प्रमाणित नहीं होते। फिर इस चार वषर्ीय कार्यकाल में सब से बडा भ्रष्टाचार माओवादी के अन्दर हुआ है, ऐसा माना जाता है। सेना समायोजन के नाम पर माओवादी लडाकू समायोजन प्रकरण में बहुत बडा भ्रष्टाचार हुआ है, ऐसा माना जाता है। नकली लडÞाकू दिखाकर सरकार से पैसा लेना, ऐसा घोटला माओवादी ने खुलेआम किया।
उसी तरह सरकार में सहभागी प्रायः प्रत्येक मन्त्री ने किसी न किसी रुप में भ्रष्टाचार किया, इस प्रकार का समाचार बारम्बार र्सार्वजनिक हुआ था। फिर मधेशवादी दल से सरकार में सहभागी मन्त्रियों की तरफ से बडेÞ-बडेÞ भ्रष्टाचार होने के समाचार भी र्सार्वजनिक हुए। विजयकुमार गच्छेदार, जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता और राजेन्द्र महतो को तो ‘भ्रष्टाचार शिरोमणि’ भी कहा जाता है। सरकार में रहते हुए भ्रष्टाचार करनेवालों में सिर्फवे लोग नहीं है। सभी दल के सभी मन्त्री ने किसी न किसी रुप में भ्रष्टाचार किया, ऐसा समाचार बारम्बार र्सार्वजनिक हुआ है।
डोलबहादुर कार्की
नेकपा एमाले के सभासद् डोलबहादुर कार्की को पुलिस ने रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ पकडÞा। किसी युवक को इन्सपेक्टर बनादेंगे कहकर उससे दो लाख रुपये वह ले रहे थे। उन पर अख्तियार में केस चला और वे जमानत में रिहा हुए। घुसकाण्ड के चलते उन का सभासद् पद निलम्बित हुआ। कार्की एमाले निकट अखिल नेपाल किसान महासंघ के सचिव भी थे। उन के पकडÞे जाने के पीछे एमाले नेता का ही हाथ है, ऐसा कार्की का आरोप था।
खड्गबहादुर विश्वकर्मा
एकीकृत नेकपा माओवादी के पोलिटब्युरो सदस्य भी रहे सभासद् खड्गबहादुर विश्वकर्मा चोरी की गाडी पर सवार होकर प्रहरी द्वारा पकडेÞ गए।  महिला, बालबालिका तथा समाजकल्याण मन्त्री के कार्यकाल में प्राप्त सरकारी गाडी में नक्कली नम्बर प्लेट डालकर प्रयोग किया गया था। पुलिस ने उनको एक घण्टा नियन्त्रण में रखा मगर और कोई कारवाही नहीं की।
इन्द्रमती यादव
एमाओवादी सभासद् इन्द्रमती यादव को कपिलबस्तु में बिजली चोरी करते हुए रंगेहाथ पकडÞा गया। एमाओवादी के समानुपातिक कोटा से सभासद् हर्ुइ यादव को बिजली चोरी के लिए तीन हजार जरिवाना किया गया था।
किरणदेवी राय
नेकपा एमाले की सभासद् किरणदेवी यादव ने एसएलसी की परीक्षा में अपने बदले में अपनी बेटी को बैठाया था। र्सलाही के बरहथवा परीक्षा केन्द्र में उन्होंने अपनी बेटी को परीक्षार्थी के रुप में बैठाया। बेटी को नकली परीक्षार्थी बनाकर अपने नाम में उपस्थित कराने पर भी राय पर कोई कारवाही नहीं हर्ुइ। बेटी के पकडÞे जाने पर दूसरे रोज कार्यकर्ता सहित वे परीक्षा केन्द्र पहुँची थी, लेकिन उन्हें परीक्षा देने का मौका नहीं मिला।
प्रेमबहादुर पुलामी
एमाओवादी के सभासद् प्रेमबहादुर पुलामी ने भी एसएलसी परीक्षा में अपने बदले में किसी दूसरे को उपस्थित कराया था। पुलामी ने रौतहट के जनज्योति मा.वि. में साइते लामा नामक युवा को अपने बदले में बैठाया था। पुलामी मकवानपुर-२ नम्बर क्षेत्र से निर्वाचित सभासद् थे। वे संसद के राष्ट्रिय हित समिति और र्सार्वजनिक लेखा समिति के भी सदस्य थे।
राजेन्द्र खेतान
नेपाल के प्रतिष्ठित उद्योगपतिओं में से एक है, राजेन्द्र खेतान। नेकपा माले से समानुपातिक कोटा में सभासद् होनेवाले खेतान द्वारा सञ्चालित उद्योग-धन्दा मंे नकली भ्याट बिल बनाकर करोडÞो का राजश्व गवन करने का मामला बाहर आया। इतना ही नहीं खेतान समूह द्वारा उत्पादित टुबोर्ग बियर पिने पर बाग्लुङ के देवीलाल गौचन और चन्द्रसिंह अदैले बिमार हुए। उसके बाद खेतान की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने पत्राचार किया, मगर कोई कानूनी कारवाही नहीं हर्ुइ।
महेन्द्रप्रसाद यादव
सत्ता के लिए जान देनेवाले महेन्द्र यादव ने अपनी मूल पार्टर्ीीर्राई-मधेश लोकतान्त्रिक को छोडÞकर तमलोपा नेपाल गठन किया। मन्त्री पद में रहते हुए कर्मचारियों का स्थानान्तरण और प्रोन्नति के लिए रकम निर्धारित करनेवालेे महेन्द्र यादव चर्चित रहे। सिचाइँ मन्त्री के काल में अपने पीए मनोज चौधरी के सहयोग में मन्त्रालय के सचिव बिन्द्रा हाडा को अश्लील गाली देते हुए जान मारने की धम्की दिनेवाले यही महोदय थे।
चन्दा देवी
एकीकृत नेकपा माओवादी के सभासद् चन्दादेवी राम २०६६ साल माघ १२ गते पर्सर्ााे सरकारी पेडÞ काट्ते हुए रंगेहाथ पकडÞी गई थी। पर्सर्ाान्यजन्तु आरक्ष के कर्मचारीओं ने सभासद् चन्दादेवी के साथ ही कुछ स्थानीय युवकोओं पेडÞ काटते समय नियन्त्रण में लिया था।
झक्कुप्रसाद सुवेदी
संविधानसभा निर्वाचन से पहले इन का नाम उतना परिचित नहीं था। मगर चुनाव में नेकपा एमाले के तत्कालीन महासचिव माधवकुमार नेपाल को पररास्त कर अचानक वे चर्चा में आए। इसी तरह एक र्सवसाधारण चाय बेचनेवाले के हाथों थप्पडÞ खाने के बाद भी वे चर्चित हुए। सुवेदी को उन के ही चुनाव क्षेत्र गोर्खा गाईखोर-८ के प्रेमराज देवकोटा ने थप्पडÞ मारा था।
अनेक प्रकार के सभासद
सरकार में मन्त्री जैसे गरिमामय पद पर रहते हुए सडक में बन्द-हडताल करनेवाले सभासद् भी इन चार वर्षो में दिखाई दिए। उन में से कुछ चर्चित थे, जैसे एमाओवादी सभासद् लेखराज भट्ट और जनमुक्ति पार्टर्ीीे सभासद् मालवर सिंह थापा। वे दोनों मन्त्री पद में रहते हुए भी अपने कार्यकर्ताओं को सरकार के विरुद्ध बन्द-हडताल में उतारनेवाले सभासद् थे।
उसी तरह मन्त्रीजैसे पद पर आसीन रहते हुए देश विखण्डित करने की चेतावनी देनेवाले सभासद् भी दिखाई दिए। सद्भावना के राजेन्द्र महतो से फोरम लोकतान्त्रिक के शरदसिंह भण्डारी लगायत बहुतेरे मधेशवादी दल के नेताओं ने सत्ता के अन्दर और बाहर से देश को विखण्डित कर अलग राज्य बनाने की अभिव्यक्ति भी दी। उन का उद्देश्य देश में संघीयता को संस्थागत बनाकर जनता के अधिकार को संविधान में स्थापित करवाने से ज्यादा, जाती और समुदाय को उत्तेजित बनाने में केन्द्रित रहा।
‘देश को विखण्डित करंगे’ कहते हुए अराजक भाषण करनेवालों में संविधानसभा के भीतर और बाहर अनेक जातीय नेता लोग दिखाइ दिए। विशेषकर मधेशवादी दल के नेता और जनजाति नेताओं ने देश को विभाजित कर नयाँ राज्य बनाने की घोषणा की। डा. ओम गुरुङ, आङकाजी शर्ेपा, राजकुमार लेखी जैसे नेता इस कोटी में पडÞते है। उन के जातीयता सम्बन्धी उग्रवादी चिन्तन के कारण से ही संविधानसभा ने समय में संविधान बनाने में सफलता नहीं पाई।
अन्त्य में
ऊपर उल्लेखित कुछ सभासदों के कारण पूरी संविधानसभा ही बदनाम हर्ुइ। ६०१ सभासद् में कुछ इमानदार भी थे, जो सचमुच जनता के पक्ष में संविधान बनाना चाहते थे। मगर उन लोगों की आवाज किसी ने नहीं सुनी। सत्ता के खिलाडÞी के रुप में परिचित और चरित्रहीन नेताओं ने सञ्चार माध्यम में अपनी पकडÞ मजबूत रखी।
उसी तरह संघीयता के नाम में जनता को अधिकार दिलाने के लिए नहीं, बदले में एक जाति तथा समुदाय विशेष के नेता और शासक को अग्राधिकार दिलाने की बात भी खूब चली। चाहे ‘एक मधेश, एक प्रदेश’ के नाम में क्षेत्रीय राजनीति करनेवाले नेताओं, अथवा जनजाति आदिवासी के नाम में जातीय राजनीति करनेवाले समूहों, सबों ने जनता के लिए आवश्यक आधारभूत तथा समान अधिकार की बात नहीं बल्कि आत्मनिर्ण्र्ााके अधिकार सहित स्वायत्त प्रदेश के नाम में एक जाति अथवा समुदाय विशेष के अग्रणी लोगों के आधिपत्य की बात उर्ठाई। इसके विरोध में आमजनता सहित एक बहुत बडा समूह है, जिसके कारण भी संविधान सभा संविधान निर्माण नहीं कर सकी। अब फिर दूसरी संविधानसभा निर्वाचन की बात हो रही है। चुनाव संविधानसभा का हो अथवा संसद का, फिर हम जनता ऐसे ही सत्ता-लोभी और चरित्रहीन नेताओं को निर्वाचित कर संविधानसभा में भेजेंगे तो फिर बहुत बडी गलती होगी। देश की अवस्था में कोई सुधार नहीं होगा। इसलिए ऐसे नेताओं को समय में पहचान लेना जरुरी है।

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