खस शासकों का तुरुप का पत्ता कितनी कारगर सिद्ध होगी

त्रिभुवन सिंह :ये बात लगभग सब खसवादी नेता जानते हैं कि अब अगर मधेश की जनता को दबाकर रखने की कोशिश की गई तो मधेश नेपाल से अलग देश बन सकता है । यह बात नेपाली काँग्रेस के नेता खुम्बबहादुर खड़का और स्वयं बाबुराम भट्राई बोल भी चुके हैं । ऊपर से ये लोग चाहे कितना भी इनकार कर लें और बेफिक्री होने का दिखावा कर लें परन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये अन्दर से बौखलाए हुए हैं । यही वजह है कि सत्ता पक्ष के द्वारा एक भी सही कदम नहीं उठाया जा रहा है वो बौखलाहट में गलत निर्णय लेते जा रहे हैं । २०७० साल से जो रंगभेद का अपमान मधेशी जनता सहती आ रही है और शोषण का शिकार होती आई है उसी के विरोध के फलस्वरूप सीके राउत जैसी विचारधारा या व्यक्ति का जन्म मधेश की धरती पर हुआ है । यह सभी जानते हैं कि सीके राउत की अगुवाई में स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन का जन्म हुआ और सत्ता की नीति की वजह से इसका बहुत कम समय में प्रचार और प्रसार भी हुआ है । युवा वर्ग इसकी ओर आकर्षित भी हो रहे हैं । मधेश आन्दोलन को सम्बोधन करने में सरकार जितनी देर कर रही है इनके मन में विरोध की भावना भी उतनी ही बलवती हो रही है ।
नेपाल के इतिहास में खसवादियों की भूमिका बहुत चतुर रही है और आज की स्थिति में भी ये खसवादी किसी भी हाल में मधेश पर अपना आधिपत्य जमाए रखना चाहते हैं और इसके लिए वो साम, दाम, दण्ड, भेद कुछ भी अपनाने से हिचक नहीं रहे । इसलिए आज भी मधेश के मन में डा. बाबुराम भट्राई की नई पार्टी और नीति के प्रति शंका है । मधेश की जनता को यह लग रहा है कि खसवादी सोच से प्रभावित होकर ही अपने आधिपत्य को बरकरार रखने के लिए बाबुराम भट्राई मधेश के शुभचिन्तक बन कर सामने आ रहे हैं और मधेश आन्दोलन का समर्थन कर रहे हैं । यह समर्थन उनकी विवशता हो सकती है दिल की आवाज नहीं । खसवादी शासक एक सोची समझी गेम खेल रहे हैं और इस गेम के लिए बाबुराम भटराई से अच्छा कोई पात्र या कार्ड नहीं हो सकता है । खस शासकों को यह लगता है कि यही वो पात्र है जो सीके राउत के बढ़ते कद को प्रभावित कर सकता है । जिस तरह महाभारत के युद्ध में अर्जुन को रोकने के लिए भीष्म पितामह को एक मजबूत कार्ड बनाया गया था और उसका उपयोग किया गया था । ठीक वैसे ही अभी बाबुराम भटराई एक मजबूत कार्ड बनकर मधेश की राजनीति में उतरना चाह रहे हैं । किन्तु मधेश अभी भी शंकित है क्योंकि सभी पूर्व के पहाड़ी नेताओं ने मधेश की भावनाओं से खेला है और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा है । मधेश वर्षों से उनके द्वारा छला जाता रहा है । आज का समय मधेश के लिए सावधानी से सोचने का है क्योंकि यह समय आर पार की लड़ाई की है अगर आज वो चूक जाते हैं तो कल उनके हाथों में कुछ नहीं रहेगा । एक ओर अपनी स्वार्थ और कुर्सी की चाहत से मजबूर कुछ मधेशी नेता हैं और दूसरी ओर पहाड़ी नेता हैं । मधेशी नेता आज भी स्वार्थ की वजह से ही इनका साथ दे रहे हैं और इनके साथ खड़े नजर आ रहे हैं । महीनों से चल रहे आन्दोलन ने मधेश की मिट्टी को खून से रंग दिया है कभी कभी तो लगता है कि इन नेताओं की वजह से कहीं शहीदों की शहादत बेकार न चली जाय । सत्ता के मोह से ग्रसित मधेशी नेता संसद से राजीनामा तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं ऐसे में मधेश की जनता का शक भी वाजिब है । मधेश की भोली भाली जनता दिशाहीन और उपलब्धिविहीन आन्दोलन का हिस्सा बन कर महीनों से सड़क पर है किन्तु न तो सत्ता का ध्यान इस ओर जा रहा है और न ही मधेशी नेताओं की ओर से कोई पुख्ता पहल हो रही है । हे ईश्वर इन पथभ्रष्ट नेताओं को सद्बुद्धि दो ताकि मधेशी वीरों का खून अपमानित ना हो सके ।

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