खुली सीमा पर खुली विचार धारा

:भार तीय राजदूत महामहिम र णजीत राय द्वारा

डा. श्वेता दीप्ति:फागुन ६ गते के कान्तिपुर के ‘विविधा’ पृष्ठ पर एक वृहत साक्षात्कार को जगह मिली थी, वह था भारतीय राजदूतावास के राजदूत महामहिम रणजीत राय का साक्षात्कार । एक सुखद संयोग नजर आया कि नेपाल के एक प्रमुख प्रकाशन ने अपना एक पूरा बहुमूल्य पृष्ठ भारतीय राजदूत को दिया । कई कही-अनकही बातें इस साक्षात्कार में उभर कर सामने आई । भारत और नेपाल के पक्ष की कई बातों को उक्त साक्षात्कार में समेटने की कोशिश की गई है । कई मुद्दे उभर कर सामने आए और उनका बहुत ही बारीकी और चतुर्राई के साथ राजदूत महोदय ने प्रतिउत्तर दिया । नेपोलियन हिल ने कहा है कि “बोलने से पहले आपको दो बार सोचना चाहिए क्योंकि आपके शब्द, Ranjit Raeकिसी के मन में सफलता या असफलता के बीज बो सकते हैं ।” महामहिम के वक्तव्य में ये खूबी दिखी । ‘कान्तिपुर’ और ‘द काठमान्डू पोस्ट’ के सम्पादकद्वय सुधीर शर्मा और अखिलेश उपाध्याय ने उन्हें कई अहम् विषयों पर लपेटने की कोशिश की किन्तु भारतीय राजदूत ने हर बार अपनी वाक्कला का परिचय दिया । ऐसा नहीं है कि उन्होंने किसी भी प्रश्न से बचना चाहा है, किन्तु ये स्पष्ट दिखा कि संवेदनशील प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने काफी र्सतर्कता और सहजता के साथ दिया है । यही तो कूटनीति है -व्यक्तियों अथवा राष्ट्रों के पारस्परिक व्यवहार में दाँवपेंच की ऐसी नीति या चाल जो सहज में प्रकट या स्पष्ट न हो सके ।
नेपाल संक्रमण काल से गुजर रहा है । यही प्रश्न जब प्रश्नकर्त्तर्ााे पूछा तो उनका सुनिश्चित जवाब था, जो अक्सर हम सुनते आए हैं कि शान्ति प्रक्रिया नेपाल की एक बडी उपलब्धि है और भारत आशान्वित है कि नेपाल जल्दी ही शान्ति और संविधान के पथ पर तेजी से अग्रसर होगा क्योंकि निर्वाचन के बाद सत्ता में आने वाले दल इसके लिए प्रतिबद्ध हैं । संक्रमण काल को लेकर एक गौरतलब बात जो उन्होंने रखी वो ये कि नेपाल कई एक संक्रमण से गुजर रहा है जैसे, राजतन्त्र से गणतन्त्र की ओर बढÞने का संक्रमण, हिन्दू राज्य से धर्मनिरपेक्ष राज्य में परिवर्तित होने का संक्रमण और आर्थिक संक्रमण । एक बात शायद उनके जेहन में नहीं आई, भाषा विवाद और प्रान्तीय विवाद का संक्रमण । बावजूद इसके उनका मानना है कि प्रगति सुस्त है किन्तु जिस दिशा में आगे बढ रहे हैं वह महत्वपर्ूण्ा है, जो निश्चय ही देश की दशा और दिशा को तय करेगा ।
एक प्रश्न जो हमेशा हर नेपाली के मन को उद्वेलित करता है कि भारतीय प्रशासन नेपाल के राजनीतिक दल को आन्तरिक रूप में संचालित करता है । जब महामहिम के समक्ष इस संवेदनशील प्रश्न को रखा गया कि, भारतीय संस्थापकों पर हमेशा से यह आरोप लगता आया है कि वो यहाँ के राजनीतिक दल का सूक्ष्म व्यवस्थापन करने की कोशिश करते हैं, तो उन्होंने आश्वस्त किया कि भारत के मन में शुभेच्छा और र्समर्थन के अलावा कुछ नहीं है । भारतीय दूतावास या भारत सरकार नेपाल में ऐसी किसी भी सूक्ष्म व्यवस्थापन की नीयत नहीं रखती । किन्तु जब कोई भावना घर कर जाती है तो उसका कोई-न-कोई आधार अवश्य होता है जो समय-समय पर उग्र रूप धारण कर लेता है । सवाल यह है कि अगर नेपाली जनता ऐसा सोचती है तो क्या भारतीय राजदूत के वक्तव्य से वह संतुष्ट हो जाएगी – शायद नहीं, क्योंकि किसी-न-किसी वजह से उनकी सोच पुख्ता हो जाती है । इसे सिर्फकह कर दूर नहीं किया जा सकता बल्कि उनकी सोच को बलवती बनने से रोकने के लिए राजनीतिज्ञों को कोई निश्चित और मजबूत कदम उठाना पडÞेगा । जहाँ यह सोच है कि नेपाल के द्विपक्षीय सम्बन्ध को भारत के तीन व्यक्ति निर्धारित करते हैं-भारतीय राजदूत, राष्ट्रीय सलाहकार और रिर्सच और एनालिसीस विंग, इसे कैसे तोडÞा जाय – आपका मानना है कि नेपाल के सम्बन्ध में भारतीय दलों की एक सहमति है । जो यही चाहते हैं कि नेपाल में शान्ति और संवैधानिक गणतंत्र मजबूती के साथ स्थापित हो । भारत सरकार की जो नीति और निर्ण्र्ााप्रक्रिया नेपाल के सम्बन्ध में है, उसे शायद यहाँ गलत रूप से व्याख्यायित किया जा रहा है या समझा जा रहा है । आपने बार-बार इसी बात पर बल दिया कि भारत यहाँ अपनी कोई विशेष दखलन्दाजी नहीं कर रहा है ।
नेपाल और भारत की सुरक्षा और विकास के मुद्दे पर आपका मानना है कि भूमण्डलीकरण और अन्तरनिर्भरता के वर्तमान युग में शान्ति, समृद्धि और सुरक्षा सभी की आवश्यकता है । एक देश में अगर कुछ घटित होता है तो उसका असर दूसरे पर भी पडÞता है और जहाँ तक भारत और नेपाल की बात है तो यह विदित है कि हमारी सीमा खुली हर्ुइ हैं । इस स्थिति में हम किसी भी परिस्थिति में एक दूसरे से ज्यादा प्रभावित होते हैं । तो आवश्यकता इस बात की है कि हमें हर हाल में मिलकर और साथ चलकर ही समस्या का निदान करना होगा । इसलिए सुरक्षा का सवाल दोनों देशों के लिए एक साझा सवाल है, जिसे मिल कर ही सुलझाया जा सकता है । क्योंकि, साथ आना शुरुआत होती है, साथ रहने से प्रगति होती है और साथ काम करने से सफलता मिलती है । भारत और नेपाल के बीच सीमा का खुला होना हमेशा ही विवाद का विषय रहा है । आतंकवाद, तस्करी जैसे गम्भीर विषयों पर जब भी चर्चा होती है, तो इसके मूल में कहीं-ना-कहीं  सीमा का खुला होना भी जिम्मेदार माना जाता है, जो अंशतः सही भी है । जहाँ सीमा का खुला होना आम जनता के लिए सुविधा का विषय है वहीं अपराधी वर्ग के लिए यह वरदान का काम करता है । खुली सीमा के विषय में जितनी बेवाकी से भारतीय राजदूत रणजीत राय ने अपना मंतव्य रखा ऐसा पहले सम्भवतः  किसी राजदूत ने नहीं रखा था, यहाँ तक की पर्ूव राजदूत श्री विमलप्रसाद से लेकर जयन्तप्रसाद जो बिहार और नेपाल के भौगोलिक वातावरण से अच्छी तरह परिचित थे उन्होंने भी कभी इतना स्पष्ट वक्तव्य नहीं दिया । राजनीति से परे महामहिम रण्जीत राय ने इस सर्ंदर्भ में अपने व्यक्तिगत विचार भी रखे यह प्रशंसनीय है । खुली सीमा का होना अगर भारत के लिए फायेदेमन्द है तो उससे कहीं ज्यादा नेपाली जनता के लिए फायदेमन्द है । व्यावहारिक रूप में अगर देखा जाय तो मंहगाई से पीडिÞत नेपाल की वो जनता, जो सीमा के करीब रहते हैं, उन्हें सीमा का खुला होना काफी हद तक मंहगाई के त्रास से बचाता है । इतना ही नहीं, ऐसे कई सुदूर प्रदेश हैं जहाँ हमारी सरकार सुविधा मुहैया नहीं करवा पाती  वो खुली सीमा की वजह से जी पाते हैं । निश्चय ही ये बातें व्यावहारिक हैं, राजनीतिक नहीं किन्तु इस पर ध्यान देने की अपेक्षा जनता तो करती ही है ।
भारतीय राजदूत ने स्पष्ट रूप में यह कहा कि सीमा का खुला होना दोनों देशों के लिए महत्वपर्ूण्ा है और दोनों देशों को सहकार्य और समन्वय से इस बात का फायदा उठाना चाहिए । सीमा पर कडÞे नियमों की आवश्यकता है और गस्तीदल को र्सतर्कता अपनाने की आवश्यकता है, किन्तु उन्होंने इस बात पर पुनः बल दिया कि सीमा को खुला रखने की भी आवश्यकता है क्योंकि शताब्दी से ये खुले हैं और दोनों देशों के बीच आपसी सद्भाव और भाईचारा का रिश्ता रहा है, इसलिए भी यह आवश्यक है ।
नेपाल में सम्भावनाओं की कमी नहीं है किन्तु, यहाँ अपेक्षाकृत निवेश कम किया जाता है । महामहिम ने यह माना कि भारतीय कम्पनी यहाँ निवेश करती हैं पर चिन्ता इस बात की है कि जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पा रहा है । क्योंकि निजी क्षेत्र के कम्पनी ऐसा मानते हैं कि सम्भावनाओं के बावजूद यहाँ पर्ूवाधार सम्बन्धी काफी समस्याएँ हैं जैसे बिजली, श्रम और पेटेन्ट की समस्या । जब जलविद्युत् संस्थापन और ऊर्जा साझेदारी की बातें आईं तो आपने स्पष्ट किया कि भारत इस दिशा में सहयोग करता आ रहा है । नेपाल से भारत की ओर जो भी नदियाँ बहती हैं उनसे अथाह जलविद्युत् उत्पन्न किया जा सकता है, क्योंकि दोनों राष्ट्रों को ऊर्जा की आवश्यकता है तो हम क्यों नहीं इन प्राकृतिक स्रोतों का मिलकर विकास करें – इस सर्न्दर्भ में आपने महाकाली सन्धि, कर्ण्ााली, मर्स्याङदी आदि से सम्बन्धित परियोजना की चर्चा करते हुए कहा कि, इसे समझौता के तहत भारतीय कम्पनियों को दिया जा सकता है । किन्तु आपने माना कि काफी लम्बे समय से ऐसे किसी भी कार्य को सम्पादित नहीं किया गया है, जिसकी वजह से शंका का वातावरण तैयार हो जाता है । ऐसा नहीं होने के कारण दोनों देशों को नुकसान हो रहा है । पानी बह रहा है किन्तु सदुपयोग का अवसर समाप्त हो रहा है । इसका लेखा-जोखा कोई नहीं रख रहा कि हम क्या खो रहे हैं । एक अच्छी बात उन्होंने कही कि, ‘बहुत अच्छा’, ‘अच्छा’ का शत्रु बन सकता है, एक पूरी सहमति से शायद हम वह नहीं पा सकते किन्तु इसी क्रम में हम एक अच्छी सहमति जिससे हम लाभान्वित हो सकते हैं उसे गवाँ भी सकते हैं । विवेकानन्द ने कहा था कि, “पवित्रता, धर्ैय तथा प्रयत्न के द्वारा ही सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य धीरे-धीरे ही सम्पन्न होते हैं ।” आपने माना कि विलम्ब हो रहा है पर हम आशान्वित हैं कि जल्दी ही दोनों देश मिलकर किसी महत्वपर्ूण्ा निष्कर्षपर पहुँचेंगे क्योंकि इसके लिए दोनों देश के राजनीतिक दल और जनता के बीच आपसी सहमति की आवश्यकता है, जो सबसे पहले नेपाल और भारत को भी लाभ देगा ।
एक प्रश्न उभर कर आया कि भारत हमेशा छोटी परियोजनाओं मसलन विद्यालय, स्वास्थ्य केन्द्र आदि में सहयोग करता है ऐसा क्यों – प्रतिउत्तर में आपने कई जानकारियाँ दीं जो निश्चय ही नेपाली जनता की जिज्ञासा को शांत कर सकती है । साथ ही आपने इस बात को रखा कि अगर यह कार्य एकीकृत तरीके से किया जाता तो शायद प्रभाव भी स्पष्ट रूप में दिखता ।
भारत और चीन के रिश्तों को हमेशा तल्ख अंदाज में ही देखा जाता है । किन्तु इस संवेदनशील रिश्ते को भी आपने र्सतर्कता के साथ व्याख्यायित किया जो निश्चय ही उनकी दूरंदेशी को स्पष्ट करता है । चीन और भारत के रिश्तों को उन्होंने ऐशियाई देशों के विकास से जोडÞते हुए कहा कि यह समय विकास का है और हम इस सर्न्दर्भ में सहकार्य कर रहे हैं । नेपाल से सम्बन्धित भारत और चीन की किसी अवधारणा के सर्न्दर्भ में आपने चतुर्राई के साथ सिर्फभारत की नीतियों की चर्चा की और कहा कि भारत यहाँ शान्ति और विकास चाहता है और मुझे लगता है कि चीन ही नहीं सम्पर्ूण्ा अन्तर्रर्ाा्रीय जगत् भी नेपाल के लिए यही चाहता होगा । जहाँ तक नेपाल में चीन के निवेश की बात है तो उनके वक्तव्य ने यह स्पष्ट किया कि यह विकास का समय है और संसार का आर्थिक गुरुत्वकेन्द्र एशिया बन रहा है इस स्थिति में चीन भी वही कर रहा है जो हम या अन्य देश कर रहे हैं । अगर असहजता महसूस करने की बात है तो इस सर्न्दर्भ में मैं कुछ नहीं कह सकता सिवा इसके कि विकास के इस दौर में हम कैसे और कितना फायदा ले सकते हैं हमें इस ओर ध्यान देना चाहिए ।
कुल मिलाकर यह वार्ता निःसन्देह कई मायनों में महत्वपर्ूण्ा है । आम जनमानस, कूटनीति और राजनीति के प्रश्नों का काफी बेलाग तरीके से भारतीय राजदूत ने जवाब दिया । किसी भी प्रतिउत्तर में पक्षपात की झलक नहीं मिली, सही ही तो है क्योंकि पक्षपात सभी अनर्थों का मूल होता है, किसी एक के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति पर््रदर्शन भविष्य में कलह का बीजारोपण कर सकता है । एक र्सार्थक और उपयोगी वार्ता के लिए ‘कांतिपुर’ और ‘द काठमान्डू पोस्ट’ बधाई के पात्र हैं

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