खूल्ला शौचालय “पास में नहीं है दाने पर अम्मा चली भूनाने” : बिम्मीशर्मा

sauchalay
बिम्मीशर्मा, विएग्न्ज , ११ माघ | खूल्ला बिश्वविधालय का नाम तो सभी ने सुनाहोगा ? जहां दूर बैठ कर भी विद्यार्थी अध्ययन करते हैं ज्ञान लेते है । यह बिश्वविद्यालय कोई चौर या खूल्ला जगह में नहीं होता । ईसे बस कैम्पस के बंद परिवेश से बाहर ले जायाजाता है । पर हमारे देश में खूल्ला बिश्वविद्यालय तो नहीं है पर खूल्ला शौचालय हर जगह है । लोगों को राह चलते शौच लग जाती है तो वह कहां जाएं । अब दौड कर घर में तो नहीं जा सकते हैं न ? फिर घर में कौन सा शौचालय  बना है ? जाना तो वही खेत मे लोटा ले कर या सडक किनारे पेशाब करना है तो आसमान के निचे खुली जगह से बढिया और क्या होगी?
जब सभी प्राणी खाते हैं तो खाए हुए को पचाने और निकालने के लिए शौच जाना ही पडता है । कोई भव्यमहल में लैपटप चलाते हुए, गाना सुनते हुए बडे मजे ले, ले कर शौच करते हैं । पर सभी की किस्मत ऐसी कहां ? ईसीलिए  जिसके पास महल नहीं हैं वह किसी जंगल या झाडी में लोटा ले कर सुबह सबेरे दुबक कर शौच करते हैं । कहीं कोई देख न ले ईसी लिए जोड से पेट पकड कर उंघते हुए कहीं पेट से कुछ आवाज न आ जाए बडा सम्हल कर शौच करते हैं । यह शौच न हुआ कोई तिजोरी कीचोरी हो गई  ? हां भई पेट भी तो एक तिजोरी ही है जहां सब खाया पिया बंद है ।
ईस देश में सब काम बंद करके करते हैं । किसी को मारना हो या प्यार करना सब छूपा कर करते हैं । करोडों रुपएं का घोटाला भी चूपके से ही होता है । व्यापारी लाखों का लेनदेन बंद कमरे में ही करते हैं । पर यह शौच क्यों लोग खूले में ही करते हैं ? बजार जाईए या सडक में घुमिए कहीं न कहीं कोई खूले में शौच या पेसाब करता हुआ मिल जाएगा । आप मूहं घूमा लिजिए पर उस बंदे को कुछ फर्क नहीं पडता । वह तो साइकल का चैन घुमाने जैसा अपने पैंट का चैन बंद करता है । यह बेचारे को बचपन से ही खूला, खूला जगह पंसद है। ईसी लिए तो गर्मी में बाहर आंगन या छत में सोता है और शौच जा कर किसी सडक किनारे या खेत में जा कर करता है । आदत से जो मजबूर है ।
ऐसे परम आधुनिक दिन दहाडे शौच करने वाले लोग जहां कहीं मिल जाएगें । ईसके लिए गाँव जाना जरुरी नहीं है बस शहर की गल्ली मे यह खूल्ला शौचालय का आम दृश्य दिख जाता है । सरकार खूल्ला शौच मूक्त क्षेत्र के रुप में विभिन्न गाँवों को भले ही कर ले पर यह कभी मूक्त नहीं हो सकता । गाँव की बात छोडिए जब शहर के ही पढे लिखे लोग सडक किनारे शौच करते हैं तो वह अनपढ, गंवार ग्रामीण बेचारे की औकात ही क्या ? उसको तो जब लगी तब लगी चाहे वह खेत हो या सडक । उसको त बस अपने पेट की गंदगी से मूक्त होना है चाहे वह गंदगी कहीं भी गिरे या बिखरे क्या फर्क पढता है ? हम सभी ने बस अपना चेहरा और घर ही साफ रखना सिखा है । बांकी जाए भांड में । ईसी लिए तो पडोसी के दरवाजे पर या सडक किनारे लोग आराम से कूडा फेंक देते हैं ।
खूला शौच मूक्त क्षेत्र को नहीं लोगों के दिमाग को करना हैं । जहां सदियों से गंदगी भरी पडी है । अंधबिश्वास, अशिक्षाऔर अंधकार के जाले से लोगों के दिमाग में गंदगी जमी हुई है । ईसी लिए तो घर में शौचालय न बना कर किसी दुसरे के खेत में आराम से शौच फरमाते हैं । ईन्हे लगता होगा कि हम ईनके खेत में शौच कर के मूफ्त में खेत को मल दे कर मालदार बना रहे हैं । ईस से खेत में उब्जनी बढेगी तो उसीको न फायदा होगा जिस के खेत में वह बंदा शौच करेगा ।
देखिए कितना महान बिचार है उस बंदे की जो दुसरों के खेत में मूंहअंधेरे जा कर शौच कर देता है । लोग मंदिर जा कर पूण्य कमाते हैं । यह बंदा शौच के रुप में अपना मल या पखाना दे कर पूण्य कर रहा है । तब भी आप ईस को डांटते हो, गाली देते हो । अरे आपको अधर्म होगा जो ईस नेक काम पर विध्न डाला तो । आप किसी के शौच करते दृश्य को देख नहीं सकते तो मूंह घूमा लिजिए । वह बंदा तो बेचारा खुद ही मूंह निचे करके बैठा है । उस पर लानत क्यों ?
बेचारा गरीब आदमी ईतना ज्यादा खून, पसिना बहा कर अपना और परिवार का दो जून का पेट भरता है । अब वह अपना पेट भरे या शौचालय बनाए । वैसे भी गरीब बेचारा खाता ही कितना होगा जो उसको शौचालय जाने की जरुरत पडे ? जो महल में रहते है, बढिया खाते हैं और जिनका शौचालय भी माशाल्लाह किसी फाईभ स्टार होटल से कम नहीं है। वही न बार, बार शौचालय जाते है । उन्हे ही बार, बार दस्त लगती है । गरीब बेचारे की पेट में भूख से ऐंठन पडती है दस्त नहीं लगती ।
धनिको का घर और किचन दोनों खाने से भरा, भरा रहता है ईसी लिए शौचालय भी हमेशा शौच से भरा रहता है । गरीब बेचारे के पास नहाने, धोने और पहनने के लिए एक ही कपडा है । तो वह क्या निचोडेगा और क्या पहनेगा ? उसी तरह खाने के लिए दाने के लाले हैं और पखाना विसर्जन करने के लिए कमरा कहां से लाए ? सोने के लिए कमरा नहीं और शौच करने के लिए कमरा ? ईतनी बडी प्रकृति द्धारा दी गई खूला छत जैसा आकाश और अपने घर जैसा चारों खूला खेत, खलिहान । जहां जहां मर्जी हो मजे से बैठ जाओ शौच करने किसी के बाप का क्याजाता है ?
खूल्ला शौचालय मूक्त नही देश को गरीब से मूक्त कर देना चाहिए । गरीब हैं तो गरिबी है जब गरीब ही नहीं रहेगें तब न रोग, भोख और शोक होगा न खूले में शौच होगा ? गरिबी है तो गंदगी और शौच है । ईसी लिए सरकार को गरीब से ही पहले निपटारा कर लेना चाहिए । न रहेगा बांस न बजेगा बांसूरी । सरकार धडल्ले से खूल्ला शौच मूक्त क्षेत्र शान से घोषणा करती जाएगी और गरीब खाली पेट पिसता जाएगा सरकार के ईस रवैये में । यह तो गरीब के लिए उसी मुहावरे की तरह हो जाएगी कि “पास में नहीं है दाने पर अम्मा चली भूनाने ।” खाने के लिए कुछ है नहीं शौचालय बनाने के लिए ईतनी हाय तौबा ? (व्यग्ंय)

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