खस शासको द्वारा नंगा नाचका प्रदर्शन : आत्माराम प्रसाद

आत्माराम प्रसाद, बीरगंज , २२ भाद्र |

आत्माराम प्रसाद

आत्माराम प्रसाद

खस शासकों मे बहुत बड़ी एकता है। विगत २४० वर्षों का इतिहास देखे, आपस मे हरदम झगड़ते रहे, मकै पर्व हुआ, सत्ता इन्हीं के हाथो मे रहा, कोत पर्व हुआ सत्ता इनके हाथो से नहीं फिसली, २००७ सालके क्रान्ति मे भी अपने ही समुदाय के राणाओ के हाथ से सत्ता तो फिसला पर शाह वंश के हाथो मे रूपान्तरित हुआ। २०१७ साल से लेकर २०४६ तक सत्ता शाहों के हाथ में रहा और २०४६ साल के बाद लोकतन्त्र के नाम पर फिर से उन्हीं खसों के हाथ मे ही रहा। पर ग़ौर से देखेंगे तो आधुनिक नेपाल की राजनीति मे जो २००७ साल के बाद शुरू हुआ, मे खस अन्तर्गत के ब्राह्मण और क्षत्रियों के वीच की लडाई बन कर रह गई है। खस ब्राह्मण समुदाय सिद्धान्त के नाम पर कम्युनिस्ट और लोकतन्त्रवादी के हैसियत से आपस मे लड़ते रहे और सत्ता खस क्षत्रियों के हाथ मे सलामत रही। बी.पी. कोईराला ने सिद्धान्त के नाम पर ही २०३६ सालके जनमत संग्रह के नतीजों को कम्युनिस्टों के अस्वीकार करने का अनुरोधों ठुकराया था और सत्ता खस क्षत्रियों के हाथ मे सुरक्षित रहा। पर जब गिरिजा प्रसाद कोईराला ने लोकतन्त्र की वापसी के नाम पर सिद्धान्तों की राजनीति छोड़ कम्युनिस्ट और तथाकथित लोकतन्त्रवादियों की एक ही जमात बना कर आन्दोलन का विगुल फुका तो शाह शासन चरमराते हुये सत्ता से बेदख़ल हई और सत्ता खस ब्राह्मणों के हाथ मे आई और बहुत कुशलता पूर्वक अपने हाथो मे ही रखने की क़वायद शुरू हुई। कभी कांग्रेस के नाम पर तो कभी कम्युनिस्ट के नाम पर सिद्धान्त का हवाला देते हुये सरकार पर पकड़ जमाये रखा। कभी गिरीजा प्रधान मन्त्री हुये तो कभी कृष्ण प्रसाद भट्टराई, कभी मनमोहनअधिकारी। पर इन्होंने यह सुनिश्चितता बनाये रखा की कांग्रेस और कम्युनिस्ट के विचार धारा के आधार पर नेपाल के समाज को बाट कर रखे और जब क्षत्रियों के हाथ मे सत्ता जाने का ख़तरा दिखाई दे तो लोकतन्त्र के नाम पर दोनो विचार धाराओं का खुबसूरत समायोजन होता रहे। ये खस ब्राह्मण देख चुके थे की आपसी लडाई के बदौलत ही तथाकथित लोकतान्त्रिक काल मे शेरबहादुर देउबा, लोकेंद्र बहादुर चन्द व सूर्य बहादुर थापा जैसे ग़ैर ब्राह्मण खस का सत्ता मे पदार्पण हुआ था। राजा ज्ञानेन्द्र ने जब सत्ता अपने हाथ मे लिया तो प्रधानमन्त्री के पद पर अपने शासन काल मे शेर बहादुर देउबा, सूर्य बहादुर थापा व कीर्तिनिधि विष्ट को सरकार चलाने की ज़िम्मेवारी दी थी। झगड़ा सत्ता पर क़ाबिज़ रहने की बात पर यह दो खस समुदाय के वीच सदियों से होता रहा पर नेपाल मे रहने वाले मधेसी समुदाय, आदीवासी जनजाति समुदाय व दलित समुदाय इन के सत्ता सुख के चक्र मे पिसते रहे और इनको सत्ता के सुख से नवाजते रहे कभी राष्ट्रीयता के नाम पर तो कभी कांग्रेस कम्युनिस्ट के नाम पर तो कभी लोकतन्त्र के नाम पर। लोकतन्त्र के नाम पर तो सत्ता के ७ स्थायी अंग सरकार, संसद, सेना, शान्ति सुरक्षा निकाय, निजामति तन्त्र, अदालत और संचार समूह मे अपने समुदाय जो तथाकथित लोकतन्त्र के उपज थे को प्रवेश करा सत्ता पर पूर्ण नियन्त्रण किया। ज्ञानेन्द्र अगर समय रहते ईस षड्यन्त्र को समझ लिये रहते और मधेसी तथा आदीवासी जनजाति समुदायों को मिला कर रखते तो शायद नेपाल गणतन्त्र नहीं होता। लोकतन्त्र के नाम पर मधेसियों को नेपाली कांग्रेस और एमाले तथा गणतन्त्र और स्वायत्तता के नाम पर आदीवासी और जनजाति को छिन्न भिन्न किया और जब दोनो मिले तो राजतंत्र समाप्त का नतिजा निकला। यह लोग बड़ी चतुराई से पूरे नेपालको गणतन्त्र और तथाकथित चिनी मोडेल के स्वायत्तता पर सदियों तक नेपाल पर अपने समुदाय का एकांकी राज्यकी निर्माण करते जहाँ वही श्री ६, ५, ३ सरकार रहते पर सब कुछ ख़ाक मे मिला दिया मधेस विद्रोह द्वारा स्थापित संघियता, समानुपातिक समावेसिकता तथा जनसंख्या के आधार निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दे।
पहला संविधान सभा गिरीजा, सुशील, ओली, माधव, झलनाथ, सी.पी. तथा प्रचण्ड, बाबुराम के प्रयत्नों का ही नतिजा रहा की विना काम के एकल जातीय पहिचान और बहु जातीय पहिचान के नाम पर तो कभी थारू मधेसी के नाम पर तो कभी मुसलमान मधेसी नहीं है के नाम पर पुरे संविधान सभा कार्यकाल मे पहिचान पक्षधर, परिवर्तन पक्षधर मधेसी, आदीवासी और जनजाति, पिडीत दलित तथा मुस्लिम समुदायों की वीच ३६ का आँकड़ा बनाये रखा और जब ये समुदाय समझ गये वास्तविकता को तो संविधान सभा को जिसका गणितीय आधार परिवर्तन के पक्ष मे था को भंग करा दिया गया और यही नहीं संवैधानिक प्रावधान के विपरीत खिलराज रेगमी के अध्यक्षता मे सरकार गठन कर यह सुनिश्चित किया की अब की बार की संविधान सभा मे परिवर्तन पक्षधर का पतन हो। प्रथम संविधान सभाके पुरे कार्यकाल मे सरकारका नियन्त्रण पहले प्रचण्ड के नियन्त्रण मे रहने बावजूद सत्ता के अन्य अंगों का भरोसा नहीं जित पाने के वजह से बाहर का रास्ता देखना पड़ा और सत्ता फिर माधव नेपाल, झलनाथ खनाल व बाबुराम भट्टराई के इर्द गिर्द घुमती रही। ईन लोगोने यह सुनिश्चित किया की आपसी झगड़ा चलता रहे जिससे मधेसी, आदीवासी और जनजाति, मुस्लिम, दलित तथा थारू मुग़ालते मे रहे की मेरे रहनुमा यही लोग है, इन्हीं के चलते उनको उनका अधिकार मिलेगा और वे कभी एक न हो पायें। लेकिन जब दुसरा संविधान सभा मे संविधान निर्माण के लिये जो नंगा नाचका प्रदर्शन किया गया, न वे कम्युनिस्ट रहे न लोकतन्त्रवादी न वे संघीयता के पक्षधर रहे न समानुपातिक समावेसिकता के, प्रचण्ड के माओवादी जो हज़ारों नागरिकों को अधिकार के नाम पर क़त्ल कराया था का एकाएक पल्ला बदलते देखा जैसे रातों रात भैंस के सिर से सिंग ग़ायब तो सभी समुदायों को महसुस हुंआ की असली माजरा क्या है और आज एकता के सूत्र मे बँधते जा रहे है। अब समझ मे आरहा है की एकल जातीय राज्य जो नेपाल मे कैसे भी सिमांकन करे नहीं हो सकने वाला परिस्थिति विद्यमान रहने के वावजुद जातीय शब्द का ग़लत व्याख्या कर नेपाल को एक जातका राज्य का निर्माण के दिशा मे अग्रसर है। इसको कदापि नहीं होने देना है। अखण्ड देश क़ायम क़ायम हेतु सभी मधेसी, आदीवासीरजनजाति, पहाड़ के नेपाल प्रेमी, थारू, दलित, मुसलमान समुदाय को एक होकर लड़ने की आवश्यकता है।

 

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