गठबंधन की गुत्थिया“

पिछले दशको से नेपाल चलाने का जिन्होंने ठेका ले रखा है वे सब नखरा कर के सोए हुए हैं और उनकी इस हरकत ने देश और मधेश को बहुत पीछे छोड़ दिया है । वो तो मधेश की राजनीति है जिसके कारण नेपाल थोड़ा ही सही परंतु प्रगतिशील पथ पर चल रहा है । प्रगतिशील संघीय प्रणाली को आत्मसात् कर के राज्य को भी घुटने पर ला देना की संघीयता को स्वीकार करो ये महज देश के लिये एक अच्छी सबक नही तो और क्या है ।


काठमांडु के खुलामंच मे चल रहे खुला मंचन को अब समेट के मधेश के कसबो में जाना उचित होगा । मधेश मे फिर से कांग्रेस, एमाले और माओवादिओ के लहर बढ़ने की सम्भावना को कम करना होगा ताकि आने बाले चुनाव में अपनी जगह बना सके ।


वरना गंदी राजनीति का खेल बहुत दूर ले जा कर छोड़ देगा मधेशी राजनीति को जिसमे डेढ़ करोड़ और गहनता से देखे तो पूरे देश का विकास और अमन जुड़ा हुआ है ।ansan 1

रणधीर चौधरी
पिछले महीने मधेश आन्दोलन मे दो परिवर्तन देखा गया । पहला, संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा मे संघीय गठबंधन का प्रवेश वा विकास । दुूसरा, मधेश आन्दोलन के विमान का काठमाण्डु में अवतरण । काठमाण्डु के विभिन्न नुक्कड़ों पर राजनीति सभा करने के बाद गठबंधन अभी रिले अन्सन के रूप में जारी है । जो लगता है महज दुनिया को दिखाने के लिये ही किया जा रहा है । वैसे ये एक उचित कदम है । दर्जनो बार सरकार के साथ वार्ता का मंचन कर चुके दलो को फिर से वार्ता के टेबुल पर चाय और बिस्किट के लिये बुलाया जा रहा है । अन्तर सिर्फ इतना है कि पहले वार्ता आन्दोलन को कमजोर करने के लिये बुलाया जा रहा था । अब गठबन्धन और मोर्चा मे फूट डालने के लिये । वैसे तो इस गठबन्धन के निर्माण मे व्यक्तिगत स्वार्थो की बू आ रही है इसको नकारा नही जा सकता । इस गठबंधन की गहराई आखिर है क्या ? कहाँ ले जा सकता है मधेश की राजनीति को ? भीतर का मनोविज्ञान क्या है गठबंधन का ? इन्हीं सवालाें के जवाब तलाशने की कोशिश है इस में ।
गठबंधन का जग
दर्जनों मधेशी की हत्या हुई मधेश आन्दोलन के दौरान । आन्दोलन का उदेश्य था विभेदकारी संविधान मे संशोधन । जब मधेश में कत्लेआम हो रहा था उस वक्त राज्य के बन्दूकों पर कांग्रेस, एमाले, माओवादी और राप्रपा जैसे पार्टियों का कब्जा था और अभी भी उन्हीं का है । आन्दोलन शान्तिपूर्ण था । आन्दोलन को मजबुत बनाने के लिये मोर्चा ने नाकावरोध करने का निर्णय लिया । सुनबाई आन्दोलन का कहे या कुछ और संविधान मे कथित संशोधन किया गया । संसद मे संविधान संसोधन का मंचन चल रहा था मधेशी दलो को खुश करने के लिये और उस वक्त मधेशी दल सड़क में चिल्ला रहे थे कि उन्हें इस संसोधन प्रक्रिया मे सहभागी नहीं किया गया । परंतु वे उस संशोधन से उतने खफा नहीं थे । अदभुत तो तब लगा जब राजेन्द्र महतो, उपेन्द्र महतो और महन्थ ठाकुर ये सब आन्दोलन के समय सबसे ज्यादा किसी चीज पर जोर दिये थे तो वो था अपनी अपनी पार्टी मे कार्यकर्ता प्रवेश का । ये सब लिखना मधेश आन्दोलन की आवश्यकता पर शंका करना है ऐसी सोच बिलकुल भी नहीं है । परंतु हर चीज का टाइमिङ होता है, उस बात को भूलना नहीं चाहिये । बस ।
आन्दोलन के वक्त किसी की सोच सबसे अलग थी तो वो थी उपेन्द्र यादव की । अशोक राय की पार्टी संघीय समाजवादी से एकता के बाद मधेशी राजनीति को आदिवासी जनजाति से सहकार्य कर संघीय समाजवादी फोरम अपनी पार्टी के राष्ट्रीयकरण करने मे लग चुका था । साथ ही अपनी व्यक्तिगत पहचान वा राजनीति में पकड़ जमाने के लिये संघीय गठबंधन निर्माण जैसे गेम प्लान की सोच बना ली थी, ऐसा आम लोगों का मानना है । कहा जाता है कि अशोक राय के साथ एकता और मोर्चा में अपना अस्तित्व तलाशने में लगे उपेन्द्र यादव को सबसे अच्छा उपाय यही लगा कि एक ऐसा गठबन्धन बनाया जाय जिस मे उनका दबदबा दिखे, संख्यात्मक हिसाब से और तब संघीय गठबन्धन का जन्म हुआ ।
सरकार ने भी इस गठबंधन को बड़े बारीकी के साथ पकड़ा । वार्ता के लिये पत्र तैयार करते वक्त अच्छा दिमाग लगाया । कभी तमलोपा पार्टी कार्यालय में तो कभी सदभावना पार्टी मे पत्र भेज कर वार्ता आह्वान का ढिंढोरा पीटती दिखी सरकार । संघीय गठबन्धन की बयानबाजी कि वार्ता के लिये गठबंधन को पत्र लिखना चाहिये था, इसने तो सरकार की रणनीति को मदद ही किया । आज कहीं न कहीं काठमाण्डु फिर से वही घिसी पिटी डिभाइड एण्ड रुल का फण्डा अपना कर मधेशी राजनीति को कमजोर करने में लगी है ।
काठमांडू को सबक
जब कोइ वाकई में नींद मे सोया हो तो उसको जगाना सरल होता है । परंतु जब सोने का नखरा करे तो उसको जगाना आसान नही । पिछले दशको से नेपाल चलाने का जिन्होंने ठेका ले रखा है वे सब नखरा कर के सोए हुए हैं और उनकी इस हरकत ने देश और मधेश को बहुत पीछे छोड़ दिया है । वो तो मधेश की राजनीति है जिसके कारण नेपाल थोड़ा ही सही परंतु प्रगतिशील पथ पर चल रहा है । प्रगतिशील संघीय प्रणाली को आत्मसात् कर के राज्य को भी घुटने पर ला देना की संघीयता को स्वीकार करो ये महज देश के लिये एक अच्छी सबक नही तो और क्या है ।
उसी तरह नेपाल का संविधान जो कि अभी भी लागू न होने के कारण शैशवावस्था में है और लागू न हो पाने का कारण है कि देश की एक बड़ी जनसंख्या को वह संविधान स्वीकार नही । मधेशी लगायत कोई भी सिमांतकृतवर्ग को वह संबिधान स्वीकार नहीं है । आज जिस तरह गठबंधन का निर्माण हुआ वो एक अच्छा संकेत भी है काठमाण्डौ को सबक सिखाने के लिये और दुनिया को दिखाने के लिये की सीमांतकृत जनता एक है । उनकी एक ही पुकार है कि विभेदकारी संविधान को संसोधित कर देश को एक अच्छी दिशा दी जाय ।
कथित बडेÞ दलों को ये ध्यान दे कर देखना चाहिये कि ये जो गठबंधन है वो सही मे एक समावेशी और नेपाल के असल पीड़ितो का कशक है । हमें प्रकृति से पाठ सीखनी चाहिये । विज्ञान की खोज के बारे मे नेताओं को बारीकी से समझना होगा । मै तो कहुंगा की यह जो गठबंधन है ये पानी है । इनका रूप पानी से मिलता है । विज्ञान ने पता लगाया है की पानी हाइड्रोजन और आक्सिजन से बनता है । पानी की आवश्यकता हरेक प्राणी को है । और पानी जब उग्र रूप लेता है तो दुनिया को तबाह कर के रख देता है । मौनसुन ठीक से शुरु भी नही हुआ है और पानी ने अपना कहर दिखाना शुरु कर दिया है । ठीक उसी तरह यह गठबंधन मधेश और अन्य सीमांतकृत वर्गों का सम्मिश्रण है । भले ही संख्या मे कम दिखती हो काठमांडु में । परंतु इसका फैलाब बहुत है । अगर समय पर सचेत नही हुआ तो बहुत मंहगा पर सकता है काठमांडु को ।
निःस्वार्थ होने की आवश्यकता
जबतक राष्ट्रबाद की परिभाषा मे परिमार्जन नही किया जायगा और व्यबहार मे नहीं उतारा जायगा तबतक हरेक मधेशवादी दलो को अपने जेहन से ये हटा लेना उचित होगा कि उनकी पार्टी भी राष्ट्रीय पार्टी बन सकती है । पोखरा और हुमला मे सभा कर के उनको बेइज्जती का ही सामना करना पड़ेगा । जो उर्जा वो पहाड मे लगाते हंै । अगर वही उर्जा मधेश मे लगाया जाय तो हर एक दिन बहुत हिस्सो मे मधेशी जनता सुनिश्चित होगें । कथित राष्ट्रीय दल के प्रति का मोहभंग होगा ।
हरेक मधेशी दलो को अभी पार्टी पोलिटिक्स से ध्यान हटा कर संबिधान के उपर कैसे जीता जा सकता है उसपर लगना उचित होगा । अपनी अपनी पार्टी को कितना ज्यादा समावेशी बनाया जा सकता है उसपर ध्यान देना चाहिये । और आगे उठ कर, अभी मधेश मे चल रहे क्षमा याचना अभियान की तरह उन्हें भी घर घर जा कर क्षमा याचना चलाना बेहतर । इसके माध्यम से वे मधेश के बहुसंख्यक कथित गैर ब्राहमनो वा शोषितों का विश्वास जीत सकते हैं जो कि चुनाबी दृष्टिकोण से फायदाजनक माना जा सकता है ।
काठमांडु के खुलामंच मे चल रहे खुला मंचन को अब समेट के मधेश के कसबो में जाना उचित होगा । मधेश मे फिर से कांग्रेस, एमाले और माओवादिओ के लहर बढ़ने की सम्भावना को कम करना होगा ताकि आने बाले चुनाव में अपनी जगह बना सके । निहित स्वार्थ जो की राजनीति में हावी दिखती है उसको दिल से त्याग देना होगा तभी जा कर शहीदो का भी सम्मान होगा । मधेशी मोर्चा और संघीय गठबंधन दोनो एक ही परिवार के दो कमरे हैं । एक कमरे में कोलाहल हो तो दूसरे में कैसे अमन चयन हो सकता, ध्यान देना चाहिये घर के मालिक को । शासकों का नापाक इरादा तभी नेस्तनाबूत हो सकता हो जब आपस मे मेल होगा । वरना गंदी राजनीति का खेल बहुत दूर ले जा कर छोड़ देगा मधेशी राजनीति को जिसमे डेढ़ करोड़ और गहनता से देखे तो पूरे देश का विकास और अमन जुड़ा हुआ है ।
अन्त मे राजेन्द्र अनुरागी के कबिता से चन्द पंक्ति रखना चाहता हुँ–हमारी सभी प्रार्थनाएँ अर्थहीन होती है और दृष्टिहीन जतन होते है सभी धूल । आदमी का बेटा युग की परीक्षा मे फेल हो जाता है और नई पीढी के सौ–पचास वर्षो का खेल हो जाता है !

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