खुद अपने बाग के फूलों से डर लगे हैं मुझे

प्रो. नवीन मिश्रा

अपने विद्यार्थी जीवन में पटना के एक मुशायरा कार्यक्रम में मुझे शेर सुनने को मिला था- “न खौफे बर्क न खौफे सरर लगे है मुझे, खुद अपने बाग के फूलों से डर लगे है मुझे।” इसका अर्थ यह है कि मुझे बिजली के चमकने और बादल के गरजने से डर नहीं लगता है लेकिन अपने ही बाग के फूलों से डर लगता है। नेपाली राजनीतिक दलों की नियति को देख कर ही शायद शायर ने इस शेर की रचना की है। यहाँ के किसी भी राजनीतिक दल को विरोधी दल से डरने की आवश्यकता नहीं है। सभी राजनीतिक दलों को अपनी ही पार्टी
लोगों से सबसे ज्यदा विरोध का सामना करना पड है। आप शुरु से लेकर आज तक के इतिहास का आकलन कीजिए। गिरिजाप्रसाद कोईराला ने अपने ही दल के नेताओं के विरोध के कारण अपनी पार्टी बहुमतवाली सरकार को भंग कर देश को मध्यावधि चुनाव की आग में झोंक दिया था। इसी दिन से नेपाली राजनीति में अस्थिरता का दौर शुरु हुआ और नेपाली कांग्रेस का ग्राफ जो नीचे खिसकना शुरु हुआ, सो अब तक जारी है। फिर माधव नेपाल को अपने ही दल के नेता झलनाथ खनाल के विरोध के कारण प्रधानमन्त्री पद त्यागना पडÞा। और आज बाबुराम भट्टर्राई की सरकार को गिराने के लिए उनके ही दल के नेता वैद्य कमर कसे हुए हैं। मधेशी दलों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। एक समय की सद्भावना पार्टर्ीीो मधेशी दल का प्रतीक हुआ करती थी, आज न जाने कितने भागों में विभाजित है। उपेन्द्र यादव का फोरम जो पिछले चुनाव के बाद सबसे बडेÞ मधेशी दल के रुप में उभर कर सामने आया था, दिल के टुकड हजार हुए की तर्ज पर अस्तित्वविहीन हो गया है। महन्थ ठाकुर का तमलोपा भी अर्न्तविरोध के कारण विभाजित हो चुका है। यूँ कहने को लोग जो भी कहें, इस सब के पीछे सभी दलों के अपने ही नेताओं का हाथ है।
लोकतान्त्रिक व्यवस्था अर्ंतर्गत राजनीतिक दलों को रीढÞ की हड्डी की संज्ञा दी गई है, जिस पर पूरा शरीर टिका होता है। अगर लोकतान्त्रिक व्यवस्था रुपी शरीर की रीढÞ की हड्डी रुपी राजनीतिक दल ही कमजोर हो तो व्यवस्था का चरमराना लाजिम है। राजनीतिक दलों की यह दर्ुदशा नेताओं के कारण है, जो राष्ट्रीय हित की अनदेखी कर अपने स्वार्थपर्ूर्ति के लिए सत्ता के पीछे भाग रहे हैं। आज तक ऐसी एक भी मिसाल देखने को नहीं मिली हैं, जब किसी राष्ट्रीय हित के किसी मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल एकमत हुए हों। यही कारण है कि देश में अभी तक न तो संविधान निर्माण हुआ है और न हीं शान्ति प्रक्रिया को गति मिली है। आज कल पूरे देश में राजनीतिक दलों की सभा और बन्द का सिलसिला जारी है। हास्यास्पद तो तब लगता है, जब वे संविधान निर्माण नहीं हो सकने की बात पर जोर जोर से चिंघारते नजर आते हैं। जिसे संविधान का निर्माण करना है, वे ही दहाडÞ लगा रहे हैं अगर ये लोग संविधान निर्माण करने में असक्षम हैं तो क्यों नहीं संविधान सभा से त्यागपत्र दे देते हैं। इतनी सी बात समझ में नहीं आती है। सिर्फभोली भाली जनता को ठगने का काम चल रहा है। शान्ति स्थापना तो दूर अब देश में हिंसा का दौर भी फिर से शुरु हो गया है। अभी कुछ ही दिनों पहले जनकपुर में हुए बम बिस्फोट ने भय और त्रास फैला दिया है कि न जाने कब कहाँ क्या हो जाए।
सभी समस्याओं का मूल यह है कि सांसद या नेतागण अपने दायित्व का निर्वहन निष्ठापर्ूवक नहीं कर पा रहे हैं। इस रुख पर जनता की ओर से अभी धीमी अवाज ही उर्ठाई जा रही है लेकिन कब यह विस्फोटक रुप धारण कर ले इसका ठिकाना नहीं है। आवश्यकता है कि प्रधानमन्त्री अपने कर्तव्य का पालन निष्ठापर्ूवक करें तथा सांसद और मन्त्री भी। अगर ऐसा नहीं होता है तो लोकतन्त्र का सारा ढाँचा अर्थहीन हो जाएगा। इस सम्बन्ध में निष्पक्ष विश्लेषण और कठोर निर्ण्र्ाालेने का समय आ गया है। निश्चय ही देश में हो रही सभी घटनाओं का अन्तिम उत्तरदायित्व नेपाल सरकार का है। कोई भी सरकार इससे कतरा नहीं सकती। यह ठीक है कि सरकार प्राकृतिक तत्वों पर नियन्त्रण स्थापित नहीं कर सकती तथा और भी कई चीजें हैं, जिन पर उनका वश नहीं। फिर भी लोकतन्त्र की जननी के नाम से मशहूर ब्रिटेन में व्यवस्था का र्सवाधिक ठोस सिद्धान्त यही माना जाता है कि अगर किसी विभाग में कुछ उल्टा-सीधा हो जाए तो उसके मन्त्री को ही शूली पर चढÞना होता है। कोई मन्त्री अपने अधीनस्थ कर्मचारी की आडÞ में अपनी जान नहीं बचा सकता। उसे अपने विभाग की गलती के लिए भी खुंद ही जिम्मेवारी लेनी होती है। यह अत्यन्त दर्ुभाग्यपर्ूण्ा है कि हम नैतिकता की ऊँचाई से लगातार नीचे गिरते जा रहे हैं। आये दिन मन्त्रियों द्वारा अपनी जिम्मेदारियों को अस्वीकार करने की प्रवृति पर््रदर्शति हो रही है और वह भी उस हालत में जब उनके विभागों में गडÞबडिÞयों के विस्फोट हो रहे हैं। यह ठीक है कि पतन का यह क्रम अचानक आज शुरु नहीं हुआ है। यह बहुत दिनों से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है। लेकिन इस में भी शक नहीं कि गिरावट में तो तेजी हाल ही में आयी है। हमारी वित्तीय व्यवस्था में लोगों की आस्था हिल गयी है। हमारे देश को अन्य देशों की तरह बाहर या बाहरी लोगों का भय नहीं है बल्कि यह अपने ही लोगों के क्रियाकलाप से ग्रस्त है। देश में ऐसा कोई दैवी प्रकोप भी नहीं हुआ है जिसके लिए मनुष्य जिम्मेदार नहीं है। किसी न किसी को संशय के कटघरे में अभियुक्त होकर खडÞा होना ही पडेÞगा। सम्भव है कि एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समूह की जिम्मेदारी हो, आज देश की माली हालत के लिए। संसदीय लोकतन्त्र इन प्रश्नों को अनुत्तरित छोडÞकर विश्वसनीय नहीं रह सकता। लगता है व्यवस्था के सभी मुख्य तन्त्रों ने बिगडÞती हर्ुइ परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया है और दरबारी संस्कृति दिन-प्रति-दिन दृढÞतर होती जा रही है। यह सच है कि संविधान निर्माण के विषय में सभी दलों की स्थिति हास्यास्पद बनी हर्ुइ है और छवि भी धूमिल हर्ुइ है।
अब समझ आ गया है कि देश की बिगडÞती हर्ुइ हालात पर गम्भीरता से चिन्तन मनन कर कुछ ठोस कदम उठाए जाएँ। स्थिति अगर और विकृत हो गयी तो इसे सम्भालना आसान नहीं होगा। आज नेता संसद और संविधान सभा सदस्य होकर भी अपनी गरिमा का ख्याल किये बिना जनहित की जगह व्यवस्था हित को ही मूल मान रहे है तथा संसद में आये दिनों में नियमों और कायदे कानूनों की जो अवहेलना होती रहती है, उसका असर जनजीवन पर प्रतिकूल पडÞ रहा है। नजदीक से देखने पर कभी कभी सरकार की स्थिति कुरूप नजर आती है। किसी की दया पर निर्भर रहना कितना दयनीय होता है, यह कोई किसी दिन संसद में आकर देखे। राजनीति का सच केवल सरकार और संसद ही नहीं है बल्कि उसका सच निहित है जनता में और जनता मिट्टी की अबोध मूरत नहीं होती। हमें अपने विचारों और चिन्तनों में भी परिवर्तन लाना होगा। एक ओर अधिकांश लोगों से बातें करने पर राजनीति के प्रति घृणा और राजनेताओं के प्रति गालियों की बौछार सुनने को मिलती है। लेकिन दूसरी ओर जब किसी मन्त्री या राजनेता का सामना होता है तो बाँछें खिल जाती है। आज राजनीति हमारे जीवन का एक अंग बनती जा रही है। यह एक कडÞवी सच्चाई है, जिसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। राजनेताओं को यह बखूबी समझने की आवश्यकता है कि राजनीति में सपनों का आकार छिन्न भिन्न भी होता है, क्योंकि सच्चाइयाँ कभी कभी सपनों से भी ज्यादा धूमिल होती हैं। इतिहास के लिए वैसे हर तिथि महत्व की होती है और यह भी सच है कि राजनीति का सच ही भविष्य में इतिहास के नाम से पुकारा जाता है। एक इतिहास महात्मा गांधी का और गणेशमान सिंह का है तो दूसरा इतिहास हिटलर, मुसोलिनी और ज्ञानेन्द्र का। अब आपको तय करना है कि आप अपने आप को किस श्रेणी में रखना पसंद करेंगे। लेकिन इतना तय है कि समय रहते ही चेतना जरुरी है। एक बार जब गाडÞी पटरी से नीचे उतर जाती है तो पुनः उसे पटरी पर लाने के लिए बडÞा परिश्रम करना पडÞता है। पिछले कुछ वर्षों से देश विचित्र तरह से चरमरा रहा है। राजनीतिक व्यवस्था और अर्थतन्त्र दोनों पटरी से नीचे उतर गए है। विचित्र संत्रास से यह देश गुजर रहा है। कहीं पानी की भयावह किल्लत, तो कही बिजली का अभूतपर्ूव संकट और हर आदमी की इज्जत दाँव पर। हर परिवार का सदस्य अपने को असुरक्षित अनभुव कर रहा है। इन्हीं आशंकाओं में इस देश के अधिकांश लोगों की नींद हराम रहती है। हम जिस सामाजिक ढाँचे में रह रहे हैं, उस में भयानक गिरावट आयी है। राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, स्कूल-काँलेज के शिक्षक, कार्यालय के बडेÞ-छोटे बाबू तथा सामान्य दुकानदार और सरकारी तथा गैरमामूली तबका सबों में गिरावट और बेहिसाब भ्रष्टाचारदिखाइ देता है । ऐसे में यही लगता है कि देश का क्या होगा – ±±±

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