खेल राजनीति का और नियति मधेश की

डा. श्वेता दीप्ति:इतिहास साक्षी है, २०६३ में संघीयता की माँग को नजरअंदाज कर जब अंतरीम संविधान बना तो उसे जलाया गया । जलाने की नौबत आज भी है । उस वक्त जब मधेशी जनता ने यह कदम उठाया था तो उनकी संख्या नगण्य थी । किन्तु जब शासकवर्ग की दमन नीति ने सर उठाया तो मधेश आन्दोलन की आग ऐसी भडÞकी कि उसकी तपिश को महसूस करते हुए अन्तरिम संविधान में संशोधन करके संघीयता को परिभाषित करने की कोशिश की गई । किन्तु आज भी यह कोशिश कोई रंग नहीं दिखा पाई है । हम सबने बचपन में एक कहानी पढÞी होगी, ‘कछुए और खरगोश की कहानी’ । कहानी में अहंकार की मद की वजह से खरगोश की तीव्रता ने मात खाई थी और हमें madheshi morchaयह सीख मिली थी कि धर्ैय और बुद्धि से बडÞी-से-बडÞी चुनौतियों से लडÞा जा सकता है और जीता भी जा सकता है । यहाँ इसकी चर्चा करने का तार्त्पर्य यह है कि अभी के परिदृश्य में खरगोश की तीव्रता का तो सवाल ही नहीं उठता किन्तु कछुए की जिस मंथर गति को हम देखते आ रहे हैं इसमें दूर-दूर तक यह उम्मीद नहीं दिख रही कि उसकी धर्ैयता से उसे कोई सही मंजिल मिलने वाली है । सवाल यह है कि इसमें बुद्धि की कमी है या त्याग की – जहाँ तक धर्ैय का सवाल है, तो वह तो मधेश की मिट्टी में बहुत है आज भी वह अपने धर्ैय का परिचय दे रही है किन्तु कब तक – मधेश व्रि्रोह के तकरीवन आठ वर्षबीत चुके हैं । इन आठ वर्षों में मधेश ने क्या हासिल किया – हाँ कुछ शब्द उसके हिस्से में अवश्य आए मसलन समावेशीकरण, समानुपाती, सहभागिता और एकाध उच्चपद । शब्दों ने कुछ क्षण के लिए तुष्ट किया और पदों ने औरों की निगाहों में मनोबल बढाया । राज्य में उसका प्रतिनिधित्व सिर्फप्रतीकात्मक है सारभूत नहीं । राज्य के सभी महत्वपर्ूण्ा अंग में मधेश नगण्य है यह तथ्य और आँकडÞे बताते हैं । आज जब समानता के अधिकार की बात होती है तो कुछ पदों और व्यक्तियों के नाम को गिनाकर कहा जाता है कि और क्या चाहिए । अधिकार की माँग होती है तो विखण्डनकारी का तमगा मिलता है । विगत के कुछ ही महीनों में मधेश में जितनी भी घटनाएँ घटीं चाहे वो फेशबुक कमेंट काण्ड हो, सी.के.राउत गिरफतारी प्रकरण हो, विकास की माँग करने वाले जयनारायण पटेल की मौत का सवाल हो या प्रहरी नियंत्रण में ताजपुरिया हत्याकाण्ड हो, इन सब में सत्ता पक्ष की दमन नीति और मधेश के प्रतिनिधियों की खामोशी और कथित दखलअंदाजी गौरतलब है । प्रत्येक घटना में सत्ता की उपेक्षापर्ूण्ा नीति और मधेशी नेताओं की खानापर्ूर्ति स्पष्ट देखने को मिल रही है । खैर ।
मधेश के नेताओं ने नारा दिया था ‘एक मधेश एक प्रदेश’ । मधेशी जनता उत्साहित थी कि अब उन्हें और उनके अस्तित्व को पहचान मिलेगी । उनकी मेहनत का फल भी उन्हें ही मिलेगा और शासन के हर क्षेत्र में उन्हें स्थान मिलेगा । फलस्वरूप अपने प्रतिनिधियों को उन्होंने चुना । किन्तु जिनके हाथों मधेश की पतवार थी उन्होंने ही कश्ती को डुबोया । एक मधेश और एक प्रदेश की माँग करने वाले खुद ना जाने कितने टुकडÞों में बँट गए । इनके धनमोह,  परिवारमोह और जातिमोह ने मधेशमोह को कहीं परे ढकेल दिया । मधेश खुद से ठगा गया । अवसरवादी नेता आज भी इससे निकल नहीं पा रहे और इसकी पीडÞा मधेश की जनता आज तक भुगत रही है । मधेश को आज भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है यह लगभग तय हो चुका है । कल तक एक मधेश एक प्रदेश की माँग आज एक मधेश दो प्रदेश में बदल चुका है और सत्तासीन तो और भी न जाने कितने टुकडÞों में बाँटने और मधेश की स्थिति को और भी लचर बनाने के लिए तैयार बैठे हुए हैं । सत्ता नामकरण और प्रदेश बँटवारे में उलझी हर्ुइ है । संवाद समिति की सभी बैठकें बिना किसी  निष्कर्षके खत्म होती रहीं और अब तो उनके पास समय ही नहीं है । प्रदेश बँटवारे में भी उसे कमजोर बनाने की पूरी कोशिश की जा रही है अगर वह मान्य हो गया तो मधेश के लिए वह आत्मघाती ही साबित होगा । मधेश की स्थिति आगामी दिनों में क्या होगी यह तो आन्दोलन के पश्चात् ही कायम हो चुका था । मधेशी जनता अपने ऊपर हुए विभेद के कारण ही अलग प्रान्त चाहती थी किन्तु आन्दोलन के बाद राज्य ने ही यह तय किया था कि मधेश को स्वायत्त प्रदेश की मान्यता दी जाएगी । किन्तु नेताओं ने ऐसी नीति अपनाई कि बात जातीयता, पहचान आदि मुद्दों में उलझती चली गई । आज अगर मधेश से किए गए वादे के विपरीत कुछ फैसले लिए जाते हैं तो आगे की राह और भी उलझ जाएगी यह तो तय है । भले ही मधेश ने मधेशी नेताओं को नकारा हो किन्तु इसका अर्थ यह तो कदापि नहीं निकालना चाहिए कि उसने अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख दिया है ।
खैरियत है कि अब कई सबल मधेशी नेताओं को मधेश के साथ किए गए वादे याद आ रहे हैं । किन्तु ऐसे मधेशी नेताओं की कमी भी नहीं है जो मधेश को जातीयता, संस्कृति और पहचान के नाम पर कई टुकडÞों में बाँटने के लिए तैयार हैं और रोज कोई ना कोई वक्तव्य जारी कर रहे हैं । विजय गच्छदार जी स्पष्ट कह रहे हैं कि मधेश को एक नहीं दो प्रदेश में बाँटा जाय, थरुहट तर्राई पार्टर्ीीे नेता गोपाल दहित का मानना है कि तर्राई को तीन भागों में बाँटा जाय वहीं नेपाल नागरिक पार्टर्ीीे अध्यक्ष राजकुमार लेखी का कहना है कि पहाडÞ और तर्राई की जनसंख्या समान है इसलिए प्रदेश का बँटवारा भी समान ही होना चाहिए । इन सभी विचारों में दूरदर्शिता कहीं नजर नहीं आ रही सिवा इसके कि आज भी जनता की भावनाओं को उकसाकर राजनीति की खिचडÞी पकाई जा रही है । पहचान, संस्कृति, भाषा ये कुछ ऐसे भावुक शब्द हैं जिसमें किसी भी समुदाय विशेष को उलझाकर नेतागण अपनी स्वार्थसिद्धि करते रहे हैं । किन्तु किसी भी क्षेत्र का विकास उसकी समृद्धि और सामर्थ्य पर निर्भर करता है । अगर आपके पास वही नहीं है तो आपकी पहचान और संस्कृति तो स्वयं मिट जाएगी । समृद्धि और सामर्थ्य के लिए एकजुटता की आवश्यकता होती है । सोचने वाली बात तो यह है कि आजतक मधेश जिस विभेद और शोषण का शिकार होता आया है क्या वह जाति विशेष था, क्षेत्र विशेष था या वर्ग विशेष था – नहीं यह शोषण समग्र में था । तो आज जब स्वायत्ता की बात उठ रही है, अधिकार की बात उठ रही है, स्वशासन की बात उठ रही है तो क्यों उन्हें आपस में ही विलगाव की राह पर ले जाने की कोशिश की जा रही है । जब जब अधिकार की बात हर्ुइ किसी ना किसी तरह फूट डालकर उसे रोका गया । मधेश के विकास में आज वही नेता बाधा बने हुए हैं जिन्हें मधेश के विकास के लिए के लिए चुना गया था । उनकी मौकापरस्ती और सत्ता मोह ने मधेश को बर्बादी के कगार पर ला खडÞा किया है । आज भी वो इससे बाज नहीं आ रहे हैं । मधेशवादी दलों को जिस विभेद ने जन्म दिया था आज उनकी अवसरवादिता और परिवारमोह ने उन्हें पतन की ओर धकेल दिया है ।
विगत को देखें तो नामकरण, एकल पहचान, बहुपहचान आदि जैसे अनावश्यक बातों में समय गँवाकर पहला संविधानसभा भंग किया  गया और आज कम से कम प्रदेश बनाना, उनके नामकरण आदि जैसे मसले पर उलझे हुए हैं जिससे यह तो जाहिर है कि निर्धारित समय पर संविधान जनता को मिलने वाला नहीं है । ये सारे प्रयास ऐसे हैं जो राज्य पुनःसंरचना और संघीयता की महत्ता को कमजोर कर रहे हैं और एक बार फिर जो विभेद और असमानता के शिकार हैं उन्हें किनारे करने की साजिश की जा रही है । एक पक्ष जातीय संघीयता और अधिकार की बात को छोडÞकर प्रदेश नामकरण संख्या आदि के सवाल में उलझे हैं तो दूसरा पक्ष अपने बहुमत की धाक और शासकीय ताकत के मद में अपनर्ीर् इच्छा जबरन थोपने के अराजकीय खेल में व्यस्त हैं । यह सच है कि राजनीति में एक स्वर और एक विचार नहीं होते, किन्तु यह भी एक सच है कि विश्व में कई उदाहरण ऐसे हैं जहाँ यहाँ से कहीं अधिक जटिल समस्या होने के बावजूद संविधान बना भी है और लागू भी हुआ है । वार्ता से बडÞे बडÞे मसले हल हुए हैं तो आखिर इस देश के कर्ण्र्ाार इतने अक्षम क्यों हो रहे हैं – या तो उनमें जज्बा नहीं है या वो मामले की गम्भीरता को सही नहीं आँक रहे हैं और सत्ता शक्ति का आनन्द ले रहे हैं । किन्तु बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ये देखना है ।

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